pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

अनजाने में जूते हमारी बिमारी का कारण तो नहीं बन रहे....!

बहुत से लोगों को कहते सुना है कि पता नहीं क्यों हजार उपायों के बावजूद हमारे घर में कोई ना कोई किसी ना किसी व्याधि से पीड़ित ही रहता है। ऐसे लोगों का ध्यान अपनी इस आदत की ओर नहीं जाता कि  जिन जूतों इत्यादि को पहन कर वे दिन भर बाहर घूमते हैं उनमें सड़क की तरह-तरह की गंदगी, कीटाणु, विषैले पदार्थ चिपक जाते हैं जो घर के बाहर जूते ना उतारने से घर के अंदर तक पहुँच वहाँ के वातावरण में घुल-मिल कर उनका कितना नुक्सान करते हैं........

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कुछ दिनों पहले मेरे एक बचपन के मित्र, जिनका व्यवसाय विदेशों तक में फैला हुआ है, घर आए। पर कमरे में प्रवेश करने के पहले, मेरे बहुत मना करने के बावजूद, उन्होंने अपने जूते द्वार उतार दिए। यह बचपन की ही सीख का नतीजा था कि घर चाहे किसी का भी हो उसे साफ़-सुथरा रखना चाहिए। ऐसे घर में ही बरकत रहती है। यह बात वे कभी भी नहीं भूलते, आदत बना लिया है इस को और इसका फल उनकी जीवन शैली को देख कर समझा जा सकता है।

भले ही आज की कीमती जूते-चप्पल पहनने वाली पीढ़ी इस बात को ना माने या समझे, पर यह साइंटिफिक फैक्ट है कि जूते-चप्पल से संबंधित कुछ बातों का ध्यान न रखने पर बहुत सारी अनचाही समस्याओं से रूबरू
होना पड़ता है। यदि वास्तु या ज्योतिष को किनारे कर दिया जाए तो भी यह तो सामान्य ज्ञान की बात है कि जिन जूतों इत्यादि को आप पहन कर दिन भर बाहर घूमते हैं उनमें सड़क की तरह-तरह की गंदगी, कीटाणु, विषैले पदार्थ चिपक जाते हैं जो यदि घर के बाहर जूते ना उतारे जाएं तो घर के अंदर तक पहुँच वहाँ के वातावरण में घुल-मिल कर हमारा नुक्सान ही करते हैं। बहुत से लोगों को कहते सुना है कि पता नहीं क्यों हजार उपायों के बावजूद हमारे घर में कोई ना कोई किसी ना किसी व्याधि से पीड़ित ही रहता है। ऐसे लोगों का ध्यान अपनी इस आदत की ओर नहीं जाता। 

होना तो यह चाहिए कि, घर का हर सदस्य बाहर से आते समय घर के दरवाजे पर ही जूते-चप्पल, उतार दे। इससे बाहरी गंदगी, धूल, कीटाणु इत्यादि घर में नहीं आते। घर साफ-सुथरा रहता है। मुख्य द्वार पर एक पांव-पोछ जरूर हो,ना चाहिए, जिससे कम से कम जूते कुछ तो साफ़ हो सकें। शास्त्रों के अनुसार घर में नंगे पैर ही रहना चाहिए क्योंकि घर में कई स्थान देवी-देवताओं से संबंधित होते हैं उनके आसपास जूते-चप्पल लेकर जाना शुभ नहीं माना जाता है, पर यदि बिना कुछ पैरों में पहने रहा ही ना जा सके, तो घर के लिए एक अलग स्लीपर रख लें। जूते रखने का एक स्थान निश्चित करें, जहां परिवार के सभी सदस्य सलीके से अपने जूते
पहनें और उतारें। इसके लिए दरवाजे के पास एक शू-रैक रखी जा सकती है। पर ध्यान रहे वह ईशान-कोण में नहीं होनी  चाहिए। वैसे तो यह हमारी काफी प्राचीन  परंपरा रही है पर आजकल के फैशन ने उसे धीरे-धीरे हाशिए पर ला धरा है। द्वार पर जूते उतरना आधुनिकता नहीं मानी जाती। पर उसके परिणाम तो भुगतने ही  पड़ते हैं। 


ज्योतिष के अनुसार शनि को पैरों का कारक माना गया है जिन लोगों के घर में जूते इधर-उधर बिखरे रहते हैं, वहां शनि की अशुभता का प्रभाव रहता है। इसलिए पैरों से संबंध रखने वाली किसी भी वस्तु को साफ़-सुथरा
और यथाक्रम रखना चाहिए। टूटे-फूटे जूते-चप्पल नहीं पहनने चाहिए इससे दुर्भाग्य बढ़ता है। साफ-सुथरे और सुंदर फुटवियर पहनने से सौभाग्य सदा बना रहता है। जूते-चप्पल पहनकर कभी भी भोजन नहीं करना चाहिए। इससे भी दुर्भाग्य में वृद्धि होती है। 

