मंगलवार, 31 अगस्त 2010

"पीपली को लाइव" कर अनुष्का ने नाम और दाम दोनों का जुगाड़ बैठा लिया

पीपली लाइव देख ड़ाली। ना ही देखी जाती तो ठीक था। पर गल्तियां तो सभी से होती हैं। हो गयी हमसे भी। पर दाद देनी पड़ेगी अनुष्का की हिम्मत की । पहले तो आमिर को वश में किया फिर जैसे-तैसे जुगाड़ लगा बहुत सारे मंत्रियों व संत्रियों को भी फिल्म का डोज पिलवा कर नाम और दाम दोनों पा लिए। इसे कहते हैं "मार्केटिंग"।
आगे चलने से पहले दो बातें।

वर्षों पहले श्री सत्यजीत रे ने एक फिल्म बनाई थी "गुपी गाईन बाघा बाईन"। जब पिक्चर रिलीज हुई तो उसके बारे में बड़े-बड़े दिग्गज समिक्षकों ने एक से बढ कर एक समीक्षा लिख मारी। सत्यजीत साहब की फिल्म एवंई तो हो नहीं सकती इसीलिए किसी को उसमें गहरी राजनीति नजर आई तो किसी को भ्रष्ट नेतागिरी किसी ने उसमें दार्शनिकता खोज डाली तो किसी ने अपने देश की उसमे दिखाए राज्य से तुलना कर डाली। हफ्ते भर बाद जब सत्यजीतजी से फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि "मैंने कोई गूढ बात इस फिल्म द्वारा नहीं कही है। यह विशुद्ध बच्चों की फिल्म है जिसकी कहानी वर्षों पहले मेरे नानाजी ने लिखी थी।"

एक थे ख्वाजा अहमद अब्बास। धुरंधर कहानीकार। उनकी कहानियों पर जब-जब राजकपूर ने फिल्में बनाईं वे सुपर हिट हुईं। पर जब-जब अब्बास साहब ने खुद अपने हाथ आजमाए तब-तब फिल्म कब आई कब उतरी किसी को पता भी नहीं चला।

आमिर का लगता है कि महिला पत्रकारों के लिए उनके दिल में कोई कोना सदा सुरक्षित रहता है। जहां जा कभी बरखा अपना हित साध लेती है तो कभी अनुष्का।
आमिर का नाम अपनी फिल्म से जोड़ कर इस चतुर महिला ने अपनी पहचान बनवा ली। पर देखा जाए तो एक अच्छे भले विषय की ऐसी की तैसी हो गयी है। कहानी कहना, सुनाना अलग बात है पर उसको फिल्माने के लिए दक्षता का होना बहुत जरूरी होता है। कैमरे की कलम से जब झरने की कलकल सी कहानी गढी जाती है तो उसका जादुई असर पड़ता है देखने वाले पर। इसी कहानी को यदि किसी निष्णात हस्ति ने या खुद आमिर ने फिल्माया होता तो इस व्यंग्य की धार इतनी पैनी होती कि देश में ऐसा माहौल बनाने वालों की बखिया उधड़ जाती। पर इसमें तो अभद्र और वाहियात संवादों और बेमतलब की गंदी गालियां ड़ाल अपने को बिंदास दिखा तुरंत मशहूर होने की फूहड़ कोशिश की गयी है वह भी एक महिला निर्देशक द्वारा।

इसके अलावा पता नहीं परफेक्टनिष्ट कहलाने वाले आमिर की नजर नत्थे की पत्नी के किरदार पर कैसे नहीं पड़ी। एक गरीब, फटेहाल, दाने-दाने को मोहताज किसान परिवार, जिसके पुरुषों के गंदे कपड़े, धूल भरे चेहरों पर बेतरतीब बढे बिना कंघियाए बाल और झाड़-झंखाड़ की तरह उगी दाढियां अपनी बदहाली का बखान करती नजर आती हैं वहीं नत्थे की बीवी की "भवें" अभी अभी तराशी गयीं लगती हैं। इतना ही नहीं उसके चेहरे का मेक-अप और सलवट रहित साड़ियां निर्देशक की कमजोरी की चुगली खाती नजर आती हैं। एक मरभुक्खे परिवार की महिला को क्या अपनी भवें तराशने या चेहरा पोतने की मोहलत मिल भी पाती है कभी?

सही बात है यदि कैमरे से कहानी में रंग भरना इतना ही आसान होता तो आज हर ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे का नाम आसिफ, राज कपूर, गुरुदत्त, बिमलराय या ऋषिकेश मुखर्जी के साथ लिखा नजर आता।

सोमवार, 30 अगस्त 2010

तब फिल्मों में स्त्री पात्र का होना एक अजूबा था.

