हमारा शरीर एक अजूबा है। यह इतना जटिल और विचित्र है कि इसके रहस्यों को समझ पाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है। धन्य हैं वे सर्जन, डाक्टर और वैज्ञानिक जो दिन रात एक कर जुटे हुए हैं मानव शरीर के अंगों की पूर्ण जानकारी पाने के लिये जिससे आने वाले समय में मानव रोगमुक्त जीवन जी सके।
आज कान की तरफ कान देते हैं। यह हमारे शरीर की महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्री है। इसका संबंध आंख, नाक, गले तथा मस्तिष्क से होता है। इस पर काफी शोध हो चुका है, पर अभी भी भीतरी कान का इलाज पूर्णतया संभव नहीं हो पाया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एस.एस. स्टीवेंस के अनुसार कान के पास करीब 27000 नर्व-फाइबर्स का जमावड़ा होता है। इसीलिये कान की मालिश बहुत उपयोगी मानी जाती है। कहते हैं कि यदि आप पूरे शरीर की मालिश ना कर पायें तो सिर्फ सिर, कान और पैर के तलवों की मालिश जरूर कर लें खास कर जाड़ों में। इससे भी शरीर को स्वस्थ रहने में काफी सहायता मिलती है।
हमारे यहां तो प्राचीन काल से ही कानों में बालियां पहनने का रिवाज रहा है। इससे कान विभिन्न तरह के रोगों से बचे रहते थे। चीन के चिकित्सकों ने भी इस ओर काफी शोधकार्य कर 'एक्यूपंचर' पद्धति का प्रचलन शुरु किया था। चूंकि कान के पास की बारीक नसों का संबंध दिमाग से होता है, सो स्कूलों में जाने-अनजाने अध्यापकगण चपतियाकर, कान उमेठ कर या कान पकड़ कर उठक-बैठक करवा कर हमारी बुद्धी को चैतन्य करने में सहायक ही होते थे।
वैसे आजकल सौंदर्य विशेषज्ञ सुंदरता बढाने के लिये भी स्लैप-थेरेपी (थप्पड़ चिकित्सा) का उपयोग भी करने लग गये हैं। कहा जाता है कि इस तरह चपतियाने से खून का दौरा बढता है।
तो क्या इरादा है ? सुंदर दिखने के साथ-साथ बुद्धिमान भी कहलवाना चाहते हैं तो शुरु हो जायें आज से ही। वैसे किसी ने अपने ही कान उमेठ कर अपने ही मुंह पर चपतियाते देख लिया तो पता नहीं हम बुद्धिमान बने ना बने पर उसकी नज़र में तो कुछ और ही बन जायेंगे। सो जरा देख-भाल कर चिकित्सा शुरु करें।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 2 जनवरी 2009
मंगलवार, 30 दिसंबर 2008
ज्ञान भी सुपात्र को ही देना चाहिए
एक बहुत विद्वान ब्राह्मण थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। वे घूम-घूम कर लोगों में ज्ञान बांटा करते थे। एक बार इसी तरह विचरण करते हुए वह एक राजा के यहां जा पहुंचे। राजा ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। उन्हें अपने महल में ठहराया। रोज ही उनके सत्संग रूपी प्रकाश से राज्य की जनता अपना अज्ञान रूपी अंधकार मिटाती रही। इसी तरह कुछ दिन व्यतीत होने पर ब्राह्मणदेव ने अपनी यात्रा जारी करने की इच्छा जाहिर की। जाते समय राजा ने उनसे गुरुमंत्र देने को कहा। इस पर उन्होंने राजा से कहा कि सदा आलस्य रहित होकर, शान्ति, मित्रता, दया और धर्म से अपने राज्य का संचालन करते रहना। इस पर राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें एक गांव भेंट करना चाहा पर ब्राह्मणदेव ने उसे लेने से इंकार कर दिया और अपनी राह चल पड़े।