घर का सबसे शुद्ध व साफ़ हिस्सा रसोई का होता है। पहले यहां की बनावट कुछ और होती थी उस समय तो यहां नंगे पैर ही प्रवेश किया जाता था। पर आजकल समय के साथ यहां भी बदलाव आ गया है, फिर भी शुद्धता का ध्यान रखते हुए इसके लिए अलग स्लीपर की व्यवस्था जरूर करनी चाहिए। बाथरूम और रसोई के स्लीपरों का अलग-अलग होना हर लिहाज से जरूरी है। रसोई व्यवस्थित, शुद्ध और साफ-सुथरी होनी चाहिए। ऐसी रसोई में देवी-देवता अपना स्थाई वास बना लेते हैं जिससे घर में कभी भी निरोगिता, धन, सकारात्मकता और सुख-समृद्धि की कमी नहीं रहती। 
घर जितना शुद्ध रहेगा उतना ही घर में लक्ष्मी का वास बना रहेगा।

वास्तु शास्त्र में जूतों से संबंधित ऐसी बातें बताई गई है जिनका पालन करने से घर में प्रवेश होने वाली नकारात्मक ऊर्जा दूर रहती है और घर में सुख-शांति बनी रहती है। उपयोग में आने वाले जूते-चप्पल को एक
व्यवस्थित ढंग से, उचित स्थान पर हमेशा पश्चिम की ओर ही रखना चाहिए। जो जूते चप्पल काम के न हों उन्हें घर में ना रखें उन्हें किसी गरीब को दे दें। ऐसा करने से शनि देव का प्रकोप भी कम होता है । पुराने जूते चप्पल रखने से घर में नकारात्मक ऊर्जा बनी रहती है और आपके घर से समस्याऐं जाने का नाम ही नहीं लेती हैं। परिवार के अच्छे स्वास्थ्य के लिए जरूरी है कि घर में पूरी तरह साफ-सफाई रहे, गंदगी न हो, धूल-मिट्टी हो। गंदगी के कारण हमारे स्वास्थ्य को तो नुकसान है साथ ही इससे हमारी आर्थिक स्थिति पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है।

सोमवार, 5 फ़रवरी 2018

इंसुलिन प्लांट

विशेषज्ञों के अनुसार डाइबटीज टू से पीड़ित रोगियों की संख्या करीब 80 प्रतिशत है और इनके लिए "इंसुलिन प्लांट" बहुत ही कारगर साबित हुआ है। इसके पत्तों का नियमित रूप से सेवन करने से पैंक्रियाज में हॉर्मोन बनाने वाली ग्रंथि के बीटा सेल्स मजबूत होते हैं। जिसके परिणामस्वरूप पैंक्रियाज ज्यादा मात्रा में इंसुलिन बनाता है, जिसके चलते अतिरिक्त दवा की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती.........!
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इस बार रेल यात्रा के दौरान श्रीमती जी को डायबिटीज की गोलियां वगैरह गटकते देख एक सहयात्री संजय बाघमारे जी से संवादों के साथ आत्मीयता हो गयी। उनकी उम्र 40-42 की होगी और वे इस बिमारी को पिछले आठ साल से झेल रहे थे। वे एक डायबिटीज ग्रुप के सदस्य थे और इस तरह इस बिमारी की हर ताजा खबर से अवगत होते रहते थे। उन्हीं ने एक पौधे  के  बारे में जानकारी दी जो दवाई के रूप में इस बिमारी में बहुत ही लोकप्रिय हो रहा है, नाम है उसका, इंसुलिन प्लांट (costus igneus)। हिंदी में इसे जारूल या केऊकंद के नाम से जाना जाता है। 

वैसे तो हर "पैथी" मधुमेह के इलाज का दावा करती है, पर शायद सच्चाई यही है कि इसे ताउम्र साथ पालना
पड़ता है। हाँ खान-पान और संयमित जीवन-यापन से इस पर नियंत्रण रखा जा सकता है और इसी में सहायता करता है यह पौधा। आधुनिक विज्ञान भी इस इंसुलिन के पौधे के गुणों पर अपनी मुहर लगा चुका है। कहते हैं, इस हर्बल पौधे के पत्तियों का सेवन करने से हाइ डाइबटीज को भी अपने नियंत्रण में किया जा सकता है। सबसे अच्छी बात यह है कि इसे किसी भी अच्छी नर्सरी से ला कर आसानी से घर में गमले इत्यादि में लगाया जा सकता है।  

