सोमवार, 1 जनवरी 2018

कोई तो कारण होगा, धर्म स्थलों में प्रवेश के प्रतिबंध का !!

अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह स्वीकारा था कि माह के उन कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जाती हैं ! जबकि समाज के कई परिवारों में शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों में रसोई में भी जाना अनुचित समझा जाता है। अब यदि इसे ही आजादी समझा जाता है तो क्या कह सकते हैं ! अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सोशल मीडिया पर एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना.......... !!

हमारे देश में कुछ धर्म-स्थल ऐसे हैं, जहां प्रवेश के उनके अपने नियम हैं, जिन पर काफी सख्ती से अमल किया जाता है। इसको ले कर काफी बहस-बाजी भी होती रही है, विरोध दर्ज करवाया जाता रहा है, आंदोलन होते रहे हैं, हो-हल्ला मचा है ! और यह सब उन लोगों द्वारा ज्यादा किया जाता है जिन पर कोई पाबंदी लागू नहीं होती। कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो इंसान की बराबरी के हिमायती होते हैं जो अच्छी बात है; पर विडंबना यह भी है कि ज्यादातर प्रतिवाद करने वालों को प्रतिबंधित वर्ग से उतनी हमदर्दी नहीं होती जितना वे दिखावा करते हैं नाहीं उन्हें वर्षों से चली आ रही ऐसी व्यवस्था को बदलने की अदम्य इच्छा होती है, उनका ध्येय किसी भी तरह खबरों में बने रहना होता है ! अपने को कुछ अलग दिखाने की लालसा होती है, प्रसिद्धि पाने की चाह इनसे कुछ भी करवा लेती है इसीलिए कुछ दिनों धूम-धड़ाका मचा ये गायब हो जाते हैं। नहीं तो कहाँ है वह कन्या जिसने जबरदस्ती शिंगणापुर के शनि-चबूतरे पर चढ़ने को ले कर हंगामा मचाया था। क्यों नहीं ऐसे लोग उन तथाकथित बाबाओं के विरुद्ध मोर्चा खोलते जो भगवान् के नाम पर ज्यादातर महिलाओं का ही शोषण करते हैं ! क्यों नहीं उन पंथों के खिलाफ आवाज उठाते जो जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का दुःसाहस करते हैं ! सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां शायद नाम मिले ना मिले पर जान को जरूर खतरा होता है !! 

सोचने की बात यह है कि ऐसी जगहों की व्यवस्था संभालने वाले लोग, विद्वान, धर्म को समझने वाले, धर्म-भीरु होते हैं। उनको क्या यह पता नहीं होता कि उनका वैसा रवैया गलत है ? क्या वे नहीं जानते कि प्रभू के यहां सब बराबर होते हैं ? क्या उन्हें मालुम नहीं कि ऊपर वाले के यहाँ कोई भेद-भाव नहीं होता ! यदि ऐसा होता तो इंसान भी अपनी हैसियत के मुताबिक़ पैदा होता और मरता ! एक ही तरह से सबका जन्म या मृत्यु नहीं होती ! फिर क्यों भगवान् के घर में ही इंसान और इंसान में फर्क किया जाता है ? कोई तो कारण होगा ?

इतिहास गवाह है कि अलग-अलग संप्रदायों के अलग-अलग मतों में, विरोधी मान्यताओं, अपने पंथ को श्रेष्ठ मनवाने की जिद, अपने इष्ट को सर्वोपरि मानने के हठ के कारण अक्सर टकराव होते रहे है। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में जन-धन-स्थल को हानि पहुंचाने के उपक्रमों को भी मौके-बेमौके, जानबूझ कर अंजाम दिया जाता रहा है। हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले लोग दूसरे पंथ के पूजा-स्थल में जा गैर-वाजिब हरकतें करते हों ! शुचिता का ध्यान ना रखते हों ! स्थल के सम्मान में कोताही बरती जाती हो ! पूजा-अर्चना में बाधा उत्पन्न करते हों, और वैसे कुछ अवांछनीय, असमाजिक, गैरजिम्मेदाराना लोगों की हरकतों का खामियाजा औरों को भी भुगतना पड़ गया हो। कुछ तो प्रयोजन जरूर होगा किसी को प्रतिबंधित करने का। 

अभी कुछ दिनों पहले तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से स्वीकारा था कि माह के उन कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जाती हैं ! जबकि समाज के कई परिवारों में शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों में रसोई में भी जाना अनुचित समझा जाता है। अब यदि इसे ही आजादी समझा जाता है तो क्या कह सकते हैं ! अभी बहुत दिन नहीं हुए जब सोशल मीडिया पर एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना !! हो सकता है कुछ स्थल महिलाओं के लिए सुरक्षित न होते हों, जैसे शिंगणापुर के शनिदेव का चबूतरा, जहां हर समय तेल फैला रहता है और गीले कपड़ों में जाने का प्रावधान है, इसलिए हो सकता है एक तो गीले कपडे और फिर तेल, महिलाओं को किसी भी तरह के खतरे से बचाने के लिए वहां चढ़ने से मना किया जाता हो !

रही दूसरे पक्ष की बात उन्हें भी अब बदलते हालात में अपने नियम-कानून की समीक्षा करनी चाहिए साफ़ तौर पर । गहराई से सोच-समझ कर नए विधानों को लागू करना चाहिए। सिर्फ, होता आ रहा है इसीलिए किसी बात को होते नहीं देना चाहिए। नहीं तो उस मठ जैसी बात हो जाएगी; जहां गुरूजी के पालतू बिल्ली के उत्पात के कारण आराधना के समय उसे बांधने का आदेश, उनके बाद परंपरा ही बन गया था और हर पूजा के पहले बिल्ली को बांधना अवश्यंभावी माना जाने लग गया था ! वैसे भी अब समाज पहले की अपेक्षा ज्यादा जागरूक है इसलिए उसे अब पीपल के वृक्ष या तुलसी के पौधे को बचाने के लिए, या गाय की उपयोगिता के कारण उन्हें देवी-देवता से जोड़ने की आवश्यकता नहीं रह गयी है उसे साफ़ तौर पर सीधे-सादे शब्दों में सच्चाई बता देना सबके लिए फायदेमंद रहेगा। जिससे समाज बेकार की बहसबाजी से बचा रहे। 
#हिन्दी_ब्लॉगिंग

4 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (03-01-2018) को "2017. तुमसे कोई शिकायत नहीं" (चर्चा अंक-2837)

पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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नववर्ष 2018 की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
हार्दिक धन्यवाद

Jyoti Dehliwal ने कहा…

अब समाज पहले की अपेक्षा ज्यादा जागरूक है इसलिए उसे अब पीपल के वृक्ष या तुलसी के पौधे को बचाने के लिए, या गाय की उपयोगिता के कारण उन्हें देवी-देवता से जोड़ने की आवश्यकता नहीं रह गयी है उसे साफ़ तौर पर सीधे-सादे शब्दों में सच्चाई बता देना सबके लिए फायदेमंद रहेगा। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

ज्योति जी,
कुछ अलग सा पर सदा स्वागत है

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अभी कुछ दिनों पहले कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने सोशल मिडिया पर गर्व से यह  स्वीकारा था कि माह के उन  कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जात...