pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2009

कुछ इधर की कुछ बहुत उधर की

* मरने के बाद भी वह शासन करता रहा -
फ्रेंच कोंगो के कोंडे प्रदेश के शासक, 'कोकोडो, के मरने के बाद उसका शव एक चौकोर कौफीन में तीन साल तक रख छोडा गया था। उसे भोजन और पैसा उपलब्ध कराया जाता रहा था। ऐसा इसलिए की वह आराम से सोच सके की उसे मृत रहना है की नहीं।
नोट :- उसने मृत रहने का ही निर्णय लिया।

* पोपाई द सेलर का जीता जागता रूप -
जापान के डाक्टर काकुजी योशीदा ने बच्चों को स्वस्थ रखने का गुर सिखाने के लिए एक अनोखा कारनामा किया। उन्होंने ६ साल में करीब ८२८० पाउंड पालक खाई। तकरीबन तीन पाउंड रोज। उनका कहना था इससे वे खुद को भी स्वस्थ और तरोताजा रख सके थे।

* शव यात्रा, जो साल भर तक चली -
चीन के एक जनरल की शवयात्रा, पेकिंग से चल कर काश्गार, सिंकियांग तक गयी थी। जिनके बीच की दूरी २३०० मील थी। यह यात्रा एक जून १९१२ से शुरू हो कर एक जून १९१३ तक चलती रही थी।

* खानदानी असर -
बीमारी इत्यादि का असर तो सुना है, पीढियों तक चलता है। पर इसको क्या कहेंगे जब वाशिंगटन के रोजलिन इलाके के विलियम लुमस्देंन ने अपना बायाँ हाथ एक एक्सीडेंट में खोया तो वह अपने खानदान की चौथी पीढी का ऐसा सदस्य बन गया। इसके पहले उसके परदादा, दादा और पिता उसी की उम्र में अपना बायाँ हाथ किसी न किसी हादसे में गंवा चुके थे।

* अस्थिर दिमाग का अनोखा उदाहरण -
बेल्जियम की एड्रियेंन कुयोत की २३ सालों में ६५२ बार मंगनी था ५३ बार शादी हुई। पर वह कभी भी स्थिर दिमाग नहीं रह पायी और ओसत हर १२ वें दिन उसने अपना मन बदल कर सम्बन्ध तोड़ लिए।

******इधर खुदा है, उधर खुदा है, सामने खुदा है, पीछे खुदा है, अगल खुदा है, बगल खुदा है। ******
******जहाँ नहीं खुदा है, वहाँ कल खुदेगा। हाय रे मेरा शहर!!!!!!!!!


