मंगलवार, 6 जून 2017

पठार, पंचगनी का

कहावत है कि गंजेड़ी को गांजा, भगेंडी को भांग मिल ही जाती है। उसी तरह घुमक्कड़ को घुमक्कड़ी का अवसर मिल ही जाता है। पिछली अप्रैल को प्रेम भरी मनुहार के फलस्वरूप पुणे जाने का सुयोग सामने आया। इसी यात्रा का एक हिस्सा रहा, पंचगनी और महाबलेश्वर की प्राकृतिक सुरम्य गोद में जा बैठने का सुख। पहले पंचगनी की बात।
पुणे से करीब सौ की. मी. की दूरी पर, समुद्र तल से लगभग 1,350 मीटर की ऊँचाई पर, सहयाद्री पर्वत श्रृंखला में पांच पहाड़ियों के बीच कृष्णा नदी की घाटी में बसे पांच गांवों के केंद्र में स्थित है, महाराष्ट्र की यह खूबसूरत पहाड़ी सैरगाह पंचगनी। इसकी खोज अंग्रेजों ने गर्मियों से बचने के लिए की थी। उन्होंने यहां ब्रिटिश मूल के सैकड़ों पौधों को लगाया जिसमे सिल्वर ओक एवं पोइंसेत्टिया प्रमुख हैं। जो अब पूरी तरह से पंचगनी के ही समझे जाते हैं। महाबलेश्वर भी ब्रिटिश लोगों की पसंदीदा जगह थी लेकिन मानसून के दौरान वह रहने के लायक नहीं रह जाता था। पंचगनी का मौसम साल भर खुशनुमा रहता है इसीलिए इसको उनके द्वारा अपने आराम गृह के तौर पर विकसित किया गया। यहीं एशिया का दूसरा सबसे बड़ा पठार स्थित है जो लगभग 99 एकड़ के क्षेत्र में फैला हुआ है। यह स्थान एक अजूबा ही है, जहां समय बिताना अपने-आप में एक उपलब्धि है। इसका असली जादू मानसून के दौरान ही जागता है, जब इसके कोने-कोने से पहाड़ी झरने अपनी धाराओं से स्वर्गिक दृश्य रचते हैं।

अपने वाहन का फायदा यह रहता है कि आप रास्ते भर पूरे परिवेश को अपनी मन-मर्जी से अपने में समेट सकते हैं। अप्रैल के महीने में धूप कुछ तेज थी पर माहौल खुशनुमा था। हमारा पहला पड़ाव इसका पठार ही था। वहाँ पहुँचने पर अपने-आप को एक अद्भुत जगह पर खड़े पाया। दूर-दूर तक फैला सपाट सा भूरे रंग का पथरीला मैदान। नीचे दूर दिखते छोटे-छोटे खेत और घर। उसके बाद चारों ओर फैली पहाड़ियों की श्रृंखलाएं। मंत्रमुग्ध करता नजारा। सामने ही एक बोर्ड पर देखने लायक स्थलों और घोड़ा गाड़ियों या कहें टम-टम के रेट की सूची, ग्राहकों को पटाने में लगे गाड़ीवानों की भीड़। सैकड़ों लोगों की उपस्थिति के बावजूद खाली-खाली महसूस होता परिवेश। एक अनोखा माहौल। 
विस्तृत पठार 


