अक्सर सुनने मे आता है कि भगवान को छप्पनभोग का प्रसाद चढ़ाया जाता है। इनमे किन-किन खाद्य पदार्थों का समावेश होता है, आईए देखते हैं --
1-रसगुल्ला, 2-चन्द्रकला, 3-रबड़ी, 4-शूली, 5-दधी, 6-भात, 7-दाल, 8-चटनी, 9-कढ़ी, 10-साग-कढ़ी, 11-मठरी, 12-बड़ा, 13-कोणिका, 14- पूरी, 15-खजरा, 16-अवलेह, 17-वाटी, 18-सिखरिणी, 19-मुरब्बा, 20-मधुर, 21-कषाय, 22-तिक्त, 23-कटु पदार्थ, 24-अम्ल {खट्टा पदार्थ}, 25-शक्करपारा, 26-घेवर, 27-चिला, 28-मालपुआ, 29-जलेबी, 30-मेसूब, 31-पापड़, 32-सीरा, 33-मोहनथाल, 34-लौंगपूरी, 35-खुरमा, 36-गेहूं दलिया, 37-पारिखा, 38-सौंफ़लघा, 39-लड़्ड़ू, 40-दुधीरुप, 41-खीर, 42-घी, 43-मक्खन, 44-मलाई, 45-शाक, 46-शहद, 47-मोहनभोग, 48-अचार, 49-सूबत, 50-मंड़का, 51-फल, 52-लस्सी, 53-मठ्ठा, 54-पान, 55-सुपारी, 56-इलायची,-----------------------------------------------------------------------------------------भगवान हैं भाई, हजम करते होंगे। अपन तो पढ़-सुन कर ही अघा गये।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 23 अगस्त 2008
गुरुवार, 21 अगस्त 2008
कलयुगी श्रवण कुमार
आज हरिया अपने बेटे डा0 गोविंद के साथ शहर जा रहा था। गाँव वाले अचंभित थे, गोविंद के वर्षों के बाद गांव आने पर। वह शहर में बहुत बड़ा डाक्टर था, दो-दो नर्सिंग होम चलते थे उसके। इतना व्यस्त रहता था, कि अपनी माँ के मरने पर भी गाँव नहीं आ सका था। पर आज खुश भी थे, हरिया को चाहने वाले, यह सोच कर कि बिमार हरिया शहर में अपने बेटे के पास रह कर अपनी जिंदगी के शेष दिन आराम से गुजार सकेगा।
इधर गोविंद अपने बाप को देख कर ही समझ गया था कि महिने दो महिने का ही खेल बचा है। उसे अपने बाप की देह का हरेक अंग अपने बैंक बैलेंस में तब्दील होता नज़र आ रहा था।
इधर गोविंद अपने बाप को देख कर ही समझ गया था कि महिने दो महिने का ही खेल बचा है। उसे अपने बाप की देह का हरेक अंग अपने बैंक बैलेंस में तब्दील होता नज़र आ रहा था।
बुधवार, 20 अगस्त 2008
वानर पुत्र सोच रहा था की आज बापू की सीख काम आई
बहुत समय पहले एक व्यापारी रंगबिरंगी टोपियां ले दूसरे शहर बेचने निकला। चलते-चलते दोपहर होने पर वह एक पेड़ के नीचे सुस्ताने के लिए रुक गया। भूख भी लग आई थी, सो उसने अपनी पोटली से खाना निकाल कर खाया और थकान दूर करने के लिए वहीं लेट गया। थका होने की वजह से उसकी आंख लग गयी। कुछ देर बाद नींद खुलने पर वह यह देख भौंचक्का रह गया कि उसकी सारी टोपियां अपने सिरों पर उल्टी-सीधी लगा कर बंदरों का एक झुंड़ पेड़ों पर टंगा हुआ है। व्यापारी ने सुन रखा था कि बंदर नकल करने मे माहिर होते हैं। भाग्यवश उसकी अपनी टोपी उसके सर पर सलामत थी। उसने अपनी टोपी सर से उतार कर जमीन पर पटक दी। देखा-देखी सारे बंदरों ने भी वही किया। व्यापारी ने सारी टोपियां समेटीं और अपनी राह चल पड़ा।
समय गुजरता गया। व्यापारी बूढ़ा हो गया उसका सारा काम उसके बेटे ने संभाल लिया। वह भी अपने बाप की तरह दूसरे शहरों मे व्यापार के लिए जाने लगा। दैवयोग से एक बार वह भी उसी राह से गुजरा जिस पर उसके पिता का सामना बंदरों से हुआ था। भाग्यवश व्यापारी का बेटा भी उसी पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठा। उसने कलेवा कर थोड़ा आराम करने के लिए आंखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद हल्के से कोलाहल से उसकी तंद्रा टूटी तो उसने पाया कि उसकी गठरी खुली पड़ी है और टोपियां बंदरों के सर की शोभा बढ़ा रही हैं। पर वह जरा भी विचलित नहीं हुआ और पिता की सीख के अनुसार उसने अपने सर की एक मात्र टोपी को जमीन पर पटक दिया। पर यह क्या!!! एक मोटा सा बंदर झपट कर आया और उस टोपी को भी उठा कर पेड़ पर चढ़ गया।
