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शनिवार, 11 जनवरी 2020

देश-समाज में अशांति फैलाती, फिल्म वालों की डर्टी ट्रिक्स

फिल्म निर्माण के दौरान ही बनाने वालों को उसकी कमियों का आभास हो जाता है। पर तब तक फिल्म इतना पैसा खा चुकी होती है कि उसको संभालने के लिए कुछ भी करना असंभव हो जाता है ! तब वही ''डर्टी ट्रिक'' अपनाई जाती है। अभी ऐसा ही एक सोचा-समझा षड्यंत्र रचा गया, जब छपास की नायिका दीपिका को एक विवादित यूनिवर्सिटी में ले जा खड़ा कर दिया गया ! बवाल मचना ही था; सो मचा ! दसियों लाख लोग ट्विटर युद्ध में शमिल हो गए ! हर जुबां पर फिल्म का नाम आ गया ! इधर आग लगा, शातिर लोग अपनी सफलता पर मुस्कुराते हुए अपने दड़बों में जा दुबके, देश-समाज का नुक्सान हुआ, उनकी बाला से ............!!

#हिन्दीं_ब्लागिंग   
हमारे देश में आज फिल्मों से जुड़े लोगों की एक नई जमात पैदा हो चुकी है। जो बाकी देशवासियों से बिल्कुल जुदा है। अवाम से अपने को इतर समझ इन लोगों ने अपने चारों ओर एक ऐसा आभामंडल रच डाला है, जिसकी चकाचौंध में चुंधियाई हुई वर्तमान पीढ़ी दिग्भर्मित हो उन्हें खुदा समझ बैठी है ! फ़िल्मी नायक-नायिकाओं की चाल-ढाल, हाव-भाव की नक़ल पहले भी होती थी पर अब तो जैसे अति ही हो चुकी है ! कुछ मतिहीनों ने उन्हें भगवान का दर्जा तथा उनके वचनों को पत्थर की लकीर बना डाला है। सौ साल से ऊपर की इस फ़िल्मी माया नगरी में कुछेक समर्पित लोगों को छोड़, तक़रीबन सभी का धर्म, ईमान, इंसानियत, रिश्ते-नाते, व्यवहार सभी कुछ सिर्फ पैसे से नियंत्रित होता है। इन सभी का भगवान पैसा ही है। उसके लिए वे कुछ भी कर सकते हैं ! कुछ भी !!

आज फिल्म बनाने का धंधा इतना मंहगा हो चुका है कि अपनी फिल्म की लागत वापस लाने के लिए निर्माता किसी भी हद तक जा सकता है। जान-बूझ कर लोगों की भावनाओं को भड़का कर देश-समाज में अशांति फ़ैलाने से भी ये बाज नहीं आते। इसके उदाहरण कुछेक अंतराल के बाद सामने आते ही रहते हैं। फिल्म के निर्माण के दौरान निर्देशक की नजर से सेट पर एक मक्खी तक नहीं बच सकती, तो यह कैसे संभव है कि उनकी मर्जी के बगैर विवादित संवाद या दृश्य फिल्मांकित हो जाएं। जान-बूझ कर ऐसी हरकतों को अंजाम दिया जाता है जिससे फिल्म को मुफ्त में प्रचार मिले ! जिस तरह किसी बावर्ची को खाना बनाते समय ही अपने द्वारा बनाए जा रहे खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता या उसकी कमी का अंदाजा हो जाता है ठीक उसी प्रकार फिल्म निर्माण के दौरान ही बनाने वालों को उसकी कमियोंऔर गुणवत्ता का आभास हो जाता है। पर तब तक फिल्म इतना पैसा खा चुकी होती है कि उसको संभालने के लिए कुछ भी करना असंभव हो जाता है ! तब वही ''डर्टी ट्रिक'' अपनाई जाती है।

इधर कुछ समय से फिल्मों के प्रचार के लिए एक नया तरीका चलन में है जिसके तहत फिल्म के कलाकार टी.वी. पर या विभिन्न जगहों पर जा अपनी आने वाली फिल्म का प्रचार करते हैं। उन्हें इस बात से कोई मतलब नहीं होता कि जहां वे जा रहे हैं वह जगह ख्यात है या कुख्यात ! उनके लिए वह जगह सिर्फ चर्चित, ख़बरों में या लोकप्रिय होनी चाहिए, बस !

