गुरुवार, 21 जनवरी 2016

पंद्रह किलो सोने के साथ बाबागिरी !

वैसे तो "बाबा" शब्द के कई अर्थ हैं, जैसे दादा, बुजुर्ग व्यक्ति और कहीं बालक भी। पर वृहद रूप में इस शब्द को ऐसे इंसान के लिए प्रयोग किया जाता है जिसने मोह-माया त्याग दी हो, सन्यास ले लिया हो, योगी हो। खुद को अनुशासित कर हर तरह की कुटेव से दूर रहता हो।  हमारे ग्रंथों और ज्ञानी-जनों के अनुसार ऐसा इंसान दुनिया की मोह-माया को त्याग प्रभू से लौ लगा लेता है, उसका किसी भी भौतिक चीज से व्यक्तिगत लगाव नहीं रहता, उसके मन में सिर्फ प्रेम बसता है, भक्ति बचती है, सर्वहारा के लिए करुणा शेष रह जाती है वह अपने-आप को परम-सत्ता को समर्पित कर देता है।

पर आजकल सारी मान्यताएं, धारणाएं बदली-बदली सी नजर आने लगी हैं। सन्यास लेने के बाद, बाबा कहलाने के बावजूद भी लोग मोह-माया नहीं त्याग पाते।  गुरु बन जाते हैं। शिष्यों की फौज खड़ी हो जाती है।  सैंकड़ों एकड़ में आश्रम खुल जाते हैं। ऐसे गुरु स्वयं ही भौतिक जगत से मुक्त नहीं हो पाते तो शिष्य को क्या मुक्ति दिला पाएंगे। यहाँ भी घृणा, द्वेष, शोषण, भय, प्रसिद्धि पाने की ललक, अपने-आप को श्रेष्ठ साबित करने की हवस, सब स्थाई भाव हैं। यहाँ भी जिसके साथ जन-बल होता है, सत्ता होती है, वह अराजक बन जाता है। यहां भी वह सब कुछ होता है, जो बाकी भौतिक जगत में होता है, अंतर होता है तो केवल वस्त्रों के रंग का | अपने-आप को औरों से अलग दिखाने की चाहत, समाज में अपने नाम की चर्चा की ललक, किसी भी तरह प्रसिद्धि पाने की आकांक्षा के लिए ऐसे लोग किसी भी हद तक चले जाते हैं। जिसका नाम भी कभी नहीं सुना गया हो, वह भी अपने क्रिया-कलापों से रातों-रात मशहूरी पा लेता है। समाज में चर्चा का विषय बन जाता है। जैसा कि अभी पिछले दिनों एक तथाकथित बाबा की, अपने स्वर्ण-प्रेम के चलते, बहुत चर्चा थी मीडिया में। अक्सर हरिद्वार से कांवड़ ले दिल्ली आने वाले इस शिव-भक्त के शरीर पर पंद्रह किलो (इनके शिष्यों के अनुसार आठ किलो) सोना, जिसकी कीमत तकरीबन तीन करोड़ के ऊपर होगी सदा शोभायमान रहता है। किसी समय के व्यापारी ने अपने ताम-झाम से लोगों को आकृष्ट करवा अब "गोल्डन बाबा" की उपाधि हासिल कर ली है।       

अनगिनत नकारात्मक खबरों के बावजूद रोजमर्रा की परेशानियों से जूझते, किसी अलौकिक चमत्कार की आशा में अभी भी लोगों की आस्था, विश्वास, श्रद्धा साधू-सन्यासियों के प्रति कम नहीं हुई है। पर उनसे आशा रखते हैं मार्ग-दर्शन की। अपेक्षा रखते हैं सात्विकता की। उन्हें लगता है कि ऐसे लोग आध्यात्म को गहराई से समझते हैं, प्रभू के ज्यादा करीब हैं इसलिए उनकी मुश्किलों का उनके कष्टों का, उनकी परेशानियों का निवारण कर सकते हैं। उनके दिमाग में ऐसे लोगों की छवि प्रभू के दूत की बन जाती है इसीलिए उनकी बेजा हरकतें भी उन्हें नागवार नहीं गुजरतीं। 

3 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अजब गजब..

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (23-01-2016) को "विषाद की छाया में" (चर्चा अंक-2230) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

आपके ब्लॉग को यहाँ शामिल किया गया है ।
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