बुधवार, 14 जून 2017

शनिवार वाड़ा, पेशवा बाजीराव का किला

शनिवार वाड़ा,  महाराष्ट्र राज्य के पुणे ज़िले में स्थित वह दुर्ग है जिसका निर्माण 1746 में छत्रपति साहू जी के
शनिवारवाडा में बाजीराव पेशवा की प्रतिमा 
प्रमुख सरदार, पेशवा बाजीराव 
 ने अंग्रेजों के साथ अपने तीसरे युद्ध के दौरान करवाया था। ऐसा कहा जाता है कि एक बार पेशवा बाजी राव को यहाँ एक खरगोश के डर से कुत्ते को भागते देख इस जगह पर किला बनाने की प्रेरणा मिली। इस सात मंजिला इमारत के सबसे ऊपरी भाग में पेशवा की अपनी रिहाइश थी जिसे "मेघदंबरी" के  नाम से जाना जाता था। जहां से 17 की.मी. दूर, आलंदी का जनेश्वर मंदिर  साफ़  नजर आता था। हालांकि 1838 में हफ्ते भर तक लगी रही एक 

आग से इसकी कई इमारतें पूरी तरह नष्ट हो गयी थीं, पर बचे हुए हिस्से को संरक्षित कर अब इसे एक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर दिया गया है। इस किले की नींव शनिवार के दिन रखी गई थी इसलिए इसका नाम शनिवार वाडा पड़ा। इस पर 1818 तक पेशवाओं की हुकूमत रही। इसके पांच प्रवेश द्वार हैं -   
दिल्ली दरवाजा : यह इस किले का सबसे प्रमुख द्वार है, उत्तर दिशा में स्थित यह द्वार इतना ऊँचा और चौड़ा है कि हौदे सहित हाथी निकल सकता है। हमले के वक़्त हाथियों से इस गेट को बचाने लिए इस गेट के दोनों पलड़ो में 12 इंच लम्बे 72 नुकीले कीले लगे हुए है जो कि हाथी के माथे तक की ऊँचाई तक जाते हैं। दरवाज़े के दाहिने पल्ले में एक छोटा द्वार है जो सैनिको के आने जाने के लिए बनाया गया था। 
मुख्य द्वार 

मस्तानी दरवाजा : यह दरवाज़ा दक्षिण दिशा की ओर खुलता है। बाजीराव  की पत्नी मस्तानी जब किले से बाहर जाती तो इस दरवाज़े का उपयोग करती थी।  इसलिए इसका नाम मस्तानी दरवाज़ा है। वैसे इसका एक और नाम अली बहादुर दरवाज़ा भी है।
मस्तानी दरवाजा 

खिड़की दरवाजा : यह पूर्व दिशा में खुलने वाले दरवाज़े में एक खिड़की बनी हुई है, इसलिए इसे खिड़की दरवाज़ा कहा जाता है।

जंभुल दरवाजा :  दक्षिण दिशा में स्थित इस द्वार से दास-दासियों का महल में आना-जाना होता था। नारायण राव पेशवा की ह्त्या के बाद उसकी लाश के टुकड़ो को इसी रास्ते से किले के बाहर ले जाया गया था इसलिए इसे नारायण दरवाज़ा भी कहा जाता है।


गणेश दरवाजा : किला परिसर में स्थित गणेश रंग महल के पास दक्षिण-पूर्व दिशा में स्थित होने के कारण  इसे गणेश द्वार का नाम दिया गया है।  

जैसा कि अधिकाँश किलों के साथ बर्बर घटनाएं भी जुडी होती हैं इस किले के साथ भी एक षड्यंत्र की कहानी जुडी हुई है। बाजीराव पेशवा के तीन पुत्र थे। विश्वासराव, महादेव राव और नारायण राव। विश्वासराव पानीपत की तीसरी लड़ाई में मारे गए थे। बाजी राव की मृत्यु के पश्चात् महादेव राव राजा बने पर कुछ समय पश्चात् ही उनका भी निधन हो गया तब सिर्फ सोलह साल की आयु में नारायण राव को गद्दी पर बैठना पड़ा। पर जैसाकि राजपरिवारों में होता रहा है, नारायण राव के काका-काकी, रघुनाथ राव और आनंदी बाई, उनके राजा बनाने से खुश नहीं थे उन्होंने  षड्यंत्रपूर्वक गार्दी कबीले के लोगों से मिल नारायण राव की ह्त्या करवा दी। कई लोगों का ऐसा भी कहना है कि रघुनाथ राव बालक को मारना नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने अपने संदेश में लिखा था  "नारायणराव ला धरा" जिसे उनकी पत्नी ने "नारायणराव ला मारा" कर दिया था।  बालक ने अपने अंतिम क्षणों में अपने काका से अपने को बचाने की गुहार लगाईं, पर होनी हो कर रही। कहते हैं बच्चे नारायण राव की आत्मा आज भी किले में "काका माला बचावा" कहते हुए दौड़ती, सुनाई पड़ती है। इसलिए इस किले को देश के अभिशप्त किलों में शुमार किया गया है। 