अभी ऐसा ही एक सोचा-समझा षड्यंत्र रचा गया, जब फिल्म छपाक की नायिका दीपिका को एक विवादित यूनिवर्सिटी में ले जा खड़ा कर दिया गया ! बवाल मचना ही था; सो मचा ! लाखों लोग ट्विटर युद्ध में शामिल हो गए, समाज दो फाड़ हो गया, देश-समाज का नुक्सान हुआ उनकी बला से ! उनका तो मनोरथ पूरा हो चुका था ! हर जुबां पर फिल्म का नाम आ चुका था ! फिल्म बनाने वाले और उनके सलाहकारों को शायद आभास हो गया था कि इस समय दो भारी-भरकम फिल्मों के साथ प्रदर्शित होने पर उनकी कृति हादसा सिद्ध होगी ! वैसे भी यदि दीपिका फिल्म से जुडी ना होती तो शायद इस फिल्म को स्क्रीन मिलने ही मुश्किल हो जाते, भले ही वह कितनी भी वास्तविकता के नजदीक हो, सच्चाई दर्शा रही हो। खबर तो यह भी थी कि पहले फिल्म यूनिट वालों की निर्भया के परिवार वालों से मिलने की बात थी पर फिर उन्हें ऐसा लगा कि वहां के ठंढाते माहौल में जाने से उतना प्रचार या ख्याति नहीं मिल पाएगी जितना कि जेएनयू जाने से ! वही हुआ ! इधर आग लगा, शातिर लोग अपनी सफलता पर मुस्कुराते हुए अपने दड़बों में जा दुबके !

अब यह तो हमें ही देखना और सोचना है कि हम चंट लोगों के हाथ की कठपुतली ना बन जाएं ! कोई अपने उद्देश्य की पूर्ती के लिए हमें औजार ना बना ले ! अपनी हित सिद्धि के लिए हमारी आहुति ही ना दे दे। क्योंकि ऐसे लोगों के लिए देश, समाज या अवाम कोई अर्थ नहीं रखता ! इनका एक और एकमात्र उद्देश्य सिर्फ अपना स्वार्थ सिद्ध करना होता है।  

शुक्रवार, 1 मार्च 2019

''गुपि गायेन बाघा बायेन'' बनाम ''गोपी गवैया बाघा वजइया''