फिल्मी पर्दे को छोड़ दें, वह तो बहुत बड़ी बात है, टीवी के छोटे पर्दे पर भी अपना चेहरा दिखाने और खुद अवतरित होने के लिए आज की कन्याएं कुछ भी करने को आतुर और लालायित रहती हैं। पर क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है कि जब भारत में फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के को अपनी पहली फिल्म, वह भी धार्मिक, के लिए महिला कलाकार की जरूरत पड़ी तो उन्हें दांतों तले पसीना आ गया था। कोई भी महिला या उसका परिवार अपने घर की युवती को इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। थक-हार कर उन्होंने अपनी बेटी से ही वह भूमिका करवाने की सोची पर वह उस भूमिका के लिए काफी छोटी थी। आखिर मजबूर हो उन्हें इस भूमिका के लिए एक होटल में रसोइये का काम करने वाले सालुंके नामक युवक को राजी करना पड़ा था। वैसे उस समय रंगमंच पर स्त्री पात्रों का काम भी पुरुष पात्र निभाया करते थे। क्योंकि उस समय भले और सभ्रांत घर की बहू-बेटियों के लिए ऐसे काम करना अलिखित रूप से वर्जित माना जाता था।
इसी कारण जब दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म "लंका दहन" बनाई तो उसमें भी पुरुष और महिला किरदारों को सालुंके ने ही निभाया था।

पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहती यदि उस समय बंबई में दफ्तरों इत्यादि में कार्यरत एंग्लो-इंड़ियन युवतियां फिल्मों में दिलचस्पी लेना शुरु ना कर देतीं।

आज तो यह सुन-पढ कर भी आश्चर्य होगा वर्तमान पीढी को।

शनिवार, 28 अगस्त 2010

बिना शीर्षक के

कल एक खबरिया चैनल बता रहा था कि तिरुपति में बालाजी के मंदिर में चढावे के सोने के गहनों को नकली जेवरों से बदल दिया गया। सोने के लाखों रुपये के सिक्कों में हेराफेरी हुई है।

वर्षों पहले कलकत्ते में, शक्ति के रूपों में भी सबसे भयंकर, मां काली की सोने की जीभ चुरा ली गयी थी।

मंदिरों, पूजास्थलों या म्यूजिमों से देवी-देवताओं की मूर्तियां अक्सर चोरी हो ऊंचे दामोँ में बिकती रहती हैं।

पूजास्थलों में एक ही चढावा घूम-फिर कर बार-बार चढता रहता है।

क्या आस्था, ड़र, विश्वास सब तिरोहित होता जा रहा है? स्वर्ग, नर्क, अगला जन्म, यह सब छोड़ आप क्या सोचते हैं इस बारे में?

शुक्रवार, 27 अगस्त 2010

रानी लक्ष्मी बाई की सखी झलकारी, इतिहास मौन है जिसके बारे में

"झलकारी", महारानी लक्ष्मीबाई का दाहिना हाथ, समर्पण और वफादारी का दूसरा नाम। अपने देश और सहेली के लिए जिसने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की। पर इतिहास ने उसे उतनी तवज्जो नहीं दी जितने की वह हकदार थी।

झांसी की रानी की सेना के एक सिपहसालार पूरन कोली की पत्नी थी झलकारी। शादी के बाद जब दोनों अपनी रानी का आशिर्वाद लेने महल में गये तभी उसे देख वहां उपस्थित सारे लोग दंग रह गये थे। एकदम लक्ष्मी बाई का प्रतिरूप थी वह। वैसे ही नैन-नक्श, वैसा ही कद , वैसी ही रंगत, वैसी ही कद-काठी। रानी भी उसे देख हैरान हो गयी थी। उसी दिन से उसे रानी ने अपनी सहेली बना लिया था। तब ही से शुरु हो गया था झलकारी का प्रशिक्षण। उसे घुड़सवारी, सैन्य संचालन, अस्त्र-शस्त्र चलाने की विधिवत शिक्षा रानी ने अपनी देख-रेख में दिलवानी आरम्भ करवा दी थी। दोनों जब साथ-साथ निकलती थीं तो पहचानना मुश्किल हो जाता था कि कौन, कौन है?

वैसे भी झलकारी बचपन से ही निड़र और बहादुर थी। एक बार किशोरावस्था में ही उसने अपनी सहेलियों की रक्षा एक दुर्दांत बाघ को सिर्फ कुल्हाड़ी से मार कर की थी। पूरन कोली ने भी उसकी ख्याति सुन और उसकी बहादुरी से प्रभावित हो कर उससे शादी की थी।