हम छह अदद लोग थे। तीन महिलाओं समेत। पैदल घूमना संभव नहीं था। सो टम-टम पर चलना तय हुआ।जिसमें एक पर सिर्फ चार लोगों के बैठने की शर्त थी, सो दो गाड़ियां करनी पड़ीं, 500/-, 500/- के किराए पर। हमें लगा था कि घंटा भर तो लग ही जाएगा पूरी जगह देखने में पर जैसा तक़रीबन सभी पर्यटक स्थलों पर होता है, कहा कुछ जाता है किया कुछ जाता है, हमें भी छह जगहों के बदले तीन दिखा कर वापस ले आया गया। घोड़ागाड़ी में लकड़ी के छक्कों की बजाए टायर लगे होने के बावजूद सतह इतनी उबड़-खाबड़ थी कि हर सेकंड लगते झटकों से कुछ ही देर में पेट का सारा पानी हिल गया। यदि कस कर कुछ पकड़ा ना गया हो तो भू-लुंठित होने में समय नहीं लगता। देखने के नाम पर वहाँ एक विशाल छिद्र को रेलिंग से घेर कर रखा गया है जिसे भीम का चूल्हा बताया जाता है। कहते हैं पांडव अपने अज्ञातवास के दौरान कुछ दिन यहां भी रुके थे।
भीम का चुल्हा  ??


पांडवों के पदचिन्ह ??
वहीँ से कुछ दूरी पर पत्थरों में कुछ पद चिन्ह जैसी आकृतियां बनी हुई हैं जिन्हें पांडवों के पैरों के निशान बताया जाता है। सिर्फ उत्सुकता जगा कर पर्टटकों को आकर्षित करने के लिए ऐसी मनघड़ंत बातों को फ़ैलाने से रोका जाना चाहिए। गाड़ीवान ने यहीं से हमें वापस "घुड़-अड्डे" पर ला छोड़ा। जबकि पश्चिमी हिस्से के नीचे बनी गुफा को भी दिखाया जाना था। पर गाडी की असहज सवारी हमें भी रास नहीं आ रही थी। सो गाड़ीवान की सलाह पर महिलाओं को ऊपर ही छोड़ सेठी जी, मैं तथा अभय ही नीचे गए। करीब पचास उबड़-खाबड़, अनगढ़ सीढ़ियां उतरने बाद वहाँ एक प्राकृतिक गुफा नुमा संरचना बानी हुई थी जिसमें व्यापारिक बुद्धि ने कुछ फुटकर खान-पान की दुकानें लगवा दी हैं। बाजार जो ना करे कम है। 
गुफा में खान-पान 


नीचे गुफा की ओर जाती सीढ़ियां 
धूप की तेजी और घूमने से कुछ-कुछ थकान भी महसूस हो रही थी। पुणे आज ही लौटना था फिर अभी महाबलेश्वर भी जाना था। सो और ज्यादा चहलकदमी ना कर वापस गाडी की ओर लौट लिए। 

सोमवार, 15 मई 2017

इस उम्रदराज युगल को सलाम है

याद कीजिए, अभी के वोडाफोन विज्ञापन के युगल को, जो पहली बार गोवा यात्रा पर निकले हैं। इसका हर अंक मन मोह लेता है। 78 साल के श्री वी.पी. धनंजयन और 74 साल की श्रीमती शांता धनंजयन को भरतनाट्यम में उनके योगदान के लिए 2009 में  पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है।  उनकी जीजीविषा को सलाम है कि इस उम्र में धनंजयन जी ने स्कूटर चलाना सीखा, पहली बार धोती छोड़ पैंट-टी शर्ट पहनी, युवाओं की तरह के करतब किए और विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे....

चाहे कितने भी विवाद खड़े हों, चाहे कितनी भी आलोचना हो, सच्चाई यही है कि आईपीएल  की लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आ रही। बीस ओवरों की इस सनसनी ने "टेस्ट" और "एक दिवसीय" क्रिकेट को कहीं पीछे छोड़ दिया है। आंकड़े बतला रहे हैं कि हर साल इसे देखने वालों की भीड़ में इजाफा हो रहा है। एक समय में लाखों आँखें, दीन-दुनिया को भूल, टकटकी लगाए सारा समय टी.वी. से चिपकी रहती हैं। इसी कारण विज्ञापन देने वाली कंपनियां मुंह मांगी कीमत पर यहां समय लेने के लिए होड़ लगाए रहती हैं।
 