व्यापारी का लड़का सोच मे पड़ गया कि क्या बापू ने झूठ कहा था कि बंदर नकल करते हैं। उधर बंदर सोच रहा था कि आज बापू की सीख काम आई कि मनुष्यों की नकल कर कभी बेवकूफ़ मत बनना।
समय गुजरता गया। व्यापारी बूढ़ा हो गया उसका सारा काम उसके बेटे ने संभाल लिया। वह भी अपने बाप की तरह दूसरे शहरों मे व्यापार के लिए जाने लगा। दैवयोग से एक बार वह भी उसी राह से गुजरा जिस पर उसके पिता का सामना बंदरों से हुआ था। भाग्यवश व्यापारी का बेटा भी उसी पेड़ के नीचे सुस्ताने बैठा। उसने कलेवा कर थोड़ा आराम करने के लिए आंखें बंद कर लीं। कुछ देर बाद हल्के से कोलाहल से उसकी तंद्रा टूटी तो उसने पाया कि उसकी गठरी खुली पड़ी है और टोपियां बंदरों के सर की शोभा बढ़ा रही हैं। पर वह जरा भी विचलित नहीं हुआ और पिता की सीख के अनुसार उसने अपने सर की एक मात्र टोपी को जमीन पर पटक दिया। पर यह क्या!!! एक मोटा सा बंदर झपट कर आया और उस टोपी को भी उठा कर पेड़ पर चढ़ गया।
व्यापारी का लड़का सोच मे पड़ गया कि क्या बापू ने झूठ कहा था कि बंदर नकल करते हैं। उधर बंदर सोच रहा था कि आज बापू की सीख काम आई कि मनुष्यों की नकल कर कभी बेवकूफ़ मत बनना।
मंगलवार, 19 अगस्त 2008
इस बार चूहा स्वाभिमानी था
इतिहास तो सब का होता होगा, चाहे वह इंसान हो, चाहे जानवर या कीड़े-मकोड़े ही क्यों ना हो और यदि ऐसा है तो उन सब का भी दुहरता है कि नहीं इसी का पता लगाने की मैने ठानी। इसके लिए उस कहानी को, जिसमे एक ऋषी ने चुहिया को इंसान का रूप दे पाला-पोसा था, पर उसका विवाह चूहे से ही हो पाया था, अपनी थिसिस बना, अपनी खोज शुरू की। काफ़ी भटकने के पश्चात भी जब मुझे कोई सिद्ध महात्मा के दर्शन ना हो पाये तो मैने नक्सलियों के खौफ़ के बावजूद बस्तर के घने जंगलों का रुख किया। इस बार मेरी मेहनत रंग लायी और वहां मुझे एक पहुंचे हुए महात्माजी के दर्शन हो ही गये। पहले तो उन्होंने कुछ भी बताने से साफ़ मना कर दिया पर मेरी जिद व हठ के सामने आखिर वे नरम पड़ गये और फिर उन्होंने जो बताया उसके सामने "रिप्ले का विश्वास करो या ना करो" भी मुंह छुपाता नजर आता है। पूरी बात उन्हीं के शब्दों मे आप के सामने है ----------------
कोई सोलह-एक साल पहले की बात है। एक सुबह मैं नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहा था, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया मेरी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह घायल थी। मैं उसे अपने आश्रम ले आया तथा मरहम-पट्टी कर उसे जंगल मे छोड़ देना चाहा पर शायद ड़र के मारे या किसी और कारणवश वह जाने को राजी ही नहीं हुई। मैने भी उसकी हालत देख अपने पास रख लिया। समय बीतता गया और कब मैं उसे पुत्रीवत स्नेह करने लग गया इसका पता भी नहीं चला और इसी मोहवश एक दिन अपने तपोबल से उसे मानव रूप दे दिया। कन्या जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए मैने एक सर्वगुण सम्पन्न मूषक के बारे मे उसकी राय जाननी चाही तो उसने अपनी पसंद दुनिया की सबसे शक्तिशाली शख्सियत को बताया। बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उसे मैने सूर्यदेव के पास भेज दिया, जो मेरी नजर मे सबसे तेजस्वी देवता थे। चुहिया ने उनके पास जा अपनी इच्छा बतायी। इस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। यह सुन मुषिका मेघराज के पास गयी और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके तुमने गलत सुना है। मुझ से शक्तिशाली तो पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि वह तो सदियों से पर्वत के आगे नतमस्तक होते आए हैं जो उनकी राह में सदा रोड़े अटकाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी, वह भी