अब जैसे-जैसे पुणे की आबादी बढती जा रही है, वैसे-वैसे किले के चारों ओर सड़कों, दुकानों का जाल भी बिछता जा रहा है। जरुरत है ऐसी ऐतिहासिक धरोहरों को गंभीरता से संरक्षण देने की, बचाने की।  

शुक्रवार, 9 जून 2017

एक थे दगडूसेठ, पुणे के

गणेशोत्सव पर मुंबई के सिद्धि विनायक और पुणे के दगडूसेठ हलवाई गणपति के उत्सवों को देख वहाँ जा साक्षात दर्शनों की इच्छा कई दिनों से थी।  जिनमें से एक पिछले अप्रैल में पुणे प्रवास के दौरान पूरी हुई जब  दगडूसेठ गणपति जी ने दिल खोल कर दर्शन दिए, रात्रि की अंतिम आरती का समय था। वहीँ उपस्थित लोगों से जो जानकारी प्राप्त हुई वही प्रस्तुत है....   

दगडूसेठ गडवे जी का चित्र 
वर्षों पुरानी बात है एक सज्जन, सपरिवार कर्नाटक से आ कर पुणे में बस गए। जीवन-यापन के लिए यहां उन्होंने अपना पुश्तैनी हलवाई का कारोबार शुरू करते हुए अपनी मिठाई की दूकान खोल ली।   प्रभू की  कृपा से काम चल निकला और ख्याति 
इतनी बढ़ गयी कि उनका उपनाम ही हलवाई पड़ गया। ये सज्जन थे दगडूसेठ गडवे। आज भी उनकी वह दूकान पुणे में बुधवार पेठ में दत्ता मंदिर के पास काका हलवाई के नाम से मौजूद है।

जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था तभी शहर में प्लेग की बिमारी का प्रकोप हुआ जिसमें दगडूसेठ के लड़के की भी मौत हो गयी। इस वज्र-प्रहार से पति-पत्नी गहरे सदमे में चले गए, हर चीज से किनारा कर लिया। उनको इस हालत से उबरने के लिए उनके गुरु श्री माधवनाथ महाराज ने उन्हें एक गणेश मंदिर बना समाज सेवा के लिए उद्यत किया। दगडूसेठ और उनकी पत्नी लक्ष्मीबाई दोनों प्राणपण से इस काम में जुट गए। यह मंदिर 1893 में बन कर तैयार हुआ। जिसे सभी दगडूसेठ हलवाई गणपति मंदिर के नाम से जानने लगे। धीरे-धीरे पुणे के इस गौरवशाली मंदिर की ख्याति महाराष्ट्र से से होते हुए पूरे देश में फ़ैल गयी। आज जिस तरह मुंबई के
सिद्धि विनायक की महिमा है उसी तरह देश-विदेश सब जगह इस मंदिर की भी ख्याति व्याप्त है।  दूर-दूर से लाखों भगत हर साल प्रभु गणेश के दर्शन हेतु आने लगे। देश की बड़ी-बड़ी विभूतियाँ भी अपनी मनोकामना लेकर गणपति के आशीष के लिए यहां पहुंचती रही हैं। गणेशोत्सव के दस दिनों में महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री का यहां आना तो एक परंपरा ही बन गया है। कहते हैं श्री लोकमान्य तिलक जी के साथ दगडूसेठ की बहुत आत्मीयता थी। तिलक जी को उनके मंदिर निर्माण तथा गणपति जी के प्रति समर्पण देखा तो उन्हें गणेशोत्सव मना कर लोगों को एकजुट करने का विचार आया और तभी से हर साल सार्वजनिक रूप से गणेशोत्सव मनाने की परंपरा चल पड़ी।    

शनिवारवाडा के नजदीक बुधवार पेठ के इलाके में स्थित इस मंदिर की बनावट में इतनी सादगी है कि बाहर सड़क से भी अंदर की कार्यवाही के दर्शन किए जा सकते हैं। इसमें 7.5 फिट ऊँची और फिट चौड़ी गणेश जी की
भव्य प्रतिमा स्थापित है, जिसे करीब आठ किलो सोने से सजाया गया है। जिसका बीमा एक करोड़ रूपए का किया गया है। पूरे मंदिर की देख-रेख का जिम्मा "दगडुशेठ हलवाई ट्रस्ट" द्वारा संभाला जाता है। जिसकी एक महत्त्वपूर्ण व जिम्मेदार संस्थाके रूप में पहचान है. अपनी संस्कृति-संवर्धन और समाज सेवा  के लिए पूरी तरह समर्पित मानी जाती है। इसके द्वारा लाखों रुपयों से एक पिताश्री नामक वृद्ध आश्रम की स्थापना, करीब चालीस निराश्रित बच्चों के खान-पान-पढाई के इंतजाम के साथ ही गरीबों की सहायता और इलाज का भी बंदोबस्त किया जाता है। संस्था एम्बुलेंस सेवा भी प्रदान करती है। 