चलते-चलते वे एक नदी किनारे आ पहुंचे। वहां का मल्लाह निपट मूर्ख था। उसे सिर्फ अपने पैसों से मतलब था। उसने आज तक किसी को भी बिना पैसा लिये पार नहीं उतारा था। पैसे के लिये वह लड़ाई-झगड़ा करने से भी बाज नहीं आता था। अब ब्राह्मण को उस पार जाना था सो उन्होंने नाविक से पूछा कि क्या भाई मुझे उस पार ले जाओगे ? नाविक ने कहा क्यों नहीं, किराया क्या दोगे? पंडितजी ने कहा मैं तुम्हें ऐसा उपाय बताउंगा जिससे तुम्हारे धन और धर्म दोनों की वृद्धि होगी। यह सुन कर मल्लाह ने उन्हें पार उतार दिया और उधर जा पैसे की मांग की। पंडितजी ने कहा कि तू पार उतारने के पहले ही यात्रियों से पैसा ले लिया कर, बाद में उनका मन बदल सकता है। यह धन की वृद्धि का उपाय है। नाविक ने सोचा कि इस सलाह के बाद ये पैसे भी देगा, सो उसने फिर किराया मांगा। पंडितजी ने कहा अभी तुझे धन की वृद्धि का उपाय बताया अब तू धर्म वृद्धि का उपाय भी जान ले, कैसा भी समय हो जगह हो कभी क्रोध मत करना इससे तेरा धर्म बढ़ेगा और तू सदा सुखी रहेगा। पर इस शिक्षा का मल्लाह पर कोई असर नहीं हुआ उसने कहा क्या यही तेरा किराया है? इससे काम नहीं चलनेवाला पैसे निकालो। पंडितजी ने कहा भाई मेरे पास तो शिक्षा ही है और कुछ तो है नहीं। मल्लाह चिल्लाया कि अरे भिखारी तेरे पास पैसे नहीं थे तो तू मेरी नाव में क्यूं चढ़ा, इतना कह उसने पंडितजी को नीचे गिरा पीटना शुरु कर दिया। इसी बीच नाविक की पत्नि आ गयी और उसने किसी तरह पंडितजी को छुड़ाया।
पंडितजी जाते-जाते सोच रहे थे कि इसी शिक्षा को सुनकर राजा मुझे गांव देने को तैयार था और उसी शिक्षा को सुन यह जाहिल मेरी जान के पीछे पड़ गया था।
चलते-चलते वे एक नदी किनारे आ पहुंचे। वहां का मल्लाह निपट मूर्ख था। उसे सिर्फ अपने पैसों से मतलब था। उसने आज तक किसी को भी बिना पैसा लिये पार नहीं उतारा था। पैसे के लिये वह लड़ाई-झगड़ा करने से भी बाज नहीं आता था। अब ब्राह्मण को उस पार जाना था सो उन्होंने नाविक से पूछा कि क्या भाई मुझे उस पार ले जाओगे ? नाविक ने कहा क्यों नहीं, किराया क्या दोगे? पंडितजी ने कहा मैं तुम्हें ऐसा उपाय बताउंगा जिससे तुम्हारे धन और धर्म दोनों की वृद्धि होगी। यह सुन कर मल्लाह ने उन्हें पार उतार दिया और उधर जा पैसे की मांग की। पंडितजी ने कहा कि तू पार उतारने के पहले ही यात्रियों से पैसा ले लिया कर, बाद में उनका मन बदल सकता है। यह धन की वृद्धि का उपाय है। नाविक ने सोचा कि इस सलाह के बाद ये पैसे भी देगा, सो उसने फिर किराया मांगा। पंडितजी ने कहा अभी तुझे धन की वृद्धि का उपाय बताया अब तू धर्म वृद्धि का उपाय भी जान ले, कैसा भी समय हो जगह हो कभी क्रोध मत करना इससे तेरा धर्म बढ़ेगा और तू सदा सुखी रहेगा। पर इस शिक्षा का मल्लाह पर कोई असर नहीं हुआ उसने कहा क्या यही तेरा किराया है? इससे काम नहीं चलनेवाला पैसे निकालो। पंडितजी ने कहा भाई मेरे पास तो शिक्षा ही है और कुछ तो है नहीं। मल्लाह चिल्लाया कि अरे भिखारी तेरे पास पैसे नहीं थे तो तू मेरी नाव में क्यूं चढ़ा, इतना कह उसने पंडितजी को नीचे गिरा पीटना शुरु कर दिया। इसी बीच नाविक की पत्नि आ गयी और उसने किसी तरह पंडितजी को छुड़ाया।
पंडितजी जाते-जाते सोच रहे थे कि इसी शिक्षा को सुनकर राजा मुझे गांव देने को तैयार था और उसी शिक्षा को सुन यह जाहिल मेरी जान के पीछे पड़ गया था।
शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008
तालियाँ, पैसे कमाने का एक जरिया.