तब जब उनके शिखर पर एक विदेशी कंपनी का टावर लगा हुअ था। सैकड़ों वर्षों पहले की तरह उन्होंने फिर उसे वही बताया कि चूहा मेरे से भी ताकतवर है क्योंकि वह अपने मजबूत पंजों से मुझमे भी छिद्र कर देता है। यह कह उन्होंने अपना पीछा छुड़वाया। इतना सुन चुहिया ने वापस मेरे पास आ चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। मैने मूषकराज को खबर भेजी और यहीं इतिहास भी धोखा खा गया। मूषकराज मेरे घर आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर चुप रहे फ़िर बोले देवी क्षमा करें। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता। सच कटू होता है। आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके। मैं तो एक अदना सा चूहा हूं। मेरे साथ आपका निर्वाह ना हो सकेगा। इतना कह साधू महाराज उदास हो चुप हो गये। कुछ देर बाद मैने पूछा कि वह आज कल क्या कर रही है। तो ठंड़ी सांस ले मुनि बोले कि लेखिका हो गयी है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखती रहती है।
अब आप ही बतायें कि मेरी खोज सफ़ल रही कि नहीं।
रविवार, 17 अगस्त 2008
एक सैम्नार ऐसा भी
रायपुर के मोतीबाग से आयकर विभाग की तरफ आने वाली सड़क पर घने इमली के पेड़ हैं। जिनकी शाखाओं पर ढेरों तरह-तरह के परिंदे वास करते हैं। शाम होते ही पक्षी जब अपने घोंसलों की ओर लौटते हैं तब शरारती लडके अपनी गुलेलों से उनको निशाना बनाते रहते हैं। इसी को देख यह ख्याल आया था ।
पर्यावरणविदों और पशू-पक्षी संरक्षण करने वाली संस्थाओं ने मेरे सोते हुए कस्बाई शहर को ही क्यूं चुना अपने वार्षिक सैम्नार के लिए, पता नहीं। इससे शहरवासियों को कोई फ़ायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर शहर जरूर धुल पुछ गया। सड़कें साफ़-सुथरी हो गयीं। रोशनी वगैरह की थोड़ी ठीक-ठाक व्यवस्था कर दी गयी। गहमागहमी काफ़ी बढ़ गयी। बड़े-बड़े प्राणीशास्त्री, पर्यावरणविद, डाक्टर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता और भी ना जाने कौन-कौन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे धूल उड़ाते आने लगे।
नियत दिन, नियत समय पर, नियत विषयों पर बहस शुरू हुई। नष्ट होते पर्यावरण और खास कर लुप्त होते प्राणियों को बचाने-सम्भालने की अब तक की नाकामियों और अपने-अपने प्रस्तावों की अहमियत को साबित करने के लिए घमासान मच गया। लम्बी-लम्बी तकरीरें की गयीं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए ।
यानि कि काफी सफल आयोजन रहा।
दिन भर की बहस बाजी, उठापटक, मेहनत-मसर्रत के बाद जाहिर है, जठराग्नि तो भड़कनी ही थी, सो खानसामे को हुक्म हुआ, लज़िज़, बढिया, उम्दा किस्म के, व्यंजन बनाने का। खानसामा अपना झोला उठा बाजार की तरफ चल पड़ा। शाम का समय था। पेड़ों की झुरमुट मे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे परिंदों पर कुछ शरारती बच्चे अपनी गुलेलों से निशाना साध रहे थे। पास आने पर खानसामे ने तीन-चार घायल बटेरों को बच्चों के कब्जे में देखा। अचानक उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। उसने बच्चों को डरा धमका कर भगा दिया। फिर बटेरों को अपने झोले में ड़ाला और गुनगुनाता हुआ वापस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया।
खाना खाने के बाद, आयोजक से ले कर खानसामे तक, सारे लोग बेहद खुश थे, अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने तरीके से। सैम्नार की अपार सफलता पर।
