गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

जब सारे जाने कह रहे हैं कि कल नया साल है, तो जरूर होगा

सभी "अनदेखे अपने" भाई-बहनों के लिए कल और हर आने वाला हर दिन खुशी समृद्धी तथा स्वास्थ्य लेकर आये।

दुनिया के साथ ही हम सब हैं। जब सारे जने कह रहे हैं कि कल नया साल है तो जरूर होगा। सब एक दूजे को बधाईयां दे ले रहे हैं, अच्छी बात है। जिस किसी भी कारण से आपसी वैमनस्य दूर हो वह ठीक होता है। चाहे उसके लिये विदेशी अंकों का ही सहारा लेना पड़े। अब इस युग में अपनी ढपली अलग बजाने का कोई मतलब नहीं रह जाता है। वे कहते हैं कि दूसरा दिन आधी रात को शुरु होता है तो चलो मान लेते हैं क्या जाता है। सदियों से सूर्य को साक्षात भगवान मान कर दिन की शुरुआत करते रहे तो भी कौन सा जग में सब से ज्यादा निरोग, शक्तिमान, ओजस्वी आदि-आदि रह पाये। कौन सी गरीबी घट गयी कौन सी दरिद्रता दूर हो गयी।
हर बार की तरह कल फिर एक नयी सुबह आयेगी अपने साथ कुछ नये अंक धारण किये हुए। साल भर पहले भी ऐसा ही हुआ था। होता रहा है साल दर साल। आगे भी ऐसा ही होता रहेगा। जो सक्षम हैं उन्हें एक और मौका मिल जाता है, अपने वैभव के प्रदर्शन का, अपनी जिंदगी की खुशियां बांटने, दिखाने का, पैसे को खर्च करने का। जो अक्षम हैं उनके लिये क्या नया और क्या पुराना। कल सुरज उगते ही वही चिंता, काम मिलेगा कि नहीं, चुल्हा जल भी पायेगा कि नहीं, बच्चों का तन इस ठंड में ढक भी पायेगा कि नहीं। उसको तो यह भी नहीं पता कि जश्न होता क्या है।
कुछेक की चिंता है कि इतने पैसे को खर्च कैसे करें और कुछ की कि इतने से पैसे को क्या खर्च करें। इन दिनों जो खाई दोनों वर्गों में फैली है उसका ओर-छोर नहीं है।
वैसे देखें तो क्या बदला है या क्या बदल जायेगा। कुछ कैसे भी जोड़-तोड़ लगा, साम, दाम ,दंड़, भेद की नीति लगा, किसी को भी कैसी भी जगह बैठा अपनी पीढी को तारने का जुगाड़ बैठाते रहेंगे। कुछ भेड़ों की गिनती करवा खुद को खुदा बनवाते रहेंगे। कुछ सदा की तरह न्याय की आंखों पर बंधी पट्टी का फायदा उठाते-उठवाते रहेंगे, और कुछ सदा की तरह कुछ ना कर पा कर कुढते-कुढते खर्च हो जायेंगे।
इस सब को अन्यथा ना लें। किसे दुर्भावना या पूर्वाग्रह से ग्रस्त भी नहीं है यह पोस्ट। अपनी तो यही कामना है कि कल आने वाला ही क्यों हर दिन अपने देश और देशवासियों के साथ-साथ इस धरा पर रहने वाले हर प्राणी के लिये खुशहाली, सुख, स्मृद्धी के साथ-साथ सुरक्षा की भावना भी अपने साथ लाये।

सोमवार, 28 दिसंबर 2009

वृद्धा ने शिवाजी को दी शिक्षा

शिवाजी महाराज ने मुगल सल्तनत के खिलाफ जंग शुरु कर दी थी। उनकी छापामार युद्ध नीति से औरंगजेब की नाक में दम आ गया था।
ऐसे ही एक बार शिवाजी ने एक गांव मे पड़ाव डाला। इनके खाने का इंतजाम एक वृद्धा के घर मे था। वह शिवाजी महाराज को तो जानती थी पर उनके चेहरे से अनभिज्ञ थी। वह यही समझ रही थी कि वह महाराज के सैंनिकों को भोजन करा रही है। कुछ ही देर मे उसने गरम-गरम चावल-दाल परोस दिया और मनुहार कर खिलाने लगी। शिवाजी जल्दी मे थे उन्होंने थाली सामने आते ही खाना शुरु किया ही था कि भोजन की गर्मी के कारण उन्हें हाथ खींच लेना पड़ा। यह देखते ही वृद्धा बोली, तू भी अपने महाराज की तरह बावला है। वह भी सीधे राजधानी पर हमला कर नुक्सान उठाता है और तू भी भोजन को बीच मे से खाना शुरु कर हाथ जलवाता है। अरे पगले, अपने महाराज को चाहिये कि वे पहले छोटी-छोटी जगहों पर विजय प्राप्त करें जिससे पीछे से हमला होने का ड़र खत्म हो जाये फिर सारी ताकत लगा राजधानी पर टूट पड़ें। उसी तरह तू भी खाना किनारे से शुरु कर, इससे खाना ठंड़ा भी हो जायेगा और तू आराम से खा भी पायेगा।
शिवाजी महाराज अपने इस नये गुरु का मुंह देखते रह गये। खाना खत्म कर उन्होंने वृद्धा के चरण स्पर्श किये और आगे बढ़ गये।

इतिहास गवाह है कि इसके बाद युद्ध में फिर कभी उन्हें पीछे मुड़ कर नहीं देखना पड़ा।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2009

ऊपर से प्रत्यक्ष खबर भेजने का नियम नहीं है.

