शनिवार, 20 दिसंबर 2014

दिल्ली का "मजनू का टीला", ये मजनू वो मजनू नहीं है

कभी-कभी एक जैसे नाम से गलतफहमी हो जाती है। जैसे किसी अनजान से इंसान के नाम पर किसी जगह की पहचान बनी हो तो सच्चाई न जानने वालों को लगता है कि उस जगह का नाम कथा-कहानियों में प्रचलित ज्यादा मशहूर इंसान के नाम पर ही रखा गया होगा। खोज-खबर न होने पर यह धारणा मजबूत भी होती चली जाती है।

ऐसी ही एक जगह है दिल्ली में, मजनू का टीला। ज्यादातर लोगों की धारणा है कि लैला के प्रेमी मजनू के नाम पर ही इस जगह का नामकरण हुआ होगा, जबकी असलियत यह है कि वर्षों पहले चौहदवीं शताब्दी में सिकंदर लोधी की बादशाहत के समय यहां अब्दुला नाम का एक मस्त-मौला, खुदा के ख्यालों में खोया रहने वाला इंसान रहता था, जो लोगों को अपनी नाव में यमुना नदी के आर-पार बिना कोई शुल्क लिए लाया ले जाया करता था। उसका रंग-ढंग देख लोग उसे मजनू यानी बावला पुकारने लग गए। दैव-योग से एक बार गुरु नानक देव का यहां आना हुआ और अब्दुला की निष्ठा को देख वे यहां उसके पास कुछ दिन रुक गए। उनके यहां निवास के दौरान हर धर्म के लोग धर्म-चर्चा के लिए उनके पास आने लगे। इसी बीच अब्दुल्ला उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो गया। गुरु जी ने उसकी भक्ति देख उसे आशीर्वाद दिया की तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। वही हुआ उनकी कृपा अब्दुला पर देख लोग इस जगह को उसके प्रचलित नाम, मजनू के नाम से जानने लग गए।      

1783 में सिख सेना नायक बघेल सिंह ने जब दिल्ली फतह कर उसे कुछ दिन अपने कब्जे में रखा, उसी दौरान उन्होंने यहां एक गुरूद्वारे का निर्माण करवाया जो मजनू का टीला गुरुद्वारा कहलाया । जिसे महाराजा रंजीत सिंह ने बाद में विस्तार दिया। यहीं छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी ने भी आकर निवास किया था। आज यह दिल्ली के पुराने सिख धर्मस्थलों में से एक है।
सबसे पहले सन 1900 में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली के निर्माण में जुटे मजदूरों  यहां ला कर बसाया गया। फिर
आजादी मिलने के बाद अरुणा नगर के नाम से रिहायशी इलाका आबाद हुआ। धीर्रे-धीरे जगह-जगह से लोग यहां आकर बसते गए। फिर 1960 में भारत सरकार ने न्यू अरुणा नगर बस्ती बसा वहाँ तिब्बती शरणार्थियों को पनाह दी। धीरे-धीरे उनकी आबादी बढ़ती गयी और आज यह जगह छोटे तिब्बत के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। यहां का तिब्बती बाजार सदा ग्राहकों से भरा रहता है जो अपनी पसंद के शाल, जूते, घर सजाने का सामान, तिब्बती कलाकृतियां ढूंढते-ढूंढते यहां आ पहुंचते हैं। यहां एक बौद्ध मठ तथा मंदिर भी है। इसके अलावा खाने-पीने की अनेक दुकाने खुल चुकी हैं, जहां नार्थ कैम्पस के विद्यार्थी और यहां आने वाले ग्राहक उचित मूल्य पर अपनी भूख शांत कर सकते हैं।       

दिल्ली की बढ़ती आबादी ने यहां भी अपना असर, आस-पास फैली सैंकड़ों झुग्गी-झोपड़ियों के जमावडे के रूप में फैलाया है, और इन्ही तीनों रिहायशी जगहों से घिरा हुआ है यह ऐतिहासिक मजनू का टीला। जहां अंतर्राज्यीय बस अड्डे या कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन से आसानी से कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है।

3 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-12-2014) को "कौन सी दस्तक" (चर्चा-1835) पर भी होगी।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

shaastri ji, aabhar.

Asha Joglekar ने कहा…

मजनू के टीले के बारे में बढिया जानकारी छित्र के साथ। आपका आभार।