pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 14 अगस्त 2008

कहाँ थे गांधीजी, पहले स्वतंत्रता दिवस पर

15 अगस्त 1947, सारी धरती, सारा आकाश, स्त्री-पुरुष, अबाल-वृद्ध सब जने ड़ूबे हुए थे आनन्दसागर मे, हर देशवासी सैंकडों सालों से प्रतिक्षित आजादी को अपने सामने पा खुशी के मारे बावरा बन गया था। देश का बच्चा-बच्चा जिस दिन खुशी से पागल हो उठा था, उस दिन इस जश्न का पैरोकार, इस उत्सव का सुत्रधार, इस स्वप्न को मूर्तरूप देने वाला शिल्पी देश के एक कोने मे स्थित कलकत्ता मे, अमन चैन की रक्षा हेतु उपवास और प्रार्थना कर रहा था। महात्मा गांधी ने आजादी की खुशी मे मनाए जा रहे किसी भी समारोह मे भाग नहीं लिया। उनके लिये यह 15 अगस्त भी आम दिनों की तरह ही रहा। रमजान का महिना था। लोग बापू के प्रति आदर व्यक्त कर अपना रोजा खोलना चाहते थे। सो बापू अन्य दिनों की अपेक्षा और जल्दी सो कर उठ गये थे। सुबह आने वालों मे हिंदू भी थे। गांधीजी सबसे मिले, फिर गीता का पाठ करने लगे। इसके बाद सदा की तरह प्रात: भ्रमण के लिए निकल पडे। सडकों पर उनके दर्शन के लिए भीड एकत्रित थी। करीब आठ बजे बापू लौटे और एकत्रित जनों से कहा कि आज हमें आजादी मिली है परन्तू इसके साथ ही हमारी जिम्मेदारी भी बढ गयी है। जिस चरखे ने हमें आजादी दिलाई है उसे हमे नहीं भूलना है। उपवास से हमारा शरीर शुद्ध होता है, इस प्रकार हमें शुद्ध होकर प्रभू से प्रार्थना करनी है कि वे हमें आजादी के काबिल बनाएं। यह हमारी परीक्षा की घड़ी है। गांधीजी का एक अलग ही सपना था आजादी को लेकर, वे चाहते थे कि सारे भारतवासी अपने आप को आजादी के काबिल बनाएं । उनका कहना था कि हमें प्रभू को धन्यवाद देना चाहिए कि उसने हम गरीब भारतवासियों के बलिदान का फ़ल दिया है। आजादी का दिन हमारी परीक्षा का दिन है। इस दिन सब उपवास रखें,चरखा चलाएं। किसी तरह की गडबडी ना हो। आजादी के लिए रोशनी के द्वारा समारोह करना उचित नहीं है, जबकि देश की जनता के पास प्रयाप्त अनाज, तेल और कपडा नहीं है। बापू नहीं चाहते थे कि 1946 की पुनरावृती हो। फिर भी कलकत्ता अशांत हो गया था और उन्हें आजादी का पहला दिन वहीं बिताना पडा था, अमन-चैन की बहाली के वास्ते। बापू प्रार्थना मे मुश्किल से ध्यान लगा पा रहे थे क्योंकि हजारों लोग उनसे मिलने और यह कहने आ रहे थे कि उन्हीं के कारण देश यह दिन देख सका है। इस कारण वे कुछ नाराज से हो गये और उन्होंने भवन का मुख्य द्वार बंद करवा दिया। बाद मे बंगाल सरकार के मंत्रीगण उनसे मिलने आए तो बापू ने स्पष्ट शब्दों मे उनसे कहा कि आज आपने अपने सर पर कांटों का ताज पहना है। सत्ता बेहद बुरी चीज है। आपको गद्दी पर बैठ कर सदा चौकस रहना होगा। आपको सत्यवादी, अहिंसक, विनम्र तथा सहनशील होना होगा। धन-दौलत-सत्ता के लालच मे नहीं फंसना है। आप गरीबों की सेवा के लिए हैं। अंग्रेजों के शासन की परीक्षा तो खत्म हो गयी है अब हमारी परीक्षा का कोई अंत नहीं होगा। ईश्वार आपकी मदद करे। लाख बुलाने पर भी गांधीजी किसी समारोह मे नहीं गये। शाम को प्रार्थना सभा मे जबरदस्त भीड़ थी। प्रार्थना के बाद उन्होंने फिर जनता को संबोधित कर कहा कि आज आजादी का पहला दिन है। राजाजी गवर्नर हो गयें हैं। लोगों ने सोचा कि अब आजादी मिल गयी है, सो उन्होंने राजाजी के घर पर कब्जा जमा लिया। यह अच्छी बात है कि लोग जान गये हैं कि सबको समानता का अधिकार है, पर यह दुख की बात है कि वे सोचने लगे हैं कि उन्हें मनचाहा काम करने, चीजों को तोडने-फ़ोडने और नष्ट करने की भी आजादी मिल गयी है। जनता ऐसा काम ना कर, खिलाफ़त आंदोलन के समय जैसी एकता दर्शाए, वैसी ही भावनाएं बनाए रखे। उस शाम गांधीजी के साथ सुहरावर्दी भी थे उन्होने भी बापू के बाद सभा को संबोधित करते हुए हिन्दु-मुसलिम एकता की दुहाई दी, सबने मिल कर जय-हिंद का नारा बुलंद किया। गांधीजी के चेहरे पर उस दिन पहली बार मुस्कान की आभा दिप्त हुई। फिर बहुत अनुरोध करने पर बापू शहर मे की गयी रोशनी देखने निकले। लोगों का सैलाब उनकी ओर उमड पडा। छोटे-छोटे बच्चे बेहद आतुरता से उनके हाथ थामने को लपकते रहे। भीड उन पर गुलाब की पंखुडियों की बौछार करती रही। करीब दस बजे बेहद थक कर गांधीजी लौटे और बिना किसी से बात किए सोने चले गये। स्वतंत्र भारत की नियती से स्वतंत्रता संग्राम के महानायक की यह पहली मुठभेड थी।

