मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012

जानी, जानी, हां बापू



अभी-अभी एक मित्र का निम्न संदेश मिला इस आशय के साथ कि और भी लोगों तक यह पहुंच कर गुदगुदाए।  तो........................ लीजिए गुदगुदवाईये :-)

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

इसे क्या कहेंगे ठगी या व्यापारिक बुद्धि?



गाडी चली जा रही थी और लोग कभी हाथ में पकडे लिफाफ़े को देख रहे थे और कभी एक दूसरे का मुंह। 
बात वर्षों पुरानी है पर आज जब विभिन्न उत्पादों को बेचने के लिए आजमाई जा रही तिकडमों को देखता हूं तो यह घटना बरबस याद आ जाती है।


कलकत्ते के सियालदह रेलवे स्टेशन से चली लोकल ट्रेन के बेलघरिया स्टेशन पर रुकने पर उसमें एक फेरीवाला संतरे बेचने के लिए चढा। अपनी टोकरी सिर से उतार नीचे रखी, कुछ देर उसने डिब्बे का जायजा लिया। पसीना पोछा। इतने में लोकल अपनी रफ्तार पकड चुकी थी। गाडी की आवाज से आवाज मिलाते हुए उसने संतरे बेचने शुरु किए, रुपये के चार। लोग अपने में मस्त थे। वहां इस तरह फेरीवालों और भिखारियों का चढना-उतरना, आना-जाना आम बात है। लोकल का स्टापेज हर तीन-चार मिनट पर आता रहता है और यात्रियों के साथ ही इनकी भी आमदरफ्त बनी रहती है। पर इनमें एक अघोषित नियम लागू रहता है कि एक ही चीज का व्यवसाय करने वाले दो जने एक साथ एक ही डिब्बे में नहीं चढेंगे। ना फेरीवाले ना ही भिखारी। 

तो अभी संतरेवाले ने अपना काम शुरु ही किया था कि अगला स्टेशन अगरपाडा आ गया और यहां से एक दूसरा फेरीवाला, जिसके पास भी संतरे ही थे, आ चढा। दोनों ने एक दूसरे को घूरा और पहले वाला बोला तुम्हें मालुन था कि मैं यहां हूं तो तुम क्यों आए दूसरी बोगी देखी होती। दूसरे की शायद बिक्री नहीं हुई थी उसने कहा कि मैं कहीं भी बेचुं तुम्हें क्या? तुम अपना काम करो मैं अपना करुंगा। तकरार शुरु हुई तो बात बढती गयी। कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था। उनके झगडे की तरफ़ अब अधिकांश लोग मुखातिब हो चुके थे। 

तभी पहले वाले ने कहा तो ठीक है आज मैं तुम्हें मजा चखाता हूं और इसके साथ ही उसने अपनी बोली रुपये के पांच संतरे कर दी। दूसरा भी शायद करो या मरो सोच कर आया था उसने रुपये के छह संतरे देने की पेशकश कर दी। इस पर पहलेवाले ने सात, दूसरे ने आठ कर दिए तो पहलेवाले ने रुपये के दस देने का एलान कर दिया। दूसरेवाले की शायद इससे ज्यादा की बोली बोलने की औकात नहीं थी तो वह चुपचाप अपना टोकरा लिए एक कोने में खडा हो गया। यात्रियों को उन दोनों की लडाई में अपना फायदा होता दिखा और पलक झपकते ही पहले चढे फेरीवाले की टोकरी खाली हो गयी। तब तक बैरकपुर स्टेशन आ गया और दोनों वहां उतर गये। 

वहीं से एक सज्जन डिब्बे में चढे, लोकल ट्रेनों में एक दूसरे को जानने-पहचानने वाले मिल ही जाते हैं। उनके मित्र भी वहां थे। दूआ-सलाम हुई। तभी नवागत ने इधर-उधर देख पूछा कि क्या बात है, चारों ओर संतरे ही संतरे दिख रहे हैं? तो उनके मित्र ने कुछ मिनटों पहले घटी हुई सारी बात उन्हें बताई और कहा कैसे दो हाकरों की लडाई में हम सब को सस्ते लेंबू (संतरे) मिले। आज एक ने तो बहुत घाटा सहा। नवागत मित्र पूरी बात सुन हंसने लगे और बताया कि कोई लडाई-वडाई नहीं थी नही किसी को घाटा हुआ है। उल्टे तुम लोगों ने उनकी मेहनत बचा उनका काम आसान कर दिया था। सारे यात्री भौचक्के हो गये कि यह क्या बात हुई। तब उन्होंने सारी बात बताई कि ये तीन लडके हैं। दो माल बेचते हैं और तीसरा लगेज-वैन में बाकि सामान के साथ रहता है। ये लडके महा उस्ताद हैं। आपस में मिले हुए हैं। ऐसे ही किसी डिब्बे में चढ झगडने का नाटक करते हैं और कीमत गिराना शुरु कर देते हैं।  इनको अपना सामान जिस दर पर बेचना होता है वहीं पर आकर एक चुप हो जाता है अगली बार दूसरा बेचता है तो पहला पीछे हट जाता है। ये लोग रूट बदल-बदल कर अपना काम करते रहते हैं। मुझे भी पिछले हफ्ते यह बात पता चली जब किसी काम से मैं डानकुनी लाईन पर गया था तो वहां इन्हें यह कारनामा करते देखा था। यह लोग आफिस-टाइम वाली गाडियों में ऐसा नहीं करते क्योंकि उन गाडियों में ज्यादातर रोज उसी समय यात्रा करने वाले लोग होते हैं। वैसे भी यह खेल ज्यादा दिनों तक नहीं चलने वाला। पर जब तक चल रहा है, मजा ही मजा है। 
गाडी चली जा रही थी और लोग कभी हाथ में पकडे लिफाफ़े को देख रहे थे और कभी एक दूसरे का मुंह।

बात वर्षों पुरानी है पर आज जब विभिन्न उत्पादों को बेचने के लिए आजमाई जा रही तिकडमों को देखता हूं तो यह घटना बरबस याद आ जाती है। भाग्यवश कालेज से लौटते समय मैं भी उसी डिब्बे में था और यह मजेदार नाटक मेरे सामने ही मंचित हुआ था।

 इसे क्या कहेंगे ठगी या व्यापारिक बुद्धि?

