गुरुवार, 20 सितंबर 2012

ममता, स्नेह, वात्सल्य को पैसे से नहीं तौला जा सकता



यदि ऐसा कोई  कानून बनता है तो क्या यह देश के सभी समुदायों, सभी धर्मावलंबियों पर लागू होगा या अपनी कुर्सियों पर पकड मजबूत करने के लिए सिर्फ "हिंदू मैरेज एक्ट" पर लागू कर हिंदुओं को ही फिर बली का बकरा बनाया जाएगा ?   एक और बात  इन सबसे घबडा कर कुछ पुरुष विवाह के नाम से ही बिदकने लगें तो? क्योंकि पैसा देकर जब बाजार से हर सेवा उपलब्ध होगी तो कोई क्यूं मुफ्त की सरदर्दी पालेगा? वैसे भी विदेशी प्रभाव में आ कर "एक अलग तरह का" जीवन-यापन बडे शहरों में शुरु हो ही चुका है। तब समाज का क्या रूप बनेगा इसका जवाब किस के पास है ?


विज्ञापन के क्षेत्र और बाजार में एक जुमला काफी प्रसिद्ध है, "जो दिखता है वही बिकता है।" चाहे गुणवत्ता से उसका दूर-दूर तक कोई सबंध ना हो। अब यही बात समाज के हर क्षेत्र पर लागू होने लगी है। अपने को खबरों में और मीडिया में बनाए रखने के लिए कोई भी कुछ भी कहने-करने को तैयार रहता है, खासकर 'शो बिज' और राजनीति के खिलाडी। अब कुछ दिन पहले तक महिला व बाल कल्याण मंत्रालय को कौन संभालता है यह "कौन बनेगा करोडपति" में पच्चीस लाख वाला सवाल हो सकता था। पर जबसे पुरुष की कमाई का एक हिस्सा घर की स्वामिनी को देने का शगूफा चला है तबसे अनजानी सी मंत्री महोदया श्रीमती कृष्णा तीरथ को देशवासी ही नहीं बाहर के मुल्कों में रहने वाले भी जानने लगे हैं। इस कानून का क्या हश्र होगा यह तो समय ही बतला पाएगा पर मंत्री महोदया ने खुद को प्रसिद्ध करवा ही लिया। 

कुछ तथाकथित समाज सुधारकों का मानना है कि मर्द सदियों से औरत को भावनात्मक रूप से बेवकूफ बना घर के काम करवाता रहा है तो यह उनकी घटिया सोच है। उन्हें नहीं मालुम कि ममता क्या होती है, स्नेह कैसे सदस्यों को एकजुट रखता है, उत्सर्ग की भावना क्या होती है। पुरुष के दूर-दराज के क्षेत्र में काम पर रहने पर महिला कैसे घर को घर बनाए रखती है। कुछ अपवादों को छोड दें तो क्या पुरुष बाहर जी-तोड मेहनत नहीं करता जिससे उसके परिवार का भविष्य सुखमय हो। क्या वह अपनी पत्नी का दुख-सुख में ख्याल नहीं रखता या फिर वह पूरे परिवार को पालने की चिंता नहीं करता? यदि वह भी मुआवजा मांगने लगे तो? ऐसा भी नहीं है कि सारे पुरुष कर्तव्यपरायण ही होते हैं फिर भी अधिकांश घरों में पति अपनी कमाई का एक बडा हिस्सा पत्नी को सौंप इसलिए निश्चिंत हो जाता है क्योंकि उसे पत्नी की कार्क्षमता पर भरोसा होता है, उसे वह अपने से अलग नहीं मानता। पर इस नासमझदारी वाले कदम से नारी का भला हो या नहो पर इस बात की आशंका जरूर है कि परिवारों में विघटन  शुरु हो रिश्तों में दरारें पडनी शुरु हो जाएंगी। अपरोक्ष रूप से नारी को फिर दोयम दर्जे में ढकेलने की बात हो जाएगी।  हमारे देश की मजबूती में हमारे परिवारों की एकजुटता का बहुत बडा हाथ है ऐसा तो नहीं कि यह भी देश को विखंडित करने की कोई साजिश हो। 

भले ही उनका प्रतिशत नगण्य ही हो पर बहुतेरी महिलाएं ऐसी हैं जो सर उठा कर गर्व से अपना जीवन-यापन कर रही हैं। ऐसा ही एक अच्छा खासा प्रतिशत उन महिलाओं का भी है जो अपने पति से ज्यादा कमा कर परिवार को सुखमय बना रहा है। देश में कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां आज भी मातृ-सत्ता का चलन है, वहां महिलाओं का ही बर्चस्व है। इन सब को भी आप नकार नहीं सकते। सिर्फ वातानुकूल कक्ष में बैठ घडियाली आंसूं बहा किसी का भला नहीं हो सकता। कानून ऐसा हो जो सर्व मान्य हो, बिना किसी को ठेस पहुंचाए उसे सम्मान पूर्वक जीने का हक दिला सके चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बाल हो या वृद्ध।           