सोमवार, 6 अप्रैल 2009

प्रह्लाद जैसा भाग्य एलेक्सिस का नहीं था

यह कहानी सदियों पहले हमारे देश में घटी, प्रह्लाद की कहानी से मिलती-जुलती है। पर अंत में जहां प्रह्लाद को भगवान का सहारा मिल गया था। वैसा खुशनसीब एलेक्सिस नहीं रहा-------- रूस, जहां हुआ एक तानाशाह, नाम पीटर। आतंक का जीता-जागता रूप। जिसने खुद को ईश्वर घोषित कर रखा था। जिसके शासन काल में हजारों लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी थीं। जो अपना जरा सा भी विरोध सहन नहीं कर पाता था। उसी पीटर का एकमात्र बेटा था, एलेक्सिस। बाप से बिल्कुल विपरीत, शांत, दयालू, विनम्र था जनता का लाड़ला। देशवासी उसे अपनी जान से भी ज्यादा चाहते थे। और यही कारण था कि पीटर के शंकालू मन में अपने ही बेटे के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होती चली गयी। यहां तक कि वह अपनी पत्नि, यूडेसिआ, से भी घृणा करने लगा जिसने ऐसे पुत्र को जन्म दिया। बात इतनी बिगड़ गयी कि एक दिन एलेक्सिस की अनुपस्थिति में उसने यूड़ेसिया को बंदीगृह में डाल दिया। लौटने पर जब एलेक्सिस को यह पता चला तो वह शोकग्रस्त हो गया। वैसे भी उसे अपने पिता की कार्यप्रणाली से नफरत थी, पर वह अपने पिता को चाहता भी था। इसीलिए वह जनता की भलाई में लगा रहता था, जिससे लोगों में उसके पिता के प्रति नफरत कम हो जाए। पर होता इसका उल्टा ही रहा। वह जनता में लोकप्रिय होता चला गया और पीटर बदनाम। इससे पीटर की क्रोधाग्नि और भड़कती चली गयी। उसे यह सब अपने विरुद्ध षड़यंत्र लगता था। उसके शक को उसके चापलूस दरबारी और हवा देते रहते थे। अंत में पीटर ने एलेक्सिस का महल से बाहर निकलना बंद करवा दिया और धीरे-धीरे उसे मदिरा की लत लगवा दी। यह सब देख पीटर के एक मंत्री ने भविष्य भांप कर अपनी बेटी, कैथरिन, की शादी पीटर से करवा दी जिससे उसके पुत्र को राज मिल सके। कैथरिन बहुत चालाक और महत्वाकांक्षी थी। उसने पीटर को अपने मोह पाश में जल्दि ही फंसा लिया। उनका एक बेटा हुआ, जिसका नाम भी पीटर ही रखा गया। अब एलेक्सिस को अपनी राह से हटाने की कोशिशें तेज हो गयीं। एक बार उसे मदिरा में जहर मिला कर दिया गया पर दैवयोग से वह विषयुक्त मदिरा उसके एक सेवक ने पी ली, जिससे उसकी मृत्यु हो गयी। फिर एक बार एलेक्सिस के कमरे में विस्फोटक पदार्थ रख दिए गये पर इस बार भी बाहर रहने की वजह से वह बच गया। धीरे-धीरे एलेक्सिस को अपने पिता और सौतेली मां के षड़यंत्रों की जानकारी मिलने लगी तो उसने रूस छोड़ने का ही मन बना लिया। उसने अपने इस फैसले की जानकारी अपने पिता को दे कर कहा कि मुझे सिंहासन से कोई लगाव नहीं है, मैं कोई अधिकार भी नहीं चाहता, मुझे सिर्फ यहां से चले जाने की आज्ञा दे दी जाए। परंतु शक्की पीटर ने उसकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की। अत: एक रात एलेक्सिस अपनी पत्नि के साथ महल छोड़ निकल पड़ा और रोम में शरण ली। परंतु वहां भी पीटर ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और अपने जासूसों से उसका अपहरण करवा फिर रूस ले आया और बंदीखाने में ड़ाल दिया। इतने से भी उसका मन नहीं भरा और उसने एलेक्सिस को कठोर यातनाएं देनी शुरु कर दीं। पर उसके जिंदा रहने से कैथरिन को अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा था सो उसने पीटर को उकसा कर एलेक्सिस पर राजद्रोह का इल्जाम लगवा उसे मृत्युदंड़ दिलवा दिया। फांसी पर चढते समय एलेक्सिस ने रोते हुए कहा कि मुझे मरने का ना दुख है ना खौफ। मुझे एक ही बात का गम है कि मैं अपने ही पिता को यह विश्वास नहीं दिला पाया कि मैं उनका दुश्मन नहीं हूं।

रविवार, 5 अप्रैल 2009

थका-हारा, लस्त-पस्त कौवा कितने कंकड़ ला सकता था ?

छुटपन से पढ़ते आ रहे हैं की चतुर कौवे ने कंकड़ ला-ला कर घडा भरा और अपनी प्यास बुझाई। पर सोचने की बात है की क्या सचमुच थके-बेहाल कौवे ने इतनी मेहनत की होगी, या कुछ और बात थी। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ था ------------

