मंगलवार, 9 जनवरी 2018

यह अवसाद है या प्रकृति का इशारा, निःस्पृहता के लिए ?

जब साठ-सत्तर की उम्र के बाद, हर सुख, सुविधा, उपलब्धि, निरोगिता के बावजूद मन उचाट रहने लगे, डाक्टरी भाषा में अवसाद जैसी स्थिति बनी रहने लग जाए ! तो क्या यह कहीं प्रकृति का संकेत तो नहीं, कि अब पानी में तेल की बूँद हो जाने का समय आ गया है। धीरे-धीरे अपने आप को निःस्पृह कर वानप्रस्त अपनाने का इशारा हो उसकी तरफ से......... 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
कभी-कभी हर सुख, सुविधा, उपलब्धि, निरोगिता के बावजूद मन उचाट हो जाता है। बिना किसी मतलब, नाखुशी या कारण के। तब ना किसी से बात करने की इच्छा होती है, ना ही कोई काम करने की, ना पुस्तकें सुहाती हैं, ना हीं कोई मनोरंजन ! बस चुप-चाप, गुम-सुम, अपने में लीन। जैसे जिंदगी से रूचि खत्म हो गयी हो ! 

छोटी उम्र में या आयु के पचास-साठ वर्षों तक, जब जीवन में ढेरों जिम्मेदारियां होती हैं, परिवार का भार होता है, तब किसी असफलता के कारण कुछ देर के लिए मन ऐसा हो जाता है तो वह एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है।  वैसी स्थिति यदि लंबी खिचने लगे, तो डॉक्टर इसे अवसाद कहते हैं। गौर तलब है कि अनेकों कारण गिनाने के बावजूद इसके किसी निश्चित व ठोस कारण का अभी तक पता नहीं चल पाया है। पर ऐसी स्थिति जब साठ-सत्तर की उम्र के बाद होने लगे तो क्या यह प्रकृति का संकेत तो नहीं, कि अब पानी में तेल की बूँद हो जाने का समय आ गया है। धीरे-धीरे अपने को निःस्पृह कर वानप्रस्त अपनाने का इशारा हो उसकी तरफ से !  

हमारे ऋषि-मुनियों ने मनुष्य की भलाई के लिए जो भी नियम-कायदे बनाए थे, वे सब उनकी विद्वता, दूरदर्शिता तथा गहन अनुभवों का निचोड़ था। उनका भले ही आजकल के नीम-ज्ञानी मखौल बना कर अपनी अल्प बुद्धि का प्रदर्शन करते हों, पर वे आज भी हमारा मार्ग-दर्शन करने का पूरा माद्दा रखते हैं। उनके द्वारा जीवन की अवधि 100 साल मान कर उसे 25-25 वर्षों के चार भागों में बांट, ब्रह्मचर्य, ग्रृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास आश्रम का नाम दिया गया था। जो हिंदू समाज की जीवन व्यवस्था थी। 
उम्र के प्रथम 25 वर्ष में शरीर, मन और ‍बुद्धि विकसित होते हैं, इसलिए उसे संयमी और अनुशासित रह कर भविष्य की जिम्मेदारियों के लिए तैयार किया जाता था। फिर 25 से 50 वर्ष की आयु में शिक्षा के बाद विवाह कर पति-पत्नी मिल कर पारिवारिक व सामाजिक दायित्वों का निर्वाह करते थे। इसके बाद अधेड़ावस्था की 50 से 75 तक की आयु में गृहस्ती से मुक्त हो जनसेवा, धर्मसेवा, विद्यादान और ध्यान का विधान है। इसे वानप्रस्थ कहा गया है। फिर धीरे-धीरे इससे भी मुक्त हो व्यक्ति को एकांतवासी हो, प्रभु से लौ लगाने की चेष्टा करने का विधान रखा गया था, जिसे सन्यास आश्रम का नाम दिया गया। भले ही इसे प्रभू से जोड़ा गया हो पर वास्तव में इसका उद्देश्य यह रहा होगा कि परिवार से, समाज से अलग रहने पर मनुष्य की मोह-माया कुछ कम हो सके जिससे उसके जाने पर, पीछे छूटे उसके सगे-संबंधियों को उसकी विदाई, उसका विछोह उतना कष्ट ना दे पाए जितना साथ रहते हो सकता है। 