बुधवार, 7 जून 2017

महाबलेश्वर, मुंबईकरों का स्वर्ग

मुंबईकर बहुत खुशनसीब हैं जो  प्रकृति  उन  पर पूरी   तरह मेहरबान है। यहां  सागर - पहाड़  का  दुर्लभ  मेल उपलब्ध है। समुद्र तो खैर उनके आँगन में उछालें मारता ही है, मनोरम पहाड़ी सैर - गाहें भी उनके बहुत करीब हैं। ऐसी ही एक मनोरम जगह है "महाबलेश्वर", जहां प्रकृति उदात्त रूप में अपनी छटा बिखेरती विद्यमान है।
महाबलेश्वर की ओर 
मार्ग में पड़ती सुरंग 

महाबलेश्वर 
महाबलेश्वर सहयाद्रि पर्वत श्रृंखला में स्थित है। अंग्रेज अपने शासन-काल में गर्मी के दिनों में अपना काम-काज यहां से निष्पादित किया करते थे। मुंबई से करीब 285 की.मी., पुणे से लगभग 120 की.मी. और पंचगनी से मात्र 19 की.मी. की दूरी पर तीन गांवों से घिरा एक छोटा सा शहर है जो समुद्र तल से करीब 1,353 मीटर की ऊंचाई पर कृष्णा नदी की घाटी में स्थित है। पर्यटकों के लिए यहाँ दसियों ऐसे पर्यटक स्थल हैं जहां जा कर समय के गुजरने का एहसास ही नहीं हो पाता।    
महाबलेश्वर शिव मंदिर 


निडल प्वाइंट 
पुराने महाबलेश्वर में शिव जी का एक प्राचीन मंदिर है। जिसके दर्शन जरूर करने चाहिए। इसके अलावा आर्थर सीट, मैप्रो गार्डन, निडल प्वाइंट, प्रताप गढ़ किला, विल्सन प्वाइंट, सन सेट प्वाइंट आदि दर्जनों मनोहारी जगहें हैं। इसलिए जब भी जाना हो कुछ समय अपने हाथ में जरूर रखें। 
वृक्ष संरक्षक 

सुस्ताहट 


महाबलेश्वर मॉल रोड 
पंचगनी से हम 20-25 मिनट में महाबलेश्वर पहुँच गए। पंचगनी के पठार ने कुछ थका दिया था, अप्रैल का अंतिम सप्ताह था, धूप तेज हो रही थी, समय भी करीब दो बजे का हो रहा था, इसलिए सर्वसम्मति से पहले उदर-पूजन करना ही उचित समझा गया। पुणे से चलने के पहले होटेल पैनोरमा का नाम उसके अच्छे खाने के लिए सुझाया गया था। सुझाव सटीक निकला खाना सुस्वादु था। पर उसके बाद कुछ ऐसी खुमारी चढ़ी कि दसियों जगहें देखने वाली होने के बावजूद हिम्मत नहीं हो पाई कहीं और भी जाएं। सो बाजार के ही चक्कर लगा कर संतोष करते रहे। शाम को चार बजे लौटने की प्रक्रिया शुरू हुई। मुख्य मार्ग पर ही स्थित पारसी प्वाइंट पर जरूर रुकना हुआ।







पारसी प्वाइंट 
यह एक पिकनिक स्थल है। जहां पार्क के साथ ही खाने-पीने का फुटकर सामान प्रचुरता के साथ उपलब्ध है।   यहां से घाटी का अपूर्व व विहंगम नजारा देखने को मिलता है। इसके नाम के बारे में  पूछने पर पता चला कि यह जगह पारसी समुदाय की मिल्कियत थी जिसे उन्होंने जन-हित के लिए सरकार को दे दिया था इसीलिए इसे पारसी प्वाइंट के नाम से जाना जाता है। यहां दिन भर लोगों की आवा-जाही लगी रहती है फिर भी पार्किंग शुल्क नहीं लिया जाता। घंटा भर यहां गुजारने के बाद गाडी का मुंह पूना की तरफ कर दिया गया जहां घर पहुंचते-पहुंचते घडी की सूई नौ के पास जाने को बेताब हो रही थी।           