बुधवार, 13 अगस्त 2008

"मणिकर्ण" शिवजी की रमण भूमि

मणिकर्ण, हिमाचल मे पार्वती नदी की घाटी मे बसा एक पवित्र धर्म-स्थल है। हिन्दु तथा सिक्ख समुदाय का पावन तीर्थ, जो कुल्लू से 35किमी दूर समुंद्र तट से 1650मिटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां आराम से बस या टैक्सी से जाया जा सकता है। पौराणिक कथा है कि विवाह के पश्चात एक बार शिवजी तथा पार्वतीजी घूमते-घूमते इस जगह आ पहुंचे। उन्हें यह जगह इतनी अच्छी लगी कि वे यहां ग्यारह हजार वर्ष तक निवास करते रहे। इस जगह के लगाव के कारण ही उन्होंने जब काशी की स्थापना की तो वहां भी नदी के घाट का नाम मणिकर्णिका घाट रक्खा। इस क्षेत्र को अर्द्धनारीश्वर क्षेत्र भी कहते हैं,तथा यह समस्त सिद्धीयों का देने वाला स्थान है, ऐसी मान्यता है यहां के लोगों मे।कहते हैं कि यहां प्रवास के दौरान एक बार स्नान करते हुए माँ पार्वती के कान की मणि पानी मे गिर तीव् धार के साथ पाताल पहुंच गयी। मणि ना मिलने से परेशान माँ ने शिवजी से कहा। शिवजी को नैना देवी से पता चला कि मणि नागलोक के देवता शेषनाग के पास है। इससे शिवजी क्रोधित हो गये जिससे ड़र कर शेषनाग ने जोर की फुंकार मार कर मणियों को माँ के पास भिजवा दिया। इन मणियों के कारण ही इस जगह का नाम मणिकर्ण पडा। शेषनाग की फुंकार इतनी तीव्र थी कि उससे यहां गर्म पानी का स्रोत उत्पन्न हो गया। यह एक अजूबा ही है कि कुछ फ़िट की दूरी पर दो अलग तासीरों के जल की उपस्थिति है। एक इतना गर्म है कि यहां मंदिर - गुरुद्वारे के लंगरों का चावल कुछ ही मिनटों मे पका कर धर देता है तो दूसरी ओर इतना ठंडा की हाथ डालो तो हाथ सुन्न हो जाता है।यही वह जगह है जहां महाभारत काल मे शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात के रूप मे उससे युद्ध किया था।यहीं पर सिक्ख समुदाय का भव्य गुरुद्वारा है जहां देश विदेश से लोग आ पुण्य लाभ करते हैं। इसकी स्थापना कैमलपुर, अब पाकिस्तान मे, के निवासी श्री नारायण हरी द्वारा 1940 के आसपास की गयी थी। थोडी सी हिम्मत, जरा सा जज्बा, नयी जगह देखने-जानने की ललक हो तो एक बार यहां जरूर जाएं।