इस जगत में स्तुति गान की परंपरा रही है, चाहे देवलोक हो या पृथ्वी लोक। देवी-देवताओं, गुरुओं, राजा महाराजाओं, ज्ञानी गुणी जनों आदि की पूजा अर्चना, बड़ाई, स्वागत इत्यादि में तरह-तरह के कसीदे काढे जाते रहे हैं। ये सब कभी श्रद्धा कभी खुशी कभी भय या कभी मजबूरी में भी होता रहा है। आज तो अपनी जयजयकार करवाना, तालियां बजवाना अपने आप को महत्वपूर्ण होने, दिखाने का पैमाना बन गया है। इस काम को अंजाम देने वाले भी सब जगह उपलब्ध हैं। तभी तो लच्छू सबेरे तोताराम जी का गुणगान करता मिलता है तो दोपहर को गैंडामल जी की सभा में उनकी बड़ाई करते नहीं थकता और शाम को बैलचंद की प्रशंसा में दोहरा होता चला जाता है।
यह सब अभी शुरु नहीं हुआ है, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। हमारे यहां अधिकांश शासकों के यहां चारण और भाट ये काम करते आये हैं। जिनमें से बहुतों ने मुश्किल समय में अपने फर्जानुसार देश की सेवा भी की है। पर यहां सिर्फ अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिये की जानेवाली व्यवस्था की बात कर रहा हूं।
रोम के सम्राट नीरो ने अपनी सभा में काफी संख्या में ताली बजाने वालों को रोजी पर रखा हुआ था। जो सम्राट के मुखारविंद से निकली हर बात पर करतलध्वनी कर सभा को गुंजायमान कर देते थे।
ब्रिटेन में किराये के लोग बैले नर्तकों के प्रदर्शन पर तालियों की शुरुआत कर दर्शकों को एक तरह से मजबूर कर देते थे प्रशंसा के लिये। पर इस तरह के लोगों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। ब्रिटेन में ही एक थियेटर में ऐसी हरकत करने वाले के खिलाफ एक दर्शक ने 'दि टाईम्स' पत्र में शिकायत भी कर दी थी। पर उसका असर उल्टा ही हो गया, लोगों का ध्यान इस कमाई वाले धंधे की ओर गया और बहुत सारे लोगों ने यह काम शुरु कर दिया। जिसके लिये बाकायदा ईश्तिहारों और पत्र लेखन द्वारा इसका प्रचार शुरु हो गया।
इटली में भी यह धंधा खूब चल निकला। धीरे-धीरे इसकी दरें भी निश्चित होती चली गयीं। जिनमें अलग-अलग बातों और माहौल के लिये अलग-अलग किमतों का प्रावधान था। बीच-बीच में इसका विरोध भी होता रहा पर यह व्यवसाय दिन दूनी रात अठगुनी रफ्तार से बढता चला गया।
जाते-जाते :- पश्चिम जर्मनी के दूरदर्शन वालों ने एन शैला नामक एक महिला को दर्शकों के बीच बैठ कर हंसने के लिये अनुबंधित किया था। कहते हैं उसकी हंसी इतनी संक्रामक थी कि सारे श्रोता और दर्शक हंसने के लिये मजबूर हो जाते थे।
तो क्या ख्याल है--------------रविवार, 21 दिसंबर 2008
आस्था अपनी अपनी, श्वान पुत्र की माँ का डर
गांव के बाहर एक घना वट वृक्ष था। जिसकी जड़ों में एक दो फुटिया पत्थर खड़ा था। उसी पत्थर और पेड़ की जड़ के बीच एक श्वान परिवार मजे से रहता आ रहा था।