आश्रमों का निर्धारण यूँ ही नहीं किया गया या निर्धारित कर दिया गया था, बल्कि इसके पीछे वर्षों के अनुभव, परिक्षण, शोध, प्रयोग तथा परिणामों का वैज्ञानिक आधार था। मनुष्य के स्वभाव, उसके मनोविज्ञान, उसकी अपेक्षाओं, उसके कर्तव्यों, उसकी आवश्यकताओं तथा उसकी क्षमताओं को देखते हुए सारी व्यवस्था की गयी थी। आज हम सिर्फ उसका शाब्दिक अर्थ ले उसे दरकिनार कर देते हैं जबकि उन पर आज भी अमल किया जाए तो मनुष्य, समाज व देश लाभान्वित हो सकते हैं। 

शुक्रवार, 5 जनवरी 2018

नेता पिटने लगे हैं....!

ऐसे लोगों में  लियाकत तो होती नहीं, इसलिए उन्हें सदा अपना  स्थान खोने की  आशंका बनी रहती है।  इसी  आशंका के  कारण  उनके दिलो - दिमाग में क्रोध  और  आक्रोश ऐसे  पैवस्त हो जाते हैं  कि  उन्हें  हर आदमी  अपना  दुश्मन और  दूसरे की  ज़रा  सी विपरीत बात अपनी   तौहीन लगने लगती है। ऐसे लोग  ओछी हरकतें करने से भी बाज नहीं आते।  मदांधता में इन्हें जनाक्रोश भी दिखाई नहीं देता........

जैसे ही मनुष्य को सत्ता, धन, बल मिलता है, उसका सबसे  पहला असर उसके  दिमाग पर ही होता है। अपनी शक्ति के नशे में अंधे हो जाना  आम बात  हो जाती है।  उसे  अपने  सामने हर कोई  तुच्छ कीड़ा - मकोड़ा नज़र आने लगता है। सैकड़ों साल पहले तुलसीदास जी ने कह दिया था  कि समय  के साथ भले  ही लोगों के स्वभाव में, उनके विचारों में, उनके रहन-सहन में, कितने भी बदलाव आ जाएं पर मदांधता का स्वभाव कभी नहीं बदल पाएगा। 

देश की जनता का एक बहुत बडा प्रतिशत नेताओं व उनके चमचो  से असंतुष्ट है।   उनकी असलियत भी जनता जानने लग गयी है।  आज अंतिम सिरे पर खडा इंसान भी कुछ - कुछ जागरुक हो गया है। वह भी जानने लगा है कि  अब वैसे नेता नहीं रहे,  जिनके लिए देश सर्वोपरी हुआ करता था।  आज तो सब कुछ  ‘निज व निज परिवार हिताय’ हो गया है। कुछ लोग मेहनत या योग्यता की सहायता से नहीं बल्कि कुछ तिकड़म से,  कुछ बाहुबल से और ज्यादातर धन - बल के सहारे "शक्ति" हासिल कर लेते हैं।  ऐसे लोगों में  लियाकत तो होती नहीं, इसलिए उन्हें सदा अपना  स्थान खोने की  आशंका बनी रहती है।  इसी  आशंका के कारण  उनके दिलो-दिमाग में क्रोध और आक्रोश ऐसे  पैवस्त हो जाते हैं कि  उन्हें हर आदमी  अपना  दुश्मन और  दूसरे की  ज़रा  सी विपरीत बात अपनी तौहीन लगने लगती है। ऐसे लोग ओछी हरकतें करने से भी बाज नहीं आते।  मदांधता में इन्हें जनाक्रोश भी दिखाई नहीं देता।  