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

हिचकी, शायद कोई याद कर रहा है

दूध पीते बच्चे को परेशान करती हिचकी, बड़ों को अचानक शुरु हो तंग करती हिचकी, शराबियों की पहचान बनी हिचकी और कभी-कभी जिंदगी की अंतिम हरकत हिचकी। देखने सुनने में शरीर की एक सामान्य सी हलचल, परन्तु ज्यादा देर तक टिक जाये तो मुसीबत बन जाती है. 

सांस अंदर लेने से उतकों की कठोर परतों से बना, वक्षस्थल के निचले हिस्से में स्थित, 'डायाफ़्राम' पेट की ओर संकुचित हो फेफडों में हवा भरने देता है। इससे भोजन को श्वास नली में जाने से रोकने वाला 'एपिग्लाटिस' और वाक तंतुओं का प्रवेशद्वार 'ग्लाटिस' दोनो खुल जाते हैं। इस क्रिया में व्यवधान आने पर हिचकी शुरु हो जाती है। इसके आने पर 'डायाफ्राम' में ऐंठन शुरु हो जाती है जिससे हवा तेजी से ग्लाटिस और एपिग्लाटिस पर पडती है, जिससे दोनों झटके से बंद होते हैं और वही आवाज हिचकी के रूप में सुनाई पड़ती है। जब तक व्यवधान दूर नहीं हो जाता यह क्रिया चलती रहती है।

कुछ क्षण सांस रोकने, चीनी चूसने, ठंडा पानी पीने या गिलास के बाहर वाले किनारे से पानी पीने या एक लिफ़ाफ़े को मुंह से फुलाकर उसमें सांस लेने से राहत मिलती है। कागज़ के थैले में नाक द्वारा सांस लेने से कार्बन डाई आक्साईड के मस्तिष्क में पहुंचने से तंत्रिकाओं की क्रियाशीलता में कमी आने के कारण हिचकी रुक जाती है। यदि मस्तिष्क को भ्रमित या अचंभित कर दिया जाए तो भी फ़र्क पडता है। शायद इसीलिए हमारे देश में हिचकी आने पर कहा जाता है कि कोई याद कर रहा है, इस तरह दिमाग का ध्यान बटाने से फ़र्क पड जाता है।

एलोपैथी में उपचार तब ही किया जाता है, जब हिचकी ना रुकने से मनुष्य तनाव में आ जाता है। इन परिस्थितियों में क्लोरप्रोमेज़िन या एमाइल नाइट्रेट जैसी दवाएं प्रयोग में लाई जाती हैं। इनसे फायदा ना होने पर आप्रेशन द्वारा फ्रेनिक तंत्रिका के डायाफ्राम तक जाने वाले भाग को निकाल दिया जाता है। पर इससे सांस लेने की क्षमता कम हो जाती है।

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

"बिजली का तेल"

 "बिजली का तेल" यह क्या होता है? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार 'हाई वोल्टेज करंट' के संपर्क में आ दर्द निवारक की क्षमता प्राप्त कर लेता है। जोडों इत्यादि के दर्द में काफी फायदेमंद रहता है

 कुछ दिनों से एक मित्र की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी तो एक दिन उन्हें देखने उनके घर जाना हुआ। हालांकि उनकी उम्र अभी कुछ ज्यादा नहीं है, 45-46 के होंगे और कोई दुर्घटना भी नहीं हुई पर अचानक जोडों में दर्द शुरु हो गया जिससे बहुत परेशान हैं, चलने-फिरने में बहुत तकलीफ होती है। सीढियां तो बिल्कुल नहीं चढ-उतर पा रहे हैं। चिकित्सा वगैरह का पूछने पर बताया कि अलबत्ता अभी किसी डाक्टर को नहीं दिखाया है पर जो भी दवा जिसने बताई या "दिखाई-सुनाई" पडी सबका उपयोग कर चुके हैं पर कोई फायदा नहीं हुआ है। फिलहाल अभी बिजली का तेल आजमा रहे हैं।
"बिजली का तेल" यह क्या होता है? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार 'हाई वोल्टेज करंट' के संपर्क में आ दर्द निवारक की क्षमता प्राप्त कर लेता है। जोडों इत्यादि के दर्द में काफी फायदेमंद रहता है, मुझे भी बहुत आराम मिला है।

कुछ देर बैठ कर मैं वापस तो आ गया पर इस अजीब दवा के बारे में पहली बार सुन कुछ पेशोपेश में पडा हूं। रंग चिकित्सा के बारे में तो सुना था कि सूर्य किरणों से पानी या तेल को लाल, हरे, नीले रंग की बोतलों में आवेषित कर उससे रोग निवारण किया जाता है। तो क्या बिजली की तरंगों से तेल में भी ऐसी कोई क्षमता आ जाती है? यदि आपको इस बारे में कुछ भी जानकारी हो तो मुझे बताएं।