सन सत्तावन का युद्ध शुरु हो चुका था। झलकारी रानी के कंधे से कंधा मिला कर युद्ध में भाग ले रही थी। एक दिन रणभूमि में रानी अंग्रेजों से बुरी तरह घिर गयीं। वह अपने दोनों हाथों में तलवार लिए अंग्रेज सैनिकों को गाजर मूली की तरह काटे जा रही थीं। पीठ पर दतक पुत्र दामोदर बंधा हुआ था। उनकी तलवार जिधर घूम जाती उधर ही नर मुंड़ भूलुंठित हो जाते थे। पर अंग्रेजों का घेरा धीरे-धीरे कसता जा रहा था। इतने में झलकारी की नजर मुसीबत में घिरी अपनी सखी पर पड़ी। तुरंत उसने उधर का रूख कर घेरा तोड़ा और रानी के पास जा पहुंची। भयंकर मार-काट मच गयी पर धीरे-धीरे संकट गहराने लगा था। मौके की नजाकत को देख झलकारी ने रानी को निकल जाने के लिए कहा। पर रानी कहां मानने वाली थीं। पर सारे ऊंच-नीच समझा कर, दामोदर की दुहाई दे कर किसी तरह उन्हें मना लिया गया। रानी ने अपना चेहरा कपड़े से ढक लिया और झलकारी ने अपना चेहरा उघाड़ लिया। अंग्रेजों को धोखा दे रानी अपने कुछ चुने हुए सैनिकों के साथ रणभूमि से निकल गयीं, फिर तैयारी कर अंग्रजों से लोहा लेने के लिए। इधर झलकारी ने साक्षात रणचंडी का रूप धारण कर लिया। पर अंग्रेज भी ऐसा मौका चूकना नहीं चाहते थे, रानी को जीवित गिरफ्तार करने का। आखिरकार झलकारी बंदी बना ली गयी। अंग्रेज अपनी इस सफलता पर फूले नहीं समा रहे थे। उसे सेनाध्यक्ष रोज के सामने ले जाया गया। पर कुछ हिंदोस्तानी सैनिकों ने झलकारी को पहचान कर असलियत बता दी। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। पहले तो झलकारी को मृत्यु दंड़ दिया गया पर बाद में उसे आजीवन कैद की सजा सुनाई गयी। जहां जेल में अमानुषिक यातनाओं से उसकी इहलीला समाप्त हो गयी।

हालांकि झलकारी अंग्रेजों की दुश्मन थी, फिर भी अंग्रेज अधिकारी उसकी वीरता, साहस, रणकुशलता और शौर्य की प्रशंसा किए बगैर नहीं रह सके। अपने उच्चाधिकारियों को भेजी गयी सूचना में उसकी खुल कर प्रशंसा की गयी थी।

पर अपना इतिहास पता नहीं क्यों मौन साधे है उस विरांगना के प्रति?

गुरुवार, 26 अगस्त 2010

यह सलाह नहीं चेतावनी है

जैसा देश वैसा भेष यह कहावत तो आपने जरुर सुनी होगी पर एक बात की और गाठं बांध लें, जहां भी रहते हैं वहां की भाषा जरूर सीख लें और कोशिश करें कि स्थानीय लोगों से उनकी ही भाषा में बात कर सकें। पता नहीं आप की किस बात का क्या अर्थ निकाल कर क्या अनर्थ कर दिया जाए। मजाक नहीं है खुद ही देख लें :-

अमेरिका में रह रहे एक हिंदुस्तानी भाई को सड़क पर ही दिल का दौरा पड़ गया। उन्हें तुरंत अम्बुलेंस सेवा मुहैय्या करवाई गयी। अपने यह सज्जन धार्मिक प्रवृति के थे सो वह लगातार "हरि ओम, हरि ओम" का जाप कर रहे थे। अम्बुलेंस वाले उन्हें ले उनके घर पहुंच गये। स्वाभाविक ही था कि उनकी पत्नि उन्हें इस हालात में देख चीख पड़ीं कि आप लोग इन्हें अस्पताल ले जाने के बजाय यहां घर क्यों ले आए ?

"मैडम, इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। सर लगातार "हरी होम, हरी होम" बोले जा रहे थे। हमें लगा कि यह पहले घर जाना चाहते हैं। सो................

मंगलवार, 24 अगस्त 2010

"पांगी घाटी" जहां आज भी लड़की को भगा कर शादी करने का चलन है।

हमारा हिमालय दुर्गम घाटियों और ऊचाईयों का अद्भुत संगम है। आश्चर्य होता है ऐसी-ऐसी जगहों को देख कर कि वहां मनुष्य रह कैसे लेता है। क्या है ऐसा उस जगह में जो आठ-आठ महीने मुख्य धरा से कट कर भी इंसान खुश है अपने उस निवास मे।