जिस तरह खेल के दौरान मैदान में चौके-छक्कों की बरसात होती है उसी तरह घर बैठे मैच देखने वाले लोगों पर विज्ञापनों की झड़ी लगी रहती है। पर इनमें ज्यादातर तो बकवास ही होते हैं। क्योंकि जिस तरह विज्ञापन बनवाने की मांग बढ़ी है उसी तरह गुणवत्ता भी हाशिए पर चली गयी है। विज्ञापनदाता का पहला प्रयास होता है
किसी जाने-माने फ़िल्मी कलाकार को अनुबंधित करना, उसके बाद उसके इर्द-गिर्द अपने उत्पाद का ताना-बाना बुनना। उन्हें लगता है कि उस कलाकार के आभामंडल से ही बेडा पार हो जाएगा पर होता उल्टा है, ज्यादातर ऐसे विज्ञापन दर्शकों को "बोर" करने लगते है। उदाहरण स्वरूप, एवरेस्ट मसाले, विमल, गंजी-बनियान, हेयर टॉनिक,  ओप्पो कैमरा, जिसे पिछले दो सालों से झेलते हुए लोग उसके आते ही  "ओफ्फो" कहने लगे हैं। हालांकि हर साल ये कंपनी फ़िल्मी जगत के चर्चित चहरे को ही चुनती है।

पर कुछ विज्ञापन ऐसे हैं जो अपनी पहली स्क्रीनिंग के साथ ही दर्शकों को मोह लेते हैं। दर्शकों का यही प्रेम विज्ञापनदाताओं को उनकी अगली कड़ी बनाने का हौसला देता है। याद कीजिए अभी हाल के #वोडाफोन विज्ञापन के युगल को, जो पहली बार गोवा यात्रा पर निकला है। इसका हर अंक मन मोहता है। दर्शक उम्रदराज युगल को अपने घर के सदस्य समान मानने लगता है। इन के बारे में प्रसिद्ध पत्रकार श्री रघुरामन जी के सौजन्य से पता चला कि 78 साल के श्री वी.पी. धनंजयन और 74 साल की श्रीमती शांता धनंजयन, चेन्नई के अड्यान में 1968 से भरतनाट्यम सिखाने के लिए भारत कलांजलि स्कूल चला रहे हैं, जिसके लिए उन्हें 2009 में पद्मभूषण से सम्मानित किया जा चुका है। उनकी जीजीविषा को सलाम है कि इस उम्र में धनंजयन जी ने स्कूटर चलाना सीखा, पहली बार धोती छोड़ पैंट-टी शर्ट पहनी, युवाओं की तरह के करतब किए और विश्वसनीयता व सहजता से इंटरनेट का उपयोग कर जीवन का आनंद लेते  दिखे।

वोडाफोन वाले बधाई के पात्र हैं जो उन्होंने फूहड़ता के युग में भी इतना साफ़-सुथरा, दिल को छूने वाला विज्ञापन रचा। जिसमें पहली बार बुजुर्गों को आधुनिक तकनीक को इस्तेमाल करते दिखाया गया है। ऐसा  ही एक और
सीधा-सरल विज्ञापन वोल्टास का है, जिसमें "श्री मूर्ति" अपने मासूम अंदाज में ए.सी. की बड़ाई करते-करते लोगों के चहेते बन गए हैं। वैसे ही बिलकुल अंजान चेहरों को लेकर बनाया गया amazon का विज्ञापन है जो अपने हर अंक के साथ दर्शकों को मुस्कुराने पर मजबूर कर देता है। यह सारे विज्ञापन अपने अनजाने पर सक्षम कलाकारों के साथ वह काम कर गए हैं जो जाने-पहचाने करोड़ों की फीस लेने वाले स्टार नहीं कर पाए हैं।

इनसे उन निर्माताओं को सबक लेना चाहिए जो बड़े नामों को ही सफलता की कुंजी समझ हजार की जगह लाखों फूँक कर भी कोई जादू नहीं जगा पाते। 

रविवार, 14 मई 2017

मदर्स डे कुछ सवाल भी तो उठाता है !

