pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 18 अक्टूबर 2017

दिवाली पर जुआ खेलने वालों के अपने तर्क हैं !

पता नहीं कैसे और कब दिवाली पर जुआ खेलने की प्रथा आ जुडी ! जबकि माँ लक्ष्मी खुद कहती हैं कि वे धन का अपव्यय करने वाले और दूसरे का धन हड़पने वाले लोगों से हमेशा दूर रहती हैं तथा वहाँ रहना पसंद करती हैं, जहाँ मधुर बोलने वाले, अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक पूरा करने वाले,  ईश्वर भक्त,  इन्द्रियों को वश में रखने वाले,  व्यवहार से उदार,  माता - पिता की सेवा करने वाले, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों का वास होता है .....
#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिवाली, प्रकाश का पर्व। बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार। खुशियां बांटने-पाने का समय। सुख-समृद्धि के
लिए माँ लक्ष्मी की पूजा-अर्चना कर उनका  आशीर्वाद पाने का अवसर।  छोटा - बड़ा,  अबाल - वृद्ध,  स्त्री - पुरुष, अमीर-गरीब,  दिवाली के त्यौहार को लेकर हर कोई बहुत उत्साहित रहता है।  पूरे वर्ष भर इसका इंतजार  रहता है सब को। इसके आने के काफी समय पहले इसके स्वागत की तैयारियां प्रारंभ हो जाती हैं।   

पर जैसे हर अच्छाई के साथ कोई न  कोई बुराई भी जुडी रहती है वैसे ही पता नहीं कैसे इस पावन पर्व के साथ जुआ खेलने की प्रथा भी जुड़ती चली गयी। जुआ खेलने वालों के अपने तर्क हैं। उनके अनुसार इसी दिन शिव-पार्वती ने भी द्युत-क्रीड़ा की थी। इसीलिए इस दिन लोग जुआ खेलते हैं जबकि किसी भी पौराणिक ग्रंथ में इस बात की पुष्टि नहीं होती। यह विडंबना ही है कि लोग पुराणों में लिखी अच्छाइयों को अंगीकार नहीं करते पर सुनी-सुनाई बुराई को अपनाने में जरा भी नहीं सोचते। कुछ लोगों का ऐसा भी मानना है कि दिवाली पर जुआ खेलने से माता लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और आपके पास से कहीं नहीं जातीं।  लेकिन क्या ऐसा संभव है कि देवी-देवता किसी बुराई वाली चीज पर खुश होते हों ? उल्टा इस दिन जुआ खेलने से घर की लक्ष्मी के साथ-साथ सुख शांति भी चली जाती है। क्या ही अच्छा हो कि इन पैसों से किसी बच्चे के चेहरे पर हंसी ले आई जाए।पर हम सब पाखंडी लोग हैं ! गोष्ठियों में वैसे तो बड़ी-बड़ी बातें करेंगे, ब्लॉगों में त्योहारों की ऐसी की तैसी कर मारेंगे ! सभा-सोसायटियों में लम्बे-चौड़े भाषण देंगे. समाज-पर्यावरण पर रोना-धोना मचाएंगे ! पर जब खुद पर बात आएगी तो वही करेंगे जिसका सार्वजनिक विरोध कर वाह-वाही लूटते रहे हैं !   

माँ लक्ष्मी खुद कहती हैं कि वे वहीं रहना चाहती हैं, जहाँ मधुर बोलने वाले, अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक पूरा
करने वाले,  ईश्वर भक्त,  इन्द्रियों को वश में रखने वाले,  व्यवहार से उदार,  माता - पिता की सेवा करने वाले, क्षमाशील, दानशील, बुद्धिमान, दयावान और गुरु की सेवा करने वाले लोगों का वास होता है। धन का अपव्यय
करने वाले और दूसरे का धन हड़पने वाले लोगों से मैं हमेशा दूर रहती हूँ. 


वैसे तो जुए को एक खेल ही माना जाता है पर यह ऐसा खेल है जो घर-परिवार को अशांति ही प्रदान करता है।सामाजिक बुराइयों का प्रतीक होने के बावजूद लाखों लोग इसे खेलते हैं। हालाँकि हर युग में इसकी बुराई ही सामने आई है। महाभारत के जुए के परिणाम को कौन नहीं जानता ? एक चक्रवर्ती सम्राट हुए थे नल, उन्हें भी जुए से बहुत लगाव था और उसी के कारण वे महलराजपाठ और यहाँ तक कि अपनी सेना भी हार गए थे। उनकी हालत ऐसी हो गई कि उन्हें अपने तन के कपडे भी दांव पर लगाने पड गये और वे सब कुछ हार चक्रवर्ती सम्राट से रंक बन गए। इसी तरह एक और कथा से पता चलता है कि श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम को भी जुआ खेलने और हारने पर अपमान का सामना करना पड़ा था। भले ही यह अनंत काल से खेला जाने वाला खेल हो पर इससे आज तक किसी का भला नहीं हुआ; उल्टे
घर-परिवार, हर काल में, बर्बाद जरूर हुए हैं। इसलिए सभी को अधर्म-मय आचरण से बच कर ही रहना चाहिए, जिससे घर-परिवार में सुख-शांति का स्थाई निवास बना रहे।
    
हम सब को अपने तीज-त्योहारों के साथ आ जुडी या जोड़ दी गयीं तरह-तरह की बुराइयों को दूर कर अपने उत्सवों की गरिमा को बनाए रखने के लिए कटिबद्ध होना ही होगा। जिससे आने वाली पीढ़ियां भी उनके महत्व को समझ सकें। 

सोमवार, 16 अक्टूबर 2017

मार का डर भी ना रोक पाता था, खेलने जाने से !!

