बुधवार, 18 मई 2011

पर उपदेश कुशल बहुतेरे :-) :-(

गर्मी का जलवा अपने पूरे शवाब पर है। इसके साथ ही हर अखबार और पत्रिका हमारे स्वास्थ्य को लेकर वैसे ही चिंतित हैं जैसे कभी 'काजी जी परेशान रहते थे शहर के अंदेशे को लेकर'। हर किसी में होड़ लगी है हमें तंदुरुस्त बनाए रखने की। एक तरह-तरह के सुझाव देता है, भिन्न-भिन्न तरह की नसीहतें पेश करता है तो दूसरा भांति-भांति की हिदायतें ले हाजिर हो जाता है। भले ही खुद उस पर कभी भी अमल न किया हो.

बानगी देखिए :-


:-) सुबह सबेरे उठना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। जागिंग नहीं तो वागिंग जरूर करें। गहरी साँसे लें।


:-( आजकल पूरा वायुमंडल प्रदुषित है। सुबह-सुबह थोड़ा कम रहता है जिसकी कसर सड़क साफ करने वाला दस्ता कर देता है। भूल कर भी गहरी सांस लेने से बचें।



:-) पानी अमृत जैसा है इसका भरपूर उपयोग करें। कम से कम १०-१५ गिलास पानी पीने से शरीर के दूषित पदार्थ बाहर निकल जाते हैं।


:-( ज्यादा पानी पीना ठीक नहीं होता, इससे शरीर के लिए आवश्यक लवणों के बाहर निकलने से नुक्सान होता है ।



:-) सुबह का नाश्ता भारी हो, दोपहर का भोजन हल्का तथा रात को अल्पाहार लेना चाहिए। एक साथ न खा कर दिन भर थोड़ी-थोड़ी देर बाद कुछ न कुछ खाते रहना चाहिए।


:-( बार-बार खाना ठीक नहीं होता। इससे मुंह की पाचन में सहायक लार में कमी आ जाती है और पेट पर भी अनावश्यक दवाब बना रहता है। हफ्ते में एक या दो दिन का उपवास जरूर करें।



:-) दूध जरूर पीएं। इससे शरीर को कैल्शियम मिलता है जिससे हड्डियां मजबूत बनी रहती हैं।


:-( दूध हमारे शरीर के लिए उपयोगी नहीं होता। बल्कि यह कई बीमारियों को निमंत्रण देता है।


:-) कच्ची सब्जियों और फलों का भरपूर सेवन करें। इनके रेशों से पाचन शक्ति को बढ़ावा मिलता है.


:-( आजकल इतने कीटनाशक और दवाईयां पौधों में डाली जाती हैं कि वे फलों इत्यादि की ऊपरी सतह पर ही नहीं उनके अन्दर तक जगह बना लेती हैं। सो इनका प्रयोग सोच-समझ कर ही करना चाहिए।



:-) गर्मियों में तरबूज प्रकृति का दिया वरदान है। इसको वैसे ही या इसका रस निकाल कर दिन में दो बार पीने से गर्मी कोसों दूर रहती है।


:-( आजकल तरबूज खाना मौत को दावत देना है। इसके लाल रंग और मिठास को बनाए रखने के लिए इसमें खतरनाक केमिकल्स के इंजेक्शन लगा अपने थोड़े से फायदे के लिए इसे जहरीला बना आपकी सेहत के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसे खाने से बचें।


इत्यादि-इत्यादि।


तो सारा लब्बो-लुआब यह है कि जैसे यात्रा के दौरान कहीं-कहीं लिखा होता है कि यात्री आपने सामान की हिफाजत खुद करें। ठीक वैसे ही आपने शरीर रूपी सामान की रक्षा भी हमें अपनी सोच-समझ से ही करनी है नाकि इन मुफ्त की समझाईशों से।





तो लब्बो-लुआब यह है कि जैसे यात्रा के दौरान कहीं - कहीं लिखा रहता है कि यात्री अपने सामान की हिफाजत खुद करें। ठीक वैसे ही अपने शरीर रूपी सामान की हिफाजत भी हमें अपनी सोच-समझ से ही करनी है नाकि इन मुफ्त की समझाईशों से।



















4 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

उपयोगी सुझाव!

राज भाटिय़ा ने कहा…

गोल माल हे भाई सब गोल माल हे, यानि बहुत सी चीजे नकली भी हे ... जरा बच के

anshumala ने कहा…

बिलकुल ठीक कहा सहमत हूँ आप से |

Anil Pusadkar ने कहा…

sahi kaha sharma ji apni hifazat khud hi karni hai.