सोमवार, 11 अगस्त 2008

बिंद्रा ने कड़वाहट धो दी

सुबह-सुबह ही अखबार मे पढ़ा कि सौ सरकारी पर्यवेक्षकों का एक और काफ़िला तैयारियों का जायजा लेने के बहाने बीजिंग पहुंच गया है और सैर-सपाटे में व्यस्त है, जबकी 98 सदस्यीय भारतीय दल मे पहले से ही 42 अधिकारी मौजूद हैं। तो रहा नही गया और थोडी कडवाहट "ओलिंपिक जाने नहीं ले जाने का त्यौहार" वाले ब्लाग मे उतर आई। पर बिन्द्रा ने जो इतिहास रचा उस पर मुफ़्तखोरों के सौ खून माफ़। इस सपूत ने जो कर दिखाया है, देश का जैसे गौरव बढ़ाया है उसे देख शायद "वैसे" लोगों की आने वाली नस्लें ही कोई सबक ग्रहण कर लें। आईए कड़वाहट भूल ग्यारह अगस्त की इस शानदार शुरुआत को याद रखते हुए आशा कर्रं कि आज की सफ़लता कम से कम तिगुनी-चौगुनी हो कर घर वापस आए। आमीन

ओलिंपिक जाने का नहीं ले जाने का त्यौहार

विश्व के दूसरे सबसे बडे आबादी वाले देश के खिलाड़ी ओलिंपिक मे पदक जीतने का नहीं बल्कि वहां अधिकारियों को सैर-सपाटा करवाने के लिए ले जाने का जरिया मात्र बन कर रह गये हैं। इसीलिये हमें बार-बार समझाया जाता है कि ओलिंपिक मे पदक जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना उसमे भाग लेना, और इतने महत्वपूर्ण काम मे सरकारी कारिंदे भाग ना ले सकें तो धिक्कार है। सो हे गुणी-जन खिलाडियों से ज्यादा साथ जाने वालों को अपना रिकार्ड अपने आकाओं के पास काफी ऊंचा बनाए रखना पडता है। इसके लिए तरह-तरह से हवा बांधनी पडती है, हवाई किले दिखाने पडते हैं, साम-दाम-दंड-भेद हर तरह की नीति अपनानी पडती है। यह सारा गड़बड़झाला महिनों पहले शुरु हो जाता है, कोई अपनी सीट पक्की करने तथा अपने कैंडिडेट को अपडेट करवाने की जुगत मे उससे बेहतर बकरे को ड़ोपिंग में डुबा बली दिलवा देता है, तो कोई सिरफ़िरा तो अपनी करतूतों के विरुद्ध हुई कार्यवाही से जल-भुन कर देश की इज्जत को ही दांव पर लगा सारी की सारी टीम को ही ना-लायक करवा देता है। पा कोई किसी का कुछ बिगाडता नहीं है, क्योंकी हमाम मे तो सभी निवस्त्र ही हैं। पर असलियत तो उन्हें भी पता है और अपनी पुस्तों का ख्याल भी है सो उलट ब्यान भी साथ-साथ प्रसारित होते रशते हैं। अभी एक ब्यान आया है कि भारत मे खेलों का स्वर्ण युग 2010 से शुरू होगा, यानी अगले कुम्भ के लिए बरतन चमकाने शुरू भी हो गये। कभी-कभी देशवासी ज्यादा हताश ना हों इसलिए खिलाडियों से भी कुछ ऐसा उवचवा दिया जाता है जैसे चीन जाने के पहले ही एक तीरन्दाजनी ने चीन की हवा को दोष दे ड़ाला था गोया चीन की हवा भी हम भारतियों के साथ ही दुश्मनी निभाएगी बाकि चीन के इतर दसियों देशों के लिए हवा हौवा नही बनेगी। भारत चाहे अब तक हुए ओलिंपिक के बराबर भी पदक ना ला पाया हो पर खिलाडियों के साथ सैर-सपाटे के लिए जाने वाले सरकारियों की संख्या उनके द्वारा लाए जाने वाले बैगों के साथ-साथ बढती ही जाती है। पर विडंबना देखिए कि सब जनते समझते हुए भी मेरे जैसे बांगडु टी वी से चिपक रोज लंबी होती पदक तालिका पर किसी चमत्कार की तरह भारत के नाम के उभरने का इंतजार करते-करते पखवाडा गुजार देते हैं। 88888888888888888888888888888888888888888888888888 ओलिंपिक अनंत ओलिंपिक कथा अनंता

रविवार, 10 अगस्त 2008

एक गुमनाम प्रेमी "इलोजी"