क्या दिन थे ! इधर बाबूजी जाते, बाहर से दरवाजा बंद कर, उधर मैं किसी तरह खींचते-खांचते खिड़की से निकल पहुंच जाता प्रकृति की गोद में। उस समय पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां, कीड़े-मकौड़े ही मेरे साथ होते थे। खूब बातें किया करता था उनसे, इस विश्वास के साथ कि वे भी मेरी बात को समझते-बूझते हैं। यह सब तब तक चलता था जब तक और बच्चे नहीं आ जाते थे मानवीय खेल खेलने। उनके आने की भनक लगते ही मैं अपने इन दैवीय दोस्तों को विदा कह देता था क्योंकि मेरे अंदर यह डर भी था कि कहीं कोई मेरे इन मासूम दोस्तों को हानि या चोट ना पहुंचा दे..........
#हिन्दी_ब्लागिंग
उम्र बढ़ने के साथ-साथ जब काम का बोझ कुछ कम हो गया है, थोड़ी सी निश्चिंतता साथ रहने लगी है, दिन भर में कुछ समय नितांत अपना होने लगा है तब उस सिर्फ अपने समय में पुरानी, बहुत पुरानी यादें साकार सी होने लगती हैं। पता नहीं ऐसा मेरे साथ ही हो रहा है कि सभी के साथ होता है ! अक्सर लौट जाता हूँ और खोने लगाता हूँ, वर्षों पुराने बचपन की ओर ! भोलापन, मासूमियत, शरारतें सब सामने आ-आ कर मुस्कुराने पर मजबूर कर देती हैं। यादें तो ढेर सारी हैं, पर  सब मुक्तक रूपी, टुकड़े-टुकड़े में, सिलसिलेवार न होकर एक से दुसरी तक कूद लगाती हुईं। ऐसे में सब को एक समय में एक साथ लिखना नाहीं संभव है और नाहीं मुनासिब ! फिर भी कुछेक को बंदी बनाने की चेष्टा का प्रलोभन रोका नहीं जा पाता !

उन दिनों गर्मियों में स्कूल सुबह के हो जाते थे तथा दस-साढ़े दस तक छुट्टी हो जाया करती थी। उस समय उम्र रही होगी सात-आठ साल की। पिताजी बंगाल में कलकत्ता से करीब 10-12 की.मी. दूर कोननगर नामक जगह में लक्ष्मीनारायण जूट मिल में उच्च पद पर कार्यरत थे। फर्म की तरफ से मिल के अंदर मिले बंगले में हम सिर्फ तीन जने। बाबूजी, माँ तथा मैं। दोपहर को लंच बाद माँ कुछ देर के लिए आराम करती थीं, इसलिए जब बाबूजी फिर काम पर जाते थे तो मैं धूप में बाहर ना चला जाऊं, इसलिए दरवाजे में बाहर से कुंडी लगा कर जाते थे जिसे घर में काम करने वाला जीतू, अपने आने पर खोल कर आ जाता था।

मुझे घर पर रखने का हर तरह का इंतजाम किया जाता रहता था। तरह-तरह खिलौने, उस समय उपलब्ध हर तरह की बाल-पत्रिकाएं, जिनके कुछ के नाम मुझे अभी भी याद हैं, मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू, फिर पराग आदि। धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी तथा इलस्ट्रेडेड वीकली तो अलग थीं, जिनका शौक व चस्का बाद में लगा और उनके बंद हो जाने तक रहा। हालांकि कादम्बिनी अभी भी लेता हूँ पर वो वाली बात अब कहीं नहीं रही। यह सब कुछ देर के लिए ही मुझे बाँध पाते थे। प्रकृति सदा मुझे आकर्षित करती रही है।

घर के आस-पास दसियों तरह फल और फूलदार पेड़-पौधे थे। जामुन से लेकर नारियल के पेड़, एक एकड़ में देसी-विदेशी गुलाब की नस्लों के अलावा इतने ढेर सारे फूल, चाहे बिस्तर बना लो। उस समय बिना मनाही के भी कोई बेकार में फूल-पत्तियाँ नहीं तोड़ता था। तरह-तरह के पक्षियों से भी तब सच-मुच का दोस्ताना था। कबूतर-गौरैया इत्यादि तो मेरे पास तक आ कर दाना चुगा करते थे। ढेर सारी रंग-बिरंगी, छोटी-बड़ी तितलियाँ आ-आकर मेरे सर-कंधों पर बैठ जाया करती थीं। घर में एक शीशे का दरवाजा हुआ करता था, मैं हौले-हौले, उस उम्र में भी इसका ध्यान रखते हुए कि उस कोमल जीव को कोई हानि या तकलीफ ना पहुंचे, उन्हें उस दरवाजे के पीछे कुछ देर के लिए छोड़ देता था ! पचासों तितलियाँ वहाँ उड़ कर स्वर्गिक दृश्य को साकार कर देती थीं।

उन दिनों हम बच्चों के लिए हर काम का समय निश्चित किया हुआ होता था। जिस में शाम को खेलने का समय करीब चार-साढ़े चार का तय था। पर जब हवा कुछ तेज होती थी तो मुझे लगता था कि पेड़ों की पत्तियों की सरसराहट, दसियों फिट ऊँचें नारियल के पेड़ों का झूमना, फूलोंकी सुगंध, चिड़ियों का कलरव सब मुझे बाहर बुला रहे हैं। अपनी ओर खींचते से लगते थे, ये सब ! अफ़सोस होता है आज के बच्चों को इन नेमतों से दूर होते देख !