मंगलवार, 6 जून 2017

पठार, पंचगनी का

कहावत है कि गंजेड़ी को गांजा, भगेंडी को भांग मिल ही जाती है। उसी तरह घुमक्कड़ को घुमक्कड़ी का अवसर मिल ही जाता है। पिछली अप्रैल को प्रेम भरी मनुहार के फलस्वरूप पुणे जाने का सुयोग सामने आया। इसी यात्रा का एक हिस्सा रहा, पंचगनी और महाबलेश्वर की प्राकृतिक सुरम्य गोद में जा बैठने का सुख। पहले पंचगनी की बात।
पुणे से करीब सौ की. मी. की दूरी पर, समुद्र तल से लगभग 1,350 मीटर की ऊँचाई पर, सहयाद्री पर्वत श्रृंखला में पांच पहाड़ियों के बीच कृष्णा नदी की घाटी में बसे पांच गांवों के केंद्र में स्थित है, महाराष्ट्र की यह खूबसूरत पहाड़ी सैरगाह पंचगनी। इसकी खोज अंग्रेजों ने गर्मियों से बचने के लिए की थी। उन्होंने यहां ब्रिटिश मूल के सैकड़ों पौधों को लगाया जिसमे सिल्वर ओक एवं पोइंसेत्टिया प्रमुख हैं। जो अब पूरी तरह से पंचगनी के ही समझे जाते हैं। महाबलेश्वर भी ब्रिटिश लोगों की पसंदीदा जगह थी लेकिन मानसून के दौरान वह रहने के लायक नहीं रह जाता था। पंचगनी का मौसम साल भर खुशनुमा रहता है इसीलिए इसको उनके द्वारा अपने आराम गृह के तौर पर विकसित किया गया। यहीं एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पठार स्थित है जो लगभग 99 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह स्थान एक अजूबा ही है, जहां समय बिताना अपने-आप में एक उपलब्धि है। इसका असली जादू मानसून के दौरान ही जागता है, जब इसके कोने-कोने से पहाड़ी झरने अपनी धाराओं से स्वर्गिक दृश्य रचते हैं।

अपने वाहन का फायदा यह रहता है कि आप रास्ते भर पूरे परिवेश को अपनी मन-मर्जी से अपने में समेट सकते हैं। अप्रैल के महीने में धूप कुछ तेज थी पर माहौल खुशनुमा था। हमारा पहला पड़ाव इसका पठार ही था। वहाँ पहुँचने पर अपने-आप को एक अद्भुत जगह पर खड़े पाया। दूर-दूर तक फैला सपाट सा भूरे रंग का पथरीला मैदान। नीचे दूर दिखते छोटे-छोटे खेत और घर। उसके बाद चारों ओर फैली पहाड़ियों की श्रृंखलाएं। मंत्रमुग्ध करता नजारा। सामने ही एक बोर्ड पर देखने लायक स्थलों और घोड़ा गाड़ियों या कहें टम-टम के रेट की सूची, ग्राहकों को पटाने में लगे गाड़ीवानों की भीड़। सैकड़ों लोगों की उपस्थिति के बावजूद खाली-खाली महसूस होता परिवेश। एक अनोखा माहौल। 
विस्तृत पठार 


हम छह अदद लोग थे। तीन महिलाओं समेत। पैदल घूमना संभव नहीं था। सो टम-टम पर चलना तय हुआ।जिसमें एक पर सिर्फ चार लोगों के बैठने की शर्त थी, सो दो गाड़ियां करनी पड़ीं, 500/-, 500/- के किराए पर। हमें लगा था कि घंटा भर तो लग ही जाएगा पूरी जगह देखने में पर जैसा तक़रीबन सभी पर्यटक स्थलों पर होता है, कहा कुछ जाता है किया कुछ जाता है, हमें भी छह जगहों के बदले तीन दिखा कर वापस ले आया गया। घोड़ागाड़ी में लकड़ी के छक्कों की बजाए टायर लगे होने के बावजूद सतह इतनी उबड़-खाबड़ थी कि हर सेकंड लगते झटकों से कुछ ही देर में पेट का सारा पानी हिल गया। यदि कस कर कुछ पकड़ा ना गया हो तो भू-लुंठित होने में समय नहीं लगता। देखने के नाम पर वहाँ एक विशाल छिद्र को रेलिंग से घेर कर रखा गया है जिसे भीम का चूल्हा बताया जाता है। कहते हैं पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान कुछ दिन यहां भी रुके थे।
भीम का चुल्हा  ??