हमारे ग्रंथों मे सैंकडों ऐसे पात्र हैं, जिनका उनके समय के घटनाक्रम मे एक अहम योगदान रहा था। परन्तु किसी ना किसी कारणवश उनका नाम और काम हाशिए पर धकेल दिया गया। कुछ लोगों का उस समय के शासकों ने अपने हित मे उपयोग कर उन्हें दूध की मक्खी की तरह अलग कर दिया तो कुछ के काम का मुल्यांकन सही ना हो पाने की वजह से वे नेपथ्य मे चले गये। ऐसा ही एक नाम है इलोजी। असुर राज हिरण्यकश्यप की बहन होलिका और पडोसी राज्य के राजकुमार इलोजी एक दूसरे को दिलोजान से चाहते थे। इलोजी के रूप-रंग के सामने देवता भी शर्माते थे। सुंदर, स्वस्थ,सर्वगुण संपन्न साक्षात कामदेव का प्रतिरूप थे वे। इधर होलिका भी अत्यंत सुंदर रूपवती युवती थी। लोग इनकी जोडी की बलाएं लिया करते थे। । उभय पक्ष की सहमति से दोनों का विवाह होना भी तय हो चुका था। परन्तु विधाता को कुछ और ही मंजूर था। हिरण्यकश्यप अपने पुत्र के प्रभू प्रेम से व्यथित रहा करता था। उसके लाख समझाने-मनाने पर भी प्रह्लाद की भक्ती मे कोई कमी नहीं आ पा रही थी। धीरे-धीरे हिरण्यकश्यप की नाराजगी क्रोध मे बदलती चली गयी और फिर एक समय ऐसा भी आ गया कि उसने अपने पुत्र को सदा के लिये अपने रास्ते से हटाने का दृढसंकल्प कर लिया। परन्तु लाख कोशिशों के बावजूद भी वह प्रह्लाद का बाल भी बांका नही कर पा रहा था। राजकुमार का प्रभाव जनमानस पर बहुत गहरा था। राज्य की जनता हिरण्यकश्यप के अत्याचारों से तंग आ चुकी थी। प्रह्लाद के साधू स्वभाव के कारण सारे लोगों की आशाएं उससे जुडी हुई थीं। हिरणयकश्यप ये बात जानता था। इसीलिये वह प्रह्लाद के वध को एक दुर्घटना का रूप देना चाहता था और यही हो नहीं पा रहा था। इसी बीच उसे अपनी बहन होलिका को मिले वरदान की याद हो आई, जिसके अनुसार होलिका पर अग्नि का कोई प्रभाव नहीं पडता था। उसने होलिका को अपनी योजना बताई कि उसे प्रह्लाद को अपनी गोद मे लेकर अग्नि प्रवेश करना होगा। होलिका पर तो मानो वज्रपात हो गया। वह अपने भतीजे को अपने प्राणों से भी ज्यादा चाहती थी। बचपन से ही प्रह्लाद अपनी बुआ के करीब रहा था, बुआ ने ही उसे पाल-पोस कर बडा किया था। जिसकी जरा सी चोट से होलिका परेशान हो जाती थी, उसीकी हत्या की तो वह कल्पना भी नही कर सकती थी। उसने भाई के षडयन्त्र मे भागीदार होने से साफ़ मना कर दिया। पर हिरण्यकश्यप भी होलिका की कमजोरी जानता था, उसने भी होलिका को धमकी दी कि यदि उसने उसका कहा नही माना तो वह भी उसका विवाह इलोजी से नहीं होने देगा। होलिका गंभीर धर्मसंकट मे पड गयी थी, वह अपना खाना-पीना-सोना सब भूल गयी। एक तरफ़ दिल का टुकडा, मासूम भतीजा था तो दूसरी तरफ प्यार, जिसके बिना जिंदा रहने की वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी। आखिरकार उसने एक अत्यन्त कठिन फ़ैसला कर लिया और भाई की बात मान ली, क्योंकि उसे डर था कि कहीं हिरण्यकश्यप इलोजी को कोई नुक्सान ना पहुंचा दे। निश्चित दिन, उसने अपने वरदान का सहारा प्रह्लाद को दे, उसे अपनी गोद मे ले अग्नि प्रवेश कर अपना बलिदान कर दिया, पर उसके इस त्याग का किसी को भी पता नहीं चल पाया। यही दिन होलिका और इलोजी के विवाह के लिए भी तय किया गया था। इलोजी इन सब बातों से अंजान अपनी बारात ले नियत समय पर राजमहल आ पहुंचे। वहां आने पर जब उन्हें सारी बातें पता चलीं तो उन पर तो मानो पहाड टूट पडा, दिमाग कुछ सोचने समझने के काबिल न रहा। पागलपन का एक तूफ़ान उठ खडा हुआ और इसी झंझावात मे उन्होंने अपने कपडे फाड डाले और होलिका-होलिका की मर्म भेदी पुकार से धरती-आकाश को गुंजायमान करते हुए होलिका की चिता पर लोटने लगे। गर्म चिता पर निढाल पडे अपने आंसुओं से ही जैसे चिता को ठंडा कर अपनी प्रेयसी को ढूंढ रहे हों। उसके बाद उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। वन-प्रातों मे भटकते-भटकते सारी जिंदगी गुजार दी। आज भी राजस्थान में उन्हें सम्मान की दृष्टी से याद किया जाता है। उन्हें विशेष मान्यता प्राप्त है वहां के जनमानस में। वे जिंदा हैं वहां के लोक गीतों तथा कहानियों मे।

