आज अखबार में पुरस्कार मिलने की बात आने पर लोगों को #सोनम_वांगचुक और उनके कार्यों को जानने की उत्सुकता होगी बहुत से लोग पहली बार उनको जानेंगें; पर उनसे प्रभावित हो 2009 में एक फिल्म "थ्री इडियट्स" भी बनी थी। जिसमें आमिर खान ने इनके जीवन से प्रभावित हो 'फुनशुक वांगड़ू' का किरदार निभाते हुए मुख्य भूमिका की थी। पर फिर भी देश के अधिकाँश लोग उनसे, उनके कार्यों से तथा शिक्षा के प्रति उनके समर्पण से अनभिज्ञ ही रहे। क्योंकि ऐसे लोग अपने काम में डूबे रहने के कारण प्रचार से कुछ दूर ही रहते हैं। पर क्या ऐसे लोगों के नाम का विचार अपने देश के अलंकरणों को दिए जाते समय नहीं किया जाना चाहिए ?
#हिन्दी_ब्लागिंग
सैकड़ों नकारात्मक खबरों के बीच आज एक बहुत अच्छी खबर पढ़ने को मिली कि अपने देश के "भारत वटवानी" तथा "सोनम वांगचुक" को इस वर्ष के रैमन मैगसेसे पुरस्कार, से सम्मानित किया जाएगा।
डॉक्टर वटवानी 1989 से मानसिक रूप से कमजोर, बेसहारा लोगों का इलाज, उनके रहने के प्रबंध के साथ-साथ ऐसे लोगों को अपने परिवार के पास पहुँचाने का प्रयत्न करते आ रहे हैं। वहीं सोनम वांगचुक एक लद्दाखी अभियंता, अविष्कारक और शिक्षा सुधारवादी हैं। जो गुमनाम सा रहते हुए वर्षों से लगातार अपने वैकल्पिक तरीके से बच्चों को सशक्त व वास्तविक जीवन कौशल की शिक्षा से शिक्षित करने की मुहीम चलाए हुए हैं। आज सोनम जी को समर्पित यह पोस्ट !
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितम्बर 1966 को लद्दाख के आल्ची कस्बे के पास एक गांव Uley-Tokpo में हुआ था। उस वक्त इस गांव में सिर्फ 5 परिवार रहा करते थे। उन्होंने अपने जीवन के शुरूआती 9 वर्ष वहीं बिताए और घर पर ही वर्णमाला का ज्ञान अपनी माताजी से सीखा क्योंकि वहाँ गांव में कोई स्कूल नहीं था। उम्र के नौंवें
साल में उन्हें श्रीनगर के स्कूल में भर्ती कराया गया। परन्तु वहाँ भाषा के कारण उन्हें ढेर सारी दिक्कतों का सामना करना पडता था। वर्ष 1988 में मेकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद, सोनम ने कुछ स्थानीय निवासियों और अपने परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर एक संस्था शुरू की। इस संस्था का नाम स्टूडेंट एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख था, जिसे SECMOL भी कहा जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह शिक्षा व्यवस्था में बदलाव लाने की चाहत थी। जिसके तहत स्थानीय स्कूलों की शिक्षा को स्थानीय भाषा में देने का प्रबंध किया गया। क्योकि सोनम का मानना था की बच्चों को सवालों के जवाब पता तो होते हैं, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा परेशानी भाषा की वजह से होती है। उनके इस प्रयास का उसका असर यह हुआ, कि 10वीं की परीक्षा में पास होने वाले छात्रों की संख्या 5 फीसदी से बढ़कर 75 फीसदी हो गई, जिसका असर साक्षारता दर पर भी पड़ा आज लद्दाख में साक्षरता दर यदि 77.20 प्रतिशत है तो उसका श्रेय जाता है सोनम वांगचुक को ! इसी दौरान उन्होंने एकमात्र लद्दाखी पत्रिका Ladags Melong भी निकली। कई सरकारी गैर सरकारी काम करते हुए वे समाज सेवा करते रहे। 2005 में प्राथमिक शिक्षा के नेशनल गवर्निग कौंसिल के सदस्य, 2007-10 में एक डेनिश एन जी ओ के एजुकेशन सलाहकार भी बने।