आज एक हिंदी भाषा की एनीमेशन फिल्म ''गोपी गवैया बाघा वजइया'' सिनेमाघरों में उतरी है। उसके शीर्षक, उसमें वर्णित घटनाक्रम और पात्रों के नाम से यह जाहिर है कि यह वर्षों पहले सत्यजीत रे जी की फिल्म ''गुपि गायेन बाघा बायेन'' नामक बांग्ला फिल्म  का ''एनिमेटेड'' रूप है। पर टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार की पल्लबी डे पुरकायस्थ द्वारा उसकी जो समीक्षा की गयी है उसमें ना हीं पहली फिल्म का नाम है ना हीं सत्यजीत जी का ! ऐसा क्यों ? क्या यह निर्माता-निर्देशक और समीक्षक की मिलीभगत है ? क्यों नहीं श्रेय दिया गया ''गोपी गायेन बाघा बायेन'' को ? यह सोच कर कि इतनी पुरानी बांग्ला  फिल्म की किसको याद होगी ! फिल्म चल गयी तो वाह-वाही लूट ली जाएगी ! प्रश्न उठा तो क्षमा याचना तो हईये है ...........!        
#हिन्दी_ब्लागिंग 
करीब पचास साल पहले देश के महानतम फिल्म निर्माता श्री सत्यजीत रे ने गंभीर फिल्मों से अलग हट कर बच्चों के लिए कुछ हल्की-फुल्की, मनोरंजक फिल्मों का भी निर्माण किया था। जिनमें पहली कड़ी थी ''गोपी
गाइन बाघा बाइन''। फिल्म बनाई थी दिग्गज फिल्म निर्माता-निर्देशक ने, तो कोई सोच भी नहीं सकता था कि यह पूरी तरह बच्चों की फिल्म है। सभी रे साहब की अन्य फिल्मों की तरह उसमें भी कोई गंभीर संदेश ढूंढने की कोशिश कर रहे थे। उन दिनों भी आजकी तरह अपने आप को धुरंधर, सर्वज्ञानी, तुर्रम खां समझने वाले समीक्षकों ने उस फिल्म के तरह-तरह के विश्लेषण करने शुरू कर दिए थे। कोई उसे महान राजनितिक फिल्म बता रहा था ! कोई उसके द्वारा राज नेताओं पर व्यंग्य कस रहा था तो कोई उसमें छिपा गूढ़ संदेश सामने ला रहा था ! कुछ दिनों बाद एक इंटरव्यू में उन सब तथाकथित विशेषज्ञों के मुंह देखने लायक थे जब सत्यजीत जी से इस बारे में बात हुई ! उन्होंने हंसते हुए कहा कि ''आप लोगों के बताने पर मुझे भी इसके इतने पहलू नज़र आ रहे हैं ! सच तो यह है कि यह मेरे नानाजी उपेंद्र किशोर राय चौधरी जी की आज से 40-45 साल पहले बच्चों के लिए लिखी गयी एक कहानी पर आधारित फिल्म है। जब इसे मेरे बेटे संदीप ने पढ़ा तो उसने मुझे इस पर फिल्म बनाने को कहा। इसमें कोई गूढ़ या राजनितिक संदेश नहीं छिपा है यह पूर्णतया बच्चों की फिल्म है।''
तपन चटर्जी, रबी घोष और हरिंद्रनाथ चट्टोपाध्याय अभिनीत इस फिल्म को अपार सफलता मिली। बंगाल में किसी बंगाली फिल्म के सबसे ज्यादा चलने का रेकॉर्ड बना। नेशनल फिल्म एवार्ड में भी इसकी धूम रही। बेस्ट
फिल्म और बेस्ट निर्देशक का इनाम भी इसकी झोली में आया। इसकी सफलता के उपरांत रे साहब तथा उनके सुपुत्र ने अपनी ''अप्पू त्रयी'' की तर्ज पर इस फिल्म के भी ''हीरेक राजार देशे'' और ''गुपि बाघा फीरे एलो'' जैसे सीक्वेल बनाए।   
आज एक हिंदी भाषा की एनीमेशन फिल्म ''गोपी गवैया बाघा वजइया'' सिनेमाघरों में उतरी है। उसके शीर्षक, उसमें वर्णित घटनाक्रम और पात्रों के नाम से यह जाहिर है कि यह उसी बांग्ला फिल्म का ''एनिमेटेड'' रूप है। पर आज ही टाइम्स ऑफ इंडिया अखबार की पल्लबी डे पुरकायस्थ द्वारा उसकी जो समीक्षा की गयी है उसमें ना हीं पहली फिल्म का नाम है ना हीं सत्यजीत जी का ! ऐसा क्यों है ? क्या यह निर्माता-निर्देशक और समीक्षक की मिलीभगत है ? क्यों नहीं श्रेय दिया गया ''गोपी गाइन बाघा बाइन'' को ? ऐसा तो नहीं कि यह सोच कर कि इतनी पुरानी बांग्ला फिल्म की किसको याद होगी ! फिल्म चल गयी तो वाह-वाही लूट ली जाएगी ! प्रश्न उठा तो क्षमा याचना तो हईये है ! कामना है कि यह पल्लबी डे की एक चूक ही हो।  
एक बात और फिल्म का शीर्षक भी बाजारू और चलताऊ किस्म का है, गोपी गवैया बाघा वजइया, जैसे गांव-खेड़े की नौटंकियों में नृत्य करने वालों के लिए नचनिया शब्द प्रयोग में लाया जाता है। इसके बदले गोपी गायक बाघा वादक भी हो सकता था। पर यह शिल्पा रानाडे जी का अपना मामला है वे जो भी नाम रखें पर तब जब ये उनकी अपनी रचना हो। पर जब आपने किसी और की कृति उठाई है तो उसको हल्का तो ना करें ! इसके साथ ही स्रोत को श्रेय या उसका जिक्र तो जरूर ही होना चाहिए। 

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