जैसा कि सब जानते हैं कि डाइबटीज दो प्रकार की होती है। एक टाइप वन व दूसरी टाइप टू डाइबटीज। टाइप वन डाइबटीज के अंतर्गत रोगी का शरीर इंसुलिन हार्मोन नहीं बना पाता। इसलिए उस व्यक्ति को ताउम्र इंसुलिन का इंजेक्शन लेना पड़ता है। पर कुछ संतोष की बात यह है कि डाइबटीज के करीब 10 प्रतिशत
रोगियों में ही टाइप वन पाया जाता है। वहीं दूसरी ओर टाइप टू डाइबटीज के अंतर्गत व्यक्ति का शरीर इंसुलिन तो बनाता है लेकिन उसकी मात्रा पर्याप्त नहीं होती। इन रोगियों के ही शरीर में दवा या इंजेक्शन, के जरिए इंसुलिन पहुंचाया जाया है। विशेषज्ञों के अनुसार डाइबटीज टू से पीड़ित रोगियों की संख्या करीब 80 प्रतिशत है और इनके लिए "इंसुलिन प्लांट" बहुत ही कारगर साबित हुआ है। इसके पत्तों का नियमित रूप से सेवन करने से पैंक्रियाज में हॉर्मोन बनाने वाली ग्रंथि के बीटा सेल्स मजबूत होते हैं। जिसके परिणामस्वरूप पैंक्रियाज ज्यादा मात्रा में इंसुलिन बनाता है, जिसके चलते अतिरिक्त दवा की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।

इंसुलिन पौधा प्रकृति की ओर से मधुमेह के रोगियों को एक अनमोल उपहार है। रोज इसकी एक-दो पत्तियां, जिनमें कोरोलोसिक एसिड होता है, खा लेने से ही इस ढीठ रोग को तो नियंत्रण में रखा ही जा सकता है साथ ही ब्लड शुगर भी नियंत्रित रहती है। पर दावे चाहे कितने भी लुभावने हों कुछ भी शुरू करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर ले लेनी चाहिए।  

गुरुवार, 1 फ़रवरी 2018

रायपुर का नवनिर्मित, श्रीराम मंदिर

सीढ़ियां चढ़ते ही सूर्यमण्डप है जो नक्काशीदार खंबों पर टिका हुआ है। इसके बीचो-बीच आठ फिट का खूबसूरत झूमर लगाया गया है। स्वर्ण-खचित द्वार के बाद गर्भ-गृह में श्री राम-जानकी व हनुमान जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। इसके प्रदक्षिणा-पथ में श्री राधा-कृष्ण, गणेश जी, दुर्गा माता, गौरी-शंकर व लक्ष्मी-नारायण जी की मूर्तियां स्थापित की गयी हैं..................
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छत्तीसगढ़, वैसे तो यहां श्रीराम और उनसे संबंधित अनेकों मंदिर हैं, पर चूँकि ऐसी मान्यता है कि अपने वनवासकाल के दौरान श्रीराम ने करीब ग्यारह साल इस अंचल में बिताए थे, इसलिए ऐसे धर्म-स्थलों की संख्या में लगातार बढ़ोत्तरी होती जाती है। इसी श्रृंखला में, राजधानी रायपुर के एयरपोर्ट की तरफ जाने वाले व्ही.आई.पी. मार्ग पर मुड़ते ही दाहिने हाथ पर 17 एकड़ में फैले, भगवान श्रीराम के एक भव्य मंदिर का निर्माण सफ़ेद व गुलाबी संगमरमर से किया गया है। प्रांगण में खूबसूरत वाटिका बनी हुई है जिसे लवकुश वाटिका का नाम दिया गया है।  हालांकि अभी कुछ काम बाकी है। 



पूरी मान्यताओं एवं वास्तुकला को ध्यान में रख इस मंदिर का निर्माण किया गया है। बारह खंभों और तीन गुंबदों वाले इस मंदिर की ऊंचाई 109', चौड़ाई140' और लम्बाई 110' है। इसके प्रवेश द्वार के सामने ही गरुड़ स्तंभ है और मंदिर के अंदर ले जाने वाली दोनों सीढ़ियों के बीच गोस्वामी तुलसीदास जी की सुंदर प्रतिमा स्थापित की गयी है। सीढ़ियां चढ़ते ही सूर्यमण्डप है, जो नक्काशीदार खंबों पर टिका हुआ है। इसके बीचोबीच आठ फिट का खूबसूरत झूमर लगाया गया है। स्वर्ण-खचित द्वार के बाद गर्भ-गृह में श्री राम-जानकी व हनुमान जी की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की गयी हैं। इसके प्रदक्षिणा-पथ में श्री राधा-कृष्ण, गणेश जी, दुर्गा माता, गौरी-शंकर व लक्ष्मी-नारायण जी की मूर्तियां स्थापित की गयी हैं। इसके अलावा पूरे मंदिर के लिए भी एक प्रदक्षिणा-पथ है, जिस पर भगवान विष्णु के दशावतार चित्रित हैं तथा इसे नारायण पथ का नाम दिया गया है। 