बात कुछ पुरानी है। कौआ सभी पशु-पक्षियों में चतुर सुजान समझा जाता था। उसकी बुद्धिमत्ता की धाक चारों ओर फैली हुई थी। ऐसे ही वक्त बीतता रहा। समयानुसार गर्मी का मौसम भी आ खड़ा हुआ, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले -पोखर-तालाब सूख गए। पानी के लिए त्राहि- त्राहि मच गई। ऐसे ही एक दिन हमारा कौवा पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसकी जान निकली जा रही थी। पंख जवाब दे रहे थे। कलेजा मुहँ को आ रहा था। तभी अचानक उसकी नजर एक झोंपडी के बाहर पड़े एक घडे पर पड़ी। वह तुरंत वहां गया, उसने घड़े में झांक कर देखा, उसमे पानी तो था पर एक दम तले में। उसकी पहुँच के बाहर। कौवे ने अपनी अक्ल दौडाई और पास पड़े कंकडों को ला-ला कर घडे में डालना शुरू कर दिया। परन्तु एक तो गरमी दुसरे पहले से थक कर बेहाल ऊपर से प्यास। कौवा जल्द ही पस्त पड़ गया । अचानक उसकी नजर झाडी के पीछे खड़ी एक बकरी पर पड़ी जो न जाने कब से इसका क्रिया-कलाप देख रही थी। यदि बकरी ने उसकी नाकामयाबी का ढोल पीट दिया तो ? कौवा यह सोच कर ही काँप उठा। तभी उसके दिमाग का बल्ब जला और उसने अपनी दरियादिली का परिचय देते हुए बकरी से कहा कि कंकड़ डालने से पानी काफी ऊपर आ गया है तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो सो पहले तुम पानी पी लो। बकरी कौवे की शुक्रगुजार हो आगे बढ़ी पर घडे से पानी ना पी सकी। कौवे ने फिर राह सुझाई कि तुम अपने सर से टक्कर मार कर घडा उलट दो इससे पानी बाहर आ जायेगा तो फिर तुम पी लेना। बकरी ने कौवे के कहेनुसार घडे को गिरा दिया। घडे का सारा पानी बाहर आ गया, दोनों ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई।

बकरी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर प्रचार किया। सो आज तक कौवे का गुणगान होता आ रहा है। नहीं तो क्या कभी कंकडों से भी पानी ऊपर आता है ?

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

ऊँट, प्रकृति की एक अजूबी करामात

ऊंट के बारे में हम बचपन से ही पढते-सुनते आए हैं। फिर भी प्रकृति के इस अजीबोगरीब जानवर के बारे में लगता है कि इसे हम पूर्णतया नहीं जान पाए हैं। आईए देखें इसको सूक्ष्मदर्शी से :-

ऊंट के होंठ खरगोश की तरह के होते हैं।

इसके दांत और पेट चूहे से मेल खाते हैं।

इसके पैर हाथी से मिलते-जुलते होते हैं।

इसकी गर्दन हंस जैसी होती है।

इसका खून पक्षियों जैसा होता है और इसका पित्ताशय (gall bladder) नहीं होता।

यह पलकें बंद कर भी देख सकता है।

यह अपने नथुने बालू के बवंडर में बंद कर रह सकता है।

यह अपने पेट और कूबड़ में पानी जमा कर, बिना पानी बहुत दिनों तक रह सकता है। यह तो बहुत से लोगों को मालुम है। पर स्वच्छ जल इसके लिए हानिकारक हो सकता है। इसे खारा पानी ज्यादा पसंद है, यह कम ही लोगों को मालुम होगा।

इसकी पलकों पर मुलायम रेशमी बाल होते हैं जो इसकी आंखों को सूर्य की चकाचौंध से बचाते हैं।

किसी मरे हुए ऊंट को देख कर इसकी हालत बिगड़ जाती है।


कहते हैं कि एक बार पूराने जमाने में कोई व्यापारी इस पर दूध लाद कर ले जा रहा था। इसकी अजीबोगरीब चाल से धचके लग-लग कर दूध, मक्खन में बदल गया। इस तरह मनुष्य के लिए अमृत समान एक पौष्टिक खुराक की ईजाद हुई।


जानवरों के विशेषज्ञ, जिन्होंने अपनी जिंदगी ऊंटों के अध्ययन में गुजार दी, उनका भी मानना है कि वे इस जानवर के बारे में अधिक नहीं जानते। तो फिर हम कहां टिकते हैं।

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

अजब-गजब दुनिया ( - :