भरी दोपहर दरवाजे पर दस्तक हुई, घोष बाबू ने दरवाजा खोला तो सामने फटिक खडा था

फटिक घोष गंगा घाट पर बैठे नदी के जल पर उतराती नौकाओं को देख रहे थे। कोई सवारियों को पार ले जाने के लिये लहरों से संघर्ष कर रही थी, तो कोई पानी मे जाल ड़ाले मछली पकड़ने का उपक्रम कर रही थी। बहुत से लोग घाट पर नहा भी रहे थे। बीच बीच में घोष बाबू एक नज़र अपने पोते बापी पर भी ड़ाल लेते थे जो पानी मे कागज की छोटी-छोटी नावें बना तैराने की कोशिश कर रहा था।

घोष बाबू और उनके पोते बापी का यह रोज का अटूट नियम था, संध्या समय गंगा घाट पर आ शीतल, मंद, सुगंध समीर का आनंद लेने का।
अचानक बापी एक ओर देख चिल्लाया, "दादू, देखो केष्टो!!!
"केष्टो"?, "क्या बक रहा है? किधर है"? घोष बाबू अचंभित हो बोले।
"उधर"। घाट के एक ओर अपनी उंगली का ईशारा कर बापी बोला। अपनी आंखों पर हाथ रख उसकी उंगली की सीध में घोष बाबू ने नज़र दौड़ाई, अरे!!! सचमुच वहां घाट पर केष्टो खड़ा था। घोर आश्चर्य, केष्टो उनका पुराना नौकर, जिसकी मृत्यु दो साल पहले हो चुकी थी, वह साक्षात यहां? घोष बाबू ने तुरंत बापी को उसे बुला लाने के लिये दौड़ाया। कुछ ही देर में केष्टो उनके सामने हाथ जोड़े खड़ा था। घोष बाबू आंखे फाड़े उसकी ओर देखे जा रहे थे, फिर बोले, "अरे तू तो मर गया था न? फिर यहां कैसे?" केष्टो ने अपने पुराने मालिक के चरण स्पर्श किये और ऊपर हाथ उठा कर बोला, "मालिक उस दफ्तर में मुझे धरती से लोगों को उपर ले जाने की नौकरी मिल गयी है।"
" अरे!!! तो यहां कैसे आया है?" घोष बाबू ने पूछा।
"हरिदास को लेने।" घाट पर नहा रहे जमिंदार के नौजवान बेटे की ओर उसने ईशारा किया।
"अरे बाप रे!!! हरिदास? अरे वह तो अच्छा खासा तंदरुस्त जवान है, और अभी महीना भर पहले ही तो उसकी शादी हुई है।"
"हां बाबू, पर उसका समय आ गया है। उसे जाना होगा।"

तभी घाट पर जोर का हल्ला मच गया। हरिदास ने जो ड़ुबकी लगायी तो वह फिर पानी के ऊपर ना आ सका। कुछ देर बाद ही उसकी लाश लहरों पर उतराने लगी।
तभी केष्टो बोला, "मालिक चलता हूं।"
घोष बाबू अवाक से यह सब देख रहे थे, केष्टो कि आवाज सुन जैसे होश मे आये, बोले "अरे केष्टो, सुन जरा, ऊपर तो तेरे को सब आने-जाने वालों का पता होता होगा?"
"हां मालिक" केष्टो ने जवाब दिया।
"तो तू मेरा एक काम कर सकेगा"? घोष बाबू ने पूछा।
" हां, क्यों नहीं, बोलिये"।
"जब मेरा समय आए तो मुझे छह महीने पहले बता सकेगा?"
"जरूर, मैं आप को खबर कर दूंगा।" इतना कह केष्टो हरिदास की आत्मा को ले ओझल हो गया।

समय बीतता गया। फटिक घोष निश्चिंत थे कि समय के पहले छह महीने तो मिल ही जायेंगे, कुछ काम बचा होगा तो निपट जायेगा। ऐसे ही गर्मी के दिनों में भरी दोपहर को दरवाजे पर दस्तक हुई। दोपहर के खाने के बाद की खुमारी घोष बाबू पर चढी हुई थी। धीरे-धीरे उठ कर दरवाजा खोला तो सामने केष्टो खड़ा था। इन्हें देख बोला, "बाबू, चलिये।" घोष बाबू के सारे शरीर में सिहरन दौड़ गयी। किसी तरह बोले, "पर तुझे तो कहा था ना, कि मुझे छह महीने पहले बता देना?" " हां बाबू, मैंने ऊपर बात की थी, पर वे बोले कि हमारे यहां प्रत्यक्ष रूप में खबर करने का नियम नहीं है। हमारे यहां से अप्रत्यक्ष रूप से संदेश भेजा जाता है। जब किसी व्यक्ति का शरीर अशक्त हो जाये, चेहरे पर झुर्रियां पड़ जायें, आंखों से दिखना कम हो जाये, दांत गिर जायें, बाल सफेद हो जायें तो समझ लेना चाहिये कि समय आ पहुंचा है।
चलिये....................................

बचपन में पढी कवि गुरु की यह व्यंग रचना अक्सर याद आती रहती है।
कई दिनों से अपना बक्सा बीमार है सो जुगाड़ कर इसे पोस्ट किया है:)

सोमवार, 21 दिसंबर 2009

मेरा एक सुझाव है, सोच कर देखीए.

मेरा एक सुझाव है कि किसी भी दिग्गज ब्लाग पर "गपशप" जैसा कुछ शुरू किया जाय। अब यहां एक से बढ कर एक "पोपुलर" जगहें हैं जहां हर कोई खिंचा चला आता है। इनमें किसी पर भी ऐसा कुछ शुरु किया जाय जिसमें हर ब्लागर अपने क्षेत्र की कोई भी जानकारी, कोई घटना, कोई नयी खबर, कुछ अनोखा यदि हो तो सबके साथ बांटे। और उसकी प्रतिक्रिया भी तुरंत उपलब्ध हो सके। जैसा कि अभी ताऊजी के फर्रुखाबादी खेल में सब बढ-चढ कर भाग लेते हैं, पहेलियों के अलावा भी नोक-झोंक में। उसी तरह दुनिया-जहान की बातें एक ही जगह हो जायें। कहने को तो हर ब्लाग ऐसी ही जानकारी रखता है, पर वहां संजीदगी पीछा नहीं छोड़े रहती। अब इसकी तुलना किसी "ट्वीटर या फेसबुक" से ना कर एक अलग रूप का खिलंदड़ा ब्लाग बन जाये तो कैसा रहे? जिसमे तरह-तरह की जानकारियाँ उपलब्ध हों।
इसके लिये भी मेरी ताऊजी से ही गुजारिश है कि वह एक नया ब्लाग शुरू करें। उनकी चौपाल से ज्यादा मुफीद जगह और कौन सी हो सकती है। यदि ऐसा हो तो चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाने का समय थोड़ा देर से रखा जाय।