वांगचुक का अर्थ बलशाली और ऐश्वर्यवान होता है जो तिब्बती भाषा में शिव जी का एक नाम है। उनके पिता एक नेता थे, जो बाद में राज्य सरकार में मंत्री भी बने। अगर 'सोनम वांगचुक' चाहते, तो राजनीति का रास्ता
चुनकर, सुख और चैन की ज़िन्दगी व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उन्होंने समाज की मदद करने की ठानी। उन्हें सरकारी स्कूल व्यवस्था में सुधार लाने के लिए सरकार, ग्रामीण समुदायों और नागरिक समाज के सहयोग से 1994 में ऑपरेशन न्यू होप शुरु करने का श्रेय भी प्राप्त है। उनके द्वारा डिजाइन किया गया SECMOL भवन पूरी तरह से सौर-ऊर्जा पर चलता है, और खाना पकाने, प्रकाश या तापन (हीटिंग) के लिए किसी भी प्रकार के ईंधन का उपयोग नहीं किया जाता।
प्राकृतिक तौर पर लद्दाख भले ही स्वर्ग जैसा हो पर वहाँ के इलाके में पानी की भारी कमी रहती है। इस क्षेत्र में जल संकट से निपटने तथा उसे सदा के लिए दूर करने के समाधान को खोजने में सालों से जुटे सोनम इसके लिए कुछ अलग तरीके का समाधान निकालने में लगे हुए हैं। अभी हाल ही में उन्होंने एक तकनीक, "बर्फ-स्तूप" का आविष्कार किया है। जो कृत्रिम हिमनदों (ग्लेशियरों) का निर्माण करता है, शंकु आकार के इन बर्फ के ढेरों को सर्दियों के पानी को संचय करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पर यह इतना आसान नहीं है हड्डियों को जमा देने वाली ठण्ड में आधी रात के समय काम करना आम इंसान के बस का रोग नहीं है। पर सोनम और उनकी टीम 11000 फ़ुट (3500 मीटर) की ऊंचाई पर दुनिया की सबसे ठंडी जगहों में मध्य-रात्रि के समय जब यहां का तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है तब उन्होंने और उनके 10 कार्यकर्ताओं ने अपने विचार को अमली जमा पहनाया। बर्फ के स्तूप बनाने की तकनीक आसान है। शुरू में पाइप को ज़मीन के नीचे डालते हैं ताकि बर्फीले पानी को ज़मीन के निचले स्तर तक ले आया जा सके। पाइप के आख़िरी हिस्से को लंबवत रखा जाता है। ऊंचाई और गुरुत्वाकर्षण की शक्ति में अंतर के कारण पाइप में दबाव पैदा होता है। बहता हुआ पानी ऊपर की ओर जाता है और किसी फ़व्वारे की तरह से इसमें से पानी निकलता है। शून्य से
नीचे तापमान होने की वजह से पानी जम जाता है और धीरे-धीरे यह एक पिरामिड की तरह बन जाता है। उन्हें उम्मीद है कि ये ग्लेशियर साल की शुरुआत में पिघल जाएंगे और खेतों और गांवों में पानी की ज़रूरत को पूरा करेंगे। उनका मानना है कि पहाड़ों की तकलीफों का समाधान पहाड़ के लोगों को ख़ुद ढूंढना होगा। खुद के लिए अपने द्वारा किए गए काम से स्थानीय लोगों में इसे लेकर एक अपनेपन का भाव भी पैदा होता है जो उन्हें और कुछ भी करने के लिए उत्साहित करता है।
आज अखबार में पुरस्कार मिलने की बात आने पर लोगों को सोनम वांगचुक और उनके कार्यों को जानने की उत्सुकता होगी बहुत से लोग पहली बार उनको जानेंगें; पर उनसे प्रभावित हो 2009 में एक फिल्म "थ्री इडियट्स" भी बनी थी। जिसमें आमिर खान ने इनके जीवन से प्रभावित हो 'फुनशुक वांगड़ू' का किरदार निभाते हुए मुख्य भूमिका की थी। पर फिर भी देश के अधिकाँश लोग उनसे, उनके कार्यों से तथा शिक्षा के प्रति उनके समर्पण से अनभिज्ञ ही रहे। क्योंकि ऐसे लोग अपने काम में डूबे रहने के कारण प्रचार से कुछ दूर ही रहते हैं। पर क्या ऐसे लोगों के नाम का विचार अपने देश के अलंकरणों को दिए जाते समय नहीं किया जाना चाहिए ?