हमारी दुनिया अजूबों से भरी पड़ी है। कभी-कभी तो विश्वास ही नहीं होता कि क्या ऐसा भी हो सकता है ? आज बाप-बेटों के कुछ नमूने देखें -
मोरोक्को के शाह, मुलाइ ईस्माइल (1646-1727) के 888 बच्चे थे। उसकी सेना की एक रेजिमेंट थी जिसमें 540 सैनिक थे और वे सारे के सारे उसके बेटे थे।
टर्की के सुल्तान, मुस्तफा IV (1717-1774) के 582 बच्चे थे। सारे के सारे लड़के। सत्रह सालों तक कन्या पाने की उसकी सारी कोशिशें बेकार साबित हुईं।
सुल्तान अब्दुल हमीद II, (1876-1909) के सिर्फ 500 के करीब बच्चे थे। आश्चर्य इस बात का नहीं है, आश्चर्य इस बात का है कि उसकी 30,000 पत्नियां थीं।
पोलैंड के अगस्ट II और सैक्सोनी (1670-1733) के 355 बच्चे थे, जिनमें 354 नाजायज औलादें थीं। एकमात्र जायज बेटा अगस्ट III था, जो बाद में राजा बना।
फ्रांस में बोरडिक्स के जीन गाई साहब की किस्मत देखिए। उन्होंने 16 बार शादी की। हर बार वधू अपने साथ अपने बच्चों को लाई। अंत में इन्होंने जब सारे बच्चों का हिसाब लगाया तो पाया कि वे 121 बच्चों के सौतेले पिता हैं।
अंत में फ्रांस के ही पुयी-दि-डोम के जैक्स दि थियर्स (1630-1747) की खुशकिस्मति देखिए। इनके 25 लड़के और एक लड़की थी। इनका प्रत्येक बेटा फ्रांस की सेना में कर्नल बना। हरेक ने युद्ध में अपनी-अपनी रेजिमेंट के साथ लड़ते हुए नाम कमाया। युद्ध के बाद लुइस XIV ने उन्हें प्रशस्ति पत्र दिया जिसमें उल्लेख था कि इन 25 थियर्स भाईयों, जो कि श्रीमान जैक्स थियर्स के बेटे हैं के कारण ही युद्ध जीता जा सका। गर्वोनत जैक्स थियर्स ने 117 साल की उम्र प्राप्त की।

रविवार, 29 मार्च 2009

एक सकून दायी ख़बर पाकिस्तान से

कभी-कभी तपती गर्मी में घने पेड़ की छाया पाकर जो सुख मिलता है, वैसे ही पड़ोसी देश से कोई ठंड़ी बयार सी खबर आ मन को सकून पहुंचा जाती है। अभी जाहिदा हिना जी, जो पाकिस्तान की जानी-मानी लेखिका हैं, का एक लेख पढने को मिला। आप भी जायजा लीजिए।
23 मार्च के दिन लाहौर में में भगत सिंह और उनके साथियों को याद किया गया। शादमान चौक पर भगत सिंह की बड़ी तस्वीर रखी गयी, इंकलाबी गाने गाये गये, शहीदों के नाम के नारे लगाए गये। यह सारा कार्यक्रम "भगत सिंह फाउंडेशन फार पीस एंड कल्चर" ने करवाया था। यह तो वह वाकया था जो इंसानियत के जिंदा होने का एहसास करवाता है। अब भाग्य के खेल को देखिए --
उस दिन वहां आने वाले लोगों को बताया गया कि जिस दिन भगत सिंह फांसी चढ रहे थे उस दिन शहर के तमाम मजिस्ट्रेटों ने इस फांसी का गवाह बनने से इंकार कर दिया था। तब एक आनरेरी मजिस्ट्रेट नवाब मोहम्मद अहमद खान ने सरकारी कागजात पर बतौर गवाह दस्तखत किए थे कि उसने भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी लगते और दम तोड़ते देखा। संयोग देखिए वही नवाब मोहम्मद लाहौर के शादमान चौक पर गोली मार कर कत्ल कर दिए गये। यह वही जगह है जहां ब्रिटिश काल में फांसीघर हुआ करता था। काल का पहिया फिर घूमता है। नवाब मोहम्मद के बेटे अहमद रज़ा खान ने पाकिस्तान के प्रधान मंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो के खिलाफ एफ आइ आर दर्ज करवाई और भुट्टो इसी कत्ल के इल्जाम में फांसी चढे।