रविवार, 20 दिसंबर 2009

आस्ट्रेलियन दंपति ने बनाया “मन चाहे फल देने वाला पेड़”

घर में एक पेड़ लगा कर आठ तरह के फल पाने का करिश्मा कर दिखाया है आस्ट्रेलियन दम्पति ने

आस्ट्रेलिया के वेस्ट दंपति ने एक अनोखा करिश्मा कर दिखाया है। एक ऐसा करिश्मा जिसका जिक्र किस्से कहानियों में तो सुना पढा गया होगा पर असली जिंदगी में जिसे असंभव ही माना जाता रहा है। जी हां इस युगल ने बारह वर्षों के अथक प्रयास से एक ऐसी विधी खोज निकाली है जिससे एक ही पेड़ पर अपनी पसंद के सारे फल उगाये जा सकते हैं। उन्होंने इसे “फ्रुट सलाद ट्री” का नाम दिया है। जेम्स वेट और उनकी पत्नी कैरी वेट के मन मे, अपने फार्म पर काम करते हुए, कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अखिरकार वर्षों की मेहनत रंग लायी और वे अपने बागीचे में ऐसा पेड़ तैयार करने में सफल हो गये जिस पर अपनी इच्छानुसार फल उगाये जा सकते थे। वेट दंपति ने एक पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के फलों की कलमें लगा कर इस अद्भुत कारनामे को अंजाम दिया। किस पेड़ पर किस फल की कलम लगायी जाय, कलम को किस तरह लगाया जाय, उसकी साज-संभार, दिये जाने वाली खाद का प्रकार, यह सब बातों की जानकारी पाते करते तथा उसका सफ़ल परिणाम पाने में उन्होंने अपने जीवन के अमूल्य बारह साल खपा दिये। शुरु-शुरू में तो लोगों को विश्वास ही नहीं होता था तथा वे सोचते थे कि ऐसे ही पेड़ में फल लटका दिये गये हैं। पर धीरे-धीरे लोगों को सच्चाई का पता चलता गया और अब तो उनके ऐसे पेड़ों की इतनी मांग हो गयी है जिसे पूरा करने मे भी उन्हें पसीना आ जाता है।
कैरी का कहना है कि अपने ग्राहक की पसंद के अनुसार मौसम, मिट्टी इत्यादि को ध्यान मे रख वे पेड़ को तैयार करते हैं। इस तरह के “फलों के सलाद वाले पेड़” बोंसाई तरीके से भी बनाये जा सकते हैं। पेड़ के आकार का फलों के स्वाद पर कोई असर नहीं पड़ता है।

कहिये कैसा लगेगा जब आप एक पेड़ उगायेंगे और उसीसे संतरा, चकोतरा, मौसम्बी आदि इसी जाति के फल पा सकेंगे। या फिर एक पेड़ से आड़ू, खुबानी, आलूबुखारा, बेर जैसे एक जाति के फल ले सकेंगे।

यदि ऐसा "मुह मांगा फल" देने वाला पेड़ लगायें तो मुझे फल भेजना मत भूलियेगा। अधिक जानकारी के लिये वेट दंपति की वेब साईट को भी देखा जा सकता है।

शनिवार, 19 दिसंबर 2009

आपके साथ भी ऐसा होता है क्या ? (:

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने से पहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती है वही जल्दी बढ़ने लगती है।

क्यों -----होता है क्या ? (: (: (:

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

उस्ताद बिस्मिल्ला खां को बालाजी का आशीर्वाद प्राप्त था.

उस्ताद बिसमिल्ला खां, संगीत की दुनिया का एक बेमिसाल फनकार, सुरों का बादशाह। जिन्होंने सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर बजने वाली शहनाई को एक बुलंद ऊंचाई तक पहुंचा दिया। उन्हीं के जीवन से जुड़ी एक अनोखी और अलौकिक घटना उन्हीं की जुबानी :-

मेरा बचपन मेरे मामू के घर ही बीता था। वही मेरे प्रारंभिक गुरु भी थे। वे घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया। मैं भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगा। इसमें कभी-कभी आधी रात भी हो जाती थी। करीब ड़ेढ-दो साल बाद एक दिन मामू साहब ने मुझे अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना। बात मेरी समझ में कुछ आयी कुछ नहीं आयी पर मैं तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगा रहा। ऐसे ही एक दिन काफी रात हो गयी थी मैं एकाग्रचित हो गहरे ध्यान में डूबा शहनाई बजा रहा था कि अचानक मंदिर एक अलौकिक सुगंध से भर गया। मैं उस सुगंध का ब्यान नहीं कर सकता। मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी। मेरी आंखें खुल गयीं। मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं। ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में। मैं पसीने-पसीने हो गया। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ। मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी। फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये। ड़र के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था। मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना। फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी।
इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा।

आज यह महान आत्मा हमारे बीच नहीं हैं। पर क्या उनके अनुभवों से हम कुछ सीख सकते हैं ?

गुरुवार, 17 दिसंबर 2009

यह सब सच है !!!

* नीलगिरि के जंगलों में पाये जाने वाले गिरगिट की जीभ उसके शरीर की लंबाई से तीन गुनी लंबी होती है।          इसका कद करीब 45 से।मी। होता है जबकि जीभ 1.25 मी. लंबी होती है। अफ्रीका और मेडागास्कर के जंगलों    में पाये जाने वाले गिरगिटों की जीभ तो दो मीटर लंबी पायी गयी हैं।

* पेंसिल को लेड़ पेंसिल के नाम से जाना जाता है, पर वह ग्रेफाइट और चिकनी मिट्टी के मिश्रण से बनती है।

* अंग्रेजों के समय में “कोर आफ गाइड्स” नामक पल्टन के कर्नल ने सबसे पहले खाकी रंग के कपड़ों को              अपनाया था, क्योंकि उसके अनुसार इसे पहन कर जमीन पर लेटा आदमी दूर से नज़र नहीं आ पाता।

* बुड़ापेस्ट, एक नगर नहीं, बल्कि दो शहरों के नाम से मिल कर बना है। ड़ेन्यूब नदी के एक किनारे बुडा तथा        दूसरी ओर पेस्ट नगर बसे हुए हैं।