 कुछ दिनों से एक मित्र की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी तो एक दिन उन्हें देखने उनके घर जाना हुआ। हालांकि उनकी उम्र अभी कुछ ज्यादा नहीं है, 45-46 के होंगे और कोई दुर्घटना भी नहीं हुई पर अचानक जोडों में दर्द शुरु हो गया जिससे बहुत परेशान हैं, चलने-फिरने में बहुत तकलीफ होती है। सीढियां तो बिल्कुल नहीं चढ-उतर पा रहे हैं। चिकित्सा वगैरह का पूछने पर बताया कि अलबत्ता अभी किसी डाक्टर को नहीं दिखाया है पर जो भी दवा जिसने बताई या "दिखाई-सुनाई" पडी सबका उपयोग कर चुके हैं पर कोई फायदा नहीं हुआ है। फिलहाल अभी बिजली का तेल आजमा रहे हैं।
"बिजली का तेल" यह क्या होता है? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार 'हाई वोल्टेज करंट' के संपर्क में आ दर्द निवारक की क्षमता प्राप्त कर लेता है। जोडों इत्यादि के दर्द में काफी फायदेमंद रहता है, मुझे भी बहुत आराम मिला है।

कुछ देर बैठ कर मैं वापस तो आ गया पर इस अजीब दवा के बारे में पहली बार सुन कुछ पेशोपेश में पडा हूं। रंग चिकित्सा के बारे में तो सुना था कि सूर्य किरणों से पानी या तेल को लाल, हरे, नीले रंग की बोतलों में आवेषित कर उससे रोग निवारण किया जाता है। तो क्या बिजली की तरंगों से तेल में भी ऐसी कोई क्षमता आ जाती है? यदि आपको इस बारे में कुछ भी जानकारी हो तो मुझे बताएं।




बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

माँ बम्लेश्वरी के "उडन पथ" का किराया

अक्सर कहीं ना कहीं पढने को मिल ही जाता है कि फलानी जगह ग्राहकों को छोटे नोटों के अभाव में पूरे पैसे नहीं लौटाए जाते। इसमें छोटे नोटों की किल्लत की मजबूरी हो सकती है पर इसके साथ यह भी सच है कि  बहुतेरी जगहों में जानबूझ कर लालच के वशीभूत ऐसी हरकतें होती रहती हैं।  
अब छोटे नोटों की बात तो समझ में आती है। एक, दो, पांच के नोट चलन में कम भी हुए हैं। इसी कारण कुछ जगहों पर विवाद की स्थिति बन जाती है, जैसे रेल या बस इत्यादि के किराए दूरी के हिसाब से तय होते हैं और वह किसी भी सम या विषम संख्या में हो सकते हैं इसके चलते चाहते हुए भी हो सकता है कि काउंटर पर बैठा आदमी किल्लत के कारण पूरे पैसे ना लौटा पाता हो।  पर है तो यह गलत ही। संबंधित संस्थान की जिम्मेवारी है कि वह अपने ग्राहक से वाजिब कीमत ही ले।

ये तो हुई मजबूरी या जानबूझ कर पैसा ना लौट सकने की बात। पर छतीसगढ में एक जगह ऐसी भी है जहां किराया ही कुछ इस तरह का निश्चित किया गया है कि उसे ना ठीक लिया जा सकता है नांही दिया। पता नहीं कौन, कैसे, किस तरह इस प्रकार की बेतुकी सूची तैयार करता है और कौन लागू करता है।
यह जगह है छतीसगढ के डोंगरगढ में प्रसिद्ध तीर्थस्थल माँ बम्लेश्वरीजी का मंदिर। यहां यात्रियों की सहूलियत के लिए सीढियों के साथ साथ "उडन पथ" की सुविधा भी उपलब्ध है। पर उसका किराया कुछ ऐसा निर्धारित किया गया है जो किसी भी नजर से उचित नहीं लगता। आज जब 25 पैसे का सिक्का चलन से बाहर हो चुका है, 50 पैसे का चलन सिर्फ कागजों पर ही दिखाई देता है, 1, 2, 5, की करेंसी मुश्किल से मिलती है तो किस हिसाब से कैसे और क्यों ऐसे किराये का निर्धारण किया जाता है जो बार-बार संशोधित होने के बाद भी रुपये और पैसों में ही निर्धारित होता है। 
यह लापरवाही है, किसी प्रकार की मजबूरी है या भूल है, भूल है तो यह 'ब्लंडर" है। ऐसा तो नहीं कि किसी को अप्रत्यक्ष रूप से फायदा पहुंचाने के लिए इस ओर ध्यान ही नहीं दिया जाता हो?
इस तरह का सटीक किराया तो कोई भी नहीं दे सकता, किसी से कम लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता तो जो रकम ली जाती है, "पूर्णांकों" में, उसका फायदा कहां जाता है?

गर्मी के कुछ दिनों को छोड दें तो माँ के दर्शनार्थ यहां स्थानीय और दूसरे प्रदेशों से आने वाले भक्तों की भीड सदा ही उमडी रहती है और अधिकांश लोग"ट्राली" का सहारा लेते हैं तो सहज ही अंदाज लगाया जा सकता है कि रोज की बचत का जखीरा कितना बडा होगा।

तो क्या उचित नहीं है कि शासन-प्रशासन इस ओर ध्यान देकर "उडन पथ" के किराए को एक तर्कसंगत और उचित रूप दें जिससे पैसा गलत जगह ना जा सही जगह जमा हो किसी भले काम में उपयोग हो सके।