एक दिन महिलाओं का सामान बेचने वाले एक व्यापारी ने थकान के कारण दोपहर को उस पेड़ के नीचे शरण ली और अपनी गठरी उसी पत्थर के सहारे टिका दी। सुस्ताने के बाद उसने अपना सामान उठाया और अपनी राह चला गया। उसकी गठरी शायद ढीली थी सो उसमें से थोड़ा सिंदुर उस पत्थर पर गिर गया। सबेरे कुछ गांव वालों ने रंगा पत्थर देखा तो उस पर कुछ फूल चढा दिये। इस तरह अब रोज उस पत्थर का जलाभिषेक होने लगा, फूल मालायें चढने लगीं, दिया-बत्ती होने लगी। लोग आ-आकर मिन्नतें मांगने लगे। दो चार की कामनायें समयानुसार प्राकृतिक रूप से पूरी हो गयीं तो उन्होंने इसे पत्थर का चमत्कार समझ उस जगह को और प्रसिद्ध कर दिया। अब लोग दूर-दूर से वहां अपनी कामना पूर्ती के लिये आने लग गये। एक दिन एक परिवार अपने बच्चे की बिमारी के ठीक हो जाने के बाद वहां चढावा चढा धूम-धाम से पूजा कर गया।
यह सब कर्म-कांड श्वान परिवार का सबसे छोटा सदस्य भी देखा करता था। दैव योग से एक दिन वह बिमार हो गया। तकलीफ जब ज्यादा बढ गयी तो उसने अपनी मां से कहा, मां तुम भी इन से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करो, ये तो सब को ठीक कर देते हैं। मां ने बात अनसुनी कर दी। पर जब श्वान पुत्र बार-बार जिद करने लगा तो मजबूर हो कर मां को कहना पड़ा कि बेटा ये हमारी बात नहीं सुनेंगें। पुत्र चकित हो बोला कि जब ये इंसान के बच्चे को ठीक कर सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं।
हार कर मां को कहना पड़ा, बेटा तुम्हारे पिता जी ने इसे इतनी बार धोया है कि अब तो मुझे यहाँ रहते हुए भी डर लगता है।
एक दिन महिलाओं का सामान बेचने वाले एक व्यापारी ने थकान के कारण दोपहर को उस पेड़ के नीचे शरण ली और अपनी गठरी उसी पत्थर के सहारे टिका दी। सुस्ताने के बाद उसने अपना सामान उठाया और अपनी राह चला गया। उसकी गठरी शायद ढीली थी सो उसमें से थोड़ा सिंदुर उस पत्थर पर गिर गया। सबेरे कुछ गांव वालों ने रंगा पत्थर देखा तो उस पर कुछ फूल चढा दिये। इस तरह अब रोज उस पत्थर का जलाभिषेक होने लगा, फूल मालायें चढने लगीं, दिया-बत्ती होने लगी। लोग आ-आकर मिन्नतें मांगने लगे। दो चार की कामनायें समयानुसार प्राकृतिक रूप से पूरी हो गयीं तो उन्होंने इसे पत्थर का चमत्कार समझ उस जगह को और प्रसिद्ध कर दिया। अब लोग दूर-दूर से वहां अपनी कामना पूर्ती के लिये आने लग गये। एक दिन एक परिवार अपने बच्चे की बिमारी के ठीक हो जाने के बाद वहां चढावा चढा धूम-धाम से पूजा कर गया।
यह सब कर्म-कांड श्वान परिवार का सबसे छोटा सदस्य भी देखा करता था। दैव योग से एक दिन वह बिमार हो गया। तकलीफ जब ज्यादा बढ गयी तो उसने अपनी मां से कहा, मां तुम भी इन से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करो, ये तो सब को ठीक कर देते हैं। मां ने बात अनसुनी कर दी। पर जब श्वान पुत्र बार-बार जिद करने लगा तो मजबूर हो कर मां को कहना पड़ा कि बेटा ये हमारी बात नहीं सुनेंगें। पुत्र चकित हो बोला कि जब ये इंसान के बच्चे को ठीक कर सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं।
हार कर मां को कहना पड़ा, बेटा तुम्हारे पिता जी ने इसे इतनी बार धोया है कि अब तो मुझे यहाँ रहते हुए भी डर लगता है।
गुरुवार, 18 दिसंबर 2008
विवाहों की भी श्रेणियां होती हैं।
#हिन्दी_ब्लागिंग
तकरीबन संसार के सभी धर्मों और जातियों में, समाज में मर्यादा बनाये रखने के लिये, सदाचार की बढोतरी तथा व्यभिचार की रोक-थाम के लिये विवाह की प्रथा का चलन रहा है। हमारे वेदों में भी सारे आश्रमों में गृहस्थाश्रम को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। जिसमें प्रवेश विवाह के पश्चात ही मिल पाता है। इसके आठ प्रकार बताये गये हैं।