अभी कुछ दिन पहले अपने पद, परिवार  और  राजनितिक संबंधों के  गरूर में एक महिला - नेत्री ने पुलिस कर्मी पर हाथ उठा दिया था, जिसके जवाब में मिले  झन्नाटेदार थप्पड़  ने उनके गरूर,  अहम  और  हैसियत  को धूल चटवा दी। पहले ऐसा कभी भी नहीं हुआ था कि आम जन किसी नेता पर हाथ उठा दे !  पर यह उस दबे-घुटे लावे का परिणाम था जो काफी समय से बाहर आने को उछाल मार रहा था, पर इंसानियत, नैतिकता या कहिए कुछ संकोच के कारण अंदर ही अंदर सालता रहता था !  पर अति तो अति ही होती है !! पर लगता है कि फिर भी इस जाति के लोगों को कुछ समझ नहीं आ रही !  क्योंकि कुछ दिनों बाद ही  एक और  ऐसे ही सिरफिरे  नेता ने दूसरे राज्य में जा अपनी गलत बात न  मानने पर वहाँ के  एक होटल कर्मचारी पर हाथ उठाया, तो दौड़ा-दौड़ा कर मार खाने की नौबत आन पड़ी। क्या इज्जत-मान-प्रतिष्ठा रह गयी ? 

प्रकृति का प्रकोप या अनहोनी अचानक ही नहीं घटित हो जाती।  बहुत पहले से वह  अपने अच्छे-बुरे बदलाव का आभास देने लग जाती है। ऐसे ही एक बदलाव की पदचाप दूर से आती महसूस होने लगी है। रोज-रोज भ्रष्टाचार तानाशाही, मंहगाई की मार  से दूभर होती  जिंदगी से देश  का नागरिक त्रस्त है। अपने  सामने  गलत  लोगों को गलत तरीके से धनाढ्य होते  और उस धनबल  से हर क्षेत्र में  अपनी  मनमानी करते  और इधर  खुद और अपने परिवार की  जिंदगी दिन  प्रति दिन दुश्वार  होते देख अब  एक आक्रोश उसके दिलो - दिमाग में जगह बनाता जा रहा है।  यदि इसका कहीं विस्फोट हो गया  तो ऐसे भ्रष्ट लोगों का क्या हश्र होगा  तथा उनके  संरक्षक किस बिल को ढूंढेंगे,  अपना  अस्तित्व बचाने के लिए,  इसकी कल्पना  भी नहीं की जा सकती।  अभी भी हालात उतने नहीं बिगड़े हैं, अभी भी हाथ में समय है उन जड़-विहीन,  बड़बोले,  चापलूस, तिकड़मबाज तथाकथित नेताओं के पास कि बदलाव को समझें और अपना रवैया बदल, सुधर जाएं नहीं तो जनता तो सुधार ही देगी।

बुधवार, 3 जनवरी 2018

नव-वर्ष रूपी बच्चा साल भर में ही बूढ़ा क्यों जाता है ?

 गहन शोध के बाद यह बात सामने आयी कि यह बिमारी तो "पा" फिल्म में ओरो बने अमिताभ बच्चन की प्रोजेरिया नामक बीमारी से भी खतरनाक है। अब तो यही कामना है कि नवागत 2018 नामक इस शिशु को कम से कम पीड़ा का बोध हो। इस नामुराद बिमारी से तो निजात नहीं पा सकता। पर जाते-जाते इसके मुंह पर संतोष की छाया रहे। हमारे प्रति कृतज्ञ रहे कि इसको जितना भी समय मिला उसे हमने शांति और चैन से गुजारने दिया.......
#हिन्दी_ब्लागिंग 
वर्षों से परंपरा रही है हर साल के अंतिम दिन, एक कार्टून बना, आने वाले वर्ष को बच्चे के रूप में तथा जाते हुए साल को वृद्ध के रूप में दिखाने की। हर बार इसे देख मन में यह बात उठती रही है कि कोई बच्चा एक साल में ही
गज भर की दाढी और झुकी कमर वाला वृद्ध कैसे हो जाता है। पर हर बार बात आयी-गयी हो जाते थी।

पर इधर फिल्मों ने नयी-नयी बिमारियों को आम आदमी से परिचित करवाया तो अपने भी ज्ञान चक्षु खुले। गहन शोध के बाद यह बात सामने आयी कि यह बिमारी तो "पा" फिल्म में ओरो बने अमिताभ बच्चन की प्रोजेरिया नामक बीमारी से भी खतरनाक है। "पा" वाली तो फिर भी अपने रोगी को कुछेक साल दे देती है और उससे ग्रसित एक दूसरे के बारे में देख सुन धीरज धरने वाले दस-पांच रोगी मिल भी जाते हैं। पर नव-वर्ष रूपी बच्चे को लगने वाली बिमारी एक बार में एक ही को लगती है और उसको समय भी देती है तो कुछ महिनों का। खोज से यह बात भी सामने आयी है कि इस रोग को बढाने में आस-पास के माहौल का भी बहुत बड़ा हाथ होता है। प्रदुषित वातावरण का प्रभाव इस पर जहर का असर करता है।

