शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

सुपर ट्रेनों में बढती टिप की बिमारी

बात 25-50 रुपये की नहीं है, बात है इस रोग के फ़ैलने की। एक गाडी से हजारों रुपये वसूल लिए जाते हैं, बिना बात के। हो सकता है कल "बेडिंग" देने वाला भी चादर-तकिया देने की सेवा के बदले "कुछ" चाहने लगे। रात को तापमान कम-ज्यादा करने के लिए भी पैसे वसूले जाने लगें

कुछ ट्रेनों में जिनमें खान-पान की सुविधा का मूल्य टिकट के साथ ही ले लिया जाता है, जैसे #राजधानी एक्स. में, उनमें सफर के ख़त्म होने के समय #कैटरिंग स्टाफ द्वारा #टिप लेने का चलन काफी दिनों से चला आ रहा है। हालांकि नाश्ते-भोजन का खर्च टिकट के साथ ही ले लिया जाता है यह जानते हुए भी यात्री की मन:स्थिति यात्रा के दौरान भोजन इत्यादि पर कुछ खर्च न होने और नम्रता पूर्वक की गयी त्वरित सर्विस के कारण वह 25-50 रुपये दे ही देता है। हालांकि पचासों वादों के बाद भी भोजन की गुणवत्ता जस की तस है। अब तो लोग तंग आ कर भोजन की सुविधा प्रदान करने वाली गाड़ियों में भी घर का खाना ले चलने लगे हैं। हाँ नाश्ते वगैरह को ठीक-ठाक कहा जा सकता है।  
पहले क्या होता था कि जिसने जो भी दे दिया कैटरिंग स्टाफ का मुखिया उसे चुप-चाप स्वीकार कर लेता था।पर आसानी से मिलती ढेर सी राशि को देख इनका लालच भी बढ़ने लगा है और अब ये अपनी मांग रखने लगे हैं। अभी सितंबर माह की बीस तारीख को "रायपुर राजधानी" के मेरे कोच में सिर्फ आठ-दस यात्री ही थे। सुबह दुर्ग के बाद जब वेटर के मांगने पर मैंने उन्हें टिप दी तो वे बोले, सर कुछ और दीजिए, देखिए ना आज तो कितने कम पैसेंजर हैं। जैसे यात्री कम होना भी मेरी गलती हो ! जैसे-तैसे वेटर गए तो सफाई वाला आ खड़ा हुआ कि मैं कल से सेवा कर रहा हूँ, कुछ दीजिए !! वही दृश्य जब तीन अक्टूबर को लौटना हुआ तो फिर दोहराया गया !!! जैसे ये लोग अपनी ड्यूटी न कर सिर्फ  मेरी सेवा कर रहे हों !! आदमी भले ही अपनी ख़ुशी से कुछ दे दे, पर माँगने से कोफ़्त होना स्वाभाविक है।  

बात 25-50 रुपये की नहीं है, बात है इस रोग के फ़ैलने की। एक गाडी से हजारों रुपये वसूल लिए जाते हैं, बिना बात के। हो सकता है कल "बेडिंग" देने वाला भी चादर-तकिया देने की सेवा के बदले "कुछ" चाहने लगे। रात को तापमान कम-ज्यादा करने के लिए भी पैसे वसूले जाने लगें। सरकार ने तो अपने हाथ खिंच कर सब कुछ प्रइवेट कंपनियों को सौंप दिया है। जिनका ध्येय ही है किसी न किसी तरह ज्यादा से ज्यादा कमाई करना। वे तो कमा ही रहे हैं उनके  मातहतों ने भी, यात्रियों को बकरा बना, अतिरिक्त कमाई का जरिया खोज निकाला है। समय रहते यदि इस पर अंकुश नहीं लगता है तो मांग तो बढ़ेगी ही, हो  सकता है कुछ ना देने वाले के साथ बदसलूकी की घटनाएं भी आम हो जाएं।

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (09-10-2016) के चर्चा मंच "मातृ-शक्ति की छाँव" (चर्चा अंक-2490) पर भी होगी!
शारदेय नवरात्रों की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
विजयदशमी की शुभकामनाएं सपरिवार स्वीकारें।