हमारे घर में बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ थीं जिनमें सलाखें लगी हुई थीं। उनमें से एक खिड़की की सबसे आखिरी सलाख में इतने जगह थी कि मैं उस में से बाहर निकल सकूँ ! बस इधर बाबूजी जाते, उधर मैं किसी तरह खींचते-खांचते खिड़की से निकल पहुंच जाता प्रकृति की गोद में। उस समय पेड़-पौधे, फूल-पत्तियां, कीड़े-मकौड़े ही मेरे साथ होते थे। खूब बातें किया करता था उनसे, इस विश्वास के साथ कि वे भी मेरी बात को समझते-बूझते हैं। यह सब तब तक चलता था जब तक और बच्चे नहीं आ जाते थे मानवीय खेल खेलने। उनके आने की भनक लगते ही मैं अपने इन दैवीय दोस्तों को विदा कह देता था क्योंकि मेरे अंदर यह डर भी था कि कहीं कोई मेरे इन मासूम दोस्तों को हानि या चोट ना पहुंचा दे।

हानि और चोट तो मुझे मिलती थी, दुलारा होने के बावजूद, जब माँ द्वारा बाबूजी के आने पर मेरी शिकायत होती थी, खिड़की से भागने की !  

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2017

मंदिर, जहां अमिताभ के जूते पूजे जाते हैं !!

इस क्लब के कुछ मेंबर इससे असंतुष्ट भी हैं जिसका कारण इस मूर्ति का प्रारूप फिल्म "सरकार तीन" के सुभाष नागरे जैसा तथा उसके सिंहासन का अमिताभ की एक और फिल्म "अक्स" की हरे रंग की कुर्सी का होना है। दोनों ही चीजें मन में एक नकारात्मक सोच उत्पन्न करती हैं। ये लोग उनके जबरदस्त प्रशंसक तो हैं पर उन्हें भगवान मानने से हिचकते हैं....... 
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कोलकाता में बालीगंज के तिलजला इलाके का एक संकरा सा मार्ग श्रीधर राय रोड। यहीं के एक अपार्टमेंट में रहता है संजय पाटोदिया परिवार। इस परिवार के लोग "ऑल बेंगाल अमिताभ बच्चन फैंस एसोसिएशन (ABABF) के मेंबर हैं और इनके घर में भगवान की नहीं एक इंसान की पूजा की जाती है जो और कोई नहीं हिंदी फिल्म जगत के प्रसिद्ध अभिनेता अमिताभ बच्चन हैं। इन लोगों का मानना है कि कोई अलौकिक शक्ति तो जरूर है अमिताभ में, जिसके कारण तक़रीबन पचास साल (48) से वे सबके चहते बने हुए हैं। इसीलिए यहां उनकी पूजा की जाती है।   

हालांकि कोलकाता में ही अधिकाँश लोगों को इस जगह का पता नहीं है, इसके साथ ही, देश में एकाधिक व्यक्तियों के मंदिर होने के बावजूद, लोग व्यक्ति पूजा को उचित नहीं मानते और इसे पागलपन या मजाक का विषय समझते हैं। पर इन सब से किसी की रूचि को तो बदला नहीं जा सकता ! शायद इसीलिए पाटोदिया परिवार ने अपने घर के एक हिस्से में एक मंदिर नुमा म्यूजियम बना रखा है जिसमें अमिताभ की एक प्रतिमा स्थापित है। अमिताभ की रियल लम्बाई से भी कुछ ऊँची, फायबर से बनी 25 किलो की इस मूर्ति को सुब्रत बोस नाम के कारीगर ने तीन महीने में बनाया है। इसकी लागत करीब एक लाख रुपये आई है।

पर इस क्लब के कुछ मेंबर इससे असंतुष्ट भी हैं जिसका कारण इस मूर्ति का प्रारूप फिल्म "सरकार तीन" के सुभाष नागरे जैसा तथा उसके सिंहासन का अमिताभ की एक और फिल्म "अक्स" की हरे रंग की कुर्सी का होना है। दोनों ही चीजें मन में एक नकारात्मक सोच उत्पन्न करती हैं। ये लोग उनके जबरदस्त प्रशंसक तो हैं पर उन्हें भगवान मानने से हिचकते हैं। 

पर इस सब से पाटोदियों को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनके मंदिर के द्वार पर फ्लोरोसेंट लाइट से "जय अमिताभ बच्चन" जगमगाता रहता है और अंदर किसी देवता की तरह झांझ-मजीरे-घंटियों के साथ उनके भजन और आरती पूरे विधि-विधान व अनुष्ठान और पूरे जोशो-खरोश के साथ गयी जाती है। संजय पाटोदिया ने तो पूरे नौ पेज की अमिताभ चालीसा भी लिख रखी है, जिसका "हर-हर अमिताभ" और "जय श्री अमिताभ" छपा शाल ओढ़ कर, सस्वर पाठ किया जाता है। इन सब के बाद प्रसाद का वितरण भी होता है।                               

