गुरुवार, 19 सितंबर 2013

दिल्ली के तीन मूर्ति भवन की तीन मूर्तियां

 तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का एक स्मारक है, उन्हीं के कारण इस भव्य भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड गया. यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है.

दिल्ली का तीन मूर्ति भवन. देश के स्वतंत्र होने के बाद भारत के प्रधान मंत्री का सरकारी निवास स्थान. पर प्रधान मंत्री का घोषित निवास स्थान होने के बावजूद इसमें देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ही रहे.
तीन मूर्ति भवन
उनके निधन के बाद इसे नेहरू स्मारक तथा संग्रहालय बना दिया गया. इस इमारत के सामने चौराहे पर तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का एक स्मारक है, उन्हीं के कारण इस भव्य भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड गया. यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है.

शिकारगाह के अवशेष 

वर्षों पहले इस जगह बीहड़ जंगल हुआ करता था. शाम ढलते ही किसी की इधर आने की हिम्मत नहीं पड़ती थी. पूरा वन-प्रदेश जंगली जानवरों से भरा पडा था. करीब छह सौ साल पहले जब दिल्ली पर मुहम्मद तुगलक का राज्य था तब  यह जगह उसकी प्रिय शिकार गाह हुआ करती थी. शिकार के लिए उसने पक्के मचानों का भी निर्माण करवाया था जिनके टूटे-फूटे अवशेष अभी भी वहाँ दिख जाते हैं।


तीन मूर्ति स्मारक 
समय ने पलटा खाया। देश पर अंग्रजों ने हुकूमत हासिल कर ली. 1922 में इस तीन मूर्ति स्मारक की स्थापना हुई. उसके सात साल बाद 1930 में राष्ट्रपति भवन के दक्षिणी हिस्से की तरफ उसी जगह राबर्ट रसल द्वारा एक भव्य भवन का निर्माण, ब्रिटिश "कमांडर इन चीफ" के लिए किया गया. उस समय इसे "फ्लैग-स्टाफ़-हाउस" के नाम से जाना जाता था। जिसे  आजादी के बाद  सर्व-सम्मति से भारत के प्रधान मंत्री का  निवास  बनने का गौरव प्राप्त हुआ और उसका नया नाम बाहर बनी तीन मूर्तियों को ध्यान में रख तीन मूर्ति भवन रख दिया गया.

हालांकि इन मूर्तियों का परिचय उनके नीचे लगे शिला लेख में अंकित है, फिर भी अधिकाँश लोगों ने मूर्तियों को भवन का एक अंग समझ कभी उनके बारे में  जानकारी लेने की जहमत नहीं उठाई।  अंग्रेजों ने अपने आधीन राज्यों से सैनिकों को चुन कर 'लांसरों'  की टुकड़ियां बनाई थीं।उन्हीं टुकड़ियों ने  1914 के प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से स्वेज नहर, गाजा और येरुशलम की लड़ाई में भाग लिया था, जिसे हैफा की लड़ाई के रूप में याद किया जाता है. इसी युद्ध में इन भारतीय सैनिकों की  अभूतपूर्व वीरता और युद्ध कौशल के कारण अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी.  उसी युद्ध में  शहीद हुए, जोधपुर, मैसूर तथा हैदराबाद के 'लांसरों' की याद में ये कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन मूर्तियां आज भी खडी हैं.           

6 टिप्‍पणियां:

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति-
आभार आदरणीय-

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी का लिंक कल शनिवार (21-09-2013) को "एक भीड़ एक पोस्टर और एक देश" (चर्चा मंचःअंक-1375) पर भी होगा!
हिन्दी पखवाड़े की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...!
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

HARSHVARDHAN ने कहा…

आज की विशेष बुलेटिन एल्जाइमर्स डिमेंशिया और ब्लॉग बुलेटिन में आपकी इस पोस्ट को भी शामिल किया गया है। सादर .... आभार।।

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

behtareen jaankaari ..

Onkar ने कहा…

उपयोगी जानकारी

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति...!