* ब्रह्म विवाह :- वर और कन्या ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपनी शिक्षा पूरी की हो। वे विद्वान और धार्मिक विचारों को मानने वाले हों। व्यवहार कुशल एवं सुशील हों और उनका विवाह आपसी सहमति से हुआ हो।
* देव विवाह :- यज्ञ और ऋत्विक कर्म करते हुए कन्यादान करना, देव विवाह कहलाता है।
* आर्य विवाह :- वर पक्ष से कुछ धन आदि लेकर कन्या का विवाह करना इस श्रेणी के अंतर्गत आता है। कभी-कभी इसका रूप विकृत हो जाता है, जब कन्या का पिता अपने स्वार्थ के लिये अपनी कन्या को बेच देता है। अनेकों जनजातियों में यह प्रथा प्राचीनकाल से चली आ रही है।
* प्राजापत्य विवाह :- इसमें विवाह बुद्धि व धर्म के अनुसार होता है। वर-वधू एक दूसरे के लिये आयु, रूप, गुण आदि में एक दूसरे के लिये सर्वथा उपयुक्त होते हैं। ऐसे विवाह ज्यादातर सफल होते हैं।
* असुर विवाह :- इस प्रकार के विवाह में आपसी सहमति से, एक दूसरे से लेन-देन होता है। आज के युग में जिसे दहेज कहा जाता है। दहेज की विभीषिका को आज सभी जानते हैं।
* राक्षस विवाह :- बलपूर्वक, लड़-झगड़ कर या हर कर कन्या से विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है। प्राचीन काल में भी इसकी स्वीकृति नहीं थी। आज तो यह कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है।
*गंधर्व विवाह :- अनियम, असमय, परिस्थितिवश वर-कन्या का संयोग होना गंधर्व विवाह कहलाता है। प्राचीन काल में इसे कुछ हद तक सामाजिक मान्यता प्राप्त थी। आज भी ऐसे विवाह बहुतायद से होते हैं पर ऐसा करने वाले कुछ ही लोग समाज के सामने इसे स्वीकारने की हिम्मत दर्शा पाते हैं।
* पैशाच विवाह :- नशे में चूर, पागल या सोती हुई कन्या के साथ बलपूर्वक या उसकी अनभिज्ञता से संबंध स्थापित करना पैशाच विवाह कहलाता है। वैसे इसे विवाह नहीं व्यभिचार का नाम दिया जा सकता है।
इन आठों प्रकारों में ब्रह्म विवाह सर्वोत्तम, देव एवं प्राजापत्य मध्यम, आर्य, असुर व गंधर्व निम्न तथा राक्षस और पैशाच विवाहों को भ्रष्ट श्रेणियों में माना जाता है।
बुधवार, 17 दिसंबर 2008
एक बिमारी, जिसे कोई बिमारी ही नहीं मानता
यह घातक तो नहीं पर तकलीफदेह जरूर है। कुछ लोग तो इसे बिमारी ही नहीं मानते। जी हां जुकाम, जिसके लिये यदि डाक्टर के पास जायें तो यह तीन दिन में ठीक हो जायेगा। पर यदि कुछ ना भी करें तो तो यह 72 घंटे में ठीक हो जाता है। आप कहेंगें कि यह क्या बात हुई, पर यह सच है कि थोड़े से विश्राम और कुछ घरेलू नुस्खे आजमा लें तो बिना दवाई के भी जुकाम से मुक्ति पायी जा सकती है। वैसे यह बात भी है कि जुकाम के लिये अभी तक कोई कारगर या रामबाण दवा इजाद नहीं हो पायी है।
इसके समान्य लक्षण इस तरह के हैं -
गले में हलकी सी खराश।
बेचैनी, अस्वस्थता महसूस होना, तनाव, आलस्य आदि।
नाक का बंद होना, गले में जकड़न या सूखापन।
पाचन का बिगड़ना।