एक ऐसी ही घाटी में बसी आबादी का जिक्र है, नाम है जिसका “पांगी”। हिमाचल के खूबसूरत चंबा जिले मे आने वाली यह घाटी सैलानियों के लिए स्वर्ग से कम नहीं है। राजधानी शिमला से इसकी दूरी करीब 560 किमी है। यहां जाने के लिए चंबा से “तरेला” नमक स्थान तक बस की सुविधा है। उसके बाद पैदल यात्रा करना अपने आप मे एक सुखद और रोमांचक अनुभव है। वैसे गाड़ियों द्वारा जाने के लिए एक रास्ता रोहतांग दर्रे को पार कर भी जाता है। पांगी घाटी तकरीबन 1200 किमी क्षेत्र में फैली हुए है। यह अक्तूबर से मई तक बर्फ से ढकी रहती है। उस समय यहां का तापमान -35 से -40 डिग्री तक हो जाता है। सारे काम-काज ठप्प पड़ जाते हैं। फिर भी यहां के रहने वाले अपना सामान्य जीवन बसर करते रहते हैं। इन कठिन परिस्थितियों को झेलने के लिए इनके घर भी खास तरीके से बने होते हैं। यह मिट्ती और लकड़ी के बने घर तीन मंजिला होते हैं। मुख्य द्वार निचली मंजिल में होता है जो चारों ओर से दिवारों से घिरा होता है जिससे ठंड़ी हवाएं सीधे अंदर ना आ सकें। यहीं पर इनके पालतु जानवर रहते हैं। दूसरी मंजिल में रहने तथा खाना बनाने की व्यवस्था होती है। रसोईघर काफी बड़ा बनाया जाता है जिससे सर्दियों में सारा परिवार वहां की गर्माहट में सो सके। यहां धुएं रहित चुल्हों की व्यवस्था होती है। रसोई के सामने ही एक बड़ा सा चुल्हा भी बनाया जाता है जिसमें बर्फ को पिघला कर पीने के पानी की आपूर्ति होती रह सके। कड़ाके की ठंड़ में बाहर ना जाना पड़े इसलिए शौचालय का इंतजाम भी इसी मंजिल पर होता है। यहां हर घर में जौ की शराब बनती है जो इन्हें ठंड़ से तो बचाती ही है साथ ही साथ स्वास्थ्यवर्द्धक पेय का भी काम करती है।

यहां के लोग देवी के भक्त हैं। इनकी आराध्य देवी "मिंगल माता" है, जिस पर इन्हें अटूट विश्वास है। इसी देवी के ड़र से यहां चोरी-चमारी की घटनाएं नहीं होती हैं। यहां शादी ब्याह का भी अजीबोगरीब रिवाज है। यहां लड़की को भगा कर ले जाने का चलन है। लड़का लड़की को भगा कर अपने घर ले जाता है। लड़के के घर जा कर यदि लड़की वहां का भोजन ग्रहण कर लेती है तो शादी को रजामंदी मिल जाती है पर यदि वह ऐसा नहीं करती तो बात नहीं बनती और लड़के वालों को पंचायत की तरफ से दंड़ मिलता है साथ ही साथ हर्जाना भी देना पड़ता है।

जाड़े के चरम में यहां करीब 15 से 20 फुट तक बर्फ गिर जाती है तब बाहरी दुनिया से जुड़ने का एकमात्र साधन हेलिकाप्टर ही रह जाता है। यहां का मुख्यालय “किलाड़” है। जहां सरकार ने हर सुविधा मुहैय्या करवाई हुई है। यहां का वन व लोक निर्माण विश्राम गृह बड़े-बड़े होटलों को मात करता है। जून से सितंबर तक का समय यहां रौनक मेला लगा रहता है। दूर-दूर से सैंकड़ों चरवाहे अपने-अपने रेवड़ों को यहां ला कर ड़ेरा ड़ाल देते हैं । यहां की घास इतनी पौष्टिक है कि हर चरवाहा उसे अपने पशुओं को खिलवाने के लिए लालायित रहता है। एक और आश्चर्य की बात यहां रबी और खरीफ की फसलें एक साथ उगाई जाती है। यहां की आलू की पैदावर भी बहुत मशहूर है। यहां के रहने वालों को सरकारी सुविधा प्राप्य होने का कारण यहां के बहुत सारे युवा सरकारी कार्यालयों में भी कार्य करते हैं।

पांगी घाटी में पहुंचना चाहे कितना भी मुश्किल हो यहाँ पहुंच कर पर्यटक अपनी सारी तकलीफें भूल जाता है। इस हरी-भरी स्वर्ग नुमा घाटी में प्रकृति ने अपना सौंदर्य मुक्त हाथों से लुटाया है।

सोमवार, 23 अगस्त 2010

कीरो ने देखा मन्त्रों का प्रभाव

कीरो, विश्व प्रसिद्ध भविष्यवक्ता तथा हस्तरेखाविद्। जिसके मानने वालों में रानी विक्टोरिया, एडवर्ड़ सप्तम, लार्ड किचनर जैसे बड़े-बड़े नाम शामिल थे, ने अपनी पुस्तक में अपनी भारत यात्रा के दौरान की एक हैरतगेंज घटना का जिक्र किया है। उसी के अनुसार :-