मंदिर के अगले हिस्से की दीवारें, वाल-पेपर पर लिखे "जय अमिताभ" से पटी हुई हैं जिन पर अमिताभ की फिल्मों के पोस्टर, उनकी तस्वीरों की भरमार है। इसी के साथ वहीँ एक कांच के बॉक्स में फिल्म "अग्निपथ" में उनके द्वारा पहने गए सफ़ेद चमड़े के जूते भी रखे हुए हैं, जिन्हें इन लोगों के अनुसार अमिताभ ने इनके निवेदन पर यहां भिजवाया था। ये लोग इसकी तुलना भरत की खड़ाऊं से करते हैं। रोज की पूजा-अर्चना के साथ-साथ इनकी भी पूजा की जाती है। साल में दो दिन यहां ख़ास कार्यक्रम भी होते हैं। पहला 11 अक्टूबर, अमिताभ के जन्म दिन पर और दुसरा, 2 अगस्त, जब फिल्म "कुली" के हादसे के बाद उन्होंने स्वास्थ्य लाभ किया था।  जिसे उनका दुसरा जन्म माना जाता है। इस दिन ख़ास पूजा वगैरह के बाद रक्त दान के साथ-साथ  वस्त्र वितरण तथा अमिताभ से जुडी प्रतियोगिताएं भी आयोजित की जाती हैं।    

संजय पाटोदिया अपने-आप को अमिताभ का फैन नहीं भक्त कहलाना पसंद करते हैं। उनका जनून तो इतना बढ़ गया है कि उन्होंने मंदिर में लिख रखा है कि "हे प्रभू ! क्षमा करें ! हम आपसे ज्यादा अमिताभ को पूजते हैं।" उनके अनुसार कोलकाता में अमिताभ की हर फिल्म की रिलीज  पर वह उसकी  सफलता  के लिए प्रार्थना करते

हैं, उनके जैसे कपडे पहन कर हॉल पर जा मिठाई का प्रसाद बांटते हैं। अमिताभ की हर एक गतिविधि का लेखा-जोखा रखा जाता है। इन लोगों के लिए उनकी हर बात प्रभू का आदेश है सिवा इसके कि उनको इंसान माने भगवान नहीं।

कोलकाता के लोगों के मन में एक प्रश्न अक्सर सर उठता है कि पाटोदिया परिवार का यह सारा ताम-झाम कहीं खुद को प्रचारित करने के लिए तो नहीं ? कुछ ऐसा अलग सा करना कि देश-विदेश में नाम हो ? लोग जानें, जगह-जगह उनकी चर्चा हो ! जिसमें वे पूरी तौर पर तो नहीं पर कुछ तो सफल हो ही गए हैं। क्योंकि कोई भी हस्ती पूजा करवाने की हद तक तब पहुंचती है, जब बिना अपने स्वार्थ के उसका समाज के उत्थान में बहुत बड़ा हाथ हो, देश के लिए परिवार समेत समर्पण हो, बहुत ही ख़ास आध्यात्मिक, चारित्रिक या बौद्धिकता की मिसाल कायम की गयी हो ! शायद अमिताभ जी को भी तथाकथित मंदिर को लेकर यहां के अधिकाँश लोगों में उसके बारे में उनकी सोच, मानसिकता और उदासीनता का पता है, इसीलिए दसियों साल बीत जाने पर भी उन्होंने अभी तक यहां आना उचित नहीं समझा है !  आगे की भगवान् जाने !!!     

शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2017

आपको लोग नाम से जानते हैं कि घर के नंबर से ?

आज कालोनी में एक अजीब सी स्थिति आ खड़ी हुई ! एक घर में गमी छाई हुई थी; आंसुओं, सिसकियों से भरा उदासी-गम का माहौल था ! ना पूरी होने वाली क्षति हुई थी ! दूसरी तरफ एक ने नया घर लिया था, इस उपलब्धि पर उसका अपने परिवार-परिजनों के साथ खुश होना वाजिब था। बैंड, ढोल, ताशे बज रहे थे ! इस खुशी और गम के बीच सिर्फ दो मकान थे !! 

शहरों को कंक्रीट का जंगल कहा जाता है ! पर प्रकृति निर्मित जंगल फिर भी बेहतर हैं। भले ही वहाँ जंगल राज चलता हो पर वहां के रहवासी एक-दूसरे को, उनकी प्रकृती को जानते-समझते तो हैं ! इन शहरी कंक्रीट के जंगलों में तो इंसान अपने परिवार तक ही सिमट कर रह गया है। समय ही नहीं है किसी के पास किसी के लिए। पहले छोटे शहरों-गावों में अधिकाँश लोग एक परिवार जैसे हुआ करते थे। सब का सुख-दुख तक़रीबन साझा हुआ करता था।

समय काफी बदल गया है; गंगा में बहुत सा पानी बह चुका है जो अपने साथ-साथ लोगों की आँख का पानी भी बहा कर ले गया है ! अब तो मौहल्ले, कालोनी को छोड़िए लोग अपने पड़ोसी तक को पहचानने से गुरेज करने लगे हैं ! आस-पड़ोस के लोगों की पहचान भी घरों के नंबर से होने लगी है, किसी से पूछिए मल्होत्रा जी कहाँ रहते है तो छूटते ही उलटा पूछेगा, कौन 312 वाले ? जो गंजे से हैं ? किसी कालोनी में जा किसी बच्चे से कोई पूछे कि शर्मा जी को जानते हो तो पलट कर वही पूछेगा, घर का नंबर क्या है ? यदि बताया जाएगा कि 162 में ग्राउंड फ्लोर; तो वह घर की दिशा ही बता पाएगा। यदि गलती से दो-तीन लोगों के बीच जा, पूछा जाए कि सदानंद वर्मा जी कहाँ रहते हैं तो पहले वे आपस में ही तसल्ली करेंगें; वही, जिनका हार्ट का ऑपरेशन हुआ था ? अरे नहीं वे तो थर्ड फ्लोर पर हैं अग्रवाल, वर्मा जी उनके नीचे रहते हैं, 224 में। तीन साल हो गए, एक-दो बार दुआ-सलाम ही हुई है, बस !!