पांडवों के पदचिन्ह ??
वहीँ से कुछ दूरी पर पत्थरों में कुछ पद चिन्ह जैसी आकृतियां बनी हुई हैं जिन्हें पांडवों के पैरों के निशान बताया जाता है। सिर्फ उत्सुकता जगा कर पर्टटकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी मनघड़ंत बातों को फ़ैलाने से रोका जाना चाहिए। गाड़ीवान ने यहीं से हमें वापस "घुड़-अड्डे" पर ला छोड़ा। जबकि पश्चिमी हिस्से के नीचे बनी गुफा को भी दिखाया जाना था। पर गाडी की असहज सवारी हमें भी रास नहीं आ रही थी। सो गाड़ीवान की सलाह पर महिलाओं को ऊपर ही छोड़ सेठी जी, मैं तथा अभय ही नीचे गए। करीब पचास उबड़-खाबड़, अनगढ़ सीढ़ियां उतरने बाद वहाँ एक प्राकृतिक गुफा नुमा संरचना बानी हुई थी जिसमें व्यापारिक बुद्धि ने कुछ फुटकर खान-पान की दुकानें लगवा दी हैं। बाजार जो ना करे कम है। 
गुफा में खान-पान 


नीचे गुफा की ओर जाती सीढ़ियां 
धूप की तेजी और घूमने से कुछ-कुछ थकान भी महसूस हो रही थी। पुणे आज ही लौटना था फिर अभी महाबलेश्वर भी जाना था। सो और ज्यादा चहलकदमी ना कर वापस गाडी की ओर लौट लिए। 

सोमवार, 15 मई 2017

इस उम्रदराज युगल को सलाम है

याद कीजिए, अभी के वोडाफोन विज्ञापन के युगल को, जो पहली बार गोवा यात्रा पर निकले हैं। इसका हर अंक मन मोह लेता है। 78 साल के श्री वी.पी. धनंजयन और 74 साल की श्रीमती शांता धनंजयन को भरतनाट्यम में उनके योगदान के लिए 2009 में  पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।  उनकी जीजीविषा को सलाम है कि इस उम्र में धनंजयन जी ने स्कूटर चलाना सीखा, पहली बार धोती छोड़ पैंट-टी शर्ट पहनी, युवाओं की तरह के करतब किए और विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे....

चाहे कितने भी विवाद खड़े हों, चाहे कितनी भी आलोचना हो, सच्चाई यही है कि आईपीएल  की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आ रही। बीस ओवरों की इस सनसनी ने "टेस्ट" और "एक दिवसीय" क्रिकेट को कहीं पीछे छोड़ दिया है। आंकड़े बतला रहे हैं कि हर साल इसे देखने वालों की भीड़ में इजाफा हो रहा है। एक समय में लाखों आँखें, दीन-दुनिया को भूल, टकटकी लगाए सारा समय टी.वी. से चिपकी रहती हैं। इसी कारण विज्ञापन देने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत पर यहां समय लेने के लिए होड़ लगाए रहती हैं।
 
जिस तरह खेल के दौरान मैदान में चौके-छक्कों की बरसात होती है उसी तरह घर बैठे मैच देखने वाले लोगों पर विज्ञापनों की झड़ी लगी रहती है। पर इनमें ज्यादातर तो बकवास ही होते हैं। क्योंकि जिस तरह विज्ञापन बनवाने की मांग बढ़ी है उसी तरह गुणवत्ता भी हाशिए पर चली गयी है। विज्ञापनदाता का पहला प्रयास होता है
किसी जाने-माने फ़िल्मी कलाकार को अनुबंधित करना, उसके बाद उसके इर्द-गिर्द अपने उत्पाद का ताना-बाना बुनना। उन्हें लगता है कि उस कलाकार के आभामंडल से ही बेडा पार हो जाएगा पर होता उल्टा है, ज्यादातर ऐसे विज्ञापन दर्शकों को "बोर" करने लगते है। उदाहरण स्वरूप, एवरेस्ट मसाले, विमल, गंजी-बनियान, हेयर टॉनिक,  ओप्पो कैमरा, जिसे पिछले दो सालों से झेलते हुए लोग उसके आते ही  "ओफ्फो" कहने लगे हैं। हालांकि हर साल ये कंपनी फ़िल्मी जगत के चर्चित चहरे को ही चुनती है।

पर कुछ विज्ञापन ऐसे हैं जो अपनी पहली स्क्रीनिंग के साथ ही दर्शकों को मोह लेते हैं। दर्शकों का यही प्रेम विज्ञापनदाताओं को उनकी अगली कड़ी बनाने का हौसला देता है। याद कीजिए अभी हाल के #वोडाफोन विज्ञापन के युगल को, जो पहली बार गोवा यात्रा पर निकला है। इसका हर अंक मन मोहता है। दर्शक उम्रदराज युगल को अपने घर के सदस्य समान मानने लगता है। इन के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार श्री रघुरामन जी के सौजन्य से पता चला कि 78 साल के श्री वी.पी. धनंजयन और 74 साल की श्रीमती शांता धनंजयन, चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं, जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी जीजीविषा को सलाम है कि इस उम्र में धनंजयन जी ने स्कूटर चलाना सीखा, पहली बार धोती छोड़ पैंट-टी शर्ट पहनी, युवाओं की तरह के करतब किए और विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे।