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

ऐसा होता है वेलेंटाइन

 गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।

आज वेलेंटाइन दिवस है। इसे प्रेम दिवस के रूप में भी खूब प्रचारित किया गया है। पश्चिम से आए इस उत्सव ने भारतीय युवाओं को खूब लुभाया है। सब इसे अपने-अपने अर्थ लगा, अपनी-अपनी समझ के अनुसार अपने-अपने तरीके से मनाने की कोशिश करते हैं। पर कितनों में अपने प्रिय के प्रति सच्चे प्रेम या त्याग की भावना रहती है? वर्षों पहले श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरीजी की अमर कहानी "उसने कहा था" उसी प्रेम की पवित्रता और गहराई के कारण खुद और अपने लेखक को अमर कर गयी है।  

पहली बार बचपन में जब "उसने कहा था" कहानी को पढा और फिर फिल्म भी देखी तो ना कुछ महसूस हुआ था नाहीं उसकी गहराई समझ में आई थी, सब सर के ऊपर से गुजर गया था। पढाई के दौरान इस कहानी के कोर्स में होने के कारण फिर बहुत बार इसे पढने का मौका मिला तब जाकर समझ में आया कि कैसे और क्यूं इस एक कहानी से ही गुलेरीजी अमर हो गये। लगता नहीं कि आज के अधिकांश युवा इससे परीचित होंगे। पहले तो कोर्स वगैरह में भी यह होती थी। पर धीरे-धीरे सब कुछ बदल ही तो रहा है। इस अमर कहानी का सार देने की कोशिश करता हूं।

अमृतसर में अपने मामा के घर आए दस-ग्यारह साल के लहनासिंह का बाज़ार में अक्सर एक सात-आठ साल की लडकी से सामना हो जाता है। ऐसे ही छेड़-छाड़ के चलते लहना उससे पूछता रहता है "तेरी कुड़माई (सगाई)हो गयी" और लड़की "धत्" कह कर भाग जाती है। पर एक दिन वह बालसुलभ खुशी से जवाब देती है "हां, हो गयी। देखता नहीं मेरा यह रेशमी सालू"।

वह तो चली जाती है, पर लहना पर निराशा छा जाती है। दुख और क्रोध एक साथ हावी हो बहुतों से लड़वा, भिड़वा, गाली खिलवा कर ही उसे घर पहुंचवाते हैं।

पच्चीस साल बीत जाते हैं। फौज में लहना सिंह जमादार हो जाता है। उसका अपनी बटालियन के सूबेदार हज़ारा
सिंह के साथ अच्छा दोस्ताना है। एक ही तरफ के रहनेवाले हैं। हज़ारा सिंह का बेटा बोधा सिंह भी इनके साथ उसी मोर्चे पर तैनात है। कुछ दिनों पहले छुट्टियों में ये घर गये थे। तभी पहला विश्वयुद्ध शुरु हो जाता है। सबकी छुट्टियां रद्द हो जाती हैं। हज़ारा सिंह खबर भेजता है, लहना सिंह को कि मेरे घर आ जाना, साथ ही चलेंगे। लहना वहां पहुंचता है तो सूबेदार कहता है कि सूबेदारनी से मिल ले, वह तुझे जानती है। लहना पहले कभी यहां आया नहीं था, चकित रह जाता है कि वह मुझे कैसे जानती होगी। दरवाजे पर जा मत्था टेकता है। आशीष मिलती है। फिर सूबेदारनी पूछती है "पहचाना नहीं?  मैं तो देखते ही पहचान गयी थी....तेरी कुड़माई हो गयी.......धत्.....अमृतसर"

सब याद आ जाता है लहना को। सूबेदारनी रोने लगती है। बताती है कि चार बच्चों में अकेला बोधा बचा है। अब दोनों लाम पर जा रहे हैं। जैसे तुमने एक बार मुझे तांगे के नीचे आने से बचाया था, वैसे ही इन दोनों की रक्षा करना। तुमसे विनती है।

मोर्चे पर बर्फबारी के बीच बोधा सिंह बिमार पड़ जाता है। खंदक में भी पानी भरने लगता है। लहना किसी तरह बोधे को सूखे में सुलाने की कोशिश करता रहता है। अपने गर्म कपड़े भी बहाने से उसे पहना खुद किसी तरह गुजारा करता है। इसी बीच जर्मन धोखे से हज़ारा सिंह को दूसरी जगह भेज खंदक पर कब्जा करने की कोशिश करते हैं पर लहना सिंह की चतुराई से हज़ारा सिंह की जान और खंदक दोनों बच जाते हैं। पर वह खुद बुरी तरह घायल होने पर भी चिकित्सा के लिये बाप-बेटे को पहले भेज देता है, हज़ारा सिंह से यह कहते हुए कि घर चिठ्ठी लिखो तो सूबेदारनी से कह देना उसने जो कहा था मैने पूरा कर दिया है। उनके जाने के बाद वह अपने प्राण त्याग देता है।

यह तो कहानी का सार है। पर बिना इसे खुद पढे इसकी मार्मिकता नहीं समझी जा सकती।  गुलेरीजी के शब्दों मे ही, अमृतसर के तांगेवालों की चाकू से भी तेज धार की जबान, दोनों बच्चों की चुहल, खंदक की असलियत, लड़ाई की विभीषिका, सूबेदारनी की याचिका, लहना की तुरंत-बुद्धि और फिर धीरे-धीरे करीब आती मौत के साये में स्मृति के उभरते चित्र, वह सब बिना पढे महसूस करना मुश्किल है।

यदि कभी भी मौका मिले तो इसी नाम पर बनी पुरानी "उसने कहा था" फिल्म देखने से ना चूकें।  जिसमें स्व. सुनील दत्त और नंदा ने काम किया था।