#हिन्दी_ब्लागिंग
सैकड़ों नकारात्मक खबरों के बीच आज एक बहुत अच्छी खबर पढ़ने को मिली कि अपने देश के "भारत वटवानी" तथा "सोनम वांगचुक" को इस वर्ष के रैमन मैगसेसे पुरस्कार, से सम्मानित किया जाएगा।
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| रैमन मैगसेसे अवार्ड |
सोनम वांगचुक का जन्म 1 सितम्बर 1966 को लद्दाख के आल्ची कस्बे के पास एक गांव Uley-Tokpo में हुआ था। उस वक्त इस गांव में सिर्फ 5 परिवार रहा करते थे। उन्होंने अपने जीवन के शुरूआती 9 वर्ष वहीं बिताए और घर पर ही वर्णमाला का ज्ञान अपनी माताजी से सीखा क्योंकि वहाँ गांव में कोई स्कूल नहीं था। उम्र के नौंवें
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| सोनम वांगचुक |
वांगचुक का अर्थ बलशाली और ऐश्वर्यवान होता है जो तिब्बती भाषा में शिव जी का एक नाम है। उनके पिता एक नेता थे, जो बाद में राज्य सरकार में मंत्री भी बने। अगर 'सोनम वांगचुक' चाहते, तो राजनीति का रास्ता
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| SECMOL भवन |
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| बर्फ स्तूप |
प्राकृतिक तौर पर लद्दाख भले ही स्वर्ग जैसा हो पर वहाँ के इलाके में पानी की भारी कमी रहती है। इस क्षेत्र में जल संकट से निपटने तथा उसे सदा के लिए दूर करने के समाधान को खोजने में सालों से जुटे सोनम इसके लिए कुछ अलग तरीके का समाधान निकालने में लगे हुए हैं। अभी हाल ही में उन्होंने एक तकनीक, "बर्फ-स्तूप" का आविष्कार किया है। जो कृत्रिम हिमनदों (ग्लेशियरों) का निर्माण करता है, शंकु आकार के इन बर्फ के ढेरों को सर्दियों के पानी को संचय करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। पर यह इतना आसान नहीं है हड्डियों को जमा देने वाली ठण्ड में आधी रात के समय काम करना आम इंसान के बस का रोग नहीं है। पर सोनम और उनकी टीम 11000 फ़ुट (3500 मीटर) की ऊंचाई पर दुनिया की सबसे ठंडी जगहों में मध्य-रात्रि के समय जब यहां का तापमान -30 डिग्री सेल्सियस तक नीचे गिर जाता है तब उन्होंने और उनके 10 कार्यकर्ताओं ने अपने विचार को अमली जमा पहनाया। बर्फ के स्तूप बनाने की तकनीक आसान है। शुरू में पाइप को ज़मीन के नीचे डालते हैं ताकि बर्फीले पानी को ज़मीन के निचले स्तर तक ले आया जा सके। पाइप के आख़िरी हिस्से को लंबवत रखा जाता है। ऊंचाई और गुरुत्वाकर्षण की शक्ति में अंतर के कारण पाइप में दबाव पैदा होता है। बहता हुआ पानी ऊपर की ओर जाता है और किसी फ़व्वारे की तरह से इसमें से पानी निकलता है। शून्य से
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| बर्फ स्तूप |
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| लद्दाख |