वोडाफोन वाले बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने फूहड़ता के युग में भी इतना साफ़-सुथरा, दिल को छूने वाला विज्ञापन रचा। जिसमें पहली बार बुजुर्गों को आधुनिक तकनीक को इस्तेमाल करते दिखाया गया है। ऐसा  ही एक और
सीधा-सरल विज्ञापन वोल्टास का है, जिसमें "श्री मूर्ति" अपने मासूम अंदाज में ए.सी. की बड़ाई करते-करते लोगों के चहेते बन गए हैं। वैसे ही बिलकुल अंजान चेहरों को लेकर बनाया गया amazon का विज्ञापन है जो अपने हर अंक के साथ दर्शकों को मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है। यह सारे विज्ञापन अपने अनजाने पर सक्षम कलाकारों के साथ वह काम कर गए हैं जो जाने-पहचाने करोड़ों की फीस लेने वाले स्टार नहीं कर पाए हैं।

इनसे उन निर्माताओं को सबक लेना चाहिए जो बड़े नामों को ही सफलता की कुंजी समझ हजार की जगह लाखों फूँक कर भी कोई जादू नहीं जगा पाते। 

रविवार, 14 मई 2017

मदर्स डे कुछ सवाल भी तो उठाता है !

आज की पैर फैलाती आधुनिकता क्या कल की माओं में वह वात्सल्य, ममता, समर्पण का लेशमात्र भी छोड़ेगी जो माँ-बच्चों के पारस्परिक "बांड" के लिए अति आवश्यक होते हैं ?  कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि ऐसी "मदर्स" साल के  किसी एक दिन को  "प्रॉजिनि या सन्स डे"  घोषित करवा दें ! 

आज के दिन को पश्चिम से आयातित सभ्यता और बाजार ने मातृदिवस का नाम दिया है। दोनों के अपने-अपने कारण हैं। पश्चिम में संयुक्त परिवार ना के बराबर हैं। मौज-मस्ती की प्रवृत्ति अब संस्कृति का रूप ले चुकी है। सोच-रहन-सहन सब आत्मकेंद्रित हो गया है। प्रजनन क्रिया एक रोमांच, खेल, प्रयोग या उत्सुकता का माध्यम बन कर रह गयी है ! संतान के प्रति जिम्मेदारियां भार लगने लगी हैं। अपनी आजादी, अपने व्यक्तित्व, अपनी महत्वकांक्षाओं में व्यवधान ना पड़े इसलिए बच्चे को बचपन से ही "कृत्रिम" परिवेश में डाल दिया जाता है।खरीदा हुआ आवास, ख़रीदा हुआ संरक्षण, ख़रीदा हुआ भोजन, माँ-बाप व बच्चे में वह प्रेम, लगाव, ममत्व, अपनापन उपजने ही नहीं देते जो इन रिश्तों को उम्र भर बांधे रखते हैं। तभी तो वहां सरकार को बच्चों के लिए तरह-तरह के कानून बनाने पड़े हैं। वही बच्चा जब बड़ा होता है तो "कैरियर" की अंधी दौड़ में वह भी वही सब दोहराता है जससे वह गुजर चुका होता है। नाते-रिश्तों को याद करने-रखने के लिए दिन निश्चित कर दिए गए हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा बाजार ने उठाया है। जिसने अपनी सुरसा रूपी भूख को कुछ हद तक कम करने के लिए, साल के दिनों को किसी ना किसी रिश्ते से जोड़ उत्सव या समारोह का रूप दे अपना तो उल्लू सीधा किया ही साथ ही इंसान को अपनी गलतियों की ग्लानि से उभरने का एक मौका सा भी दे दिया।

