देखने में "लिक्विड सोप" अच्छा, साफ़-सुथरा, रख-रखाव की सुविधा और आधुनिकता का प्रतीक भले ही हो पर पुराना साबुन का "बार या बट्टी" उससे बेहतर है। खपत को ही लें, साबुन की बट्टी से हाथ धोते हुए मात्र 0.35 ग्राम साबुन की जरुरत पड़ती है, वहीँ लिक्विड सोप की खपत एक बार में दो से तीन ग्राम की होती है, जो आम साबुन से करीब दस गुना ज्यादा है ! पर बाजार तो यही चाहता है कि खपत ज्यादा हो और उसके उत्पाद की बिक्री बढे.......... !
#हिन्दी_ब्लागिंग
हम कैसे विज्ञापनों से भ्रमित हो जाते हैं इसका अभी एक और चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है। पिछले कुछ वर्षों से विज्ञापन के हर संभव माध्यम से यह प्रचारित होता आ रहा है कि साबुन की "बट्टी या बार" सफाई के लिए उचित नहीं है ! टीवी पर बच्चों के द्वारा साबुन से हाथ धोते हुए "अंकलों" को बेवकूफ साबित करते,
आधुनिक माँओं द्वारा अपने पति और बच्चों को लिक्विड सोप का महत्व बताते, सफ़ेद कोट वाले भाई साहब द्वारा सफाई की अहमियत जताते, स्कुल के बच्चों का आपस में बार साबुन को स्लो ठहराते, ढेरों विज्ञापन हमारे ऊपर दागे जा रहे हैं। अपने-अपने ब्रांड के तरल साबुन के घोल की प्रशंसा कर उसे साफ़ व सुरक्षित बताया जा रहा है। साबुन की बेचारी बट्टी को तो कीटाणुओं की पनाहगार तक बना दिया गया है। गोयाकि कीड़े मारने की दवा में ही कीड़े पड़ जाने की बात ! इस बम-वर्षा से प्रभावित हो बहुसंख्यक परिवारों ने विभिन्न कंपनियों के "लिक्विड सोप" खरीदना शुरू कर दिया, उसमें भी उन ब्रांडों की बिक्री का प्रतिशत ज्यादा रहा जो पहले से ही कीट-रोधी सोल्यूशन बनाते रहे हैं। या यूँ भी कह सकते है कि ऐसी ही कंपनियों ने शुरुआत कर सफाई बाजार पर कब्जा कर लिया है।
अब यह बात सामने आ रही है कि देखने में "लिक्विड सोप" अच्छा, साफ़-सुथरा , रख-रखाव की सुविधा और आधुनिकता का प्रतीक भले ही है पर पुराना साबुन का "बार या बट्टी" उससे बेहतर है। खपत को ही लें, साबुन की बट्टी से हाथ धोते हुए मात्र 0.35 ग्राम साबुन लगता है वहीँ लिक्विड की खपत दो से तीन ग्राम की होती है, जो आम साबुन से करीब दस गुना ज्यादा है ! पर बाजार तो यही चाहता है कि खपत ज्यादा हो और उसके उत्पाद की बिक्री बढे ! दूसरे, यह बात भी शोधों से साबित हो चुकी है कि बार-बार खुले साबुन के 'बार' को उपयोग में लाने पर उस पर कीटाणु जमा हो जाने वाली बात, पूरी तरह निराधार है और सिर्फ बोतल बंद तरल साबुन की बिक्री बढ़ाने के लिए फैलाई गयी है। वह हर तरह, हर लिहाज से सुरक्षित ही होता है। तीसरी अहम बात, साबुन की बट्टी अभी भी जिस कागज में लिपटी आती है वह वातावरण को नुक्सान नहीं पहुंचाता और तुरंत ही नष्ट हो जाता है पर लिक्विड सोप की लाखों-करोड़ों प्लास्टिक की बोतलें पर्यावरण का क्या हाल करती हैं उसका सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है। इस तरह देखें तो आधुनिक लिक्विड सोप अस्पतालों या भीड़-भाड़ वाली जगहों के लिए भले ही उपयुक्त हों पर पुराने चलन के साबुन हमारी जेब और प्रकृति के ज्यादा अनुकूल हैं। तो अगली बार आप विज्ञापनों को दर-किनार कर क्या अपनी जेब और प्रकृति का ख्याल रखेंगे ?

















