मंगलवार, 29 नवंबर 2016

अपानवायु, कुछ रोचक जानकारी

दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  जान कर  आश्चर्य होगा कि चीन में   "Professional  Smeller"   द्वारा गंध सूंघ कर रोगों का निदान किया जाता रहा है। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है

अपानवायु, चिकित्सा जगत में भले ही इस पर काफी कुछ लिखा, बताया या शोध किया जा रहा हो, पर रोजमर्रा की जिंदगी में और आम बोल-चाल में यह काफी उपेक्षित सा विषय रहा है। आम धारणा में यह कुछ भदेस, असुसंस्कृत, बेशऊर, फूहड़ या कह सकते हैं कि कुछ हद तक अश्लीलता की श्रेणी में आता है। भले ही इस पर खुले-आम बात करने पर, असभ्यता माने जाने के कारण लोग कतराते हों, पर है यह हमारी रोजमर्रा की जिंदगी की अभिन्न प्राकृतिक क्रिया। इसका नाता शरीर के साथ जन्म से लेकर मृत्यु तक बना रहता है। 

इधर इस को लेकर जगह-जगह, तरह-तरह ख़बरें, कुछ ज्यादा ही सामने आने लगी हैं। कुछ में इससे कुछ हद तक निजात पाने की बात रहती है, तो कुछ में इसकी दुर्गंध को रोकने पर हो रही शोध के बारे में बताया जाता है। यह तो हुई इस समस्या को लेकर उठाए गए गंभीर कदम, पर उधर कुछ फिल्मों और टी वी के तथाकथित हास्य सीरियलों में इसको लेकर फूहड़ हास्य पैदा करने की कोशिशें भी जारी हैं। जो कतई स्वागत योग्य नहीं हैं। शायद ऐसे लोगों को अपनी प्रतिभा पर विश्वास नहीं होता जो ऐसी हरकतों को दर्शाने में उतर आते हैं।   

इसका दवाब किसी को भी, कभी भी और कहीं भी हो सकता है। पर भीड़-भाड़ में यह एक शर्मनाक समस्या बन जाता है। पार्टी इत्यादि में सभी के सामने वायु-त्याग करना खुद ही अपमानित होने जैसा लगता है। पर इसके वेग को रोकना भी सेहत के लिए ठीक नहीं होता। ऐसा करने से सिरदर्द, सीने में दर्द, बेचैनी या पेट में दर्द या सूजन भी हो सकती है।  इसलिए हमें स्वस्थ खान-पान की आदत डालनी चाहिए जो कुछ हद तक इसका निवारण कर सकती है घर के बाहर का या कुछ भी, जो मिला पेट में डाल लेना, समय-असमय खाना,  विपरीत गुणों वाले खाद्य-पदार्थों को एक साथ लेना, इसके प्रमुख कारक हैं। मद्य व अत्यधिक धूम्र-पान जैसी आदतों को छोडने या कम करने से इसका प्रकोप भी काफी हद तक  नियंत्रित किया जा सकता है। बाजार में इससे निजात दिलाने वाली दवाएं भी उपलब्ध हैं। वैसे, जैसा कि प्रयोगों द्वारा साबित हुआ है, रोज एक केला खाने से बड़ी हद तक इसे काबू में किया जा सकता है। यह सब बातें तो आम हैं पर इसके बारे में कुछ दिलचस्प तथ्य भी खोज निकाले गए हैं जो सर्वविदित नहीं हैं।   

यह जान कर आश्चर्य होता है कि मनुष्य शरीर के वायु-प्रकोप को, जिसे हेय दृष्टि से देखा जाता है वह कुछ लोगों का परिवार चलाने का जरिया है। कहते हैं चीन में  "Professional Fart Smeller" गंध सूंघ कर रोगों का निदान करते हैं। इनके काम की तरह ही इनको इस काम के एवज में मिलने वाली, करीब 50000 डॉलर की रकम भी हैरतंगेज है। आम आदमी 10 फिट/सेकंड या 9.5 की.मी/ की गति से 'औसतन' रोज 14 बार वायु निष्काषित करता है, यह क्रिया ज्यादातर रात में सोते वक्त होती है। इसकी मात्रा इतनी होती है जिससे एक मध्यम साइज का गुब्बारा फुलाया जा सकता है। पर इस क्रिया का अधिकतम ऊचांई या पानी की गहराई में होना कुछ मुश्किल होता है। अब तो विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली है कि आज इसकी आवाज और आयतन दोनों को नापना संभव हो गया है। गजब तो यह है कि अब खाने वाली ऐसी गोलियां भी मिलने लगी हैं जिनके सेवन से इसकी दुर्गन्ध, गुलाब या चॉकलेट जैसी चीजों की सुगंध में बदल जाती है। वैसे अधोवस्त्र बनाने वाले, वस्त्रों के कई निर्माता ऐसे कपडे को बाजार में लाने का उपक्रम कर रहे हैं जिससे निष्काषित वायु की दुर्गंध को रोका जा सके। इसमें सफलता भी मिलने लगी है। 
   
अपान वायु पेट में पाचन के दौरान वहां स्थित बैक्टेरिया के कारण बनी कई तरह की गैसों का मिश्रण है। यदि भोजन में सल्फर की मात्रा ज्यादा हो तो दुर्गन्ध भी उतनी ही बढ़ जाती है। इस श्रेणी में पत्तेदार सब्जियां, अंडे, रेड मीट, डेयरी के उत्पादन, प्याज, लहसुन इत्यादि आते हैं। यह मनुष्यों को ही नहीं संपूर्ण प्राणी जगत को प्रभावित करती है। यहां तक कि कीड़े-मकोड़े भी इससे अछूते नहीं हैं। जान कर  आश्चर्य होगा कि दीमक जैसा छोटा सा कीड़ा सबसे ज्यादा गैस उत्पादित करता है। फिर कतार में लगते हैं ऊंट, ज़ेबरा, भेड़, गाय, हाथी, कुत्ते तथा इंसान।  कितनी अजीब बात है कि मनुष्य को अपनी अपान वायु की दुर्गंध सदा दूसरों से कम बुरी लगती है। 

दुनिया भर में इस को चाहे कितना फूहड़, हेय या भदेस माना जाता हो, पर कुछ संस्कृतियां ऐसी भी हैं जहां इसे अन्य आम क्रियाओं की तरह मान्यता प्राप्त है, जैसे दक्षिणी अमेरिका की एक जन-जाति, यानोमामी, जो इसे अभिवादन के रूप में लेती है। चाहे जो हो वायु के इस प्रकार का हमारे शरीर पर बहुत गहरा असर रहता है। कोशिश यही रहनी चाहिए कि हम, जहां तक संभव हो, कफ और पित्त के साथ इसका संतुलन बनाए रखें। 
-संदर्भ अंतरजाल 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा आज शुक्रवार (02-12-2016) के चर्चा मंच "

सुखद भविष्य की प्रतीक्षा में दुःखद वर्तमान (चर्चा अंक-2544)
" (चर्चा अंक-2542)
पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

सुप्रभात, शास्त्री जी।