आज की पैर फैलाती आधुनिकता क्या कल की माओं में वह वात्सल्य, ममता, समर्पण का लेशमात्र भी छोड़ेगी जो माँ-बच्चों के पारस्परिक "बांड" के लिए अति आवश्यक होते हैं ?  कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि ऐसी "मदर्स" साल के  किसी एक दिन को  "प्रॉजिनि या सन्स डे"  घोषित करवा दें ! 

आज के दिन को पश्चिम से आयातित सभ्यता और बाजार ने मातृदिवस का नाम दिया है। दोनों के अपने-अपने कारण हैं। पश्चिम में संयुक्त परिवार ना के बराबर हैं। मौज-मस्ती की प्रवृत्ति अब संस्कृति का रूप ले चुकी है। सोच-रहन-सहन सब आत्मकेंद्रित हो गया है। प्रजनन क्रिया एक रोमांच, खेल, प्रयोग या उत्सुकता का माध्यम बन कर रह गयी है ! संतान के प्रति जिम्मेदारियां भार लगने लगी हैं। अपनी आजादी, अपने व्यक्तित्व, अपनी महत्वकांक्षाओं में व्यवधान ना पड़े इसलिए बच्चे को बचपन से ही "कृत्रिम" परिवेश में डाल दिया जाता है।खरीदा हुआ आवास, ख़रीदा हुआ संरक्षण, ख़रीदा हुआ भोजन, माँ-बाप व बच्चे में वह प्रेम, लगाव, ममत्व, अपनापन उपजने ही नहीं देते जो इन रिश्तों को उम्र भर बांधे रखते हैं। तभी तो वहां सरकार को बच्चों के लिए तरह-तरह के कानून बनाने पड़े हैं। वही बच्चा जब बड़ा होता है तो "कैरियर" की अंधी दौड़ में वह भी वही सब दोहराता है जससे वह गुजर चुका होता है। नाते-रिश्तों को याद करने-रखने के लिए दिन निश्चित कर दिए गए हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा बाजार ने उठाया है। जिसने अपनी सुरसा रूपी भूख को कुछ हद तक कम करने के लिए, साल के दिनों को किसी ना किसी रिश्ते से जोड़ उत्सव या समारोह का रूप दे अपना तो उल्लू सीधा किया ही साथ ही इंसान को अपनी गलतियों की ग्लानि से उभरने का एक मौका सा भी दे दिया।

हमारे देश में अभी भी कुछ हद तक संस्कृति बची हुई है। अभी भी गांव-कस्बों और कुछ-कुछ शहरों में संयुक्त परिवार का चलन कायम है। हमारे यहां माँ सिर्फ एक रिश्ता नहीं है यह तो अटूट बंधन है। इस केंद्र बिंदु के बिना परिवार की कल्पना भी नहीं की जा सकती। जन्म देने वाली माँ को देवी का स्थान प्राप्त है, जो कभी भी अपनी तकलीफों की परवाह किए बिना अपनी संतान को बिना किसी प्रलोभन के  हर अला-बला से बचाने के लिए, किसी भी उतार-चढ़ाव पर साथ देने के लिए हर क्षण तत्पर रहती है। क्या-क्या वह नहीं सहती अपनी संतान के लिए ! उसी के लिए साल में एक दिन निश्चित कर देने से उसके दिल पर क्या गुजरती होगी यह किसी ने कभी सोचा है ! पल-पल ममता लुटाने वाली को अपने ही बच्चों का प्यार पाने के लिए किसी एक दिन के इंतजार में अपनी आँखें पथरानी होती हैं ! अपने बच्चों की आवाज सुनने के लिए जिनके कान तरसते रह जाते हैं। हूक नहीं उठती होगी उनके दिल में जब कलेजे के टुकड़े आ गले न लगते होंगे !!  पर जाने-अनजाने, बढती उम्र में वही सबसे ज्यादा उपेक्षित हो जाते हैं जब उन्हें सबसे ज्यादा सहारे की जरुरत होती है।