सोमवार, 13 फ़रवरी 2012

त्यौहार जरूर मनाएं, पर उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

 किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

फिर एक बार संत वेलेंटाइन का संदेश ले फरवरी का माह आ खड़ा हुआ। बाजारों में, अखबारों में युवाओं में काफी उत्साह उछाल मार रहा है। हमारे सदियों से चले आ रहे पर्व "वसंतोत्सव" का भी तो यही संदेश है। प्रेम का, भाईचारे का, सौहार्द का। पर इसे कभी भुनाया नहीं गया। लेकिन यही संदेश जब "बाजार" ने वेलेंटाइन का नाम रख 'वाया' पश्चिम से भेजा तो हमारी आंखें चौंधिया गयीं हमें चारों ओर प्यार ही प्यार नज़र आने लगा।

हालांकि शुरु-शुरु में इस नाम को कोई जानता भी नहीं था। यहां तक कि एक स्थानीय अखबार में भी कुछ का कुछ छपा था। फिर धीरे-धीरे खोज खबर ली गयी और कहानियां प्रचारित, प्रसारित की जाने लगीं। युवाओं को इसमें मौज-मस्ती का सामान दिखा और वे बाजार के शिकंजे में आते चले गये। जबकि सदियों से हमारी प्रथा रही है, अपने-पराए-गैर-दुश्मन सभी को गले लगाने की। क्षमा करने की। प्रेम बरसाने की। इंसान की तो छोड़ें इस देश में तो पशु-पक्षियों से भी नाता जोड़ लिया जाता है। उन्हें भी परिवार का सदस्य माना जाता है। खुद भूखे रह कर उनकी सेवा की जाती है। जीवंत की बात भी ना करें यहां तो पत्थरों और पेड़ों में भी प्राण होना मान उनकी पूजा होती रही है। सारे संसार को ज्ञान-विज्ञान देने वाले को आज प्रेम सीखना पड़ रहा है पश्चिम से।
गोया "कल जिन्हें हिज्जे ना आते थे, आज वे हमें पढाने चले हैं। खुदा की कुदरत है।"
प्रेम करना कोई बुरी बात नहीं है। पर ये जो व्यवसायिकता है। अंधी दौड़ है या इसी बहाने शक्ति प्रदर्शन है उसे किसी भी हालत में ठीक नहीं कहा जा सकता।

प्रेम सदा देने में विश्वास रखता है। त्याग में अपना वजूद खोजता है। पर आज इसका स्वरूप पूरी तरह बदल चुका है। सिर्फ पाना और हर हाल में पाना ही इसका उद्देश्य हो गया है। आज भोग की संस्कृति ने सब को पीछे छोड़ रखा है। जिस तरह के हालात हैं, मानसिक विकृतियां हैं, दिमागी फितूर है उसके चलते युवाओं को काफी सोच समझ कर अपने कदम उठाने चाहिए। खास कर युवतियों को। इस उम्र में अपना हर कदम, हर निर्णय सही लगता है। पर आपसी मेल-जोल के पश्चात किसी युवक व युवती का प्रेम परवान ना चढ सके और युवती का रिश्ता उसके घरवाले कहीं और कर दें, इस घटना से युवक अपना आपा खो अपने पास के पत्र या फोटो वगैरह गलत समय में गलत जगह जाहिर कर दे तो अंजाम स्वरूप कितनी जिंदगियां बर्बाद होंगी, कल्पना की जा सकती है। ऐसा होता भी रहा है कि नाकामी में युवकों ने गलत रास्ता अख्तियार कर अपना और दूसरे का जीवन नष्ट कर दिया हो।

किसी की अच्छाई लेना कोई बुरी बात नहीं है। वह चाहे किसी भी देश, समाज या धर्म से मिलती हो। ठीक है। अच्छा लगता है। दिन हंसी-खुशी में गुजरता है। मन प्रफुल्लित रहता है तो त्यौहार जरूर मनाएं। पर एक सीमा में, बिना भावुकता में बहे। उचित-अनुचित का ख्याल रखते हुए।

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

"मर्सनरि", यानी भाडे के सैनिक


  इंसान के सभ्य होते ही शायद लडाई-झगडे भी शुरू हो गये थे। जर-जमीन-जोरु के लिए छोटे-मोटे झगडों से लेकर बडी-बडी लडाईयां होती रही हैं और होती रहेंगी। अब तो हर देश के पास अपनी सेना है। पर शुरु में ऐसा नहीं होता था, जनबल की कमी को देखते हुए लोग बाहर से पेशेवर लडाकों को धन इत्यादि का प्रलोभन दे अपनी तरफ से लडवाते थे। वैसे भी लडाई-झगडा, खून-खराबा सब के बस की बात नहीं होती इसीलिए खुंखार प्रकृति के लोग अपने लाभ के लिए इस पेशे को अपनाते थे। पहले जनहानि तो होती थी पर उतनी नहीं क्योंकि राजा या सेनापति के मरने या समर्पण करते ही युद्ध समाप्त माना जाता था। फिर कुछ जातियां ऐसी थीं जो व्यापार को ज्यादा तरजीह देती थीं और उनमें लडाई करने की मानसिकता का अभाव था, पर उन्हें भी अपनी रक्षा के लिए भाडे के सैनिकों की आवश्यकता पडती ही रहती थी। इन्हीं भाडे के सैनिकों को आज "मर्सनरि" कहा जाता है। 


मर्सनरि उस भाडे के सैनिक को कहते हैं जो सेना में भर्ती हो किसी युद्ध में सिर्फ अपने लाभ और पैसों के लिए भाग लेता है। उसको कोई मतलब नहीं होता कि कौन, किससे और क्यूं लड रहा है। जरूरी नहीं होता कि एक संघर्ष खत्म होने पर वह उसी पक्ष का हो कर रहे, धनबल के जरिए कोई भी उसकी सेवाएं प्राप्त कर सकता है।   
पर अनिवार्य ना होते हुए भी जो सेना में भर्ती होते हैं वह मर्सनरि नहीं कहलाते, भले ही उन्हें उनकी बहादुरी के लिए पारितोषिक या धन मिलता हो, क्योंकि वे अपने पक्ष, समाज या देश के प्रति समर्पित होते हैं।

