रविवार, 21 मार्च 2010

अंकल, कन्या खिलाओगे ?

आज सुबह दरवाजे की घंटी बजी। द्वार खोल कर देखा तो पांच से दस साल की चार-पांच बच्चियां लाल रंग के कपड़े पहने खड़ी थीं। छूटते ही उनमें सबसे बड़ी लड़की ने सपाट आवाज में सवाल दागा, 'अंकल, कन्या खिलाओगे'?
मुझे कुछ सूझा नहीं, अप्रत्याशित सा था यह सब। अष्टमी के दिन कन्या पूजन होता है, पर वह सब परिचित चेहरे होते हैं, और आज वैसे भी षष्ठी है। फिर सोचा शायद छुट्टी का दिन होने की वजह से गृह मंत्रालय ने कोई अपना विधेयक पास कर दिया हो इसलिये इन्हें बुलाया हो। अंदर पूछा तो पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं है। मैं फिर कन्याओं की ओर मुखातिब हुआ और बोला, बेटा आज नहीं, हमारे यहां अष्टमी को पूजा की जाती है।
"अच्छा कितने बजे"? फिर सवाल उछला, जो सुनिश्चित भी कर लेना चाहता था, उस दिन के निमंत्रण को। मुझसे कुछ कहते नहीं बना, कह दिया, बाद में बताऐंगे। तब तक बगल वाले घर की घंटी बज चुकी थी।

मैं सोच रहा था कि बड़े-बड़े व्यवसायिक घराने या नेता आदि ही नहीं आम जनता भी चतुर होने लग गयी है। सिर्फ दिमाग होना चाहिये। दुह लो मौका देखते ही, जहां भी जरा सी गुंजाईश हो। बच ना पाए कोई।
जाहिर है कि ये छोटी-छोटी बच्चियां इतनी चतुर सुजान नहीं हो सकतीं। यह सारा खेल इनके माँ, बाप, परिजनों का रचा गया है। जोकि दिन भर टी.वी. पर जमाने भर के बच्चों को उल्टी-सीधी हरकतें करते और पैसा कमाते देख हीन भावना से ग्रसित होते रहते हैं अपने नौनिहालों को देख कि दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमारे बच्चे घर बैठे सिर्फ रोटियां तोड़े जा रहे हैं। ऐसे ही किसी कुटिल दिमाग में बच्चों को घर-घर जीमते देख यह योजना आयी और उसने इसका कापी-राइट कोई और करवाए, इसके पहले ही, दिन देखा ना कुछ और, बच्चियों को नहलाया, धुलाया, साफ सुथरे कपड़े पहनवाए, एक वाक्य रटवाया, "अंकल/आंटी, कन्या खिलवाओगे? और इसे अमल में ला दिया।
इनको पता है कि इन दिनों लोगों की धार्मिक भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। फिर बच्ची स्वरुपा देवी को अपने दरवाजे पर देख कौन मना करेगा। सब ठीक रहा तो सप्तमी, अष्टमी और नवमीं तीन दिनों तक बच्चों और हो सकता है कि पूरे घर के खाने का इंतजाम हो जाए। ऊपर से बर्तन, कपड़ा और नगदी अलग से। वैसे भी इन तीन दिनों तक आस्तिक गृहणियां चिंतित रहती हैं कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई और अघाई कन्या ने खाने से इंकार किया और हो गया अपशकुन।


अस्सी के दशक की याद आती है। दिल्ली में अपनी कालोनी में, खास कर अष्टमी के दिन, कैसे आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता था। सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती थी। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते थे। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं। "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी? कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है।
इधर काम पर जाने वाले हाथ में लोटा, जग लिए खड़े हैं कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार कर काम पर जाएं। देर हो रही है, पर आफिस के बास से तो निपटा जा सकता है {वैसे आज के दिन तो वह भी लोटा लिए खड़ा होता था :)} घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो।

आज इन रायपुरियन ने कितना आसान कर दिया सब कुछ, पूरे देश को राह दिखाई है, घर पहुंच सेवा प्रदान कर।

"जय माता दी"