इसका सबसे अच्छा इलाज है, शरीर को विश्राम देना। इससे इसके किटाणू खुद ब खुद शिथिल पड़ जाते हैं। इसके लिये रोजमर्रा के काम में कमी करें, काम करते-करते बीच में आराम करें, चलते समय शरीर को ढीला छोड़ दें। पेय पदार्थ खासकर फलों का रस अतिरिक्त मात्रा में लें। ये शरीर में रोग-प्रतिरोधी तत्वों को बढाने में सहायक होते हैं। शाम को हल्का भोजन लें तथा जल्दी सोने चले जायें। इसे दूर करने के लिये गोलियां या दवायें लाभ कम और हानि अधिक पहुंचाती है। इसके बदले घरेलू इलाज ज्यादा करगर होते हैं।
इसके लिये गर्म पानी में नींबू का रस और एक चम्मच शहद काफी राहत दिलाता है।
गले की खराश, नाक तथा मांसपेशियों के लिये अदरक मिला गर्म दूध लिया जा सकता है।
काड लिवर आयल का दिन में दो-तीन बार सेवन या लहसुन की कली को निगलने से भी आराम मिलता है।
विश्लेषणों से पाया गया है कि ये सारे पेय गले के 'म्यूकोसल' उतकों में रक्त संचार को बढाते हैं तथा गले की क्षारियता को स्वस्थ अम्लिय स्थिति में बदल कर खराश, जकड़न आदि को दूर करते हैं। जुकाम में शरीर में विटामिन ए की कमी हो जाती है, जिसे दूर करने में काड लिवर आयल बहुत लाभदायक होता है। इसमें विटामिन डी भी होता है जो हमें सूर्य किरणों से मिलता है, लेकिन जाड़ों में लोग ठंड से बचने के लिये ज्यादातर घरों में बंद रहते हैं। जिससे विटामिन डी की कमी हो जाती है। इसीलिये जुकाम अधिकतर जाड़ों में ही होता है। जुकाम में विटामिन सी की भी अहम भूमिका होती है। इसलिये जब जुकाम आता दिखे तब इसकी मात्रा बढा देनी चाहिये। यह हमें नीबूं या आंवले में प्रचूर मात्रा में मिल जाता है।
इस तरह उपयुक्त विश्राम और विटामिनों से शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढा कर जुकाम से मुक्ति पायी जा सकती है।
इसके समान्य लक्षण इस तरह के हैं -
गले में हलकी सी खराश।
बेचैनी, अस्वस्थता महसूस होना, तनाव, आलस्य आदि।
नाक का बंद होना, गले में जकड़न या सूखापन।
पाचन का बिगड़ना।
इसका सबसे अच्छा इलाज है, शरीर को विश्राम देना। इससे इसके किटाणू खुद ब खुद शिथिल पड़ जाते हैं। इसके लिये रोजमर्रा के काम में कमी करें, काम करते-करते बीच में आराम करें, चलते समय शरीर को ढीला छोड़ दें। पेय पदार्थ खासकर फलों का रस अतिरिक्त मात्रा में लें। ये शरीर में रोग-प्रतिरोधी तत्वों को बढाने में सहायक होते हैं। शाम को हल्का भोजन लें तथा जल्दी सोने चले जायें। इसे दूर करने के लिये गोलियां या दवायें लाभ कम और हानि अधिक पहुंचाती है। इसके बदले घरेलू इलाज ज्यादा करगर होते हैं।
इसके लिये गर्म पानी में नींबू का रस और एक चम्मच शहद काफी राहत दिलाता है।
गले की खराश, नाक तथा मांसपेशियों के लिये अदरक मिला गर्म दूध लिया जा सकता है।
काड लिवर आयल का दिन में दो-तीन बार सेवन या लहसुन की कली को निगलने से भी आराम मिलता है।