अब ऐसे में जब जान-पहचान ही नहीं है तो कौन किसके सुख-दुःख में शामिल होगा ! क्या कोई किसी के काम आएगा ! क्या किसी के प्रति किसी की संवेदना रहेगी ! ऐसे में क्या ठीक है क्या नहीं या कौन सही है कौन गलत; इसका फैसला करना भी मुश्किल है।   

कल मेरे बगल वाले मकान में एक सज्जन का देहांत हो गया। सारा क्रिया-कर्म संध्या तक जा कर हो पाया। उनके घर से ठीक दो मकान छोड़ तीसरी बिल्डिंग में गृह-प्रवेश था। वहाँ आज सुबह से ही उत्सव का माहौल बना हुआ था। नौ बजे से ही बैंड-बाजे के साथ नाच-गाना शुरू हो गया। कुछ अजीब सी स्थिति लगी। घंटे-पौन घंटे के बाद शोर थमा तो लगा कि अगले की भी तो अपनी ख़ुशी मनाने का पूरा हक़ है, चलो घंटे भर ही सही शोर बंद तो हुआ। पर कुछ देर बाद फिर वहीँ ढोल बजना शुरू हो गया जिसके साथ-साथ फिर वैसा ही शोर-शराबा ! कुछ देर बाद ताशे बजने लगे; फिर तुरही-शहनाई जैसा कुछ !! यानी अगले ने अपने आने की घोषणा पूरे जोशो-खरोश से सबके कानों तक पहुंचाई। किसी के दुःख-दर्द का बिना एहसास किए; और यह सब करीब दोपहर एक बजे तक चलता रहा ! खुशी और गम के बीच सिर्फ दो मकान थे !! 

यह सब सही था या गलत इसके लिए कोई पैमाना तो है नहीं। एक के घर गमी थी; ना पूरी होने वाली क्षति ! उदासी-गम का माहौल ! दूसरी तरफ एक ने नया घर लिया था, इतनी बड़ी उपलब्धि पर उसका, परिवार-परिजनों के साथ खुश होना वाजिब था। बाकी के लोगों का दोनों घरों से कोई रिश्ता भी नहीं है, निरपेक्ष हैं सभी।पर क्या नवागत से, दूसरा परिवार कभी मन की कसक दूर कर पाएगा ? क्या दोनों एक-दूसरे से सहज हो पाएंगे ? कुछ तो कहीं था जो कचोट रहा था, ऐसा क्यों लग रहा था जैसे संवेदनाएं खत्म हो चुकी हैं, क्या उत्सव को बिना शोर-शराबे के संयमित हो नहीं मनाया जा सकता था ? 
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मंगलवार, 26 सितंबर 2017

.....बच बच के, बच के कहाँ जाओगे !

लोग बसों से आते-जाते थे, उसके किराए बढ़ा दिए गए ! लोग ने चुप रह मेट्रो का रुख किया तो उसकी कीमतें भी बढ़ा दी गयीं ! तर्क ये कि सालों से इसका किराया नहीं बढ़ा है ! गोयाकि सालों से नहीं बढ़ा है सिर्फ इसीलिए बढ़ाना जरुरी है; भले ही वह फायदे में चल या चलाई जा सकती हो ! पर नहीं सबसे आसान तरीका सब को यही सूझता है कि मध्यम वर्ग की जेब का छेद बड़ा कर दिया जाए.........
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एक पुरानी फिल्म, यकीन, का गाना है, "बच बच के, बच के, बच बच के, बच के कहाँ जाओगे" ! जो आज पूरी तरह देश के मध्यम वर्ग पर लागू हो फिर मौंजूं है ! उस गाने के बोलों को बिना जुबान पर लाए, आजमाया जा रहा है, देश के इस शापित वर्ग पर।  देश की जनता समझ तो सब रही है ! फिलहाल चुप है। पर उसकी चुप्पी को अपने हक़ में समझने की भूल भी लगातार की जा रही है। आम-जन के धैर्य की परीक्षा तो ली जा रही है, पर शायद यह सच भुला दिया गया है कि हर चीज की सीमा होती है। नींबू चाहे कितना भी सेहत के लिए मुफीद हो, ज्यादा रस पाने की ललक में अधिक निचोड़ने पर कड़वाहट ही हाथ लगती है....। 

किसके बूते ?
अभी बैंकों की सर्कस चल ही रही है।  जिसके तहत पैसे जमा करने, रखने, कितने रखने, निकालने, कितने निकलने जाइए करतब दिखाए जा रहे हैं। तंग हो कर भी लोगों ने शो चलने दिया है ! क्योंकि रोजी-रोटी की कशमकश के बाद थके-टूटे इंसान के पास यह सब सोचने का समय ही कहाँ छोड़ा गया है ! पर विरोध का ना होना भी अन्याय का समर्थन ही है। इसी विरोध के ना होने से साथ ही बारी आ गई किरायों की; लोग बसों से आते-जाते थे, उसके किराए बढ़ा दिए गए ! लोग ने चुप रह मेट्रो का रुख किया तो उसकी कीमतें भी बढ़ा दी गयीं ! तर्क ये कि सालों से इसका किराया नहीं बढ़ा है ! गोयाकि सालों से नहीं बढ़ा है सिर्फ इसीलिए बढ़ाना जरुरी है;
भले ही वह फायदे में चल या चलाई जा सकती हो ! पर नहीं सबसे आसान तरीका सब को यही सूझता है कि मध्यम वर्ग की जेब का छेद बड़ा कर दिया जाए। आम नागरिक फिर कड़वा घूंट पी कर रह गया। लोगों ने इसका तोड़, कार-स्कूटर पूल कर निकाला तो फिर इस बार सीधे पेट्रोल पर ही वार कर दिया गया। उस पर तरह-तरह के टैक्स, फिर टैक्स पर टैक्स, फिर सेस, पता नहीं क्या-क्या लगा उसकी कीमतों को अंतर्राष्ट्रीय कीमतों से भी दुगना कर दिया गया। हल्ला मचा तो हाथ झाड़ लिए !