आज भी अधिकांश परिवारों में सुबह उठ सबसे पहले अपने माता-पिता के चरणस्पर्श करने की प्रथा बदस्तूर कायम है। हमारे विद्वान ऋषि-मुनियों ने इसे इसीलिए बनाया था कि यही एक निस्वार्थ रिश्ता है जो सदा अपने बच्चों की भलाई का ही सोचता है, भूल से भी जो अपने बच्चों के अहित का ख्याल मन में नहीं ला सकता। दिन
की इस पहली क्रिया में मन से आशीर्वाद दिया जाता है। जिससे बच्चों को तो ठोस संबल मिलता ही है माता-पिता को भी आत्मिक संतोष की अनुभूति होती है। एक कहावत है कि हर सफल पुरुष के पीछे किसी स्त्री का हाथ होता है तो मेरे ख्याल से, नब्बे प्रतिशत, वह हाथ और साथ माँ का ही होना चाहिए।

पर धीरे-धीरे अपने यहां  भी  परिस्थितियों में भी चिंताजनक बदलाव आने लगा है। जीवन-यापन उतना सरल नहीं रह गया है। आगे बढ़ने की होड़ सी मच गयी है। आज के, खासकर शहरी युवाओं में पश्चिमी भेड-चाल की दस्तक शुरू हो गयी है। हर संस्कृति में अच्छाइयां और कुछ बुराइयां होती हैं। पर बुराइयों पर मनभावन नकाब ऐसे चढ़े होते हैं की नीम-विकसित दिलो-दिमाग उस तरफ तुरंत आकर्षित हो, नाते-रिश्ते, रीती-रिवाज सब तिरोहित कर देते हैं। वही हो रहा है ! सच्चाई कड़वी है पर आज के महानगरों के कुछ तथाकथित अत्याधुनिक युवाओं की कार्यशैली, जो आज नहीं तो कल छोटे शहरों-कस्बों में भी अपनाई जाने लगेंगी, हमारी संस्कृति व परम्पराओं के बिलकुल विपरीत है। आज की पैर फैलाती आधुनिकता क्या कल की माओं में वह वात्सल्य, ममता, समर्पण का लेशमात्र भी छोड़ेगी जो माँ-बच्चों के पारस्परिक "बांड" के लिए अति आवश्यक होते हैं ? कोई आश्चर्य नहीं होगा यदि ऐसी मदर्स किसी एक दिन को "प्रॉजिनि या सन्स डे"  घोषित करवा दें !

रविवार, 7 मई 2017

सैनेटाइजर का प्रयोग ना हीं करें तो बेहतर है !

सैनेटाइजर को प्रयोग में लाने वाले करोड़ों लोग इसे जादुई चिराग ही समझते हैं जिसके छूने भर से बैक्टेरिया का सफाया हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है, जिस तरह साबुन ग्रीस, चिकनाई, मिटटी इत्यादि को साफ़ करता है उस तरह से सैनेटाइजर काम नहीं कर पाता। ज्यादातर कीटाणु उँगलियों के बीच, नाखूनों के अंदर, पोरों में छिपे होते हैं जिन्हें साफ़ करने के लिए हाथों को कम से कम बीस से तीस सेकेण्ड तक धोना बहुत जरुरी होता है.....