विश्लेषणों से पाया गया है कि ये सारे पेय गले के 'म्यूकोसल' उतकों में रक्त संचार को बढाते हैं तथा गले की क्षारियता को स्वस्थ अम्लिय स्थिति में बदल कर खराश, जकड़न आदि को दूर करते हैं। जुकाम में शरीर में विटामिन ए की कमी हो जाती है, जिसे दूर करने में काड लिवर आयल बहुत लाभदायक होता है। इसमें विटामिन डी भी होता है जो हमें सूर्य किरणों से मिलता है, लेकिन जाड़ों में लोग ठंड से बचने के लिये ज्यादातर घरों में बंद रहते हैं। जिससे विटामिन डी की कमी हो जाती है। इसीलिये जुकाम अधिकतर जाड़ों में ही होता है। जुकाम में विटामिन सी की भी अहम भूमिका होती है। इसलिये जब जुकाम आता दिखे तब इसकी मात्रा बढा देनी चाहिये। यह हमें नीबूं या आंवले में प्रचूर मात्रा में मिल जाता है।
इस तरह उपयुक्त विश्राम और विटामिनों से शरीर की प्रतिरोधी क्षमता बढा कर जुकाम से मुक्ति पायी जा सकती है।
रविवार, 14 दिसंबर 2008
तनाव मुक्ति के अचूक नुस्खे
कहने और होने में बहुत फर्क होता है। सभी जानते हैं कि तनाव सेहत के लिए ठीक नहीं होता, पर कोई क्या इसे जान-बूझ कर पालता है ? फिर भी कोशिश तो की जा सकती है इसे कम करने के लिये। क्या ख्याल है? कोशिश करने में क्या बुराई है। मेरे एक डाक्टर मित्र ने मुझे तनाव मुक्त होने के पांच गुर बताये हैं। आप भी आजमायें। फायदा ज्यादा नुक्सान कुछ नहीं।
1 :- तनाव में सांस की प्रक्रिया आधी रह जाती है। इसलिये दिमाग में आक्सीजन की कमी को दूर करने के लिये गहरी सांस लें।
2 :- तनाव के क्षणों में चेहरा सामान्य बनाए रखें। क्योंकि स्नायुतंत्रं की जकड़न से शरीर पर बुरा असर पड़ता है। थोड़ा मुस्कुराने की चेष्टा करें। भृकुटि तनने से 72 मांसपेशियों को काम करना पड़ता है। मुस्कुराने में सिर्फ 14 को। ऐसा करने से मष्तिष्क में रक्त संचार बढ़ता है। इसलिये ना चाहते हुए भी मुस्कुरायें। (मुन्ना भाई फिल्म का डीन याद आया?)
3 :- सर्वे में देखा गया है कि तनाव में शरीर खिंच जाता है, भृकुटि तन जाती है, गाल पर रेखायें खिंच जाती हैं। तनाव ग्रस्त इंसान कंधे झुका, सीने-गर्दन को अकड़ा, माथे पर हाथ रख, गुमसुम हो जाता है। इससे रक्त संचरण कम हो जाता है तथा तनाव और बढ़ जाता है। इससे बचने के लिये, करवट बदलिये, बैठने का ढ़ंग बदलिये। खड़े हैं तो बैठ जायें, बैठे हैं तो खड़े हो जायें या लेट जायें। कमर सीधी रखें। पेट को ढ़ीला छोड़ दें, आराम से सांस लें। इतने से ही राहत का एहसास होने लगेगा।
4 :- तनाव में अनजाने में ही जबड़े, गर्दन, कंधे और पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिससे शरीर में जकड़न आ जाती है। हर मनुष्य की यह जकड़न, गठान अलग-अलग होती है। इसे सामान्य रखने की कोशिश करनी चाहिये।
5 :- तनाव के क्षणों में कोई भी काम करने से पहले थोड़ा रुकें। क्या हो रहा है, इस पर थोड़ा सोचें। जल्दि या हड़बड़ी में निर्णय लेने से तनाव बढ़ सकता है। सबसे बड़ी बात, सकारात्मक सोच ही तनाव से मुक्ति दिलाने के लिये काफी है।
यह तो रही डाक्टर की सलाह। लगे हाथ मेरी भी सुन लें। आजमाया हुआ नुस्खा है। बचकाना पन भूल कर कार्टून देखें, समय हो तो कोई हास्य फिल्म, पूरी ना सही उसका कुछ ही हिस्सा देख लें। नहीं तो यह चुटकुला तो है ही। पंजाबी में लयबद्ध रूप में है, हिंदी में पढ़वाता हूं, पूराना है पर असरकारक है _____