1977 की जेनेवा मिटिंग में 1949 के प्रलेख में संशोधन करते हुए मर्सनरि को फिर परिभाषित करते हुए बताया गया कि यदि कोई युद्ध में सिर्फ अपने लाभ के लिए भाग लेने का इच्छुक हो, या उसे किसी भी पक्ष द्वारा अपनी तरफ से युद्ध में भाग लेने पर बहुत ज्यादा धन की पेशकश, अपने 'रैंक' से भी ज्यादा की गयी हो वही मर्सनरि कहलाता है। इससे यही पता चलता है कि मर्सनरि सिर्फ अपने  लाभ और पैसे के लिए लडने वाला भाडे का लडाका होता है। इनका कोई आदर्श नहीं होता ये सिर्फ पैसों के लिए युद्ध में भाग लेते हैं। इन्हें लूटपाट और खून-खराबे में ही आनंद मिलता है। इसीलिए इसे अच्छे अर्थों में ना लेकर नकारात्मक रूप में ही लिया जाता है। वैसे भाडे के सैनिकों को भी जीवन में अच्छे पद और गौरव पाने के अवसर मिले हैं।

उन्नीसवीं शताब्दी का अंत आते-आते दुनिया के प्राय: सभी देशों द्वारा अपनी सेनाओं का गठन करने के कारण इनकी मांग में कमी आयी है। पर इसमें भी कुछ अपवाद हैं। जैसे हमारी सेना में "गोरखा ब्रिगेड" को मर्सनरि नहीं कहा और माना जाता।
दुनिया में भाडे के सैनिकों की जरूरत बनी ही रही। अफ्रिका, अंगोला, कांगो में उनका जम कर प्रयोग किया गया। विभिन्न जगहों में इनको विभिन्न नामों से संबोधित किया जाता रहा है जैसे 'सोल्जर आफ फारचून,' 'डाग्स  आफ वार'  या 'हीरो  आफ  वार'  इत्यादि।

भारत में ऐसे सैनिकों को सेना में लेने का सदा ही चलन रहा है। मुगल काल में तो मनसबदारी प्रथा शुरू कर दी गयी थी जिससे लम्बे युद्ध में कभी सैनिकों का अभाव ना हो सके।

वैसे आज भी भाडे के सैनिकों के बारे में खबरें आती ही रहती हैं। अमेरिका की एक पत्रिका "सोलज़रस आफ़ फारचून" में मर्सनरि के लिए विज्ञापन निकलते ही रहते हैं। जरा उनकी बानगी देखीये "ज्वाइन द आर्मी, ट्रेवल टू डिस्टेंट लैंड्स, मीट इंटेरेस्टिंग पिपल एंड किल देम"। और हजारों लोग जाते भी हैं जिनकी नीति लाभ और लोभ में पड कर कुछ भी करना सही होता है। इन्हें केंद्र में रख बहुत सारी फिल्में भी बन चुकी हैं और लोगों द्वारा सराही भी गयी हैं.

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

जार्ज बर्नार्ड शा के चेक


एक बार जार्ज बर्नार्ड शा ने एक चित्रकार को अपना चित्र बनाने को कहा और वायदा किया कि पसंद आने पर पारिश्रमिक के रूप में एक सौ पौंड देंगे। चित्रकार ने बडी मेहनत और लगन से उनका बहुत ही सुंदर चित्र बनाया। शा को वह चित्र बहुत पसंद आया और उन्होंने वायदे के अनुसार चित्रकार को बीस-बीस पौंड के पांच चेक एक प्रशंसा पत्र के साथ भेज दिए। चेक तथा पत्र पाने पर चित्रकार को समझ नहीं आया कि शा ने एक चेक की जगह पांच-पांच चेक क्यों भेजे। अपनी उत्सुकता शांत करने के लिए वह शा से मिला और पूछा, "सर पांच-पांच चेक काटने की क्या जरूरत थी, सौ पौंड का एक ही चेक काफी होता।"
शा ने पूछा, ''क्या तुमने चेक भुना लिए हैं?''
''नहीं,'' चित्रकार ने जवाब दिया।
शा बोले, "अच्छा किया। तुम चेक भुनाना भी मत। इससे तुम्हें भी फायदा होगा और मुझे भी।" चित्रकार बोला,  "मैं कुछ समझा नहीं सर"
शा मुस्कुराए और बोले,  "मैं अपने प्रशंसकों से अपने एक हस्ताक्षर के तीस पौंड लेता हूं। तुम पांचों चेक मेरे प्रशंसकों को बेच दो। इससे तुम्हें एक सौ के बदले डेढ सौ पौंड मिल जाएंगे। इस तरह तुम पचास पौंड ज्यादा कमा लोगे।"
"मेरा फायदा तो समझ में आया पर इससे आप को कैसे फायदा होगा?"  चित्रकार ने पूछा।
"ऐसा है कि मेरे प्रशंसक मेरे हस्ताक्षरों को बेचते नहीं हैं। वे उन्हें फ्रेम में  मढवा कर अपने पास संजोए रखते हैं। इस तरह मेरे भी एक सौ पौंड बच जाएंगे।''   शा ने हंसते हुए जवाब दिया।