अब ऐसे माहौल में जहां इंसान ने भगवान को ही बेच खाया है, जहां बेटियां अपने बाप के आश्रय में ही सुरक्षित नहीं हैं ! देश की बात तो दूर रही, जहां औलादें अपने मां-बाप को ही नोच-खसोट कर सड़क पर धकेल देती हों, जहां किसी की भी बहु-बेटी की आबरू पर लोग गिद्ध दृष्टि लगाये रखते हों, जहां चोर, उच्चके, कातिल ही भगवान बनते, बनाये जाते हों, जहां इंसान की करतूतों के आगे शैतान भी पानी भरता हो, उस वातावरण में, उस माहौल में वह देवतुल्य अच्छा भला निर्दोष बच्चा कैसे साल भर गुजारता होगा वही जानता है। साल भर में ही अपनी ऐसी की तैसी करवा यहां से निजात पा वह भी सुख की सांस लेता होगा।

कुछ किया भी नहीं जा पा रहा है ! फिर भी अब तो यही कामना है कि नवागत 2018 नामक इस शिशु को कम से कम पीड़ा का बोध हो। वह इस नामुराद बिमारी से तो निजात नहीं पा सकता; पर जाते-जाते इसके चहरे पर संतोष की छाया रहे, हमारे प्रति कृतज्ञ रहे कि इसको जितना भी समय मिला उसे हमने शांति और प्रेम से गुजारने दिया।  उसको आशा बंधे कि उसकी आने वाली पीढ़ी को यहां सुख, चैन और अमन देखने को मिलेगा।  यही कामना है। 

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह स्वीकारा था कि माह के उन कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जाती हैं ! जबकि समाज के कई परिवारों में शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों में रसोई में भी जाना अनुचित समझा जाता है। अब यदि इसे ही आजादी समझा जाता है तो क्या कह सकते हैं ! अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सोशल मीडिया पर एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना.......... !!

हमारे देश में कुछ धर्म-स्थल ऐसे हैं, जहां प्रवेश के उनके अपने नियम हैं, जिन पर काफी सख्ती से अमल किया जाता है। इसको ले कर काफी बहस-बाजी भी होती रही है, विरोध दर्ज करवाया जाता रहा है, आंदोलन होते रहे हैं, हो-हल्ला मचा है ! और यह सब उन लोगों द्वारा ज्यादा किया जाता है जिन पर कोई पाबंदी लागू नहीं होती। कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो इंसान की बराबरी के हिमायती होते हैं जो अच्छी बात है; पर विडंबना यह भी है कि ज्यादातर प्रतिवाद करने वालों को प्रतिबंधित वर्ग से उतनी हमदर्दी नहीं होती जितना वे दिखावा करते हैं नाहीं उन्हें वर्षों से चली आ रही ऐसी व्यवस्था को बदलने की अदम्य इच्छा होती है, उनका ध्येय किसी भी तरह खबरों में बने रहना होता है ! अपने को कुछ अलग दिखाने की लालसा होती है, प्रसिद्धि पाने की चाह इनसे कुछ भी करवा लेती है इसीलिए कुछ दिनों धूम-धड़ाका मचा ये गायब हो जाते हैं। नहीं तो कहाँ है वह कन्या जिसने जबरदस्ती शिंगणापुर के शनि-चबूतरे पर चढ़ने को ले कर हंगामा मचाया था। क्यों नहीं ऐसे लोग उन तथाकथित बाबाओं के विरुद्ध मोर्चा खोलते जो भगवान् के नाम पर ज्यादातर महिलाओं का ही शोषण करते हैं ! क्यों नहीं उन पंथों के खिलाफ आवाज उठाते जो जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का दुःसाहस करते हैं ! सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां शायद नाम मिले ना मिले पर जान को जरूर खतरा होता है !! 