* इसी तरह बिस्कुट जिसे रोज लाखों लोग खाते हैं, वह भी दो शब्दों से मिल कर बना है। बिस और कुट जो फ्रेंच      भाषा के शब्द हैं, जिनका अर्थ है दो बार पकाया हुआ।

* “ट्रैफिक जाम” आधुनिक युग की देन नहीं है। इसके कारण जूलियस सीजर को भी आदेश पारित करना पड़ा       था कि रोम में दिन के समय कोई पहियेदार वाहन नहीं चलेगा।

रविवार, 13 दिसंबर 2009

कथा का "री मंचन" पर अब सुधार के साथ

मूषकराज ने कहा, देवी मुझे क्षमा करें। सच बहुत कटु होता है। आपकी अस्थिर बुद्धि और चंचल मन सुयोग्य पात्रों को भी नहीं पहचान पाए। मैं तो एक तुच्छ जीव हूँ..........................

कहते हैं ना कि इतिहास अपने आप को दोहराता है, सच मानिये सब कुछ वैसे ही हुआ जैसा वर्षों पहले घटा था बस घटना का अंत जरा बदल गया है। आज कल की नारियों की प्रचंड़ सफलता की आंधी में हमारे इस नायक के फैसले का पता भी नहीं चलना था यदि दंड़कारण्य के बीहड़ जंगलों का दौरा ना किया होता। कहानी पूरानी है पर उसका अंत अप्रत्याशित है।

घूमने का शौक फिर एक बार दंड़कारण्य के जंगलों तक ले आया था। दैवयोग से एक सुबह नदी किनारे एक साधू महाराज के दर्शन हो गये। उनसे कुछ ज्ञान पाने की गरज से मैं उनके साथ हो लिया। उन्होंने मुझसे पिंड़ छुड़ाने की बहुत कोशिश की पर अंत में वे मुझे अपने साथ अपनी कुटिया में ले गये। वहां एक सुलक्षिणी कन्या को देख मैंने, अपनी जिज्ञासा को रोक ना पा, उसका परिचय जानना चाहा। साधू महाराज एक अनजान को कुछ बताने से झिझक रहे थे पर कुछ देर बाद शायद सुपात्र समझ उन्होंने जो बताया वह आश्चर्य जनक था। उन्हीं के शब्दों में पूरी कथा सुनिये............

एक सुबह मैं नदी मे स्नान करने के पश्चात सूर्यदेव को अर्ध्य दे रहा था, तभी आकाशगामी एक चील के चंगुल से छूट कर एक छोटी सी चुहिया मेरी अंजली मे आ गिरी। वह बुरी तरह से घायल थी। मैं उसे अपने आश्रम में ले आया तथा मरहम-पट्टी कर उसे जंगल मे छोड़ देना चाहा पर शायद ड़र के मारे या किसी और कारणवश वह जाने को राजी ही नहीं हुई। मैने भी उसकी हालत देख उसे अपने पास रहने दिया। समय बीतता गया और कब मैं उसे पुत्रीवत स्नेह करने लग गया इसका पता भी नहीं चला और इसी मोहवश एक दिन अपने तपोबल से उसे मानव रूप दे दिया। कन्या जब बड़ी हुई तो उसके विवाह के लिए मैने एक सर्वगुण सम्पन्न मूषक के बारे मे उसकी राय जाननी चाही तो उसने अपनी पसंद दुनिया की सबसे शक्तिशाली शख्सियत को बताया। बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी तो उसे मैने सूर्यदेव के पास भेज दिया, जो मेरी नजर मे सबसे तेजस्वी देवता थे। चुहिया ने उनके पास जा अपनी इच्छा बतायी। इस पर सूर्यदेव ने उसे कहा कि मुझसे ताकतवर तो मेघ है, जो जब चाहे मुझे ढ़क लेता है तुम उनके पास जाओ। यह सुन मुषिका मेघराज के पास गयी और अपनी कामना उन्हें बताई। मेघराज ने मुस्कुरा कर कहा बालिके तुमने गलत सुना है। मुझ से शक्तिशाली तो पवन है जो अपनी मर्जी से मुझे इधर-उधर डोलवाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया ने पवनदेव को जा पकड़ा। पवनदेव ने उसकी सारी बात सुनी और फिर उदास हो बोले कि वह तो सदियों से पर्वत के आगे नतमस्तक होते आए हैं जो उनकी राह में सदा रोड़े अटकाता रहता है। इतना सुनना था कि चुहिया मुंह बिचका कर वहां से सीधे पहाड़ के पास आई और उनसे अपने विवाह की इच्छा जाहिर की। अब आज के युग मे छोटी-छोटी बातें तेज-तेज चैनलों से पल भर में दुनिया मे फैल जाती हैं तो पर्वतराज को चुहिया की दौड़-धूप की खबर तो पता लगनी ही थी, वह भी तब जब उनके शिखर पर एक विदेशी कंपनी का टावर लगा हुअ था। सैकड़ों वर्षों पहले की तरह उन्होंने फिर उसे वही बताया कि चूहा मेरे से भी ताकतवर है क्योंकि वह अपने मजबूत पंजों से मुझमे भी छिद्र कर देता है। यह कह उन्होंने अपना पीछा छुड़वाया। इतना सुन चुहिया ने वापस मेरे पास आ चूहे से अपने विवाह की स्विकृति दे दी। मैने मूषकराज को खबर भेजी और यहीं इतिहास भी धोखा खा गया। मूषकराज मेरे घर आए और सारी बातें सुन कर कुछ देर चुप रहे फ़िर बोले देवी क्षमा करें। मैं आपसे विवाह नहीं कर सकता। सच कटू होता है। आपकी अस्थिर बुद्धी तथा चंचल मन, इतने महान और सुयोग्य पात्रों की काबलियत और गुण ना पहचान सके। मैं तो एक अदना सा चूहा हूं। मेरे साथ आपका निर्वाह ना हो सकेगा। इतना कह साधू महाराज उदास हो चुप हो गये। कुछ देर बाद मैने पूछा कि वह आज कल क्या कर रही है। तो ठंड़ी सांस ले मुनि बोले कि लेखिका हो गयी है और पानी पी-पी कर पुरुष वर्ग के विरुद्ध आग उगलती रचनाएं लिखती रहती है।

अब आप सब यह बतायें कि मेरी जंगल यात्रा सफल रही कि नहीं।

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

यहाँ होती है, संसार की सर्वोत्तम भांग की खेती.

