शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

हनुमान जी का एक और रूप, सालासर के बालाजी महाराज

श्री श्री बाला जी महाराज 
राजस्थान के चूरू जिले के एक कस्बे सुजानगढ़ से करीब 34 किलोमीटर दूर एक गांव, सालासर, जो नॅशनल हाईवे 65 पर पड़ता है. इसी के बीचोबीच स्थित है हनुमान जी का सुप्रसिद्ध बालाजी का मंदिर. जहां साल भर भक्तों का तांता लगा रहता है. चैत्र और आश्विन पूर्णिमा के समय यहाँ मेला भरता है जब लाखों लोग अपनी आस्था और भक्ति के साथ यहाँ आकर हनुमान जी के दर्शन का पुण्य लाभ उठाते हैं. 
मंदिर की चांदी जड़ी दीवारें 
मंदिर के बारे में जनश्रुति है कि वर्षों पहले नागौर जिले के एक गांव असोटा के एक किसान को अपने खेत में काम करने के दौरान हनुमान जी की एक मूर्ती प्राप्त हुई. दिन था श्रावण शुक्ल नवमीं का शनिवार, साल था 1811. उसी दौरान वहाँ किसान का कलेवा ले पहुंची उसकी पत्नी ने अपनी साड़ी से मूर्ती को साफ कर उसकी वंदना की और इसकी खबर गांव के ठाकुर तक पहुंचाई। दैव योग से उसी रात ठाकुर को सपने में हनुमान जी ने दर्शन दे उस मूर्ती को सालासर गांव में रहने वाले अपने अनन्य भक्त मोहन दास के पास पहुंचाने का आदेश दिया। उधर उसी रात मोहन दास जी को भी स्वपन में उस मूर्ती को सालासर ला स्थापित करने को कहा।   


माता अंजनी 
स्थापना करते समय मोहन दास जी ने पूजा कर जो जोत जलाई थी वह आज भी वैसे ही जल रही है. उस स्थान को बालाजी की धूनी के नाम से जाना जाता है. कहते हैं कि धूनी की चुटकी भर भस्म जीभ में लगाने से शारीरिक कष्टों का निवारण हो जाता है. मोहन दास जी की समाधी बालाजी मंदिर के पास ही बनी हुई है जहां उनके पदचिन्हों की छाप देखी जा सकती है। 
श्री मोहनदास जी की धूनी 

यहाँ की हनुमान जी की प्रतिमा देश में उपलब्ध उनकी बाक़ी मूर्तियों से बिल्कुल अलग और न्यारी है. ऎसी प्रतिमा का और कहीं होने की जानकारी भी नहीं है। सालासर की प्रतिमा में हनुमान जी का चेहरा दाढ़ी और मूंछों से आच्छादित है जिसका और कोई उदाहरण नहीं मिलता।  यहाँ यह भी मान्यता है कि सालासर के कुओं में पानी की उपस्थिति श्री हनुमान जी के आशीर्वाद के कारण ही है. 

लक्ष्मण गढ़ से आते हुए बालाजी मंदिर से करीब दो किलो मीटर पहले उनकी माताजी अंजनी देवी का मंदिर है. जिसे बने अभी कुछ ही साल हुए हैं. मंदिर में माता अंजनी जी के अलावा राम दरबार और हनुमान जी की प्रतिमाएं भी स्थापित हैं.                       

इधर जब कभी भी आना हो तो बालाजी महाराज के दर्शनों के साथ-साथ माता अंजनी के दरबार में भी जरूर जा कर उनका आशीर्वाद लें।  हमारी दिल्ली-झुंझनु-बालाजी-खाटु जी-दिल्ली का आधा चरण पूरा हो गया था. करीब साढ़े बारह बजे हम सब बालाजी के दर्शन कर सुजानगढ़ के डूंगर बालाजी के दर्शन करने रवाना हो गए थे।
विवरण कल के अंक में

# स्थानीय लोगों की सलाह पर शरद पूर्णिमा के कारण अत्यधिक भीड़ की वजह से बालाजी के दर्शनार्थ जाते समय कैमरों को सेवा-सदन में ही छोड़ दिया गया था. वैसे भी मंदिरों में आजकल फ़ोटो खींचने की मनाही है।  सो इस पोस्ट के सारे चित्र अंतरजाल की मेहरबानी से उपलब्ध हैं।    

4 टिप्‍पणियां:

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : उत्सवधर्मिता और हमारा समाज

ब्लॉग बुलेटिन ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन सब 'उल्टा-पुल्टा' चल रहा है - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सुन्दर जानकारी, सुन्दर वर्णन..

आशा जोगळेकर ने कहा…

एक अलग से स्थान का सुंदर वर्णन।