सोचने की बात यह है कि ऐसी जगहों की व्यवस्था संभालने वाले लोग, विद्वान, धर्म को समझने वाले, धर्म-भीरु होते हैं। उनको क्या यह पता नहीं होता कि उनका वैसा रवैया गलत है ? क्या वे नहीं जानते कि प्रभू के यहां सब बराबर होते हैं ? क्या उन्हें मालुम नहीं कि ऊपर वाले के यहाँ कोई भेद-भाव नहीं होता ! यदि ऐसा होता तो इंसान भी अपनी हैसियत के मुताबिक़ पैदा होता और मरता ! एक ही तरह से सबका जन्म या मृत्यु नहीं होती ! फिर क्यों भगवान् के घर में ही इंसान और इंसान में फर्क किया जाता है ? कोई तो कारण होगा ?

इतिहास गवाह है कि अलग-अलग संप्रदायों के अलग-अलग मतों में, विरोधी मान्यताओं, अपने पंथ को श्रेष्ठ मनवाने की जिद, अपने इष्ट को सर्वोपरि मानने के हठ के कारण अक्सर टकराव होते रहे है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में जन-धन-स्थल को हानि पहुंचाने के उपक्रमों को भी मौके-बेमौके, जानबूझ कर अंजाम दिया जाता रहा है। हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले लोग दूसरे पंथ के पूजा-स्थल में जा गैर-वाजिब हरकतें करते हों ! शुचिता का ध्यान ना रखते हों ! स्थल के सम्मान में कोताही बरती जाती हो ! पूजा-अर्चना में बाधा उत्पन्न करते हों, और वैसे कुछ अवांछनीय, असमाजिक, गैरजिम्मेदाराना लोगों की हरकतों का खामियाजा औरों को भी भुगतना पड़ गया हो। कुछ तो प्रयोजन जरूर होगा किसी को प्रतिबंधित करने का। 

अभी कुछ दिनों पहले तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से स्वीकारा था कि माह के उन कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जाती हैं ! जबकि समाज के कई परिवारों में शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों में रसोई में भी जाना अनुचित समझा जाता है। अब यदि इसे ही आजादी समझा जाता है तो क्या कह सकते हैं ! अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सोशल मीडिया पर एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना !! हो सकता है कुछ स्थल महिलाओं के लिए सुरक्षित न होते हों, जैसे शिंगणापुर के शनिदेव का चबूतरा, जहां हर समय तेल फैला रहता है और गीले कपड़ों में जाने का प्रावधान है, इसलिए हो सकता है एक तो गीले कपडे और फिर तेल, महिलाओं को किसी भी तरह के खतरे से बचाने के लिए वहां चढ़ने से मना किया जाता हो !

रही दूसरे पक्ष की बात उन्हें भी अब बदलते हालात में अपने नियम-कानून की समीक्षा करनी चाहिए साफ़ तौर पर । गहराई से सोच-समझ कर नए विधानों को लागू करना चाहिए। सिर्फ, होता आ रहा है इसीलिए किसी बात को होते नहीं देना चाहिए। नहीं तो उस मठ जैसी बात हो जाएगी; जहां गुरूजी के पालतू बिल्ली के उत्पात के कारण आराधना के समय उसे बांधने का आदेश, उनके बाद परंपरा ही बन गया था और हर पूजा के पहले बिल्ली को बांधना अवश्यंभावी माना जाने लग गया था ! वैसे भी अब समाज पहले की अपेक्षा ज्यादा जागरूक है इसलिए उसे अब पीपल के वृक्ष या तुलसी के पौधे को बचाने के लिए, या गाय की उपयोगिता के कारण उन्हें देवी-देवता से जोड़ने की आवश्यकता नहीं रह गयी है उसे साफ़ तौर पर सीधे-सादे शब्दों में सच्चाई बता देना सबके लिए फायदेमंद रहेगा। जिससे समाज बेकार की बहसबाजी से बचा रहे। 
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गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

हॉट डॉग ! यह कैसा नाम है भई !