गर्मी के बावजूद इस बार अप्रैल में कई जगह आना-जाना करना पड़ा था। जिसमें सालासर बालाजी के दर्शनों का
सुयोग भी था। जिसका ब्यौरा पिछली पोस्ट में कर भी चुका हूँ। पर इस यात्रा के दौरान एक चीज पर ध्यान गया कि टी.वी पर रोज हर मिनट बरसाए जा रहे इश्तहारों का असर तो पड़ता ही है। जैसे झूठ को रोज-रोज कहने-सुनने पर वह भी सच लगने लगता है। इन्हीं उत्पादों में एक है "सैनेटाइज़र", जिसको साबुन-पानी का पर्याय मान कर, हर जगह, बिना उसके दुष्प्रभावों को जाने, खुलेआम घर-बाहर-स्कूल-कार्यक्षेत्र व अन्य जगहों में होने लगा है। इसका एक दूसरा कारण इसको आसानी से अपने साथ रख लाना ले जा सकना भी है। धीरे-धीरे यह आधुनिकता की निशानी बन फैशन में शुमार हो गया है। जिस तरह साधारण पानी की जगह "मिनिरल वाटर" ने ले ली है और लोग बिना उसकी गुणवत्ता जाने-परखे भेड़-चाल सा उसका उपयोग करते जा रहे हैं, उसी तरह साबुन-पानी की जगह अब  "सैनेटाइजर" स्टेटस सिंबल बन कर छा गया है।   

इस यात्रा पर भी सदा की तरह "कानूनी भाई" सपरिवार साथ थे। यात्रा के और धर्मस्थान में रहने के दौरान कई बार हाथ वगैरह को साफ़ करने की जब भी जरुरत महसूस होती, पानी-साबुन की उपलब्धता के बावजूद उन्हें "सैनेटाइजर" का इस्तेमाल करते पाया। एक-दो बार टोका भी कि बार-बार केमिकल का प्रयोग ठीक नहीं रहता, पर और लोगों की तरह उनके दिलो-दिमाग में भी इश्तहारों ने ऐसा घर बना लिया था कि अब उन्हें साबुन वगैरह का प्रयोग असुरक्षित और पिछड़ेपन की निशानी लगने लगा था।  जबकि आज वैज्ञानिक और डॉक्टर भी इसके कम से कम इस्तेमाल की सलाह देने लगे हैं। 

यूनिवर्सिटी ऑफ मिसोरी, कोलंबिया ने अपनी खोज से सिद्ध किया है कि इसके ज्यादा इस्तेमाल से हाथों पर रहने वाले अच्छे बैक्टेरिया के खत्म होने के साथ-साथ हमारी एंटीबायोटिक अवरोध की क्षमता के कम होने की आशंका भी बढ़ जाती है। शोधों से यह भी सामने आया है कि सैनेटाइजर के ज्यादा उपयोग से खतरनाक रसायनों को शरीर अवशोषित करने लगता है जो कि स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। कई बार तो इसके तत्व यूरीन और खून के सैम्पल में भी दिखाई पड़ने लगे हैं।  खासकर बच्चों को इसका कम से कम उपयोग करना चाहिए। वैसे भी अधिकतर सैनेटाइजर में अल्कोहल सिर्फ 60% ही होता है जो जीवाणुओं के खात्मे के लिए पर्याप्त नहीं होता।  इसका उत्तम विकल्प साबुन और पानी ही है। 

इसका उपयोग न करने की सलाह के कुछ और भी कारण बताए गए हैं, जैसे इसके ज्यादा उपयोग से त्वचा को नुक्सान होता है। इसमें "ट्राइक्लोसन" और "विस्फेनोल" जैसे  हानिकारक और विषैले केमिकल मिले होते हैं। जो तरह-तरह की बीमारियों को तो न्यौता देते ही हैं हमारी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी कम कर देते हैं।       अमेरिका के Epidemic Intelligence Service द्वारा की गयी पड़तालों से भी यह सच सामने आया है कि इसके दिन में छह-सात बार के इस्तेमाल से हाथों पर  "नोरोवायरस" के पनपने का खतरा उत्पन्न हो जाता है जो हमारे पेट की जटिल बीमारियों का जरिया बनते हैं।     


