गुरुवार, 31 अक्तूबर 2019

लेडिकेनी ! यह कैसा नाम है मिठाई का !

लेडिकेनि ! कुछ अजीब सा नाम नहीं लगता, वह भी जब यह किसी मिठाई का हो ! लेकिन यह सच है कि पश्चिम बंगाल में इस नाम की एक मशहूर मिठाई पाई जाती है जो काफी लोकप्रिय भी है। छेने और मैदे के मिश्रण को तल कर फिर चाशनी में सराबोर कर तैयार किए गए इस मिष्टान का नाम, 1856 से 1862 तक भारत के गवर्नर-जनरल रहे, चार्ल्स कैनिंग की पत्नी चार्लोट कैंनिंग के नाम पर रखा गया था.....!

#हिन्दी_ब्लॉगिंग 
उन दिनों देश में फिरंगियों के विरुद्ध गंभीर माहौल था। उन्हें दुश्मनी की नज़रों से देखा जाता था ! विद्रोह की संभावना बढ़ती जा रही थी ! ऐसे में भी एक अंग्रेज महिला ने ऐसी ख्याति अर्जित की, इतना स्नेह जुटाया कि उनके नाम पर एक मिठाई का नामकरण कर दिया गया ! ऐसा होने का भी एक बड़ा कारण था ! उन दिनों देश का माहौल अत्यंत खराब और भयप्रद होने के बावजूद लेडी चार्लोट देश भ्रमण कर लोगों से मिलती-जुलती रहीं। जनता के करीब रह उनका हाल-चाल जानने के लिए प्रस्तुत रहीं। इसी कारण अवाम में वे काफी लोकप्रिय हो गयीं, आम आदमी उन्हें अंग्रेज होने के बावजूद पसंद करने और चाहने लगा। वे भी शायद इस देश से प्रेम व लगाव रखने लगी थीं इसीलिए शायद उन्होने इसी धरा में दफ़न होना उचित समझा हो ! उनकी कब्र कोलकाता के नजदीक बैरकपुर में आज भी मौजूद है। उनकी इसी लोकप्रियता के कारण उनकी अभ्यर्थना स्वरुप एक नयी मिठाई की ईजाद कर उसका नाम उनके नाम पर रखा गया।  


मिष्टी प्रेम 



वैसे लेडिकेनि के उद्भव के बारे में तरह-तरह के लोकमत हैं। कोई कहता है कि कलकत्ता के मशहूर हलवाई भीम चंद्र नाग, जिनकी छठी पीढ़ी अभी भी कलकत्ते में अत्यंत सफलता पूर्वक अपना कारोबार चला रही है, द्वारा इसे खासकर लेडी कैंनिग के भारत प्रवास पर इसे बनाया था ! कोई इसे उनके जन्मदिन के उपहार स्वरुप निर्मित किया मानता है ! कोई उनके आगमन पर उनके स्वागत हेतु प्रस्तुत किए गए व्यंजन के रूप में देखता है तो कोई इसका जन्म बरहमपुर में लॉर्ड कैंनिग के आगमन के समय बनाया गया बताता है। कहानी कोई भी हो पर यह सच है कि इसका नाम लेडी कैनिंग को ही समर्पित है। इसी समर्पण की वजह से ही इसे इतनी अधिक ख्याति मिली बजाए इसके स्वाद के ! उस दौरान यह इतनी लोकप्रिय हो चुकी थी कि 1861 में उनकी मृत्यु के पश्चात भी इसको सम्मलित किए बगैर, मिष्टी प्रिय सभ्रांत बंगाली परिवारों का कोई भी महाभोज पूरा नहीं हो पाता था। पर समय के साथ धीरे-धीरे इसका नाम लेडी कैनिंग से बदल कर लेडिकेनि होता चला गया !  


बैरकपुर में स्थित ग्रेव 
देखने में और कुछ-कुछ स्वाद में भी यह अपने चचेरे भाई गुलाब जामुन के बहुत करीब है। पर दोनों में एक बुनियादी फर्क है, गुलाबजामुन जहां खोये से बनाया जाता है, वहीं लेडिकेनि के लिए छेने का प्रयोग किया जाता है। बाकि बनाने की विधि और रूप-रंग तक़रीबन समान ही होते हैं। जो भी हो, है तो यह भी एक जिह्वाप्रिय मिष्टान ! तो जब कभी भी मौका मिले, चूकना नहीं चाहिए इसका स्वाद लेने को ! 

4 टिप्‍पणियां:

Meena Bhardwaj ने कहा…

रोचक जानकारी लिए सुन्दर सृजन ।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी, हार्दिक आभार

Anita saini ने कहा…


जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (०२ -११ -२०१९ ) को "सोच ज़माने की "(चर्चा अंक -३५०७) पर भी होगी।
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनिता जी, आपका और चर्चा मंच का हार्दिक आभार

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