भारत में मुझे अनेकों बार अलौकिक चमत्कारों को देखने का अवसर प्राप्त हुआ था। यहां का आध्यात्म, योग, भगवान के प्रति आस्था, तंत्र-मंत्र सदा मुझे आकर्षित करते रहे। ऐसे ही एक मंत्र के प्रयोग को देखने का मुझे अवसर मिला, जिसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए थे।

एक बार किसी गांव में एक चीते का आतंक फैल गया था। उसने सैंकड़ों मवेशी तथा मनुष्य उदरस्त कर ड़ाले थे। गांव वाले उसके ड़र से अपने घर छोड़ अनयत्र जा कर रहने लगे थे। किसी भी तरह काबू ना आने वाले इस भयंकर पशू को मंत्रों से वश में किया गया था। उसके लिए घने जंगल में एक पुराने मंदिर में बारह ब्राह्मणों ने मिल कर एक अनुष्ठान का आयोजन किया। वे सब एक गोले में बैठ कर एक दुसरे की उंगलियों को आपस में छुआए धीमे स्वर में एक सुर व ताल में मंत्र जाप कर रहे थे। धीरे-धीरे उनके मंत्रजाप की ध्वनी तीव्र होती जा रही थी। मैं सोच रहा था कि इससे ना जाने क्या होने वाला है? पर थोड़ी ही देर में मुझे इसका जवाब मिल गया जब कुछ दूर किसी जगली पशू के रोने की सी आवाज सुनाई दी। ब्राह्मणों का मंत्रोचार अपने चरम पर पहुंच चुका था। तभी अचानक मंदिर के दरवाजे पर एक विशाल पशू की छाया नजर आई। धीरे-धीरे आकृति साफ नज़र आने लगी वह एक विशालकाय, भयंकर, क्रूर चीता था जो चांद की रोशनी में मंदिर के आहाते में प्रवेश कर चुका था। अब वह बिना हिले-ड़ुले वहां खड़ा था सिर्फ उसकी पूंछ गुस्से में धीरे-धीरे हिल रही थी। वहां जमा ग्रामिण भय के मारे एक दूसरे से चिपक गये थे। मंत्रोच्चार अपने चरम पर था। तभी चमत्कार हो गया। चीते की क्रोध से चमकती आंखें धीरे-धीरे बंद होने लगीं। उसका सिर निढाल सा हो एक तरफ झुकने लगा और कुछ ही देर में वह विशालकाय पशू जमीन पर एक तरफ लुढक गया।

रविवार, 22 अगस्त 2010

गामा के साथ दिव्य आत्माएं कुश्ती लड़ती थीं

विश्व विजेता गामा एक ऐसा नाम जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है जो जीतेजी किंवदन्ती बन गया था। इतना बड़ा पहलवान होने के बावजूद वह एक सीधा-साधा, सरल ह्रदय, सादगी पंसद, घमंड से कोसों दूर रहने वाला तथा नियमों का कठोरता से पालन करने वाला इंसान था। आंधी हो, तूफान हो, ठंड हो या गर्मी वह कभी भी अखाड़े जाने मे चूक नहीं करता था। बिना नागा सबेरे चार बजे वह जोर आजमाने अखाड़े मे पहुंच जाता था।

बहुतेरी बार वहां उसे पहले से ही जोर आजमाते दो-तीन लोग मिल जाते थे। जो इसे देखते ही कहते थे "आओ ददा कुछ जोर आजमाईश हो जाए। गामा भी उन कुछ जाने-अनजाने लोगों की ओर ध्यान ना दे कुश्ती के दांव-पेंच आजमाने लग जाता था। पर वह कभी भी उन्हें पछाड़ने में सफल नहीं हो पाता था, उल्टे उन्हीं में से कोई गामा को जमीन सुंघा देता था। इसे आश्चर्य तो होता था पर फिर अपनी कमी को दूर करने के लिए दूगने उत्साह से मेहनत करने लग जाता था।

ऐसे ही एक दिन जब गामा अखाड़े पहुंचा तो उसने वहां सिर्फ एक ही आदमी को कसरत करते पाया। उस व्यक्ति ने गामा को देखते ही कहा कि आओ गामा भाई आज कुछ जम कर कुश्ती की जाए। गामा तो गया ही था जोर आजमाने। काफी देर की कुश्ती के बाद नाहीं वह व्यक्ति गामा को पछाड़ सका नाहीं गामा उसे। थोड़ी देर बाद उस आदमी ने गामा की पीठ पर जोर से अपना हाथ मार कर कहा "गामा, मैं तुझसे बहुत खुश हूं। जा आज से तुझे दुनिया में कोई नहीं हरा पाएगा। तेरी इस पीठ को कोई भी कभी भी किसी भी अखाड़े की जमीन को नहीं छुआ पाएगा।" ऐसा कह कर वह आदमी गायब हो गया।