सरकारी, गैर-सरकारी कंपनियों की कमाई कहाँ से आती है; मध्यम वर्ग से ! देश भर में मुफ्त में अनाज, जींस, पैसा बांटा जाता है उसकी भरपाई कौन करता है; मध्यम वर्ग। सरकारें बनाने में किसका सबसे ज्यादा योगदान रहता है; मध्यम वर्ग का। फिर भी सबसे उपेक्षित वर्ग कौन सा है; वही मध्यम वर्ग !! अब तो उसे ना किसी चीज की सफाई दी जाती है नाहीं कुछ बताना गवारा किया जाता है। तरह-तरह की बंदिशों के फलस्वरूप इस वर्ग के अंदर उठ रहे गुबार को अनदेखा कर उस पर  धीरे-धीरे हर तरफ से शिकंजा कसा जा रहा है कि कहीं बच के ना निकल जाए ! ऐसा करने वाले उसकी जल्द भूल जाने वाली आदत और भरमा जाने वाली फितरत से पूरी तरह वाकिफ हैं, इसीलिए अभी निश्चिंत भी हैं। पर कब तक ???

शनिवार, 23 सितंबर 2017

रंभ पुत्र महिषासुर, जिसका दो बार वध किया माँ भवानी ने !

एक बार अपने विजय अभियान से लौटते हुए असुर रंभ ने एक सरोवर में एक भैंस को जल-क्रीड़ा करते हुए देखा तो उस पर मोहित हो उसने प्रणय निवेदन किया, जिसके स्वीकार होते ही उसने भैंसे का रूप धर उस श्यामला नामक महिष-कन्या से विवाह कर लिया और वहीं रहने लगा। ऐसा उल्लेख भी  मिलता है कि श्यामला एक राजकुमारी थी जिसे श्रापवश भैंस का रूप मिला था। इन्हीं के संयोग से महिषासुर का जन्म हुआ.....
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पौराणिक काल में देव - दानवों के बीच अक्सर युद्ध होते रहते थे। इसी  बीच कश्यप ऋषि और दक्ष-पुत्री  दनु के
असुर वंश में दो पराक्रमी भाइयों, रंभ और करंभ का जन्म हुआ। जब वे दोनों युवावस्था में पहुंचे और असुरों की दयनीय अवस्था और हालत देखी तो उन्होंने शक्तिशाली होने के लिए तपस्या करने की ठानी।  रंभ ने अग्नि में बैठ कर अग्निदेव की, और करंभ ने पानी में जा कर वरुणदेव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तप करना शुरू किया। उनकी तपस्या को अपने आसन के लिए ख़तरा मान देवराज इंद्र ने उन पर आक्रमण कर दिया। उसने मगर का रूप धर पानी में जा करंभ को मार डाला; पर अग्निदेव द्वारा रंभ की रक्षा करने के कारण वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ पाया। समय के साथ रंभ की तपस्या पूर्ण हुई और अग्निदेव ने उसे वरदान दिया कि वह देव-दानव-मनुष्य किसी से भी मृत्यु को प्राप्त नहीं होगा उसकी मौत सिर्फ मरे हुए इंसान द्वारा ही होगी। अब मरा हुआ इंसान किसी को कैसे मार सकता है यह सोच रंभ को अपने अमर होने का गुमान हो गया। धीरे-धीरे वह शक्तिशाली होने के साथ-साथ अराजक भी होता चला गया। उसने अनेक सिद्धियां भी प्राप्त कर लीं. चहुँ ओर उसकी तूती बोलने लगी। 

एक बार अपने विजय अभियान से लौटते हुए रंभ ने एक सरोवर में एक भैंस को जल-क्रीड़ा करते हुए देखा तो उस पर मोहित हो उसने प्रणय निवेदन किया जिसके स्वीकार होते ही उसने भैंसे का रूप धर उस त्रिहायणी नामक महिष-कन्या से विवाह कर लिया और वहीं रहने लगा।ऐसा उल्लेख भी  मिलता है कि श्यामला एक राजकुमारी थी जिसे श्रापवश भैंस का रूप मिला था। इधर देवासुर संग्राम तो चलता ही रहता था। दोनों पक्ष एक-दूसरे पर विजय पाने के लिए तरह-तरह के उपाय खोजते रहते थे। समय के साथ-साथ देताओं ने रंभ की मौत का जरिया भी खोज निकाला। ऋषि दाधीच की हड्डियों से बने अस्त्र, वज्र से उस पर हमला कर उसे मौत के घात उतार दिया। अग्निदेव के वरदानानुसार एक मृत व्यक्ति ही रंभ की मौत का कारण बना। पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि उसका पुनर्जन्म रक्तबीज के रूप में हुआ था जो शुंभ-निशुंभ की सेना का सेनापति बना था। इस बार उसे वरदान प्राप्त था कि यदि उसके खून की एक बूँद भी धरती पर गिरेगी तो वह पुन: जीवित हो जाएगा। इस तरह उसने फिर एक तरह से अमरत्व पा लिया था। उसके आतंक को ख़त्म करने के लिए माँ दुर्गा ने माँ काली का अवतार ले उसका अंत किया था। 