यदि सरकार सही मायनों में महिलाओं का उत्थान चाहती है तो भी यह रास्ता उचित नहीं लगता। इससे बेहतर होता कि पुरुष की सारी संपत्ति का आधा भाग महिला के नाम कर दिया जाता। इस तरह काम के बदले पैसा देना ओछी मानसिकता का प्रतीक है। कोई भी स्वाभिमानी, प्रेमल, ममतामयी नारी इस तरह अपना मेहनताना लेना स्वीकार नहीं करेगी। जो स्त्री अपने स्नेहिल, वात्सल्यता भरे व्यवहार से दुख-तकलीफ, खुशी-गम, ऊंच-नीच में परिवार को एकजुट रखती रही हो, जिसका अधिकार सारे घर पर माना जाता रहा हो उसे इस तरह कैसे उसी की नजरों में कमतर साबित किया जाना चाहिए। यह तो उसका व्यवसायिककरण हो जाएगा।  पति-पत्नी का पवित्र बंधन  मालिक और नौकर का रिश्ता बन कर रह जाएगा। फिर यदि ऐसा होता है तो पैसे के बदले करवाए गये काम में मीन-मेख निकालना शुरु हो जाएगा। काम पूरा ना होने की स्थिति में आक्रोश और क्रोध की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरी बात दुनिया में सिरफिरों की कोई कमी नहीं है ऐसा ही कोई पति काम के बदले पैसा दे अपनी और जिम्मेदारियों से मुंह मोड ले तो महिला की अन्य जरूरतों यथा कपडे-लत्ते, दवा-दारू, मनोरंजन, निजी वस्तुओं की जरूरत तथा अन्य ढेरों खर्चों के लिए आवश्यक रकम क्या सरकार अपने कोष से देगी? एक बात और भी गौर-तलब है बहुतेरे घरों में पति-पत्नी में नोक-झोंक, अनबन, तनाव या कलह-क्लेश की स्थिति बनी रहती है। उस पर यदि इस प्रकार के उट-पटांग कानून लाद दिए जाएंगे तो इन सबसे घबडा कर कुछ पुरुष विवाह के नाम से ही बिदकने लगें तो? क्योंकि पैसा देकर जब बाजार से हर सेवा उपलब्ध होगी तो कोई क्यूं मुफ्त की सरदर्दी पालेगा? वैसे भी विदेशी प्रभाव में आ कर "एक अलग तरह का" जीवन-यापन बडे शहरों में शुरु हो ही चुका है। तब समाज का क्या रूप बनेगा इसका जवाब किस के पास है? 

सबसे बडी बात यदि यह कानून बनता है तो क्या यह देश के सभी समुदायों, सभी धर्मावलंबियों पर लागू होगा या अपनी कुर्सियों पर पकड मजबूत करने के लिए सिर्फ "हिंदू मैरेज एक्ट" पर लागू कर हिंदुओं को ही फिर बली का बकरा बनाया जाएगा?  

देश के "सेव फ़ैमिली फाउंडेशन", जिसकी देश भर में करीब चालीस शाखाएं हैं, का कहना है कि कोई भी कानून लिंग भेद नहीं करता पर इस बार यह एक तरफा बात लगती है जिसमें दूसरे पक्ष को पूरी तरह नजरंदाज किया गया है। जिसका सबसे खतरनाक पहलू पारिवारिक विखंडता होगी। 

इसलिए यदि सरकार अपनी राजनीति से उपर उठ कर सचमुच महिलाओं का भला और उनका सर्वांगीण उत्थान चाहती है तो कोई तर्कसम्मत कदम उठाए। नहीं तो जैसी हमारी व्यवस्था है उसमें किसी की भलाई के लिए दिल से उठाये गये कदम को भी गलत रास्ते में डलवाने में देर नहीं लगती। बाल-विवाह, विधवा-उद्धार, बाल-श्रम, बालिका-पुनुरुत्थान, रेवडी की तरह बंटती छात्र-वृत्तियों का हश्र सभी देख ही चुके हैं। 


2 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सब अपनी अपनी तरह से उत्थान के कार्य में लगे हुये हैं..शरीर का ध्यान किसी को नहीं।

Vinay Prajapati ने कहा…

bahut sahi likha hai aapne

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