मंदिर परिसर में एक नवग्रह मंदिर भी है, जहां से ज्योतिष परामर्श केंद्र संचालित किया जाता है। भक्तों-दर्शनार्थियों के लिए प्रसाद की व्यवस्था हेतु जानकी रसोई के साथ-साथ एक गौ-शाला का भी संचालन किया जाता है। इसके साथ ही एक यज्ञशाला, सतसंग भवन तथा मंदिर कार्यालय भी बने हुए हैं। आने वाले समय में यह भव्य मंदिर पर्यटकों के लिए एक मुख्य आकर्षण होने वाला है।

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

संस्कारी बहू

यह काल्पनिक कहानी नहीं है, बल्कि यथार्थ में घटित प्रकरण से प्रेरित एक सत्य कथा है जो हसने की बजाय  सोचने पर ज्यादा मजबूर करती है ! आज की पीढ़ी का आभासी संसार से लगाव उन्हें जानकारी से तो भरपूर करता है पर ज्ञान के रूप में सब शून्य बटे सन्नाटा ही नजर आता है......    

नौकरी लगते ही चंदन, जिसे घर में सबसे छोटा होने के नाते सब छोटू पुकारते थे, की शादी कर दी गयी। घर में सोहनी-सुलक्खिनी-गूगल ज्ञान से भरपूर बहू आ गयी। साथ ही ले आई अपने मायके की ढेरों अच्छाइयों की फेहरिस्त ! एक दिन अपनी सास के सामने बैठी अपने संस्कारों का बखान कर रही थी; मम्मी जी, हमारे यहां सभी को आदर के साथ बुलाने की सीख दी गयी है। जी,  हांजी के बिना हमारे यहां कोई बात नहीं करता। हम तो अपने ड्रायवर को भी काका कह कर बुलाते हैं। दूध वाले को भइया जी कहते हैं। हम ना, अपनी काम करने वाली आया को भी अक्कू कह कर बुलाते हैं। पापा ने यही सिखाया है कि किसी का नाम ना लिया जाए, सभी को इज्जत से पुकारा जाए, इसीलिए हम अपने पेट्स को भी प्यार से पुकारते हैं, भूल से भी डॉगी को डॉगी नहीं कहते; पप्पीज कहते हैं।
  
इतने में घडी ने सात बजा दिए, बहू चौंकी ! ओ, शिट....सात बज गए ! ये छोटू भी न, पता नहीं कहाँ रह गया ! आफिस तो छह बजे बंद हो जाता है; पता नहीं कहां  मटरगश्ती करता रहता है ! बताया था कि आज बुआ जी ने बुलाया है, उनके यहां जाना है ! पर इडियट को ध्यान ही नहीं रहता किसी बात का ! रेक्लेस फेलो !! मम्मी जी संस्कारी और एटिकेटेड बहू का मुंह, मुंह खोले ताक रही थीं !   

मुंह तो मैं भी ताक रहा था, पिछले दिनों रायपुर से दिल्ली ले आती, पल-पल लेट होती गाडी में, अपनी सहयात्री 30-32 साला युवती का ! जिसे ना गाडी के समय का पता था, न उसके देर से चलने का और ना हीं उसके रूट वगैरह का, नाहीं आस-पास के माहौल का ! कानों में मोबाइल के प्लग लगाए, बीसियों घंटों से उसी में मशगूल। चिप्स जैसे दो-तीन पैकेट जरूर खाली हुए थे पर अपनी सेहत के प्रति कुछ ज्यादा ही जागरूक रहने वाली इस पीढ़ी की प्रतिनिधी को पानी का एक भी घूँट गले के नीचे उतारते नहीं देखा गया था। 

अब तक  गाडी पांच घंटे लेट हो चुकी थी। तभी उन्होंने पास से गुजरते बिरयानी बेचते लड़के से पूछा, भइया बिरयानी गरम है ? उसने जवाब दिया, मैडम ठीक है; एकदम गरम तो नहीं मिल पाएगी ! ताजा सामान तो चढ़ नहीं रहा, जो है वही बेच रहे हैं। ले लीजिए, नहीं तो यह भी ख़त्म हो जाएगा, गाडी तो चार बजा देगी दिल्ली पहुंचते-पहुंचते ! युवती चौंकी !! चार ? इसके तो एक बजे पहुँचने की बात है ! लड़का हंसा, क्या मैडम ! सवा बारह तो यहीं बज गए हैं और ट्रेन ठीक से चल भी नहीं रही है। चार बजे भी पहुँच जाए तो बहुत है। कुछ-कुछ परिस्थिति को समझते हुए बिरयानी खरीदी गयी और खाई गयी। 

कुछ देर बाद गाडी ने आगरा को पीछे छोड़ा ही था कि उन्हें गाडी की स्थिति वगैरह जानने को किसी रिलेटिव का फोन आया कि कहाँ हो इत्यादि, तो उस ज्ञानवान ने पूरी तत्परता, गंभीरता और विश्वास के साथ कह दिया, हाँ चार घंटे लेट है; अभी हरियाणा क्रॉस की है !! आस-पास के लोगों के चेहरे पर इस लाल-बुझ्झकड़ी उत्तर से मुस्कान फ़ैल गयी। फोन करने वाला भी बेहोश हो गया होगा ! अरे, तुम क्या सड़क मार्ग से जा रही हो तत्परता और विश्वास ? नहीं पता है तो साफ़ बतलाओ कि अभी पता नहीं है कि कहाँ हूँ ! किसी स्टेशन के निकलने पर बताती हूँ। पर यह पीढ़ी अपने को अज्ञानी सिद्ध नहीं होने देना चाहती भले ही मूर्ख साबित हो जाए !