उस दिन गामा को समझ आया कि महीनों वह जिनके साथ कुश्ती के दांव-पेंच आजमाता रहा था वे दिव्य आत्माएं थीं। दतिया राज्य के पुराने महल के अंदर सैयदवली की मजार है, लोगों का विश्वास है कि वही स्वंय गामा को दांव-पेंच मे माहिर करने के लिए उसके साथ जोर आजमाया करते थे।

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

प्रकृति ने बक्शा है जानवरों को खुद स्वस्थ्य रहने का गुर

आज इंसान खुद को स्वस्थ्य और दीर्घायु बनाने के लिए कितनी जोड़-तोड़ कर रहा है। तरह-तरह की दवाईयां, तरह-तरह की पैथियां, तरह-तरह के उपकरण लगे हुए हैं आदमी को सौ साला बनाने के लिए। भरी रहती हैं पत्रिकाएं, अखबारें हेल्थ कालमों से। डाक्टर मोशायों को फुरसत नहीं है अपने परिवार के लिए चंद घंटे निकालने की। पर सच्चाई तो यह है कि जैसे-जैसे तरह-तरह के उपचार सामने आ रहे हैं वैसे-वैसे बिमारियां भी उग्र से उग्रतर होती जाती हैं। दावे भले ही कितने किए जाएं पर एक साधारण से जुकाम का सटीक इलाज तो आज तक ढूंढे नहीं मिल पाया है। वही पुरानी बात आज भी लागू होती है कि दवाई खा लो तो तीन दिन में ठीक हो जाओगे नहीं तो बिना दवा खाए 72 घंटों में ठीक हो पाओगे। वैसे भी हम अपनी दुर्दशा करने के लिए खुद ही जिम्मेवार हैं। हर चीज की अति करते हैं। वह भी इतनी कि जीवन की गति की मति बिगाड़ कर रख देते हैं।

इसके उलट जानवर बेचारे, प्रभू ने जितनी जिंदगी दी है उसी में खुश हैं। यदि हमारी संगत में पड़ कर वे अपनी जीवन शैली ना बिगाड़ें तो बहुत कम ही बीमार पड़ते हैं। इन सीधे, सरल जीवों का प्रकृति भी ध्यान रखती है। खुदा ना खास्ता यदि कोई हारी-बीमारी का शिकार हो भी जाता है तो अपना इलाज खुद ही कर जल्द स्वस्थ्य भी हो जाता है।

घरों के आस-पास रहने वाले कुत्तों को अपच जैसा कुछ होते ही वह एक पौधा खा वमन कर देते हैं जिससे गंभीर रूप से बीमार पड़ने का खतरा नहीं रहता। घाव वगैरह होने पर कुत्ते और बिल्ली प्रजाति के जानवर उन्हें चाट-चाट कर ठीक कर लेते हैं।
जंगली खरगोश घायल होने पर एक खास राल इकट्ठा कर अपने जख्मों पर लगा ठीक हो जाता है।
भालू अक्सर चीड़ या देवदार की राल खाता रहता है जिससे उसके पेट के सभी रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।
भैंसें, गाय, बैल वगैरह जख्मी होने पर घंटों तालाब के कीचड़ में बैठ अपने घाव को ठीक कर लेते हैं।
डाल्फिने जिन्हें मनुष्य के बाद सबसे अक्लमंद माना जाता है वे अपने बीमार साथी को पानी के ऊपर रखने की कोशिश करती हैं जिससे वह ड़ूब ना जाए।

मुर्गी, बतख, हंस इत्यादि भी घाव पर मिट्टी लगा उसे ठीक करने का रास्ता अपनाते हैं।

गुरुवार, 19 अगस्त 2010

कैसी रही ?

आज दैनिक भास्कर मे दो-तीन चुटकुले पढे। अच्छे लगे, खासकर पहला। सोचा आप सब तक भी पहुंचा दूं। आज यही सही।
जिन्होंने पढे हों अन्यथा ना लें :

***
पत्नी - देखो पड़ोस के शर्माजी की लड़की मैथ मे 99 अंक ले कर आई है।
पति - अरे-रे-रे, एक अंक कहां रह गया ?
पत्नी - वह हमारा बेटा ले कर आया है।

रामूजी ससुराल गये। घर की बाड़ी थी। बेशुमार पत्ते की भाजी लगी हुई थी। जमाई को ताजा भाजी खिलाने के शौक में वही सबेरे शाम बनने लगी। चौथे दिन जब सास ने उनसे पूछा, बेटा आज क्या खाओगे?
तो जले भुने रामू ने कहा, बनाने का क्यों कष्ट करेंगी,
बाडी दिखा दीजिए, खुद ही चर आऊंगा।