बंता के घर रात को अनचाहा मेहमान आ गया। पति-पत्नि ने उसे भगाने की एक तरकीब निकाली। मेहमान को बाहर बैठा दोनों अंदर कमरे में जा जोर-जोर से लड़ने लगे। फिर पत्नि के पिटने और उसके जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। इसे सुन मेहमान उठ कर घर के बाहर चला गया। बंता ने झांक कर देखा तो मेहमान नदारद था। उसने पत्नि से कहा, देखा मेरा कारनामा, मैने खटिये को इतना पीटा, तुम्हें छुआ भी नहीं। पत्नि भी कहां कम थी बोली, मैं भी गला फाड़ कर चिल्लाई, रोई मैं भी नहीं। इतने में मेहमान ने कमरे में आते हुए कहा, मैं भी ऐसे ही बाहर बैठा था, गया मैं भी नहीं।
1 :- तनाव में सांस की प्रक्रिया आधी रह जाती है। इसलिये दिमाग में आक्सीजन की कमी को दूर करने के लिये गहरी सांस लें।
2 :- तनाव के क्षणों में चेहरा सामान्य बनाए रखें। क्योंकि स्नायुतंत्रं की जकड़न से शरीर पर बुरा असर पड़ता है। थोड़ा मुस्कुराने की चेष्टा करें। भृकुटि तनने से 72 मांसपेशियों को काम करना पड़ता है। मुस्कुराने में सिर्फ 14 को। ऐसा करने से मष्तिष्क में रक्त संचार बढ़ता है। इसलिये ना चाहते हुए भी मुस्कुरायें। (मुन्ना भाई फिल्म का डीन याद आया?)
3 :- सर्वे में देखा गया है कि तनाव में शरीर खिंच जाता है, भृकुटि तन जाती है, गाल पर रेखायें खिंच जाती हैं। तनाव ग्रस्त इंसान कंधे झुका, सीने-गर्दन को अकड़ा, माथे पर हाथ रख, गुमसुम हो जाता है। इससे रक्त संचरण कम हो जाता है तथा तनाव और बढ़ जाता है। इससे बचने के लिये, करवट बदलिये, बैठने का ढ़ंग बदलिये। खड़े हैं तो बैठ जायें, बैठे हैं तो खड़े हो जायें या लेट जायें। कमर सीधी रखें। पेट को ढ़ीला छोड़ दें, आराम से सांस लें। इतने से ही राहत का एहसास होने लगेगा।
4 :- तनाव में अनजाने में ही जबड़े, गर्दन, कंधे और पेट की मांसपेशियों में खिंचाव आ जाता है जिससे शरीर में जकड़न आ जाती है। हर मनुष्य की यह जकड़न, गठान अलग-अलग होती है। इसे सामान्य रखने की कोशिश करनी चाहिये।
5 :- तनाव के क्षणों में कोई भी काम करने से पहले थोड़ा रुकें। क्या हो रहा है, इस पर थोड़ा सोचें। जल्दि या हड़बड़ी में निर्णय लेने से तनाव बढ़ सकता है। सबसे बड़ी बात, सकारात्मक सोच ही तनाव से मुक्ति दिलाने के लिये काफी है।
यह तो रही डाक्टर की सलाह। लगे हाथ मेरी भी सुन लें। आजमाया हुआ नुस्खा है। बचकाना पन भूल कर कार्टून देखें, समय हो तो कोई हास्य फिल्म, पूरी ना सही उसका कुछ ही हिस्सा देख लें। नहीं तो यह चुटकुला तो है ही। पंजाबी में लयबद्ध रूप में है, हिंदी में पढ़वाता हूं, पूराना है पर असरकारक है _____
बंता के घर रात को अनचाहा मेहमान आ गया। पति-पत्नि ने उसे भगाने की एक तरकीब निकाली। मेहमान को बाहर बैठा दोनों अंदर कमरे में जा जोर-जोर से लड़ने लगे। फिर पत्नि के पिटने और उसके जोर-जोर से चिल्लाने की आवाजें आने लगीं। इसे सुन मेहमान उठ कर घर के बाहर चला गया। बंता ने झांक कर देखा तो मेहमान नदारद था। उसने पत्नि से कहा, देखा मेरा कारनामा, मैने खटिये को इतना पीटा, तुम्हें छुआ भी नहीं। पत्नि भी कहां कम थी बोली, मैं भी गला फाड़ कर चिल्लाई, रोई मैं भी नहीं। इतने में मेहमान ने कमरे में आते हुए कहा, मैं भी ऐसे ही बाहर बैठा था, गया मैं भी नहीं।
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