ऐसे ही एक दिन जब गामा अखाड़े पहुंचे तो वहां सिर्फ एक ही आदमी को कसरत करते पाया। उस व्यक्ति ने गामा को देखते ही कहा कि आओ गामा भाई, आज कुछ जम कर कुश्ती की जाए। गामा मान गए ! काफी देर की कुश्ती के बाद ना हीं वह व्यक्ति गामा को पछाड़ सका ना हीं गामा उसे। थोड़ी देर बाद उस आदमी ने गामा की पीठ पर जोर से अपना हाथ मार कर कहा "गामा, मैं तुझसे बहुत खुश हूं। जा आज से तुझे दुनिया में कोई नहीं हरा पाएगा। तेरी इस पीठ को कोई भी कभी भी किसी भी अखाड़े की जमीन को नहीं छुआ पाएगा।" ऐसा कह कर वह आदमी गायब हो गया............!
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आज एक ऐसे भारतीय पहलवान का जन्म दिन है जो अपने जीवन काल में कभी भी कोई कुश्ती का मुकाबला नहीं हारा ! विश्व विजेता गामा एक ऐसा नाम, जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है, जो जीते जी किंवदंती बन गया था। कुश्ती की दुनिया में गामा पहलवान का कद कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जन्मदिन के मौके पर गूगल ने भी डूडल बनाकर उन्हें सम्मान दिया है। एक दौर था, जब किसी भी शख्स की ताकत को बताने के लिए रोज पांच हजार बैठक और तीन हजार दंड लगाने वाले गामा के नाम का इस्तेमाल होता था। घर-घर में यह नाम गूंजा करता था।
अमृतसर के एक गांव झब्बोवाल में 22 मई 1878 में पैदा हुए गामा का असली नाम गुलाम मोहम्मद बक्श बट्ट था। उनके वालिद भी कुश्ती के खिलाड़ी थे। इसलिए उनकी तालीम घर पर ही हुई। दस साल की उम्र में पहली बार कुश्ती लड़ी थी। परन्तु ख्याति तब मिली जब 1890 में जोधपुर के राजदरबार में आयोजित दंगल में उन्होंने वहाँ आए सारे के सारे पहलवानों को मात दे दी ! जोधपुर के महाराजा भी इस बालक की चपलता और कुशलता देख दंग रह गए ! जो आगे चल कर रुस्तम ए हिंद, रुस्तम ए जमां और द ग्रेट गामा कहलाया !
उन्नीस साल के होते-होते उन्होंने देश के सभी पहलवानों को हरा दिया था ! 1910 से शुरू हुए विदेश भ्रमण पर उनके सामने सारे विदेशी दिग्गज चित्त हो गए ! एक से एक बड़े नाम, विश्वविजेता, दुनिया के कुश्तीगीर गामा के आगे बौने सिद्ध होते चले गए ! दुनिया भर के पहलवानों को चित्त कर जब स्वदेश लौटे तो उन्हें रुस्तम ए हिंद की उपाधि से नवाजा गया। अपने तक़रीबन 52 साल की कुश्ती की जीवन यात्रा में वह एक बार भी किसी से नहीं हारे। दुनिया भर में अपनी पहचान बनाई। दुनिया भर के पहलवानों को कई-कई बार हरा कर जीवनपर्यंत अपराजित रहे। पर समय से पराजित हो उनके जीवन के आखिरी दिन कुछ मुश्किल में ही बीते ! 23 मई 1960 में 82 साल की उम्र में उनका निधन हो गया !
कुश्ती की दुनिया में गामा पहलवान का कद कितना बड़ा था, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जन्मदिन के मौके पर गूगल ने भी डूडल बनाकर उन्हें सम्मान दिया है
इतना बड़ा पहलवान होने के बावजूद वह एक सीधा-साधा, सरल ह्रदय, जाति-धर्म के पक्षपात से दूर, मिलनसार, सादगी पंसद, घमंड से कोसों दूर रहने वाला तथा नियमों का कठोरता से पालन करने वाला इंसान था। आंधी हो, तूफान हो, ठंड हो या गर्मी वह कभी भी अखाड़े जाने मे चूक नहीं करता था। बिना नागा सबेरे चार बजे वह जोर आजमाने अखाड़े मे पहुंच जाता था। इतने बड़े और महान खिलाड़ी के साथ कई किस्से जुड़े हुए हैं। उन्हीं में से एक लोकविश्वास और अनुश्रुति है कि उनके साथ दिव्य आत्माएं कुश्ती लड़ा करती थीं।
कहते हैं कि सुबह सबेरे जब वह वे अखाड़े जाते थे तो वहाँ पहले से उपस्थित लोग उन्हें कुश्ती लड़ने का आह्वान करते थे, जिसमें अक्सर गामा को हार मिलती थी ! पर इससे विचलित ना हो गामा और अधिक मेहनत करने लगते थे ! ऐसे ही एक दिन जब गामा अखाड़े पहुंचे तो वहां सिर्फ एक ही आदमी को कसरत करते पाया। उस व्यक्ति ने गामा को देखते ही कहा कि आओ ! गामा भाई, आज कुछ जम कर कुश्ती की जाए। गामा मान गए ! काफी देर की कुश्ती के बाद ना हीं वह व्यक्ति गामा को पछाड़ सका ना हीं गामा उसे। थोड़ी देर बाद उस आदमी ने गामा की पीठ पर जोर से अपना हाथ मार कर कहा "गामा, मैं तुझसे बहुत खुश हूं। जा आज से तुझे दुनिया में कोई नहीं हरा पाएगा। तेरी इस पीठ को कोई भी कभी भी किसी भी अखाड़े की जमीन को नहीं छुआ पाएगा।" ऐसा कह कर वह आदमी गायब हो गया।
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| पत्नी वजीर बेगम के साथ |
जनश्रुति है कि उस दिन गामा को समझ आया कि महीनों वह जिनके साथ कुश्ती के दांव-पेंच आजमाते रहे, वे दिव्य आत्माएं थीं। दतिया राज्य के पुराने महल के अंदर सैयदवली की मजार है, लोगों का विश्वास है कि वही स्वंय गामा को दांव-पेंच मे माहिर करने के लिए उनके साथ जोर आजमाया करते थे। जो भी हो यह बात तो बिलकुल सही है कि कुश्ती का पर्याय और जीत की मिसाल बन चुके गामा का ना तो कोई सानी था और शायद कभी हो भी नहीं सकेगा ! उनके पांच बेटे और चार बेटियां थीं ।उनकी पोती कलसूम पूर्व पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज नवाज शरीफ की पत्नी हैं ।

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