एक संभावना और भी कही जाती है कि जर्मनों ने अपने वीनर श्वानों और इस कबाब की एकरूपता के कारण इसे ऐसा नाम दे दिया हो। कारण कुछ भी हो पर एक खाने वाली चीज का ऐसा नाम अनोखा तो लगता ही है ना !!
अक्सर बर्गर, सैंडविच, पैटिस जैसे यूरोपीय व्यंजनों के साथ एक नाम और सुनाई पड़ जाता है, हॉटडॉग ! हालांकि यह आमिष कबाब ही है, जिसे गौ या सूअर के मांस को बेलनाकार, ट्यूब सरीखे आकार का बना, पूरी तरह पका, धुएं में सुखा, "बन" में भर कर खाया जाता है। फिर भी, यह कैसा नाम है ! फिर पता चला कि इसे फ्रैंकफर्टर और वीनर भी कहा जाता है। फ्रैंकफर्टर शब्द फ्रैंकफर्ट, जर्मनी से आया है जहां सूअर के मांस से बने सॉसेज को उसी प्रकार के बन में परोसा जाता है। जैसे हैम्बर्गर का नाम भी एक जर्मन शहर से लिया गया है। वीनर शब्द वियना, ऑस्ट्रिया, से संबंधित है, जो सूअर के मांस व गौमांस के मिश्रण से बनाए जाने वाले सॉसेज का प्रमुख स्थान है। पर यह हॉटडॉग क्या नाम हुआ !! 
सहारा अंतर्जाल का ही था, सो उसी ने बताया कि 1884 से ही "डॉग" शब्द का प्रयोग सॉसेज के पर्याय के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है, पर उस समय भी ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि ज्यादा अर्थ लाभ के लिए कुछ सॉसेज निर्माता कुत्ते के मांस का प्रयोग भी करते थे, जो उस समय चलन में भी था। जो भी हो, सॉसेज के सन्दर्भ में हॉट डॉग शब्द को सबसे पहले प्रयोग करने का विवरण बैरी पोपिक द्वारा नॉक्सविल्ले पत्रिका में पाया गया था। पता नहीं कि इसमें कितना सच है पर इस शब्द को चलन में लाने का श्रेय थॉमस एलॉसियस
नाम के एक कार्टूनिस्ट को दिया जाता है, जिसने खेल के मैदानों में बिकने वाले कबाबों को यह नाम दिया जो इतना मशहूर हो गया कि उसे 1900 ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में स्थान मिल गया। एक संभावना और भी कही जाती है कि जर्मनों ने अपने वीनर श्वानों और इस कबाब की एकरूपता के कारण इसे ऐसा नाम दे दिया हो।
कारण कुछ भी हो पर एक खाने वाली चीज का ऐसा नाम अनोखा तो लगता ही है ना !!

शनिवार, 16 दिसंबर 2017

कुत्तों ने भी "शोले" देखी...पर..!!


तकरीबन 40-42 साल पहले फिल्म “शोले" ने जो तहलका मचाया था उसकी तपिश, उसका सरूर अभी तक लोग भुले नहीं हैं। इंसान तो इंसान जानवरों पर भी उसका जादू सर चढ कर बोला था................ 

कलकत्ता के नीमतल्ला-अहिरीटोला घाट के सामने हुगली नदी के पार “बांधाघाट” का इलाका। उस कस्बाई इलाके के एक साधारण से सिनेमाघर “अशोक” में कई दिनों से शोले बदस्तूर चल रही थी। सिनेमाघर बहुत साधारण सा था। सड़क के किनारे बने उस हाल की एक छोटी सी लाबी थी। उसी में टिकट घर, उसी में प्रतिक्षालय, उसी में उपर जाने की सीढियां। वहीं अंदर जाने के लिये दो दरवाजे थे। जिसमें एक हाल के अंदर की पिछली कतारों के लिये था तथा दूसरा पर्दे के स्टेज की पास की कतारों के लिए था।  उन पर मोटे काले रंग के पर्दे टंगे रहते थे। गर्मी से बचने के लिए अंदर सिर्फ पंखों का ही सहारा होता था। शाम को अँधेरा घिरने पर हाल के दरवाजे खुले छोड़ दिये जाते थे जिससे दिन भर बंद हाल में शाम को बाहर की ठंड़ी हवा से कुछ राहत मिल सके।

दोपहर में गर्मी से बचने के लिये दो-चार “रोड़ेशियन" कुत्ते   भी लॉबी में आ कर सीढियों के निचे दुबके रहते थे। लोगों के आने-जाने से, शाम को दरवाजे खुले होने से वे भी गानों इत्यादि को सुनने के आदी हो गये थे। पर दैवयोग से उन्होंने अपने से सम्बंधित संवाद नहीं सुना था।