आखिरकार नौ घंटों बाद गाडी ने सफदरजंग पहुँचाया। सोच रहा था कि यदि उन मोहतरमा को पेंट्री वाले लड़के ने बिरयानी ना खिला दी होती तो शायद उन्हें यहां उतरना नहीं, उतारना पड़ता !! 

शनिवार, 13 जनवरी 2018

कुछ और भी कारण हैं मकर संक्रांति के विशेष होने के

सूर्यदेव के उत्तरायण होने के अलावा और भी बहुतेरे कारण हैं जिनकी वजह से मकर संक्रांति का दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। भले ही नाम और रूप अलग-अलग हों पर यह शायद अकेला त्यौहार है जो सर्वमान्य रूप से पूरे देश में मनाया जाता है। वैसे भी पर्व और त्यौहार हमें आपस में मिल-जुल कर रहने का संदेश देने के लिए ही तो बनाए गए हैं...... 
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हमारा देश पर्वों और त्योहारों का देश है और हम उत्सव धर्मी हैं। हमारे सभी त्योहार अपना विशेष महत्व रखते हैं। लेकिन मकर संक्रांति का धर्म, दर्शन तथा खगोलीय दृष्ट‌ि से विशेष महत्व है। ज्योत‌िष और शास्‍त्रों में हर महीने को दो भागों में बांटा गया है, कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष।  जो चन्‍द्रमा की गत‌ि पर न‌िर्भर करता है।  इसी

तरह वर्ष को भी दो भागों  में बांटा गया है, जो उत्तरायण और दक्षिणायन कहलाता है। यह सूर्य की गति पर  न‌िर्भर होता है। मकर संक्रांति के दिन से सूर्य धनु राशि से मकर राश‌ि में प्रवेश कर उत्तर की ओर आने लगता है। दिन बड़े होने लगते हैं। धरा को सर्दी से छुटकारा मिलने लगता है। इसी दिन से बसंत ऋतु का आगमन माना जाता है। फल-फूल पल्लवित होने लगते हैं। प्रकृति खुशहाल लगने लगती है। फसल घर आने से किसान भी खुशहाल हो जाते हैं। जानवरों के लिए ठंड ख़त्म हो जाने के कारण चारे की कमी भी नहीं रहती। इसी लिए प्रभू को धन्यवाद देने लोग स्नान-ध्यान कर इकठ्ठा हो अपनी ख़ुशी मनाते हैं। इस समय को किसी न किसी रूप और नाम से पूरे देश में मनाया जाता है। जैसे तमिलनाडुआंध्र प्रदेश में पोंगल। कर्नाटक, केरल, राजस्थान, बंगाल में 'संक्रांति'। हिमाचल-हरियाणा-पंजाब में 'लोहड़ी'। उत्तर प्रदेश, बिहार में 'खिचड़ी' या 'माघी'। महाराष्ट्र में 'हल्दी-कुमकुम' और असम में बिहू’ कहते हैं। चाहे इसका नाम प्रत्येक प्रांत में अलग-अलग हो और इसे मनाने के तरीके भी भिन्न हों, किंतु यह हमारे देश का एक सर्वमान्य व महत्वपूर्ण पर्व है। 

मकर संक्रांति के दिन भगवान सूर्य अपने फर्ज को निभाने और दुनियां को यह समझाने कि बाप-बेटे में कितनी भी अनबन क्यों ना हो रिश्ते तो रिश्ते ही रहते हैं, अपना क्रोध त्याग, अपने पुत्र  शनि की राशि मकर में प्रवेश कर उनका भंडार भरते हैं। इससे उनका मान घटता नहीं बल्कि और भी बढ़ जाता है। इसीलिए इस दिन को
पिता-पुत्र के संबंधों में निकटता की शुरुआत के रूप में देखा जाता है। इस अवधि को विशेष शुभ माना जाता है और सम्पूर्ण भारत में मकर सक्रांति का पर्व सूर्य उपासना के रूप में मनाया जाता है। मकर संक्रांति के दिन सूर्य का मकर राशि में प्रवेश करते ही सूर्य का उत्तरायण प्रारंभ हो जाता है। शास्त्रों के अनुसार दक्षिणायन को देवताओं की रात्री तथा उत्तरायण को उनका दिन माना गया है इसलिए इस दिन जप, तप, दान, स्नान, श्राद्ध, तर्पण आदि धार्मिक क्रिया-कलापों को विशेष महत्व दिया जाता है|
   