उधर रंभ और त्रिहायणी के संयोग से महिषासुर का जन्म हुआ, जिसको  यह शक्ति  प्राप्त  थी कि  वहअपनी
इच्छानुसार कभी भी असुर  या  महिष का रूप धर सकता था।  महिषासुर ने  ब्रम्हा जी की कठोर तपस्या कर वरदान प्राप्त कर लिया था कि कोई भी देवता, दानव,मनुष्य, पशू-पक्षी  उसपर विजय प्राप्त नहीं कर सकेगा। इस तरह वह उच्श्रृंखल हो तीनों लोकों में उत्पात मचाने लगा। स्वर्ग पर आक्रमण कर दिया और इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर कब्ज़ा कर लिया  तथा सभी देवताओं को वहाँ से खदेड़ दिया। देवगण परेशान होकर ब्रम्हाविष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुँचे। पर सारे देवता मिल कर भी उसे परास्त नहीं कर पाए। तब सबने मिल कर आर्त स्वर में माँ दुर्गा का आह्वान किया। उनके प्रकट होने पर उनकी पूजा-अर्चना कर अपनी विपत्ति से छुटकारा दिलवाने की प्रार्थना की। माँ भगवती ने देवताओं पर प्रसन्न होकर उन्हें शीघ्र ही महिषासुर के भय से मुक्त करने का आश्वासन दिया। माँ के दिलासा देने पर सभी देवों ने अपने-अपने आयुध उन्हें सौपें। महामाया हिमालय पर पहुँचीं और अट्टहासपूर्वक घोर गर्जना की। उस भयंकर शब्द को सुनकर दानव डर गये और पृथ्वी काँप उठी। भयंकर युद्ध छिड़ गया। एक-एक करके महिषासुर के सभी सेनानी देवी के हाथों से मृत्यु को प्राप्त हुए। महिषासुर का भी भगवती के साथ भयंकर
युद्ध हुआ। उसने नाना प्रकार के मायाविक रूप बनाकर महामाया के साथ युद्ध किया, पर उसकी एक ना चली। जब उसे लगने लगा कि अंत नजदीक है तो उसने माँ से अपने कृत्यों के लिए क्षमा मांगी। माँ ने उसे क्षमा करते हुए वरदान भी दिया कि आने वाले समय में उनके साथ उसकी भी पूजा की जाएगी। इसीलिए आज भी नवरात्रों में माँ दुर्गा की प्रतिमा के साथ ही महिषासुर की मूर्ति भी बनती है। माँ भगवती द्वारा महिषासुर के वध से देवताओं में ख़ुशी व्याप्त गयी, उन्होंने माँ की स्तुति की और भगवती महामाया प्रत्येक संकट में देवताओं का सहयोग करने का आश्वासन देकर अंतर्धान हो गयीं। 

गुरुवार, 21 सितंबर 2017

भाषा में मुहावरों का तड़का

हिंदी में तो मुहावरों की भरमार है। इसमें  मनुष्य के सर से लेकर पैर तक हर अंग के ऊपर एकाधिक मुहावरे बने हुए है। इसके अलावा खाने-पीने, आने-जाने, उठने-बैठने, सोने-जागने, रिश्ते-नातों, तीज-त्योहारों, हंसी-ख़ुशी, दुःख-तकलीफ, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, कथा-कहानियों, स्पष्ट-अस्पष्ट ध्वनियों, शारीरिक-प्राकृतिक या मनोवैज्ञानिक चेष्टाओं तक पर मुहावरे गढ़े गए हैं; और तो और हमने ऋषि-मुनियों-देवों तक को इनमे समाहित कर लिया है....

#हिन्दी_ब्लागिंग 
संसार की हर समृद्ध भाषा में मुहावरों का अपना एक अलग स्थान है। जिस तरह किसी पुरुष या नारी के व्यक्तित्व में थोड़े से साज-श्रृंगार व उचित परिधान से और निखार आ जाता है; या जिस तरह भोजन-व्यजंन, मिर्च-मसालों  के प्रयोग से और स्वादिष्ट हो जाते हैं; जिस तरह बाग़-बगीचे में फूलों की क्यारियां उसे और मनोहर बना देती हैं, उसी प्रकार किसी भी भाषा को मुहावरों का प्रयोग और रुचिकर बना देता है। उसमें एक गहराई, एक अलग प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। शायद ही कोई ऐसा इंसान होगा जिसने कभी इनका प्रयोग किया-देखा-सुना ना हो !  

इसका प्रयोग कैसे और कब शुरू हुआ इसकी जानकारी मिलना बहुत मुश्किल है, पर यह कहा जा सकता है कि मनुष्य ने शारीरिक चेष्टाओं, अस्पष्ट ध्वनियों और बोलचाल की किसी शैली का अनुकरण या उसके आधार पर उसके सामान्य अर्थ से भिन्न कोई विशेष या विशिष्ट अर्थ देने वाले वाक्य, वाक्यांश या शब्द-समूह को मुहावरे का नाम दिया होगा। ऐसे वाक्य जन-साधारण के अनुभवों, अनुभूतियों, तजुर्बों से अस्तित्व में आते रहे होंगे। जिनमें व्यंग्य का पुट भी मिला होता था। इन्हें लोकोक्ति के नाम से भी जाना जाता है। इनके बिना तो भाषा की कल्पना भी मुश्किल लगती है।    