रविवार, 22 मार्च 2009

कुंभकर्ण, जिसे अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया।

कुंभकर्ण एक महान वैज्ञानिक, ईश्वर भक्त, अपनी जाति और परिवार को अपनी जान से भी ज्यादा चाहने वाला एक प्रचंड योद्धा था। परंतु रावण के प्रभामंडल में गुम तथा एक पराजित पक्ष का सदस्य होने के कारण उसे अपेक्षित सम्मान नहीं मिल पाया। जबकि उसी की उपलब्धियों के कारण रावण अपना साम्राज्य चारों ओर फैला सका था। कुंभकर्ण महीनों एकांत में, अपने परिवार और जनता से दूर रह कर तरह-तरह के आविष्कारों को
मूर्तरूप देने में लगा रहता था। इसीलिए उसके बारे में यह बात प्रचलित हो गयी थी कि वह महीनों सो कर गुजारता है।

अलग-अलग भाषाओं में, अलग-अलग स्थानों में लिखी गयी रामायणों में यथा वाल्मीकि रामायण, कम्ब रामायण, आध्यात्म रामायण, गाथा राम-रावण में तथ्यों के आधार पर कुंभकर्ण की उपलब्धियों का विस्तृत वर्णन किया गया है। कुंभकर्ण शुरु से ही सात्विक विचारों वाला कट्टर शिवभक्त था। शिव जी ने उसे अनेकों सिद्धियां प्रदान की हुई थीं। इसके अलावा महर्षि भारद्वाज ने उसे निद्रा पर काबू पाने का रहस्य बताया हुआ था जिससे वह दिन-रात अपने वैज्ञानिक प्रयोगों में जुटा रहता था। उसने अपने बल-बूते पर तरह-तरह के अंतरिक्ष यान, अतिशय तेज गति वाले तथ, भयंकर क्षमता वाले अस्त्र-शस्त्रों का आविष्कार कर लंका की सेना को अजेय बना दिया था। इतना ही नहीं इसके साथ-साथ सैंकड़ों विद्यार्थीयों को निपुण बनाने के लिए उसने कई प्रयोगशालाएं, अपनी देख-रेख में संचालित कर रखी थीं। एक बार दोनों भाईयों ने शिव जी को आमंत्रित कर अपने सारे संस्थान और प्रयोगशालाएं दिखलाई थीं जिससे खुश होकर उन्होंने दोनों को आशीर्वाद दिया था पर साथ ही साथ आदेश भी दिया था कि इन सारी उपलब्धियों का सदुपयोग धरती के जीवों की भलाई के लिये ही किया जाय इसी में जगत की भलाई है।

पर जैसा की हर चीज का अंत होता है। इस फलती-फूलती सभ्यता का भी सर्वनाश, रावण के अहम और उसकी बहन शूर्पणखा की चारित्रिक दुर्बलता के कारण हो गया। शूर्पणखा के तथाकथित अपमान का बदला लेने के लिए जब रावण सीता जी को उठा कर ले आया और युद्ध ने तहस-नहस मचा दी तो रावण ने कुंभकर्ण को समर में अपने आयूधों के साथ उतरने की आज्ञा दी। कुंभकर्ण ने उसे बहुत समझाया तथा सीता जी को वापस भेजने की सलाह भी दी पर रावण ने उसकी एक ना सुनी उल्टे उसे धिक्कारते हुए कायर तक कह डाला। तब मजबूर हो कर
कुंभकर्ण ने युद्ध करने का निश्चय किया और यहीं से राक्षस वंश के विनाश की नींव पड़ गयी।

युद्धक्षेत्र में कुंभकर्ण के आते ही तहलका मच गया। उसके यंत्रों का कोई तोड़ किसी के पास नहीं था। वानर सेना तिनकों की भांति बिखर कर रह गयी। तब विभीषण अपने बड़े भाई से मिलने गये। विभीषण को सामने देख कुंभकर्ण ने उन्हें अपनी विवशता बताई। उसने कहा कि रावण की गलत आज्ञा माननी पड़ी है मुझे। अब मेरा मोक्ष श्री राम के ही हाथों हो सकता है। यदि वे मेरे अस्त्रों को किसी तरह गला सकें तो मेरी मृत्यु निश्चित है। ऐसा ही किया गया। राम जी ने अपने मंत्रपूत बाणों से कुंभकर्ण और उसके यत्रों को नष्ट कर दिया। इस प्रकार एक महान वैज्ञानिक का दुखद अंत हो गया। उसके काम को आगे बढाने वाला भी कोई नहीं था क्योंकि उसका एकमात्र पुत्र सुमेतकेतु पहले से ही संन्यास धारण कर वनगमन कर चुका था।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...