सूर्य के उत्तरायण होने के अलावा और भी कई कारणों से यह दिन महत्वपूर्ण माना जाता है। भगवान कृष्ण ने गीता में भी सूर्य के उत्तरायण में आने का महत्व बताते हुए कहा है कि इस काल में देह त्याग करने से पुर्नजन्म नहीं लेना पड़ता और इसीलिए महाभारत काल में पितामह भीष्म ने सूर्य के उत्तरायण में आने पर ही देह त्याग किया था। ऐसा माना जाता है कि सूर्य के उत्तरायण में आने पर सूर्य की किरणें पृथ्वी पर पूरी तरह से पड़ती है और यह धरा प्रकाशमय हो जाती है। इस दिन लोग सागर, पवित्र नदियों व सरोवरों में सूर्योदय से पहले स्नान  करते हैं और दान इत्यादि कर पुण्य-लाभ प्राप्त करते हैं। 
गंगा सागर 
प्रकृति की इस अनोखी करवट के अलावा भी इस दिन कई महत्वपूर्ण घटनाएं घटी हैं। पुराणों के अनुसार भगवान राम के पूर्वज व गंगा को धरती पर लाने वाले राजा भगीरथ ने इसी दिन अपने पूर्वजों का तिल से तर्पण किया था। तर्पण के बाद गंगा इसी दिन सागर में समा गई थीं। इसीलिए इस दिन गंगासागर में मकर संक्रांति के दिन मेला लगता है।

इसी दिन भगवान विष्णु और मधु-कैटभ युद्ध समाप्त हुआ था और प्रभू मधुसूदन कहलाने लगे थे। 

माता दुर्गा ने इसी दिन महिषासुर वध करने के लिए धरती पर अवतार लिया था। 



मकर सक्रांति तब ही मनाई जाती है जब सूर्य धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश करते हैं। सूर्य का प्रति वर्ष धनु राशि से मकर राशि में प्रवेश बीस मिनट की देरी से होता है। इस तरह हर तीन साल के बाद यह क्रिया एक घण्टे की देर यानी बहत्तर साल में एक दिन की देरी से संपन्न होती है।  इस तरह देखा जाए तो लगभग एक हजार साल पहले मकर सक्रांति 31 दिसम्बर को मनाई गई होगी। पिछले एक हजार साल में इसके दो हफ्ते आगे खिसक जाने से यह 14 जनवरी को मनाई जाने लगी। अब सूर्य की चाल के आधार पर यह अनुमान लगाया जा रहा हे कि पाॅंच हजार साल बाद मकर सक्रांति फरवरी महीने के अंत में जा कर हो पाएगी। 

