शुक्रवार, 14 जून 2019

छत्तीसगढ में खेल और खेलों में संस्कृत

क्रिकेट = कंदुक क्रीड़ा।
रन       = भावनांक।  
चौका   = सिद्ध चतुष्कम।
बढ़िया शॉट = पुष्ठु प्रहार। 
बाउंड्री = कंदुक परिधि लंघनम। 
कैच     =  ग्रहणम। 
आउट = निर्गत। 

#हिन्दी_ब्लागिंग  
ये कोई मजाक की बात नहीं हो रही ना ही हिंदी को असमर्थ भाषा बताने की साजिश ! यह तो छत्तीसगढ के संस्कृत विद्या मंडलम का प्रदेश में संस्कृत भाषा को लोकप्रिय और बढ़ावा देने के साथ-साथ खेलों में भी इस भाषा के प्रयोग को प्रोत्साहन देने का एक प्रयास है। इससे छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य होगा जहां क्रिकेट, फ़ुटबाल, बैडमिंटन जैसे हर प्रचलित खेलों के नाम व नियम के लिए संस्कृत में तकनीकी शब्दावली होगी। इसकी तैयारी चरणबद्ध तरीके से, नए शिक्षा सत्र से संस्कृत स्कूलों में खेलों के प्रचलित नामों की जगह संस्कृत के नामों से पुकारे जाने से की जा रही है। इसके साथ ही यह भी कोशिश रहेगी कि खेलकूद की प्रतियोगिताओं में संस्कृत ही में उसका विवरण प्रसारित किया जाए। इसके साथ ही यह भी प्रयास किया जाएगा कि स्थानीय और देशज लोकप्रिय खेलों के नामों और नियमों का भी संस्कृत में अनुवाद किया जा सके, इस पर रिसर्च भी की जा रही है।  

वैसे इससे मिलता-जुलता एक प्रयास इस साल बनारस में संपूर्णानंद विश्वविद्यालय ने संस्कृत क्रिकेट प्रतियोगिता का आयोजन करवा कर किया था, जिसमें खिलाड़ियों ने धोती-कुर्ता पहन कर क्रिकेट खेला था। इस में कॉमेंट्री व अन्य नियम कायदे सबमें संस्कृत का ही उपयोग किया गया था। जब खेलों प्रतियोगिताओं में भी संस्कृत का प्रयोग होने लगेगा तो बच्चे भी इस भाषा से और ज्यादा जुड़ाव और लगाव महसूस करने लगेंगे। अभी जो संस्कृत में खेलों के नाम का शब्दकोष बनाया जा रहा है उसमें खेलों के नाम कुछ इस तरह के होंगे -

* क्रिकेट = कंदुक क्रीड़ा !            * फ़ुटबॉल  = पाद कंदुकम !                 * बॉस्केटबॉल = हस्तपाद कंदुकम !
* वॉलीवाल = अपाद कंदुकम !     * टेबल टेनिस = उत्पीठिका कंदुकम !    * बैडमिंटन = खगक्षेपण क्रीड़ा !
* दौड़ = धावनम !                        * कबड्डी = रुद्ध्यते बाध्यते !                   * खोखो = खो गति प्रतिघात !      
* कुश्ती = मल्लयुद्धम !   

शुरू में यह सब अजीबोगरीब या अटपटा सा जरूर लगता है ! साथ ही यह आशंका भी है कि सदा की तरह भारतीय भाषाओं को अक्षम बताते हुए उनका विरोध कर, अंग्रजी को तरजीह देने वाले कुछ लोग इस कदम को भी निरुत्साहित करने, इसे अव्यवहारिक और कलिष्ट बताने, इसका मजाक बनाने के साथ-साथ अंग्रजी शब्दों के उपयोग को ख़त्म करने के विरोध में मुहीम चलाने की पुरजोर कोशिश कर सकते हैं ! अब तो यह समय ही बताएगा कि यह प्रयास कितना सफल होता है। लोगों का कितना सहयोग मिलता है और जुबान पर चढ़े शब्दों की जगह नए शब्दों के प्रयोग में कितना समय लगता है या फिर अवाम स्वीकार करती भी है या नहीं ! क्योंकि संस्कृत में टी.वी. पर पढ़ी जाने वाली खबरों का उदहारण हमारे सामने है !

*संदर्भ - दैनिक भास्कर        

4 टिप्‍पणियां:

Kya Hai Kaise ने कहा…

खूबसूरत पंक्तियाँ

Anita saini ने कहा…

जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (15 -06-2019) को "पितृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ" (चर्चा अंक- 3367) पर भी होगी।

--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है

….
अनीता सैनी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

@क्या है कैसे !
आपका ''कुछ अलग सा'' पर सदा स्वागत है

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अनीता जी, आपका और चर्चा मंच का हार्दिक आभार

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