किसी भी भाषा में मुहावरों का प्रयोग भाषा को सुंदर, प्रभावशाली, संक्षिप्त तथा सरल बनाने के लिए किया जाता है। हिंदी में तो मुहावरों की भरमार है। इसमें  मनुष्य के सर से लेकर पैर तक हर अंग के ऊपर एकाधिक मुहावरे बने हुए है। इसके अलावा खाने-पीने, आने-जाने, उठने-बैठने, सोने-जागने, रिश्ते-नातों, तीज-त्योहारों, हंसी-ख़ुशी, दुःख-तकलीफ, जीव-जंतुओं, पशु-पक्षियों, कथा-कहानियों, स्पष्ट-अस्पष्ट ध्वनियों, शारीरिक-प्राकृतिक या मनोवैज्ञानिक चेष्टाओं तक पर मुहावरे गढे गए हैं; और तो और हमने ऋषि-मुनियों-देवों तक को इनमे समाहित कर लिया है। पर इसके साथ ही एक बात ध्यान देने की यह भी है कि मुहावरे किसी-न-किसी तरह के अनुभव पर आधारित होते हैं। इसलिए उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन या उलटफेर नहीं किया जाता है।जैसे गधे को बाप बनाना या अपना उल्लू सीधा करना; इनमें गधे की जगह बैल या उल्लू की जगह कौवा कर देने से उनका अनुभव-तत्व नष्ट हो जाता है और वह बात नहीं रह जाती। 

इनकी कुछ विशेषताएं भी हैं, जैसे - ये वाक्यांश होते हैं। मुहावरे का प्रयोग वाक्य के प्रसंग में ही होता है, अलग नहीं। मुहावरा अपना असली रूप कभी नही बदलता कार्टून चरित्रों की तरह ये सदैव एक-से रहते हैं, अर्थात उसे पर्यायवाची शब्दों में अनूदित नही किया जा सकता। इनका प्रयोग करते समय इनका शाब्दिक अर्थ न लेकर विशेष अर्थ लिया जाता है। इनके विशेष अर्थ भी कभी नहीं बदलते। ये लिंग, वचन और क्रिया के अनुसार वाक्यों में प्रयुक्त होते हैं; हाँ समय, समाज और देश की तरह नए-नए मुहावरे भी बनते रहते हैं। आज के मशीनी युग के मुहावरों और पुराने समय के मुहावरों तथा उनके प्रयोग में भी अंतर साफ़ दिखलाई पड़ता है 

उदाहरण के तौर पर आज कुछ मुहावरों को यहां आमंत्रित करते हैं, जो खान-पान संबंधित चीजों से अटे पड़े हैं। पता नहीं विशेषज्ञों से कोई पदार्थ छूटा भी है कि नहीं, देखिए ना, कहीं "खिचड़ी अलग पक रही है" तो "कहीं अकेला चना भाड़ फोड़ने की बेकार कोशिश में लगा हुआ है।" तो "कहीं लोहे के चने चबवा दिए जाते हैं।" फलों की बात करें तो यहां "आम के आम गुठली के भी दाम" मिलते हैं ! कहीं "खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदल लेता है" तो "किसी के अंगूर ही खट्टे होते हैं।" किसी की "दाल नहीं गलती" तो "कहीं दाल में कुछ काला हो जाता है।" कहीं कोई "घर बैठा रोटियां तोड़ता है," तो "किसी की दांत काटी रोटी होती है" तो "किसी का आटा ही गीला हो जाता है।" कोई "मुंह में दही जमाए बैठ जाता है" तो "कोई अपने दही को खट्टा भी नहीं कहता।" सफलता के लिए किसी को "पापड बेलने पड़ जाते हैं" तो किसी का "हाल बेहाल हो जाता है" ऐसे में "ये मुंह और मसूर की दाल सुनना" पड़ता है। कुछ लोग "गुड़ खाते हैं पर गुलगुले से परहेज कर" "गुड़ का गोबर कर देते हैं।' कहीं कोई "ऊँट के मुंह में जीरा" देख "राई का पहाड़" और "तिल का ताड़ बना कर", "जले पर नमक छिड़कने" से भी बाज नहीं आता है। किसी के "दांत दूध के होते हैं" तो कुछ "दूध से नहाए होते हैं।" वहीँ कुछ लोग "दूध का दूध पानी का पानी" कर "छठी का दूध याद दिला" कर किसी को "नानी की याद दिलवा देते हैं।" हमारे यहां मिठाइयों से भी तरह-तरह की अजीबोगरीब उपमाएं रच दी गयी हैं ! जैसे किसी टेढ़े व्यक्ति को "जलेबी की तरह सीधा" बता कर उसकी असलियत बताई जाती है तो किसी मुश्किल काम को "टेढ़ी खीर" कहा जाता है ! किसी के अच्छे वचनों के लिए उसके "मुंह में घी शक्कर" भर दी जाती है तो किसी की सफलता पर उसके "दोनों हाथों में लड्डू।" थमा दिए जाते हैं। किसी की "पाँचों उंगलियां घी में होती हैं" तो किसी की "खिचड़ी में ही घी गिरता है।"  इसी कारण हम "खाते-पीते घर के लगते हैं।"   औरों की तो क्या कहें, हमारे यहां तो "अंधे भी रेवड़ियां बांट" कर "दाल-भात में मूसरचंद बन जाते हैं।" इन मुहावरों की दुनिया तो इतनी विशाल है जैसे "सुरसा का मुंह" कि इन पर "पूरा ग्रंथ लिखा जा सकता है।" यह भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि "मुहावरे अनंत मुहावरा कथा अनंता"। 

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