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

फिल्मों को जरुरत है, स्वस्थ दिलो-दिमाग वाले निर्माताओं की

आज एक फिल्म अपनी शुद्ध, भदेश गाली-गलौच वाली भाषा के कारण सुर्ख़ियों में है, जिसके निर्माता का दावा है कि  "स्लैंगी लैंग्वेज समाज की सच्चाई है" ! उसके अनुसार आज के समाज में ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल होता है और आज का दर्शक इसी को पसंद करता है। पता नहीं वह किस समाज में और किन लोगों से घिरा रहता है जो उसकी ऐसी धारणा बन गयी है। फिल्म का तो जो भी हश्र होना होगा, होगा; आवश्यकता है ऐसे लोगों की सोच में बदलाव की.......
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कोई भी विधा मनुष्य, देश, समाज के लिए तभी उपयोगी या फलदाई होती है जब वह सही हाथों में हो। विकृत सोच तो अर्थ का अनर्थ ही करेगी। ऐसा ही एक सशक्त माध्यम है फ़िल्में; जो भारतीय अवाम पर गहरा असर डालती रही हैं। हमारे यहां इस विधा के एक से बढ़ कर एक जानकार रहे हैं,  जिन्होंने समय-समय पर जनता को बिना किसी खौफ और दवाब के मनोरंजक तरीके से उद्वेलित करने का कारनामा किया है। आज वर्षों बीत जाने के बावजूद लोग बिमल रॉय, शांताराम, राजकपूर, सत्यजीत रे, हृषिकेश मुखर्जी, ताराचंद, बासु चटर्जी, बी आर चोपड़ा जैसे फिल्मकारों को, पचासों साल बीत जाने के बाद भी लोग भुला नहीं पाए हैं। आज भी कुछ लोग हैं जो इस विधा की गरिमा बनाए रखने को लेकर कटिबद्ध हैं। पर इसके साथ ही इस माध्यम से अथाह पैसा बनाने की चाहत कुछ ऐसे तिकड़मी लोगों को भी खींच लाई है। जिनका साम-दाम-दंड-भेद किसी भी तरह एक मात्र उद्देश्य धनोपार्जन होता है। उनको ना हीं समाज से मतलब है ना हीं युवाओं के पथ-भ्रष्टन से ! अपनी विकृत मानसिकता, ओछी सोच, को ही वे अपनी निपुणता मानते हैं। उनके लिए किसी तरह की बंदिश कोई मायने नहीं रखती, अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर वे कुछ भो उगलने को तैयार रहते हैं, फिर वह चाहे विवादित पट-कथा हो, अश्लील संवाद हों या वैसे ही दृश्य, चाहे वीभत्स खून-खराबा हो या शुद्ध भदेस गाली-गलौच ! गुणवत्ता
तो गयी भाड़ में ! उन्हें इससे कोई मतलब नहीं कि, इसका असर बच्चों या किशोरों पर क्या पडेगा ! परिजन
सपरिवार एक साथ बैठ ऐसी फिल्म देख पाएंगे कि नहीं ! उन्हें मतलब होता है राष्ट्रीय अवकाश या फिर सप्ताहंत के तीन दिनों की कमाई से। इसके लिए उनकी आपसी सर-फोड़ी की ख़बरें आजकल आम होती हैं। कुछ जान-बूझ कर ऐसा विषय चुनते हैं जिस पर सौ प्रतिशत हंगामा होना तय हो। इसके लिए वे तरह-तरह के विवाद पहले से ही खड़े करने लगते हैं, जिसके लिए आजकल विशेषज्ञ भी उपलब्ध हैं, जिनका काम ही होता है लंगड़ी-लूली फिल्म में विवाद की बैसाखी लगाने का। कोई इतिहास में टंगड़ी फंसाता है, तो कोई भाषा का क्रिया-कर्म करने पर उतारू हो जाता है, कोई आस्था-मान्यता से खिलवाड़ करने लगता है तो कोई जनमत की भावनाओं को दांव पर लगा देता है। कोई किसी नेता की छवि को धूमिल करने की बेजा कोशिश करता है तो कोई किसी के चरित्र को लांछित करने का कुप्रयास। आज फ़िल्में सिनेमा हॉल में नहीं बाहर सड़कों पर ही मनोरंजन करने का साधन बन गयी हैं। पर जब लोग उन्हें नापसंद कर देते हैं, नकार देते हैं, तो ऐसे बद-दिमाग लोग अपनी गलती ना मान दर्शकों के ही नासमझ  होने का दावा करने लगते हैं।  

सीधी सी बात यह है कि आज के तथाकथित फिल्म निर्माता को अपने पर बिलकुल भरोसा नहीं है। ज्यादातर
को इस विधा के किसी भी पहलू का पूरा ज्ञान भी नहीं होता। तिकड़म से इकठ्ठा किया गया धन, किसी बड़े स्टार की कुछ डेट का इंतजाम कर फिल्म बनानी शुरू कर दी जाती है। अधिकाँश वर्षों पहले की दो-चार फिल्मों का घालमेल या उनका "रि-मंचन" या फिर  विदेशी चल-चित्रों का हिंदी रूपांतर होता है। यदि कहीं बिल्ली के भाग  छीका टूट जाता है तो मीडिया में जबरदस्त प्रचार कर वह अपने आप को क्रांतिकारी फिल्म-मेकर के रूप में प्रचारित करवा आगे और ब्लंडर करने को तैयार हो जाता है।  

पहले के फिल्म निर्माता की अपनी शैली होती थी, अपनी पहचान होती थी, अपना "ब्रांड" होता था, हरेक का अपना ढंग होता था, स्तर होता था, पूरी विधा पर  पकड़ होती थी। समर्पित थे वे लोग कला के प्रति ! उनकी दो-तीन साल में आने वाली फिल्मों का लोग बेसब्री से इंतजार किया करते थे। उस समय नामी-गिरामी फिल्म निर्माताओं की फ़िल्में कई बार एक साथ रिलीज होती थीं और खूब पसंद की जाती थीं। हरेक को अपनी क्षमता
पर पूरा भरोसा होता था, इसीलिए उनमें से किसी को किसी "क्लैश" का डर नहीं होता था। दस-बीस रुपए की कीमतों वाली 800-900 सीटों वाले एक हॉल में पच्चीस-पचास हफ्ते चलने के बाद सिल्वर या गोल्डन जुबली कहलाती थीं, और आज भी याद की जाती हैं। ऐसा नहीं था कि उस समय स्तर-हीन फ़िल्में नहीं बनती थीं, पर उनकी संख्या कम ही होती थी। 

ऐसा नहीं है कि सब कुछ निराशा जनक हो गया हो; आज भी इस विधा के निष्णात लोग कटिबद्ध हैं इस माध्यम को  नई-नई ऊंचाईंयों तक पहुंचाने के लिए। आज पहले से ज्यादा सुविधाएं, सुरक्षा, तकनीकी उपलब्ध हैं, जिससे गुणवत्ता भी बढ़ी है। फिल्म बनने में अब सालों नहीं लगते। संसार भर में हमारी फ़िल्में नाम कमा रही हैं। इस माध्यम से जुड़े लोगों की पूछ-परख विभिन्न देशों में होने लगी है। 

मंगलवार, 9 जनवरी 2018

यह अवसाद है या प्रकृति का इशारा, निःस्पृहता के लिए ?