मलाणा गाँव, जिसे भारत के बाहर ज्यादा जाना जाता है।
मलाणा, हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसा वह गांव जिसके ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं। वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है।भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है, वैसे नाम मात्र को चावल,गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा- क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2009

यहाँ के लोगों ने कभी कचहरी का दरवाजा नहीं देखा

हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।

विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तिक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो 'जरी' नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा तक पहुंचने मे करीब चार घंटे लग जाते हैं।

कुछ सालों पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है,लोगों की आवाजाही बढ़ी है, पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कभी भी कचहरी का मुंह नही देखा है।

मंगलवार, 8 दिसंबर 2009

ये वो हैं जिनके बिना देशों की सुरक्षा दाँव पर लग सकती है.

आज किसी भी देश के लिये उसका गुप्तचर विभाग उसकी सेना का एक आवश्यक अंग बन चुका है। इसके बिना देश की सुरक्षा की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हर देश का अपना गुप्तचर संगठन और प्रणाली है। अमेरिका और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के बारे में तो अक्सर समाचार आते रहते हैं। इसीलिये उनकी गुप्तचर एजेंसियों का नाम सब को पता रहता है पर अन्य दूसरे देशों के बहुत से ऐसे संगठन हैं जो किसी भी मायने में किसी से कम नहीं हैं। इनमें से कुछ की जानकारी निम्नानुसार है।

सी.आई.ए. :- अमेरिका की यह संस्था दुनिया का सबसे बड़ा गुप्तचर संगठन है। इसका जाल सारे संसार में फैला हुआ है। परन्तु इसके कारण बहुत बार अमेरिका को बदनामी भी सहनी पड़ी है।

के.जी.बी. :- इसका पूरा नाम कामिटेट गोसुदस्त्रवेनाई बीजोपास्तनोस्ती है। इसका मुख्य काम रूस में कम्युनिस्ट शासन को मजबूत बनाना, देश की सीमाओं की देख-रेख तथा विदेशों में गुप्तचरी करना है। करीब दो लाख सदस्यों वाली यह संस्था हर तरह से सी.आई.ए. के समकक्ष है।

डी.जी.आई. :- क्यूबा की इस जासूसी संस्था को रूस की के.जी.बी. की कार्बन कापी माना जाता है। इसके अनेक ऊंचे पदों पर रुसी अधिकारी पदासीन हैं। इसका मुख्य काम अमेरिका समेत उसके सहायक देशों की जासूसी करना है।

सिक्योरिटि इंटेलिजेंस सर्विस :- कनाडा सरकार ने इसका गठन 1981 में किया था। यह “नाटो” की सहायता से अपना काम-काज करती है।

मोस्साद :- इजरायल का यह संगठन अपने आप में एक मजबूत एजेंसी है। इजरायल को सदा युद्धों का सामना करना पड़ता रहा है और उसमें इसकी प्रभावी भूमिका रही है।

सावाक :- ईरान की यह गुप्तचर संस्था कफी बदनाम रही है। 1956 में इसकी नींव सी.आई.ए. और मोस्साद ने मिल कर डाली थी। ईरान के शाह रजा पहलवी का इस पर वरद हस्त था। कहते हैं इसीके जुल्मों के कारण ईरान में क्रान्ति हुई थी।

एम15 और एम16 :- इन दो संगठनों का अस्तित्व ब्रिटेन में 1909 में आया। जहां अमेरिका के साथ मिल कर इन्होंने कफी नाम कमाया वहीं कयी असफलताओं ने इन्हें हंसी का पात्र भी बनाया है।

ए.एस.आई.ओ. :- आस्ट्रेलियन सिक्यूरिटी एंड इंटेलिजेंस आर्गनाइजेशन की नींव शीत युद्ध के दौरान आंतरिक सुरक्षा संगठन के रूप में डाली गयी थी। बाद में इसके दो भाग कर दिये गये। एक को देश में विदेशी जासूसों पर शिकंजा कसने का काम तथा दूसरे को देश में आंतरिक सुरक्षा बनाये रखने की जिम्मेदारी सौंप दी गयी।

रा :- हमारे इस संगठन को कफी सूझ-बूझ से चलाया जाता रहा। पर एक दिन इसको भी राजनैतिक कारणों से सबके सामने आना पड़ा। इसकी भी अपनी बहुत सी उपलब्धियां हैं।

पढने, सुनने देखने में (फिल्मों इत्यादि में) जासूस और उनके कारनामे चाहे कितने भी आकर्षक लगें पर सच्चाई यही है कि यह एक अलग तरह का संसार है। जिसकी अंधेरी सुरंगों से वापस लौटना बहुत मुश्किल होता है। दुनिया की नज़रों से दूर बिना किसी पहचान के, गुप्त जगहों में, गुप्त रह कर, गुप्त योजनाओं को कार्यान्वित करने वाले यह गुप्तचर हर समय कितने तनाव और आशंका में जीते हैं इसका अंदाजा भी आम आदमी नहीं लगा सकता। ऊपर से विड़ंबना यह है कि चाहे कितने भी बड़े काम को ये अंजाम दें, ना तो इनके नाम का किसी को पता चलता है और नही उसका कोई सार्वजनिक पारितोषिक इन्हें मिलता है।

सोमवार, 7 दिसंबर 2009

नारद मुनि संभवत: गुप्तचरों के सरताज हैं.