उस इलाके में कोई भी फिल्म एक दो हफ्ते से ज्यादा नहीं चलती थी क्योंकि अधिकांश लोग शहर जा सुविधायुक्त हाल की ठंड़क में फिल्म का मजा लेते थे। पर जब महीने भर यहां से शोले नहीं उतरी तो हमारे इन “रोड़ेशियन” को भी आश्चर्य हुआ क्योंकि वे भी कुछ दिनों बाद नये पोस्टर देखने के आदी हो गये थे। फिर दूसरी बात यह कि उन्हें अंदर से आती फिल्म की आवाजों को कई लोगों को दोहराते सुना तो उन्होंने भी एक एतिहासिक फैसला लिया कि हम भी अंदर जा यह फिल्म देखेंगे कि इसमें ऐसा क्या है जो लोग इसे बार-बार देख रहे हैं। पर अंदर जाना और उतनी देर छिप कर बैठे रहना बहुत मुश्किल काम था। किसी ने देख लिया तो लाबी की दोपहर की नींद से भी हाथ धोना पड़ सकता था। सो यह फैसला किया गया कि सब जने नहीं जायेंगें एक जना टुकड़े-टुकड़े मे पिक्चर देखेगा और रात को सब को उसके बारे में बताएगा।

तो एक दिन हमारा शेरदिल कालू रात के शो में छिपता-छिपाता अंदर चला ही गया। पर आधे घंटे के बाद ही बाहर आ खड़ा हुआ। सबने आश्चर्य से पूछा कि क्या हो गया? उसने कहा कि बस मार खाने से बच कर आ रहा हूं। सब फिर बोले अरे हुआ क्या था बताओ तो सही। तब कालू ने जवाब दिया कि मैं अंदर मुंह उठाए देख रहा था, तभी वहां एक गंदा सा आदमी आया, उसके हाथ में लंबा मोटा सा कुछ हंटर जैसा कुछ था। उसके सामने खंबे से एक आदमी बंधा हुआ था। वहीं एक सुंदर सी लड़की भी खडी थी। गंदे से आदमी ने उस लड़की से कहा, छमिया नाच के दिखा। तो खंबे से बंधा हट्टा-कट्टा आदमी बोला, नहीं बासंती, इस कुत्ते के सामने मत नाचना। अब बोलो अंदर हाल में इतने लोग नाच देखने को इकट्ठे हुए थे। उधर वह गंदा सा आदमी और बहुत से लोग बंदुके लिये खड़े थे अब मेरे कारण नाच नहीं हो पाता तो सबने मिल कर मुझे मारना ही था सो मैं भाग आया।

सब चुप हो गये समय की नजाकत को देख। पर वह जादू ही क्या जो सर पर ना चढ जाए। कुछ दिनों बाद फिर एक श्वान पुत्र के खून ने जोश मारा। उसने एलान किया कि जो भी हो वह आज रात फिल्म देख कर ही रहेगा। रात का शो शुरु होने के कुछ देर बाद वह अगले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गया। पर दस मिनट बाद ही ड़र से कांपता हुआ अपनी पूंछ को पिछले पैरों में दबाये बाहर निकला और भागता ही चला गया। उसके साथी हैरान-परेशान उसके पीछे-पीछे भागे और एक सुनसान गली में उसे जा घेरा। वह
अभी भी ड़र से कांप रहा था। सबने उससे कारण पूछा पर उसके मुंह से बोल ही नहीं फूट रहे थे। कुछ देर बाद उसने कहना शुरू किया कि मैं छिप कर ही अंदर गया था पर पता नहीं कैसे उस हट्टे-कट्टे आदमी ने मुझे देख लिया और मेरी तरफ ऊंगली उठा कर बोला, कुत्ते मैं तेरा खून पी जाऊंगा। वह शायद समझा होगा कि मैं ही हूं जिसके कारण पिछली बार नाच ना हो पा रहा था सो इस बार तो वह मुझे मार देने पर ही उतारू हो गया था। वह तो मुझे मार ही देता यदि मैं भाग ना आया होता।

इसके बाद उन शेरदिल श्वान पुत्रों की "अशोक हाल" तक जाने की तब तक हिम्मत नहीं पड़ी जब तक कि शोले वहां से उतर ना गयी। 