जब साठ-सत्तर की उम्र के बाद, हर सुख, सुविधा, उपलब्धि, निरोगिता के बावजूद मन उचाट रहने लगे, डाक्टरी भाषा में अवसाद जैसी स्थिति बनी रहने लग जाए ! तो क्या यह कहीं प्रकृति का संकेत तो नहीं, कि अब पानी में तेल की बूँद हो जाने का समय आ गया है। धीरे-धीरे अपने आप को निःस्पृह कर वानप्रस्त अपनाने का इशारा हो उसकी तरफ से......... 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
कभी-कभी हर सुख, सुविधा, उपलब्धि, निरोगिता के बावजूद मन उचाट हो जाता है। बिना किसी मतलब, नाखुशी या कारण के। तब ना किसी से बात करने की इच्छा होती है, ना ही कोई काम करने की, ना पुस्तकें सुहाती हैं, ना हीं कोई मनोरंजन ! बस चुप-चाप, गुम-सुम, अपने में लीन। जैसे जिंदगी से रूचि खत्म हो गयी हो ! 

छोटी उम्र में या आयु के पचास-साठ वर्षों तक, जब जीवन में ढेरों जिम्मेदारियां होती हैं, परिवार का भार होता है, तब किसी असफलता के कारण कुछ देर के लिए मन ऐसा हो जाता है तो वह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।  वैसी स्थिति यदि लंबी खिचने लगे, तो डॉक्टर इसे अवसाद कहते हैं। गौर तलब है कि अनेकों कारण गिनाने के बावजूद इसके किसी निश्चित व ठोस कारण का अभी तक पता नहीं चल पाया है। पर ऐसी स्थिति जब साठ-सत्तर की उम्र के बाद होने लगे तो क्या यह प्रकृति का संकेत तो नहीं, कि अब पानी में तेल की बूँद हो जाने का समय आ गया है। धीरे-धीरे अपने को निःस्पृह कर वानप्रस्त अपनाने का इशारा हो उसकी तरफ से !  

हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य की भलाई के लिए जो भी नियम-कायदे बनाए थे, वे सब उनकी विद्वता, दूरदर्शिता तथा गहन अनुभवों का निचोड़ था। उनका भले ही आजकल के नीम-ज्ञानी मखौल बना कर अपनी अल्प बुद्धि का प्रदर्शन करते हों, पर वे आज भी हमारा मार्ग-दर्शन करने का पूरा माद्दा रखते हैं। उनके द्वारा जीवन की अवधि 100 साल मान कर उसे 25-25 वर्षों के चार भागों में बांट, ब्रह्मचर्य, ग्रृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम का नाम दिया गया था। जो हिंदू समाज की जीवन व्यवस्था थी। 
उम्र के प्रथम 25 वर्ष में शरीर, मन और ‍बुद्धि विकसित होते हैं, इसलिए उसे संयमी और अनुशासित रह कर भविष्य की जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता था। फिर 25 से 50 वर्ष की आयु में शिक्षा के बाद विवाह कर पति-पत्नी मिल कर पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते थे। इसके बाद अधेड़ावस्था की 50 से 75 तक की आयु में गृहस्ती से मुक्त हो जनसेवा, धर्मसेवा, विद्यादान और ध्यान का विधान है। इसे वानप्रस्थ कहा गया है। फिर धीरे-धीरे इससे भी मुक्त हो व्यक्ति को एकांतवासी हो, प्रभु से लौ लगाने की चेष्टा करने का विधान रखा गया था, जिसे सन्यास आश्रम का नाम दिया गया। भले ही इसे प्रभू से जोड़ा गया हो पर वास्तव में इसका उद्देश्य यह रहा होगा कि परिवार से, समाज से अलग रहने पर मनुष्य की मोह-माया कुछ कम हो सके जिससे उसके जाने पर, पीछे छूटे उसके सगे-संबंधियों को उसकी विदाई, उसका विछोह उतना कष्ट ना दे पाए जितना साथ रहते हो सकता है। 

आश्रमों का निर्धारण यूँ ही नहीं किया गया या निर्धारित कर दिया गया था, बल्कि इसके पीछे वर्षों के अनुभव, परिक्षण, शोध, प्रयोग तथा परिणामों का वैज्ञानिक आधार था। मनुष्य के स्वभाव, उसके मनोविज्ञान, उसकी अपेक्षाओं, उसके कर्तव्यों, उसकी आवश्यकताओं तथा उसकी क्षमताओं को देखते हुए सारी व्यवस्था की गयी थी। आज हम सिर्फ उसका शाब्दिक अर्थ ले उसे दरकिनार कर देते हैं जबकि उन पर आज भी अमल किया जाए तो मनुष्य, समाज व देश लाभान्वित हो सकते हैं। 

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