14 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

श्रद्धा जब विजेनेस बन जाये तो श्रद्धा खत्म हो जाती है, आप का लेख पढ कर बहुत हेरनगी हुयी.कि क्या आज ऎसा भी होने लगा है, धन्यवाद

Mired Mirage ने कहा…

आवश्यकता आविष्कार की जननी होती है। अब कहाँ मिल सकती हैं ७ या ८ या ९ कन्याएँ? उनमें से बहुत सी तो भ्रूणावस्था में ही पार लगा दी गईं। और जो बची हैं वे किसी की प्यारी दुलाती हैं, वे पहली जगह का हलुवा तो मुँह में डाल सकती हैं किन्तु दूसरी व तीसरी जगह का नहीं। यह जो लाल कपड़ों में स्वयं को निमन्त्रित करती बच्ची ब्रिगेड है यही इस रीति को जीवित रख सकती है।
घुघूती बासूती

Gagan Sharma, Kuchh Alag sa ने कहा…

भाटिया जी,
ऐसे लोगों को भगवान का भी खौफ नहीं है। वैष्णव देवी के पैदल पथ पर स्थानीय माँ-बाप छोटी-छोटी बच्चियों को देवी का रूप धारण करवा बैठा देते हैं। जहां वे घंटों एक ही मुद्रा में बैठी रहती हैं, आने-जाने वाले भक्तों के चढावे के इंतजार में।

Bhavesh (भावेश ) ने कहा…

आपका लेख पढ़ कर आज एक वाकया याद आ गया. कोई पच्चीस साल पहले की बात है. हमारी माताजी जब तक थी, हर बार नवरात्री में कन्या खिलाती थी. जैसा आपने कहाँ उस दिन कन्याओ की डिमांड कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है. हमारे एक परिचित, जो घर से करीब पाच सात किलोमीटर दूर रहते थे, उन की एक कन्या को भी उस दिन न्योता दिया था पर किसी कारणवश वो कन्या को लेकर नहीं आ सके. मुझे उनके घर कन्या को लिवा लाने भेजा तो कन्या की माताजी ने कहाँ की कन्या तो पड़ोस में खाने चली गई है आप उसका टिफिन बना कर हमारे घर भेज दो. आज ये लेख पढ़ कर बरबस वो घटना याद आ गई :-)

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

भले ही ये बच्चियां उनके अभिभावकों की स्वार्थ-लिप्सा का उद्घोष कर रही हों, लेकिन इकहीं न कहीं हमारा काम भी आसान ही कर रही हैं, वजह वही कन्याओं का आसानी से न मिलना.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

बस इस एक दिन ही कन्याओं का पूजन होता है बाकी दिन...
काश कि पूरे साल भर नवरात्र रहें..

मनोज कुमार ने कहा…

वैष्णव देवी के पैदल पथ पर स्थानीय माँ-बाप छोटी-छोटी बच्चियों को देवी का रूप धारण करवा बैठा देते हैं। जहां वे घंटों एक ही मुद्रा में बैठी रहती हैं, आने-जाने वाले भक्तों के चढावे के इंतजार में।
आपने सही लिखा है। इसी महीने वैष्णव देवी के दर्शनार्थ गया था। ऐसा ही दिखा।

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari ने कहा…

जै माता दी.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

जय माता शेरों वाली की!

Udan Tashtari ने कहा…

काम तो आसान कर दिया अंकल आपका.

Anil Pusadkar ने कहा…

क्या किया जा सकता है महाराज्।

ललित शर्मा ने कहा…

अब घर पहुँच सेवा है जी।
सभी आवश्यकता की पुर्ती
एक फ़ोन पर भी हो जाती हैं,

अच्छी पोस्ट
आभार

shikha varshney ने कहा…

हे भगवान कहाँ पहुँच गया हिन्दुस्तान..

नेहा पाठक ने कहा…

कभी हमें भी बुलाते थे लोग...अष्टमी के दिन.....पूरे मोहल्ले भर के घरो के पकवान खा कर फिर शाम कों पेट दर्द होता था......फिर भी हम हर बार वीरो की तरह डटे रहते....अब बड़े हो गए तो हमारी क़द्र करनी बंद कर दी लोगो ने...