पत्नी - शादी के पहले तो तुम कहा करते थे कि शादी के बाद भी तुम मुझसे इतना ही प्यार करते रहोगे।
पति - अरे यार !! उस समय मुझे क्या मालुम था कि मेरी शादी तुम्हीं से हो जाएगी।

बुधवार, 18 अगस्त 2010

भगवान् से भी बड़ा बनने की कामना

कुछ दिनों पहले ऐसे ही बातों-बातों मे एक सज्जन ने एक घटना का जिक्र किया जो हमारे धार्मिकता और ज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगा पूछती है कि कब तक तुम ढोंगियों और पाखड़िंयों के हाथ की कठपुतली बन खुद को बेवकूफ बनवाते रहोगे? सत्संग, विद्वान साधू-संतों के उपदेश, ज्ञानी जनों की वाणियां तो सदा से ही आमजनों का मार्गदर्शन करती आई हैं, पर सर्वसाधारण को भी कम से कम इतना विवेक तो होना ही चाहिए कि वह सच्चे और ढोंगी की पहचान कर सके। हमारी मानसिकता में भगवे वस्त्रों की शुचिता की ऐसी धारणा पैठ गयी है कि इसे धारण करने वाले पर आंख बंद कर विश्वास कर लिया जाता है और इसी का फायदा धूर्त मनस्थिति वाले आसानी से उठा ले जाते हैं।

उन सज्जन ने बताया कि एक शाम उनके शहर से जुड़े गांव में प्रवचन चल रहा था। उत्सुकतावश काम से घर लौटते वह भी दो मिनट के लिए वहां रुक गये। प्रवचन कर्ता महाशय अशोक वाटिका का वर्णन कर रहे थे। पहले उन्होंने यह पंक्ति पढी "स्फटिक शिला बैठी इक नारी ........" अब उस अनपढ, गेरुए वस्त्र धारी को किसने क्या सिखा या समझा कर इस धंधे मे ढकेला यह तो ऊपर वाला ही जानता होगा पर उसने जो व्याख्या की उससे अपना सिर पीट लेने की ईच्छा होती है, पूरी तन्मयता से उसने अर्थ बताया कि "फटी पुरानी साड़ी धारण किए एक औरत बैठी हुई थी........ अब यह असाक्षरता थी या धार्मिक ड़र कि एक भी भला आदमी कुछ नहीं बोला सब हाथ जोड़े जहरास्वादन लेते रहे। यह तो एक दो पंक्ति की बात है। तीन दिनी उस संत समागम में और क्या-क्या कैसे-कैसे कहा गया होगा इसका तो सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। यह तो एक जगह की बात थी।

आज के अखबार में एक अति व्यस्त तथा स्वंय को जगत गुरु कहलवाने वाले एक "महाराज" की प्रचारक ने संत? को भगवान से भी बड़ा निरुपित कर दिया। उनके अनुसार भगवान ने खुद कहा है कि वह संत समदर्शी हैं मैं उनके पीछे-पीछे चलता हूं मैं उनका गुलाम हूं। प्रवचन करते समय भावार्थ को पीछे ढकेल दिया गया। शब्दों का अर्थ साफ अपनी मंशा जता रहा है।

कुछ समय पहले अपनी लच्छेदार भाषा और हाव-भाव से अपार ख्याति पा जाने वाले कुछ लोगों ने अपने पिच्छलगुओं से अपने को भगवान प्रचारित करवाना शुरू कर दिया था। "स्टेज" पर उनकी मुद्राएं, भाव-भंगिमाएं भी पूरी तरह से ऐसे नियोजित होती थीं कि ड़री, सहमी, तरह-तरह के माया जालों में फंसी, तुरंत किसी करामात के जरिए अपने दुखों से छुटकारा पा जाने को लालायित भूखी नंगी जनता उनकी वाक पटुता और कभी कभी हाथ की सफाई से अचंभित हो उन्हें सचमुच अवतार मानने लग गयी। पर इच्छाएं कहां खत्म होती हैं कामनाएं कहां मरती हैं और फिर इस क्षेत्र में बहुतेरे भगवान हो गये। प्रतिस्पर्द्धा बढ गयी तो फिर "शब्दार्थों" का अस्त्र संभाला गया और अपने आप को भगवान से भी बड़ा साबित करने का मैदान तैयार करना शुरु कर दिया गया। बड़ी चतुराई से अपने मतलब के हिस्से का प्रचार खुद ना कर अपने शिष्यों से शुरु करवा दिया गया जिससे पीछे लौटने की गुंजाईश भी बनी रहे। पर गीता के उस भाग को सफाई से अनदेखा कर दिया गया जिसमें उसी प्रभू ने कहा है कि "मैं इस सम्पूर्ण जगत का धारण-पोषण करने वाला हूं। पिता, माता, पितामह मैं ही हूं। देवताओं का गुरू भी मैं ही हूं। सबका स्वामी भी मैं ही हूं।"