सृष्टि के साथ-साथ ही असुरक्षा की भावना भी अस्तित्व में आ गयी होगी। इसीलिये अपने को सुरक्षित रखने के लिये दूसरों के भेद जानने की प्रवृति भी अपने पैर जमाने लग गयी होगी और इसी से इजाद हुई होगी गुप्तचरी की कला।
देखा जाय तो देवताओं की भलाई के लिये सदा तत्पर रहने वाले नारद जी को सबसे पहला गुप्तचर माना जा सकता है। जिन्होंने एक तरह से खुद बदनामी मोल लेकर भी सुरों का भला करना नहीं छोड़ा।

रामायण-महाभारत में भी गुप्तचरों की वृहद जानकारी मिलती है। रावण की कूटनीति में गुप्तचरी को खासा स्थान प्राप्त था। रामायण में उसके विभिन्न गुप्तचरों के नामों का जगह-जगह उल्लेख मिलता है। शुक, सारण, प्रभाष, सरभ तथा शार्दुल उसके प्रमुख गुप्तचर थे। शुक और सारण को ही युद्ध के समय वानर भेष में रामसेना का भेद लेते पकड़ा गया था। उधर विभीषण के लंका के बाहर रहने के बावजूद उनके गुप्तचर लंका में सक्रिय थे जो समय-समय पर उन्हें रावण की गतिविधियों की जानकारी देते रहते थे। श्री राम के लंका विजय के बाद अयोध्या आने पर उनके गुप्तचर भद्रमुख ने ही उन्हें धोबी के कथन की जानकारी दी थी।

महाभारत में तो पग-पग पर गुप्तचारी के कारनामों का उल्लेख मिलता है। धृतराष्ट्र के प्रमुख गुप्तचर का नाम कणिक था। जिससे उसे सारे राज्य की खबरें मिला करती थीं। पांड़वों के अज्ञातवास के दौरान सैंकड़ों गुप्तचर उनका पता लगाने के लिये दुर्योधन ने छोड़ रखे थे। यह गुप्तचरों का ही काम था जो पांडव लाक्षागृह से सकुशल निकल पाये थे। कौरवों को गुप्तचरों द्वारा ही जयद्रथ वध की अर्जुन की प्रतिज्ञा का पता चला था।
महाभारत में शत्रू की सूचना प्राप्त करने के अनेकों उपाय बताये गये हैं। इस काम के लिये साधू, भिक्षुक, नटों, नर्तकियों और अंधे लोगों को उपयुक्त बताया गया है। पर साथ ही साथ संकट काल में इन्हें देश से निर्वासित करने की भी सलाह दी गयी है।
गुप्तचरों के काम की कोई सीमा नहीं होती। जहां संकट के समय इन्हें हर छोटी-बड़ी सूचना अपने अधिकारी को देनी होती है वहीं शांतिकाल में भी राज्य की आंतरिक व्यवस्था बनाये रखने की जिम्मेदारी भी इनकी होती है।

चाणक्य ने तो इस विधा को नयी ऊंचाईयों तक पहुंचा दिया था। जिसके फलस्वरूप ही चंद्रगुप्त नि:शंक हो अपना राज कर सके।

आज हालत यह है की इंसान तो इंसान जानवर तथा मशीनो का भी उपयोग जासूसी में होने लग गया है। जिसमें शत्रू मित्र का भेद भी ख़त्म हो चुका है। देशों की बात तो दूर अब तो व्यक्तिगत जासूसी आम हो गयी है। यहाँ तक की शादी के पहले भावी वर तथा वधू के आचरण को जानने के लिए लोग गुप्तचरों की सेवा बेहिचक लेने लगे हैं।

शनिवार, 5 दिसंबर 2009

ताजमहल को बचाने, संवारने में इनका भी योगदान रहा है.

ताजमहल के संरक्षण में कईयों का योगदान रहा है अब तक...........
ये तो सभी जानते हैं कि भारत की पहचान बन चुका आगरे का ताजमहल किसने बनवाया, क्यूं बनवाया, कैसे बनवाया, इत्यादि,इत्यादि। परन्तु इसके बनने के बाद इसकी साज-संभाल, देख-रेख कितनों ने की यह शायद सबको मालुम ना हो। इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि इसके बनने के कुछ ही सालों के बाद 1655 में ही इसमें कुछ दरारें उभर आयीं थीं। इसकी जानकारी उसी समय बादशाह औरंगजेब को दी गयी। वह इस तरह के खर्चों से दूर रहता था, झुंझलाने के बावजूद उसने ताज की मरम्मत करवाई।
इसके बाद 1812 में कैप्टन जोसेफ अलेक्जेंडर जो आगरा के एग्जेक्यूटिव इंजीनियर थे, ने इसका रख-रखाव करवाया। फिर दोबारा 1873-74 में ताज की नींव में गड़बड़ी पायी गयी और फिर बड़े पैमाने पर इसकी मरम्मत का काम करना पड़ा था।
फिर आता है 1984 का साल जब श्री महेश चंद्र मेहता ने इसको आस-पास के प्रदूषण से बचाने के लिये मुहिम छेड़ी। जिसके ही कारण 1996 में अदालत ने 292 कारखानों को वहां से हटाने का आदेश पारित कर ताज की उम्र में बढोतरी की। इसी जागरूकता के कारण श्री मेहता को 1997 में मेगसासे एवार्ड से नवाजा गया।
नौ अप्रैल 98 को युनेस्को और पुरातत्व विभाग ने मिल कर ताज के रख-रखाव के लिये एक प्रोजेक्ट तैयार किया।
13-05-1998 सरकार ने एक प्रस्ताव पास कर इसक चारों ओर किसी भी प्रकार के निर्माण पर पाबंदी लगा दी।
सन 2000 में ताज के 500 मीटर के दायरे में किसी भी तरह के वाहन की पार्किंग या आवाजाही पर रोक लगा दी गयी।
22 जून 2002, ताज ग्रुप आफ होटल और पुरातत्व विभाग के द्वारा एक "नेशनल कल्चर फंड़" बनाया गया। जो इसकी देख-रेख और सुविधायें बढाने पर अपना ध्यान देता है।
दिसम्बर 2002 मायावती की सरकार का इसके चारों ओर ताज कारीडोर बनाने के घातक मंसूबे का पर्दाफाश हुआ। पर ऐसा होने के पहले करीब चालीस लाख क्यू. मीटर मिट्टी को जमुना में डाला जा चुका था। पर फिर भी ताज की रक्षा हो ही गयी।
ताजमहल भारत की ही नहीं विश्व की धरोहर बन चुका है। इसके संरक्षण और सुरक्षा की जिम्मेदारी को तो निभाना ही है। साथ-साथ इसका भी ध्यान रखना जरूरी है कि कुदरती प्रदूषण के साथ-साथ घिनौनी नियत वालों की काली नजरों से भी इसका बचाव होता रहे।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