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

एक प्राकृतिक और चमत्कारिक औषधि इसबगोल


आज के भाग-दौड के जमाने में खुद को चुस्त-दुरुस्त रखना टेढी खीर है। ना ढंग से खाना हो पाता है ना सोना। हर समय अफरा-तफरी, पीछे छूट जाने का भय, काम का तनाव, भागते-भागते ही दिन-दोपहर-शाम निकलते जाते हैं। पर शरीर को चलाए रखने के लिए भोजन की भी जरूरत पडती है। ऐसे में जो मिला खा कर काम चलाते हैं, अधिकांश लोग। नतीजा खराब पाचन, पेट की गडबड, अपच और कब्ज जैसी तकलीफें। फिर उनके लिए तरह-तरह की दवाएं या फिर डाक्टर के चक्कर।

आदमी की आधी से ज्यादा बिमारियों का कारण पेट है। यदि यह सुचारु रुप से काम करता रहे तो अधिकांश रोग पास ही ना फटकें। तुरंत राहत पाने के लिए बाजार में सैंकडों दवाएं उपलब्ध हैं, पर उनका कुछ न कुछ गलत प्रभाव भी होता ही है। प्रचार की धुंध में बहुत सारी प्राकृतिक औषधियों को लोग भुला बैठे थे पर उनकी उपयोगिता उन्हें फिर लोकप्रिय बनाने में सफल रही है।
 गलत खान-पान से उपजी व्याधियों को दूर करने की एक ऐसी ही अचूक, प्राकृतिक और चमत्कारिक औषधि है "इसबगोल की भूसी"।

यह एक महीन पत्तों वाला झाडीनुमा पौधा है। इसकी शाखाओं पर फूल आते हैं जिनमें एक सफेद पतली झिल्ली में पौधे के बीज लिपटे होते हैं। यह झिल्ली ही इसबगोल की भूसी है। इसके औषधिय महत्व को हर चिकित्सा प्रणाली में स्वीकार किया गया है। इन्हें शीतल, मलावरोध को दूर करने वालाकब्जअतिसारपेचिश और आंत के रोगों के लिए बहुत उपयोगी पाया गया है। इसमें म्यूसिलेज नामक तत्व पाया जाता है जो पानी के साथ मिल कर स्वादरहित लसीली तथा चिकनी जेली में बदल जाता है जो पेट में पानी सोख कर अपने आकार से तिगुनी हो जाती है जिससे आंतें और सक्रिय हो पचे पदार्थों को आगे बढाने लगती हैं। यह भूसी शरीर से 'टाक्सिंस और बैक्टीरिया' को भी शरीर से बाहर कर देती है। इसके लसीलेपन के कारण मरोड और पेचिश में भी आराम मिलता है। इस पौधे के बीज भी काफी उपयोगी होते हैं। जो बवासीर में काफी
लाभदायक होते हैं। इसकी भूसी को दूध या पानी के साथ लिया जा सकता है। सामान्यत: भूसी का प्रयोग रात सोने के पहले किया जाता है। सामान्यत: एक से दो चम्मच की मात्रा  प्रयाप्त होती है।

मैं खुद वर्षों से जरूरत पड़ने पर इसका उपयोग करता आ रहा हूं और आज तक ना इसकी आदत पडी है और ना ही किसी तरह का विपरीत असर महसूस हुआ है। तो जब कभी भी पाचन संबंधी कोइ परेशानी महसूस हो तो बेझिझक इसबगोल की भूसी का इस्तेमाल कर देखें, फायदा ही होगा। 

गुरुवार, 2 फ़रवरी 2012

अग्रोहा के महाराजा अग्रसेन

 महाराज अग्रसेन के वंशज आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं। 



अग्रवाल समाज के संस्थापक महाराज अग्रसेन एक क्षत्रिय सूर्यवंशी राजा थे। जिन्होंने प्रजा की भलाई के लिए वणिक धर्म अपना लिया था। इनका जन्म द्वापर युग के अंतिम भाग में महाभारत काल में हुआ था। ये      प्रतापनगर के राजा बल्लभ के ज्येष्ठ पुत्र थे। सुप्रसिद्ध लेखक भारतेंदु हरिश्चंद्रजी, जो खुद भी वैश्य समुदाय से थे, ने 1871 में "अग्रवालों की उत्पत्ति" नामक प्रमाणिक ग्रंथ लिखा है जिसमें विस्तार से इनके बारे में  बताया गया है। इसी में 'अग्रवाल का अर्थ भी समझाया गया है कि अग्रवाल यानी "महाराज अग्रसेन के वंशधर या बच्चे"।

वर्तमान के अनुसार उनका जन्म आज से करीब 5185 साल पहले हुआ था। उनके राज में कोई दुखी या लाचार नहीं था। बचपन से ही वे अपनी प्रजा में बहुत लोकप्रिय थे। वे एक धार्मिक, शांति दूत, प्रजा वत्सल, हिंसा विरोधी, बली प्रथा को बंद करवाने वाले, करुणानिधि, सब जीवों से प्रेम, स्नेह रखने वाले दयालू राजा थे।

समयानुसार युवावस्था में उन्हें राजा नागराज की कन्या राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में शामिल होने का न्योता मिला। उस स्वयंवर में दूर-दूर से अनेकों राजा और राजकुमार आए थे। यहां तक कि देवताओं के राजा इंद्र भी राजकुमारी के सौंदर्य के वशीभूत हो वहां पधारे थे। स्वयंवर में राजकुमारी माधवी ने राजकुमार अग्रसेन के गले में जयमाला डाल दी। यह दो अलग-अलग संप्रदायों, जातियों और संस्कृतियों का मेल था। जहां अग्रसेन सूर्यवंशी थे वहीं माधवी नागवंश की कन्या थीं। पर इस विवाह से इंद्र जलन और गुस्से से आपे से बाहर हो गये और उन्होंने प्रतापनगर में वर्षा का होना रोक दिया। चारों ओर त्राहि-त्राही मच गयी। लोग अकाल मृत्यु का ग्रास बनने लगे। तब महाराज अग्रसेन ने इंद्र के विरुद्ध युद्ध छेड दिया। चूंकि अग्रसेन धर्म-युद्ध लड रहे थे तो उनका पलडा भारी था जिसे देख देवताओं ने नारद ऋषि को मध्यस्थ बना दोनों के बीच सुलह करवा दी।