हमारे देश में अभी भी कुछ हद तक संस्कृति बची हुई है। अभी भी गांव-कस्बों और कुछ-कुछ शहरों में संयुक्त परिवार का चलन कायम है। हमारे यहां माँ सिर्फ एक रिश्ता नहीं है यह तो अटूट बंधन है। इस केंद्र बिंदु के बिना परिवार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जन्म देने वाली माँ को देवी का स्थान प्राप्त है, जो कभी भी अपनी तकलीफों की परवाह किए बिना अपनी संतान को बिना किसी प्रलोभन के  हर अला-बला से बचाने के लिए, किसी भी उतार-चढ़ाव पर साथ देने के लिए हर क्षण तत्पर रहती है। क्या-क्या वह नहीं सहती अपनी संतान के लिए ! उसी के लिए साल में एक दिन निश्चित कर देने से उसके दिल पर क्या गुजरती होगी यह किसी ने कभी सोचा है ! पल-पल ममता लुटाने वाली को अपने ही बच्चों का प्यार पाने के लिए किसी एक दिन के इंतजार में अपनी आँखें पथरानी होती हैं ! अपने बच्चों की आवाज सुनने के लिए जिनके कान तरसते रह जाते हैं। हूक नहीं उठती होगी उनके दिल में जब कलेजे के टुकड़े आ गले न लगते होंगे !!  पर जाने-अनजाने, बढती उम्र में वही सबसे ज्यादा उपेक्षित हो जाते हैं जब उन्हें सबसे ज्यादा सहारे की जरुरत होती है।

आज भी अधिकांश परिवारों में सुबह उठ सबसे पहले अपने माता-पिता के चरणस्पर्श करने की प्रथा बदस्तूर कायम है। हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने इसे इसीलिए बनाया था कि यही एक निस्वार्थ रिश्ता है जो सदा अपने बच्चों की भलाई का ही सोचता है, भूल से भी जो अपने बच्चों के अहित का ख्याल मन में नहीं ला सकता। दिन
की इस पहली क्रिया में मन से आशीर्वाद दिया जाता है। जिससे बच्चों को तो ठोस संबल मिलता ही है माता-पिता को भी आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है। एक कहावत है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है तो मेरे ख्याल से, नब्बे प्रतिशत, वह हाथ और साथ माँ का ही होना चाहिए।

पर धीरे-धीरे अपने यहां  भी  परिस्थितियों में भी चिंताजनक बदलाव आने लगा है। जीवन-यापन उतना सरल नहीं रह गया है। आगे बढ़ने की होड़ सी मच गयी है। आज के, खासकर शहरी युवाओं में पश्चिमी भेड-चाल की दस्तक शुरू हो गयी है। हर संस्कृति में अच्छाइयां और कुछ बुराइयां होती हैं। पर बुराइयों पर मनभावन नकाब ऐसे चढ़े होते हैं की नीम-विकसित दिलो-दिमाग उस तरफ तुरंत आकर्षित हो, नाते-रिश्ते, रीती-रिवाज सब तिरोहित कर देते हैं। वही हो रहा है ! सच्चाई कड़वी है पर आज के महानगरों के कुछ तथाकथित अत्याधुनिक युवाओं की कार्यशैली, जो आज नहीं तो कल छोटे शहरों-कस्बों में भी अपनाई जाने लगेंगी, हमारी संस्कृति व परम्पराओं के बिलकुल विपरीत है। आज की पैर फैलाती आधुनिकता क्या कल की माओं में वह वात्सल्य, ममता, समर्पण का लेशमात्र भी छोड़ेगी जो माँ-बच्चों के पारस्परिक "बांड" के लिए अति आवश्यक होते हैं ? कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि ऐसी मदर्स किसी एक दिन को "प्रॉजिनि या सन्स डे"  घोषित करवा दें !

रविवार, 7 मई 2017

सैनेटाइजर का प्रयोग ना हीं करें तो बेहतर है !

सैनेटाइजर को प्रयोग में लाने वाले करोड़ों लोग इसे जादुई चिराग ही समझते हैं जिसके छूने भर से बैक्टेरिया का सफाया हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है, जिस तरह साबुन ग्रीस, चिकनाई, मिटटी इत्यादि को साफ़ करता है उस तरह से सैनेटाइजर काम नहीं कर पाता। ज्यादातर कीटाणु उँगलियों के बीच, नाखूनों के अंदर, पोरों में छिपे होते हैं जिन्हें साफ़ करने के लिए हाथों को कम से कम बीस से तीस सेकेण्ड तक धोना बहुत जरुरी होता है.....

गर्मी के बावजूद इस बार अप्रैल में कई जगह आना-जाना करना पड़ा था। जिसमें सालासर बालाजी के दर्शनों का
सुयोग भी था। जिसका ब्यौरा पिछली पोस्ट में कर भी चुका हूँ। पर इस यात्रा के दौरान एक चीज पर ध्यान गया कि टी.वी पर रोज हर मिनट बरसाए जा रहे इश्तहारों का असर तो पड़ता ही है। जैसे झूठ को रोज-रोज कहने-सुनने पर वह भी सच लगने लगता है। इन्हीं उत्पादों में एक है "सैनेटाइज़र", जिसको साबुन-पानी का पर्याय मान कर, हर जगह, बिना उसके दुष्प्रभावों को जाने, खुलेआम घर-बाहर-स्कूल-कार्यक्षेत्र व अन्य जगहों में होने लगा है। इसका एक दूसरा कारण इसको आसानी से अपने साथ रख लाना ले जा सकना भी है। धीरे-धीरे यह आधुनिकता की निशानी बन फैशन में शुमार हो गया है। जिस तरह साधारण पानी की जगह "मिनिरल वाटर" ने ले ली है और लोग बिना उसकी गुणवत्ता जाने-परखे भेड़-चाल सा उसका उपयोग करते जा रहे हैं, उसी तरह साबुन-पानी की जगह अब  "सैनेटाइजर" स्टेटस सिंबल बन कर छा गया है।   