गुरुवार, 14 दिसंबर 2017

कैंची धाम, उत्तराखंड

चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरे परिसर में हनुमान जी के अलावा भगवान राम एवं सीता माता तथा देवी दुर्गा जी के साथ-साथ करोली बाबा का भी मंदिर है जिसमें उनकी बिलकुल सजीव सी प्रतिमा स्थापित है, जिसे देख एक क्षण के लिए तो दर्शनार्थी चकमा ही खा जाता है। कैंची धाम मुख्य रूप से बाबा नीम करौली और हनुमान जी की महिमा के लिए प्रसिद्ध है

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हमारे देश में सैकड़ों ऐसी जगहें मौजूद हैं, जिनके विख्यात होने के बावजूद बहुत ही कम लोगों को उनके बारे में जानकारी होती है। ऐसा ही एक स्थान है देव्-भूमि उत्तराखंड के नैनीताल जिले में अल्मोड़ा-रानीखेत राष्ट्रीय राजमार्ग पर नैनीताल से करीब 38 की.मी. की दूरी पर  स्थित एक दिव्य, रमणीक, लुभावना स्थल कैंची धाम। यहां सड़क कैंची की तरह दो मोड़ों से होकर आगे बढ़ती है इसीलिए इस जगह का नाम कैंची मोड़ और मंदिर का नाम कैंची धाम पड़ गया। जिसे नीम करोली बाबा का कैंची धाम नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं कि1964  में उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के एक गांव अकबरपुर से लक्ष्मी नारायण शर्मा नामक एक युवक ने यहां आ कर रहना शुरू किया था। चूँकि यहां आने से पहले उस युवक ने फर्रूखाबाद के गांव नीब करौरी में कठिन तपस्य़ा की थी, इसी कारण वे बाबा नीम करौली कहलाने लगे। महाराजजी की गणना बीसवीं शताब्दी के सबसे महान संतों में होती है।


उन्होंने 15  जून 1964 को कैंची धाम में हनुमान जी की मूर्ति की प्रतिष्ठा की। तभी से 15 जून प्रतिष्ठा दिवस के रूप में मनाया जाता है। चारों ओर से ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों से घिरे परिसर में हनुमान जी के अलावा भगवान राम तथा सीता जी, दुर्गा माता के साथ ही करौली बाबा का भी मंदिर है। जिसमें उनकी बिल्कुल सजीव सी प्रतिमा स्थापित है, जिसे देख एक क्षण के लिए तो दर्शनार्थी चकमा खा ही जाता है !

कैंची धाम मुख्य रूप से बाबा नीम करौली और हनुमान जी की महिमा के लिए प्रसिद्ध है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ आने पर व्यक्ति अपनी सभी समस्याओं के हल प्राप्त कर सकता है।


हर साल यहां पंद्रह जून को विशाल मेला लगता है, जिसमें देश-विदेश से असंख्य भक्तजन पधारकर अपनी श्रद्धा व आस्था को व्यक्त करते हैं। ऐसी मान्यता है कि यहां पर श्रद्धा एवं विनयपूर्वक की गयी पूजा कभी भी व्यर्थ नहीं जाती है तथा मांगी गई हर मनौती पूर्णतया फलीभूत होती है।

बाबा को यह जगह बहुत पसंद थी, वे यहां अपने निर्वाण दिवस 11 सितम्बर, 1973 तक अक्सर आते रहे थे। उनके साथ अनेक अलौकिक कथाएं जुडी हुई हैं। उन्होंने अपने तपोबल से लोगों का सदा उपकार कर उन्हें कष्टों, मुसीबतों से निजात दिलवाई। उनके भक्त तो उन्हें हनुमान जी का ही रूप मानते हैं।  कैंची धाम और खासकर स्वर्गीय नीम करौली बाबा के भक्तों की यहां खूब आस्था है। Apple के संस्थापक स्टीव जॉब्स और Facebook के संस्थापक व मौजूदा सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने भी कैची मंदिर आकर अपने जीवन को एक नई राह दी और अपार सफलता हासिल की। इसके अलावा जूलिया रॉबर्ट्स, डॉक्टर रिचर्ड एल्पेर्ट और मशहूर लेखक डेनियल भी यहां आ चुके हैं। 

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