पर्यावरणविदों और पशू-पक्षी संरक्षण करने वाली संस्थाओं ने मेरे सोते हुए कस्बाई शहर को ही क्यूं चुना अपने वार्षिक सैम्नार के लिए, पता नहीं। इससे शहरवासियों को कोई फ़ायदा हुआ हो या ना हुआ हो पर शहर जरूर धुल पुछ गया। सड़कें साफ़-सुथरी हो गयीं। रोशनी वगैरह की थोड़ी ठीक-ठाक व्यवस्था कर दी गयी। गहमागहमी काफ़ी बढ़ गयी। बड़े-बड़े प्राणीशास्त्री, पर्यावरणविद, डाक्टर, वैज्ञानिक, नेता, अभिनेता और भी ना जाने कौन-कौन बड़ी-बड़ी गाड़ियों मे धूल उड़ाते आने लगे।
नियत दिन, नियत समय पर, नियत विषयों पर बहस शुरू हुई। नष्ट होते पर्यावरण और खास कर लुप्त होते प्राणियों को बचाने-सम्भालने की अब तक की नाकामियों और अपने-अपने प्रस्तावों की अहमियत को साबित करने के लिए घमासान मच गया। लम्बी-लम्बी तकरीरें की गयीं। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए ।
यानि कि काफी सफल आयोजन रहा।
दिन भर की बहस बाजी, उठापटक, मेहनत-मसर्रत के बाद जाहिर है, जठराग्नि तो भड़कनी ही थी, सो खानसामे को हुक्म हुआ, लज़िज़, बढिया, उम्दा किस्म के, व्यंजन बनाने का। खानसामा अपना झोला उठा बाजार की तरफ चल पड़ा। शाम का समय था। पेड़ों की झुरमुट मे अपने घोंसलों की ओर लौट रहे परिंदों पर कुछ शरारती बच्चे अपनी गुलेलों से निशाना साध रहे थे। पास आने पर खानसामे ने तीन-चार घायल बटेरों को बच्चों के कब्जे में देखा। अचानक उसके दिमाग की बत्ती जल उठी और चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गयी। उसने बच्चों को डरा धमका कर भगा दिया। फिर बटेरों को अपने झोले में ड़ाला और गुनगुनाता हुआ वापस गेस्ट हाउस की तरफ चल दिया।
खाना खाने के बाद, आयोजक से ले कर खानसामे तक, सारे लोग बेहद खुश थे, अपनी-अपनी जगह, अपने-अपने तरीके से। सैम्नार की अपार सफलता पर।
बैंक, जहाँ पैसा नही कपडे रखे जाते हैं
ज्यादातर यही समझा जाता है कि बैंकों में पैसा या कीमती सामान ही रखा जाता है। पर झारखंड के जमशेदपुर मे एक बैंक ऐसा है जिसका पैसों से कोई लेना-देना नहीं है। इस अनोखे बैंक में इंसान की मूलभूत जरूरत कपड़े रखे जाते हैं तथा इसे कपड़ों के बैंक के नाम से जाना जाता है। करीब एक दशक पुराने इस बैंक "गूंज" का मुख्य उद्देश्य देश के उन लाखों गरीब तथा जरूरतमंद लोगों को कपड़े उपलब्ध करवाना है, जो उचित वस्त्रों के अभाव मे अपमान और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम का सामना करते हैं। पूरी दुनिया में अनगिनत लोगों को कपड़ों के अभाव में शारिरिक व मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ता है। भारत के ही कुछ भागों में महिलाओं को उचित वस्त्रों के अभाव में अनेकों बार अप्रिय परिस्थियों से गुजरना पड़ता है। इसी तरह की परेशानियों से लोगों को रोज दो-चार होता देख, कुछ लोगों का मिल कर इसका हल निकालने की सोच ने जो रूप लिया वही है "गूंज"। इसी तरह यदी छोटी-छोटी धाराएं अस्तित्व में आती रहें तो गरीबी के रेगिस्तान में कहीं-कहीं तो नखलिस्तान उभर कर कुछ तो राहत प्रदान कर ही सकता है।
शुक्रवार, 15 अगस्त 2008
लो, मन गया एक और स्वतंत्रता दिवस
एक और स्वतंत्रता दिवस निपटा घर लौट गये सब छुट्टी मनाने। जिस संस्था से जुडा हूं, वहां और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है, अपने को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, एक तरफ साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन ने आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य किया और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और प्रेरक देशभक्ति की भावना सारे लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धिरे-धिरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के या किसी और मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गया है या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है।
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