इस यात्रा पर भी सदा की तरह "कानूनी भाई" सपरिवार साथ थे। यात्रा के और धर्मस्थान में रहने के दौरान कई बार हाथ वगैरह को साफ़ करने की जब भी जरुरत महसूस होती, पानी-साबुन की उपलब्धता के बावजूद उन्हें "सैनेटाइजर" का इस्तेमाल करते पाया। एक-दो बार टोका भी कि बार-बार केमिकल का प्रयोग ठीक नहीं रहता, पर और लोगों की तरह उनके दिलो-दिमाग में भी इश्तहारों ने ऐसा घर बना लिया था कि अब उन्हें साबुन वगैरह का प्रयोग असुरक्षित और पिछड़ेपन की निशानी लगने लगा था।  जबकि आज वैज्ञानिक और डॉक्टर भी इसके कम से कम इस्तेमाल की सलाह देने लगे हैं। 

यूनिवर्सिटी ऑफ मिसोरी, कोलंबिया ने अपनी खोज से सिद्ध किया है कि इसके ज्यादा इस्तेमाल से हाथों पर रहने वाले अच्छे बैक्टेरिया के खत्म होने के साथ-साथ हमारी एंटीबायोटिक अवरोध की क्षमता के कम होने की आशंका भी बढ़ जाती है। शोधों से यह भी सामने आया है कि सैनेटाइजर के ज्यादा उपयोग से खतरनाक रसायनों को शरीर अवशोषित करने लगता है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। कई बार तो इसके तत्व यूरीन और खून के सैम्पल में भी दिखाई पड़ने लगे हैं।  खासकर बच्चों को इसका कम से कम उपयोग करना चाहिए। वैसे भी अधिकतर सैनेटाइजर में अल्कोहल सिर्फ 60% ही होता है जो जीवाणुओं के खात्मे के लिए पर्याप्त नहीं होता।  इसका उत्तम विकल्प साबुन और पानी ही है। 

इसका उपयोग न करने की सलाह के कुछ और भी कारण बताए गए हैं, जैसे इसके ज्यादा उपयोग से त्वचा को नुक्सान होता है। इसमें "ट्राइक्लोसन" और "विस्फेनोल" जैसे  हानिकारक और विषैले केमिकल मिले होते हैं। जो तरह-तरह की बीमारियों को तो न्यौता देते ही हैं हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कम कर देते हैं।       अमेरिका के Epidemic Intelligence Service द्वारा की गयी पड़तालों से भी यह सच सामने आया है कि इसके दिन में छह-सात बार के इस्तेमाल से हाथों पर  "नोरोवायरस" के पनपने का खतरा उत्पन्न हो जाता है जो हमारे पेट की जटिल बीमारियों का जरिया बनते हैं।     


अब तो U.S. Food and Drug Administration ने भी सैनेटाइजर बनाने वाली कंपनियों से पूरा शोध करने को कहा है जिससे इसका प्रयोग निरापद हो सके। वैसे भी इसको प्रयोग में लाने वाले करोड़ों लोग इसे जादुई चिराग ही समझते हैं जिसके छूने भर से बैक्टेरिया का सफाया हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है, जिस तरह साबुन ग्रीस, चिकनाई, मिटटी इत्यादि को साफ़ करता है उस तरह से सैनेटाइजर काम नहीं कर पाता। ज्यादातर कीटाणु उँगलियों के बीच, नाखूनों के अंदर, पोरों में छिपे होते हैं जिन्हें साफ़ करने के लिए हाथों को कम से कम बीस से तीस सेकेण्ड तक धोना बहुत जरुरी होता है। साबुन से धोने के बाद हाथों को ठीक से सूखा लेना चाहिए। वैसे ही यदि सैनेटाइजर का उपयोग करना ही पड़े तो उसके केमिकल को ठीक से वाष्पीकृत होने देना चाहिए और इसके उपयोग के कुछ देर बाद ही भोजन को छूना चाहिए। फिर भी कोशिश यही रहनी चाहिए कि इसका कम से कम ही प्रयोग हो। साबुन-पानी पर खुद और दूसरों का विश्वास बनाए रखने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।

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