पर भगवान के कहे पर कोई विश्वास नहीं करता। उन तथाकथित स्वयंभू भगवानों पर ज्यादा श्रद्धा है जिन्हें पता चल जाए कि अब भोजन और शीतनियंत्रित अष्टतारा सुविधाओं पर कल से नवग्रहों की साढेसाती पड़ने वाली है तो उनके अपने देवता कूच कर जाएं।

मंगलवार, 17 अगस्त 2010

रविवार को पड़ने वाला स्वतन्त्रता दिवस

परसों एक और स्वतंत्रता दिवस "निपटा" घर लौट गये सब छुट्टी मनाने, आराम करने। वही हर साल जैसा यंत्रवत माहौल था। विडंबना देखें, इस दिन हर संस्था को एक नोटिस निकलवाना पड़ता है कि कल झंडोतोलन के समय सबका उपस्थित होना बहुत जरूरी है, उनके विरुद्ध "एक्शन लिया जाएगा जो इस दिन अनुपस्थित होंगे। इस बार तो समस्या और भी टेढी थी क्योंकि इस बार यह पर्व रविवार के दिन पड़ा था।

समय पर सब पहुंच तो रहे थे, रटे रटाए जुमले उछालते पर देख कर साफ लग रहा था कि सब के सब बेहद मजबूरी में ही आए हैं। बहुतों से रहा भी नहीं गया और आते ही कहा 'क्या सर, एक तो संडे आता है उस दिन भी !! दसियों काम निपटाने होते हैं।

मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, एक तरफ साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन ने आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य किया और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और प्रेरक देशभक्ति की भावना सारे लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धिरे-धिरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के या किसी और मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गया है या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस और इस आशा में कि आने वाले समय में इस दिन को लोग खुद उचित सम्मान देंगे, सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं।

सोमवार, 16 अगस्त 2010

पूरे २१ दिन और कुछ घंटे लग गए यहाँ वापस आने में

आखिर पूरे 21 दिन और कुछ घंटों के पश्चात सरकारी फोन में जान आ ही गयी। बड़ी गरीब सी चीज हो गया है यह बेचारा। हो क्या गया है बना दिया गया है इसे। नहीं तो सारी कंपनियों को मिलाने के बाद भी जिसके, चाहे मजबूरी मे ही सही, ग्राहकों की संख्या ज्यादा हो उसका यह हाल है कि उसका नाम सुनते ही या तो लोग मुंह बना लेते हैं या फिर उनके चेहरे पर एक अजीब सी व्यंग्यात्मक मुस्कान आ जाती है। फिर रही-सही कसर चलित फोन ने पूरी कर दी है। ऐसे मे यदि बेचारा एक बार जो बिमार पड़ता है तो पहले तो कोई ध्यान ही नहीं देता। कोशिश दर कोशिश के बाद पांच सात बार याद दिलाने पर एक-दो दिनों का आश्वासन का झुनझुना ठेका दिया जाता है।

पता नहीं संचार व्यवस्था में इतनी तरक्की होने के बाद भी फाल्ट खोजने में ही दसियों दिन क्यों लग जाते हैं। चलिए ठीक है आपकी रफ्तार ऐसी ही है तो "उपभोक्ता" को अंधेरे में ना रख कितने दिन लगेंगे ठीक होने में यह बताने की हिम्मत तो रखिए। जिससे वह रोज सबेरे भगवान का नाम लेने के पहले चोंगा उठा-उठा कर इसके ठीक होने की आशा को निराशा मे ना बदलता रहे।

एक बार चारेक महिने पहले भी ऐसा हुआ था और फोन महीने से कुछ दिन कम के लिए कोमा में चला गया था। इस बार भी 24 जुलाई को जो खटिया पकड़ी तो 14 अगस्त को जाकर बिमारी से आजादी पा सका। सोचता हूं कि किसी प्रायवेट सेक्टर वाले की इतनी "हिम्मत" हो सकती है ऐसी जुर्रत करने की। अरे भाई जब बिल जमा करने मे जरा सी देर-सबेर होने पर कनेक्शन काटने की धौंस देते हो तो महीने भर सर्विस ना देने पर उसका भी हरजाना दो। यदि कोई अड़ ही जाए तो अहसान करते हुए इतनी कम रकम की छूट मिलती है कि लेने वाले को भी शर्म आ जाती है। फिर जले पर नमक छिड़कने वाली बात यह कि रोज ही झिंझोड़-झिंझोड़ कर कहा जाता है "जागो ग्राहक जागो" अरे भैया पहले देख तो लो कि किस खाट पर कोई सोया है ऐसा ना हो कि जागते ही पहले वह खाट ही खड़ी कर दे।