बुधवार, 6 अगस्त 2008

भगवान् भी लाचार है

खबर विश्वसनीय सूत्रों से ही मिली थी, पर विश्वास नही हो पाया था कि ऐसा भी हो सकता है। खबर आपके सामने है और फ़ैसला आपके हाथ में। सावन के महीने मे मेघा नक्षत्र के उदय होने के पूर्व एक मुहूर्त बनता है जिसमे प्रभू का दरबार धरती वासियों के लिए कुछ देर के लिये खोला जाता है। इसका पता अभी-अभी साईंस दानों को लगा था। लाटरी के जरिये भारत, अमेरीका तथा जापान के तीन नुमांईदों को उपर जाने का वीसा मिला था। तीनों को एक जैसा ही सवाल पूछने की इजाजत थी। पहले अमेरीकन ने पूछा कि मेरे देश से भ्रष्टाचार कब खत्म होगा, प्रभू ने जवाब दिया कि सौ साल लगेंगे। अमेरीकन की आंखों मे आंसू आ गये। फिर यही सवाल जापानी ने भी किया उसको उत्तर मिला कि अभी पचास साल लगेंगे। जापानी भी उदास हो गया कि उसके देश को आदर्श बनने मे अभी समय लगेगा। अंत मे भारतवासी ने जब वही सवाल पूछा तो पहले तो प्रभू चुप रहे फिर फ़ूट-फ़ूट कर रो पड़े। अब आज के जमाने मे कौन ऐसी बात पर विश्वास करता है, पर जब सर्वोच्च न्यायालय की ओर से कहा गया कि इस देश को भगवान भी नही बचा सकते, तो पहली खबर को आप क्या कहेंगे ?
पुनश्च :- न्यायालय भी तो पूरी बात खोल के नहीं बता सकता न।

शुक्रवार, 1 अगस्त 2008

राष्ट्रपति लिंकन और केनेडी की अविश्वसनीय समानताएं

प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन तथा उनके सौ साल बाद प्रेसिडेंट बने केनेडी के जीवन मे घटी घटनाओं की समानता दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर कर देती हैं। विश्वास नहीं होता कि ऐसा हुआ होगा; पर यह सच है --- * प्रेसिडेंट लिंकन 1860 मे राष्ट्रपति चुने गये थे, केनेडी का चुनाव 1960 मे हुआ था। * लिंकन के सेक्रेटरी का नाम केनेडी तथा केनेडी के सेक्रेटरी का नाम लिंकन था। * दोनों राष्ट्रपतियों का कत्ल शुक्रवार को अपनी पत्नीयों की उपस्थिति मे हुआ था। * लिंकन के हत्यारे बूथ ने थियेटर मे लिंकन पर गोली चला कर एक स्टोर मे शरण ली थी और केनेडी का हत्यारा ओस्वाल्ड स्टोर मे केनेडी को गोली मार कर एक थियेटर मे जा छुपा था। * बूथ का जन्म 1839 मे तथा ओस्वाल्ड का 1939 मे हुआ था। * दोनों हत्यारों की हत्या मुकद्दमा चलने के पहले ही कर दी गयी थी। * दोनों राष्ट्रपतियों के उत्तराधिकारियों का नाम जानसन था। एन्ड्रयु जानसन का जन्म 1808 मे तथा लिंडन जानसन का जन्म 1908 मे हुआ था। * लिंकन और केनेडी दोनों के नाम मे सात अक्षर हैं। * दोनों का संबंध नागरिक अधिकारों से जुडा हुआ था। * लिंकन की हत्या फ़ोर्ड के थियेटर में हुई थी, जबकी केनेडी फ़ोर्ड कम्पनी की कार मे सवार थे।

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...