कुछ समय बाद महाराज अग्रसेन ने अपने प्रजा-जनों की खुशहाली के लिए काशी नगरी जा शिवजी की घोर तपस्या की, जिससे शिवजी ने प्रसन्न हो उन्हें माँ लक्ष्मी की तपस्या करने की सलाह दी। माँ लक्ष्मी ने परोपकार हेतु की गयी तपस्या से खुश हो उन्हें दर्शन दिए और कहा कि अपना एक नया राज्य बनाएं और वैश्य परम्परा के अनुसार अपना व्यवसाय करें तो उन्हें तथा उनके लोगों या अनुयायियों को कभी भी किसी चीज की कमी नहीं होगी।
  
अपने नये राज्य की स्थापना के लिए महाराज अग्रसेन ने अपनी रानी माधवी के साथ सारे भारतवर्ष का भ्रमण किया। इसी दौरान उन्हें एक जगह शेर तथा भेडिये के बच्चे एक साथ खेलते मिले। उन्हें लगा कि यह दैवीय संदेश है जो इस वीरभूमि पर उन्हें राज्य स्थापित करने का संकेत दे रहा है। वह जगह आज के हरियाणा के हिसार के पास थी। उसका नाम अग्रोहा रखा गया। आज भी यह स्थान अग्रवाल समाज के लिए तीर्थ के समान है। यहां महाराज अग्रसेन और माँ वैष्णव देवी का भव्य मंदिर है।

महाराज अग्रसेन के राजकाल में अग्रोहा ने दिन दूनी- रात चौगुनी तरक्की की। कहते हैं कि इसकी चरम स्मृद्धि के समय वहां लाखों व्यापारी रहा करते थे। वहां आने वाले नवागत परिवार को राज्य में बसने वाले परिवार सहायता के तौर पर एक रुपया और एक ईंट भेंट करते थे, इस तरह उस नवागत को लाखों रुपये और ईंटें अपने को स्थापित करने हेतु प्राप्त हो जाती थीं जिससे वह चिंता रहित हो अपना व्यापार शुरु कर लेता था।   

महाराज ने अपने राज्य को 18 गणों में विभाजित कर अपने 18 पुत्रों को सौंप उनके 18 गुरुओं के नाम पर 18 गोत्रों की स्थापना की थी। हर गोत्र अलग होने के बावजूद वे सब एक ही परिवार के अंग बने रहे। इसी कारण अग्रोहा भी सर्वंगिण उन्नति कर सका। राज्य के उन्हीं 18 गणों से एक-एक प्रतिनिधि लेकर उन्होंने लोकतांत्रिक राज्य की स्थापना की, जिसका स्वरूप आज भी हमें भारतीय लोकतंत्र के रूप में दिखाई पडता है।

उन्होंने परिश्रम और उद्योग से धनोपार्जन के साथ-साथ उसका समान वितरण और आय से कम खर्च करने पर बल दिया। जहां एक ओर वैश्य जाति को व्यवसाय का प्रतीक तराजू प्रदान किया वहीं दूसरी ओर आत्म-रक्षा के लिए शस्त्रों के उपयोग की शिक्षा पर भी बल दिया।   


उस समय यज्ञ करना समृद्धि, वैभव और खुशहाली की निशानी माना जाता था। महाराज अग्रसेन ने बहुत सारे यज्ञ किए। एक बार यज्ञ में बली के लिए लाए गये घोडे को बहुत बेचैन और डरा हुआ पा उन्हें विचार आया कि ऐसी समृद्धि का क्या फायदा जो मूक पशुओं के खून से सराबोर हो। उसी समय उन्होंने अपने मंत्रियों के ना चाहने पर भी पशू बली पर रोक लगा दी। इसीलिए आज भी अग्रवाल समाज हिंसा से दूर ही रहता है। अपनी जिंदगी के अंतिम समय में महाराज ने अपने ज्येष्ट पुत्र विभू को सारी जिम्मेदारी सौंप कर वानप्रस्थ आश्रम अपना लिया।     
महाराज अग्रसेन के राज की वैभवता से उनके पडोसी राजा बहुत जलते थे। इसलिए वे बार-बार अग्रोहा पर आक्रमण करते रहते थे। बार-बार मुंहकी खाने के बावजूद उनके कारण राज्य में तनाव बना ही रहता था। इन युद्धों के कारण अग्रसेनजी के प्रजा की भलाई के कामों में विघ्न पडता रहता था। लोग भी भयभीत और रोज-रोज की लडाई से त्रस्त हो गये थे।  इसी के साथ-साथ एक बार अग्रोहा में बडी भीषण आग लगी। उस पर किसी भी तरह काबू ना पाया जा सका। उस अग्निकांड से हजारों लोग बेघरबार हो गये और जीविका की तलाश में भारत के विभिन्न प्रदेशों में जा बसे।  पर उन्होंने अपनी पहचान नहीं छोडी।  वे सब आज भी अग्रवाल ही कहलवाना पसंद करते हैं और उसी 18 गोत्रों से अपनी पहचान बनाए हुए हैं। आज भी वे सब महाराज अग्रसेन द्वारा निर्देशित मार्ग का अनुसरण कर समाज की सेवा में लगे हुए हैं।