लो, कर लो बात !! दुर्योधन का भी मन्दिर है भाई

हमारे देश में सबसे बड़ा खलनायक माने जाने वाले रावण के समर्थकों का एक अच्छा खासा वर्ग है। वाल्मिकि जी के अनुसार उसमें बहुत सारे गुणों का होना ही उसे कहीं-कहीं पूज्य बनाता है। पर दुर्योधन को तो सदा बुराईयों का पुतला ही माना गया है। पर आश्चर्य की बात है कि उसकी भी पूजा होती है और वह भी भगवान के रूप में।
महाराष्ट्र का अहमदनगर जिला। इसी जिले के एक छोटे से गांव, "दुरगांव", में दुर्योधन का मंदिर स्थित है। ऐसा माना जाता है कि संपूर्ण भारत में यह इकलौता दुर्योधन का मंदिर है। जिसके प्रति यहां के लोगों में अटूट श्रद्धा है। उनका विश्वास है कि भगवान दुर्योधन उनकी विपत्ति में रक्षा तो करते ही हैं, उनकी मन्नतों को भी पूरा करते हैं।
एक चबूतरे पर बने इस मंदिर का निर्माण तेरहवीं शताब्दी का माना जाता है। इस ऊंचे शिखर वाले मंदिर में दो तल हैं। ऊपर वाले भाग में दुर्योधन की बैठी अवस्था वाली करीब दो फुट की मूर्ती है। नीचे गर्भ गृह में भगवान शिव के दो लिंग विद्यमान हैं। अपनी तरह के इस अनोखे मंदिर की अपनी अनोखी परंपरा भी है। यह मंदिर बरसात के चार महिनों में पूरी तरह बंद (सील बंद) कर दिया जाता है। जिसके पीछे यह धारणा है कि यदि दुर्योधन की दृष्टि बादलों पर पड़ जाएगी तो यहां पानी नहीं बरसेगा। क्योंकि महाभारत में अपनी पराजय के बाद जब दुर्योधन ने एक तालाब में छुपने की कोशिश की थी तो उसके जल ने श्री कृष्ण के ड़र से उसे आश्रय नहीं दिया था। दुर्योधन की वह नराजगी अभी भी बरकरार है। दुर्योधन की नजरें मेघों पर ना पड़ें इसलिये मंदिर को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इस मंदिर के इसी क्षेत्र में बनने की भी एक कथा प्रचलित है। बलराम जी अपनी बहन सुभद्रा का विवाह दुर्योधन से करना चाहते थे पर श्री कृष्ण ने उसका विवाह अर्जुन से करवा दिया था। इसलिये पांडवों से बदला लेने के लिये दुर्योधन ने भगवान शिव की तपस्या कर उनसे वरदान प्राप्त किया था कि युद्ध में वह कभी भी अर्जुन से परास्त नहीं होगा ना ही अर्जुन उसका वध कर पायेगा। उसने वह तप इसी जगह किया था इसीलिये इस मंदिर का निर्माण यहां किया गया है।
यहां हर सात साल के बाद एक विशाल मेला लगता है, जिसमें आने वाले लोगों को लंगर के रूप में भोजन उपलब्ध करवाया जाता है।

बुधवार, 2 दिसंबर 2009

गरीब देश की गरीब पार्टी का गरीब नेता, होटल का बिल करोंड़ों का !!!!!

चिकने घड़े पर पानी ठहर भी जाये, किसी ढीठ को उसकी करतूतों का आईना दिखाने पर शर्म आ भी जाये, कुत्ते की पूंछ सीधी हो भी जाय पर हमारे देश में पायी जाने वाली एक खास प्रजाती की फितरत नहीं बदल सकती, चाहे साक्षात भगवान भी आ कर जोर लगा लें। इनके कारनामों पर टनों कागज़ काला हो चुका है पर मजाल है किसी के कान पर जूं भी रेंगी हो। अब तो इनके बारे में लिखना या कुछ बताना भी मुर्खता लगती है। फिर भी कभी-कभी कुछ ऐसी खबरें आती हैं कि लगता है कि उसे ज्यादा से ज्यादा लोग जाने और शायद धौंकनी की फूंक से लोहा भस्म हो ही जाये।
आज एक ऐसे जनता के सेवक की खबर है जो गरीबों की समझी जाने वाली पार्टी का सदस्य बन भारत के भाग्यविधाताओं की जमात में जा बैठा है। यह पार्टी अपने आप को सर्वहारा लोगों की तथा जमीन से जुड़े होने का दम भरती है। अभी कुछ दिनों पहले जब सरकार ने खर्च कम करने की बात की थी तो इस पार्टी की अगुआ ने व्यंग से कहा था कि हमें तो कहने की जरूरत नहीं है, हम तो सदा सादगी में विश्वास रखते हैं। उन के रहन-सहन से लगता भी है कि वह जैसा कहती हैं ,करती भी होंगी। पर कल ही उनके एक साथी को, जो केन्द्र में मंत्री भी बन गये हैं, एक नोटिस जारी किया गया है, पांच सितारा होटल का कमरा खाली करने के लिये, जहां वह पिछले छह माह से कुंड़ली मारे बैठे हैं। ये महाशय पहली बार सांसद बने हैं। इन्हें बंगला भी अलाट हो चुका है पर उसकी सजावट का काम पूरा नहीं हो पाने के कारण ये वहां रह नहीं पा रहे थे।
राजधानी में हर राज्य का अपना आलीशान ‘गेस्ट हाऊस’ होता है। जो किसी भी अच्छे होटल से किसी भी नजर से कम नहीं होता। वहां भी तो रहा जा सकता था। वहां रहने से इनकी इज्जत कम तो नहीं हो जाती उल्टे अपने राज्य में हो सकता है लोगों का विश्वास और बढ जाता। पर माले मुफ्त दिले बेरहम।
अब इन महाशय का होटल का बिल है “सिर्फ 36 करोड़” रुपये का। जिसे चुकाने का आदेश इनकी मुखिया ने इन्हें दिया है। इनका कहना है कि मुझे तो अभी तक कोई बिल मिला ही नहीं है। अब सोचने की बात है कि इतना छोटा-मोटा बिल क्या ये अपनी जेब से चुकायेंगे। और यदि चुकाते हैं तो वह पैसा कहां से आयेगा? क्या इन्होंने अपनी सम्पति का खुलासा किया है?
दूसरी बात अगला छह माह तक ऐश करता रहा तब इनकी मुखिया की नज़र इन पर क्यों नहीं पड़ी?
अब नाम में क्या रखा है।वैसे जिसने यह बात कही है वह भी इस उक्ति के बाद अपना नाम लिखने का लोभ छोड़ ना सका था। :)

मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

क्या सचमुच जरुरी है आयोडीनयुक्त नमक ?

ज़रा सोचिये कहीं आप उस आयोडीन की कीमत तो नहीं चुका रहे जो गर्म होते ही वाष्प में बदल जाता है..........
वर्षों से साधारण नमक खाते-खिलाते अचानक हमारी सरकार को एक दिन विदेशी विशेषज्ञों के चेताने से यह ख्याल आया कि अरे! हमारे देश के नागरिक आयोडीन का अंश तो लेते ही नहीं । हड़कंप मच गया रातोंरात हर आम आदमी तक पहुंचने वाले माध्यम से उसे अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने का काम शुरू कर दिया गया। डरा-डरा कर समझाया गया कि “अब” यदि आयोडीन नामक रोग बचाऊ दवा नहीं लोगे तो ऐसे रोग का शिकार हो जाओगे जिसका इलाज बहुत मुश्किल है। डरना हमारी फितरत है, कोई भी आ कर डरा जाता है, हम डर गये और शुरु हो गया करोंड़ों अरबों का खेल।
इसके लिये नमक को चुना गया जिसे हर आमोखास इंसान अपने काम में लाता ही है। और दौड़ पड़ीं अरबों खरबों का "टर्न ओवर" करने वाली कंपनियां, इस रुपये में दो किलो बिकने वाले नमक को "हेल्थ प्रोडक्ट" बनाने के लिये। विदेशी भी इसी ताक में थे वे भी आ जुटे अपना ताम-झाम लेकर उस गरीब की “सहायता” करने जो नमक के साथ ही सूखी रोटी खा भगवान को दुआ देने लग जाता था।
वर्षों से अपनी सेहत से लापरवह हमें सेहतमंद बनाने की सुध भी उन्हीं अंग्रंजों को ही आयी जिन्होंने सालों हम पर राज कर हमारी “तकलीफों" को करीब से जाना। इतिहासकार “पट्टाभि सीतारमैया जी” के अनुसार, अंग्रेजों के जहाज यहां से माल भर इंग्लैंड जाते थे तो लौटते समय जहाजों का भार बनाए रखने के लिये उनमें रेत भर-भर कर लाई जाती थी। फिर बाद में रेत की जगह नमक लाना शुरु हो गया। अब जब उसके ढेरों के ढेर जमा होने लगे तो उन्होंने यहां के नमक पर पाबंदी लगानी शुरु कर दी। पर इसके विरोध में जन-जन उठ खड़ा हुआ। नमक सत्याग्रह कर दिया गया। अंग्रजों को झुकना पड़ा। पर वह इस सोना उगलने वाली खान को भूल नहीं पाये।
प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला नमक किसी भी तरह सेहत के लिये ठीक नहीं है ऐसा कोई दावा नहीं होने के बावजूद अंततोगत्वा रास्ता निकाल ही लिया गया नमक को आमदनी का जरिया बनाने का। क्योंकि यही एक ऐसा खाद्य पदार्थ था जिसे हर घर की रसोई में स्थान प्राप्त था। हर छोटे-बड़े, अमीर-गरीब की जरूरत था। किसी भी दूसरी चीज के मुकाबले इसकी खपत कहीं ज्यादा थी। सो नमक में आयोडीन मिला लोगों की सेहत की हिफाजत की तथाकथित मुहिम शुरु कर दी गयी। जबकि वैज्ञानिकों के अनुसार आयोडीन गर्मी पाते ही वाष्प में बदल जाता है। भारत में जहां खाना बनाने की विधी में ज्यादातर तलने, भूनने, सेंकने तथा फिर भोजन में तरह-तरह के मसालों का उपयोग होता हो वहां बेचारा आयोडीन कब तक अपना अस्तित्व बचा कर रख सकता है। अब सोचिये आप उस आयोडीन की कीमत अदा करते हैं जो गर्म होते ही भोजन का साथ छोड़ देता है।
दूसरी बात शोधकर्ता बताते हैं कि हमारे द्वारा उपयोग में लाई जाने वाले फल, सब्जियों और आमिष खाद्यों में भी पर्याप्त मात्रा में आयोडीन होता है। और फिर एक स्वस्थ इंसान को कितना आयोडीन चाहिये, सिर्फ 100-125 माइक्रोग्राम। इसके अलावा बार-बार दुनिया भर से ये जानकारियां सामने आती रही हैं कि आजकल रक्त चाप जैसे रोगों की बढोतरी में इसी आयोडीन मिश्रित नमक का हाथ है। जिसके कारण बहुतेरे देशों में इसकी जरुरत को खारिज भी कर दिया गया है।
जनता के स्वास्थ्य को लेकर कुछ ज्यादा ही चिंतित हमारे भाग्यविधाता यह भी भूल गये कि उनके इन सब तमाशों से साधारण नमक की दसियों गुना बढी कीमतों का उन हजारों-लाखों गरीब परिवारों पर क्या असर पड़ेगा जो आज भी नमक और प्याज (उसे भी कहां रहने दिया गया है किसी की हद में) के साथ दो रोटी खा कर अपनी जिंदगी काट रहें हैं। पर उस गरीब की पहले कब फिक्र की गयी थी जो अब की जाती।
अभी बहुत दिन नहीं हुए हैं जब इसी तरह का खेल सरसों के तेल को ले कर शुरु करने की कोशिश की गयी थी, सिर्फ इसलिये कि "उनके" यहां के सड़ते हुए तेल को यहां खपाया जा सके।
पता नहीं कब चंद लोग अपनी बदनीयति से बाज आ देश की नीयति के बारे में सोचेंगे।