अब तो U.S. Food and Drug Administration ने भी सैनेटाइजर बनाने वाली कंपनियों से पूरा शोध करने को कहा है जिससे इसका प्रयोग निरापद हो सके। वैसे भी इसको प्रयोग में लाने वाले करोड़ों लोग इसे जादुई चिराग ही समझते हैं जिसके छूने भर से बैक्टेरिया का सफाया हो जाता है। जबकि ऐसा नहीं है, जिस तरह साबुन ग्रीस, चिकनाई, मिटटी इत्यादि को साफ़ करता है उस तरह से सैनेटाइजर काम नहीं कर पाता। ज्यादातर कीटाणु उँगलियों के बीच, नाखूनों के अंदर, पोरों में छिपे होते हैं जिन्हें साफ़ करने के लिए हाथों को कम से कम बीस से तीस सेकेण्ड तक धोना बहुत जरुरी होता है। साबुन से धोने के बाद हाथों को ठीक से सूखा लेना चाहिए। वैसे ही यदि सैनेटाइजर का उपयोग करना ही पड़े तो उसके केमिकल को ठीक से वाष्पीकृत होने देना चाहिए और इसके उपयोग के कुछ देर बाद ही भोजन को छूना चाहिए। फिर भी कोशिश यही रहनी चाहिए कि इसका कम से कम ही प्रयोग हो। साबुन-पानी पर खुद और दूसरों का विश्वास बनाए रखने की कोशिश जरूर होनी चाहिए।

गुरुवार, 4 मई 2017

कहीं आप भी ऐसी "मम्मी" तो नहीं हैं ?

काफी देर हो चुकी थी छुटकू भाई साहब को फोन पर बिना सर उठाए, पलकें झपकाए, खेलते हुए, माँ को याद आया तो झपट कर फोन छीना, फिर जैसे ही निगाह बैटरी पर पड़ी, चीखीं, बेवकूफ बैटरी पांच परसेंट रह गयी है, बंद हो गया तो क्या करेंगे। चार्जर भी नहीं है.........इधर मैं सोच रहा था, गलती किस की है ?

पिछले दिनों रायपुर से दिल्ली आना हो रहा था। वातानुकूलित शयन यान II का कोच। हमारे सामने की दोनों बर्थ पर एक दंपत्ति अपने सात-आठ साल के बच्चे के साथ  विराजमान थे। बच्चा कुछ अजीब सा लग रहा था। बेतरतीब बिखरे बाल, रूखी-सूखी त्वचा, चेहरे पर बाल सुलभ भोलापन गायब, कपडे-जूते कीमती पर रख-रखाव से दूर। गाडी चलने के कुछ ही समय के बाद बेटे की फरमाइश हुई कुछ पीने को दो, तो महिला रूपी माँ ने डांट  कर कहा, अभी कुछ नहीं मिलेगा, रुको थोड़ी देर ! अभी तो घर से पी कर चले हो !!     
बच्चा बिदक गया, कुछ भी नहीं देते हो, जब मांगता हूँ। प्यास लगी है ! माँ ने आँखें तरेरीं, पर उस पर कोई असर नहीं। तभी उसके पापा, जो कुछ शांत स्वभाव के लग रहे थे,  ने कहा, दे दो, मानेगा थोडे ही ना। फ्रूटी का डिब्बा निकला, बच्चा जीत की हंसी के साथ जुट गया उसे खाली करने पर। राजनांदगांव आते-आते फिर शुरू हो गयी मांगे, इस बार कुछ खाने को चाहिए था। वैसा ही कार्यक्रम दोहरा कर पैकेट थमा दिया गया उसके हाथ में। उसके खाली होते ही उछल-कूद शुरू, कभी ऊपर की बर्थ पर कभी नीचे, कभी साइड रेलिंग पकड़ कर जिम्नास्टिक, कभी हमारी ऊपर की बर्थ पर कभी किनारे की पर। मैं अपना कुछ पढ़ रहा था, उसमें बार-बार व्यवधान पड़ने से बेचैनी हो रही थी, उधर किनारे वाली बर्थ के मुसाफिर भी परेशान थे, एक-दो बार इशारों और हाव-भाव से जताया भी गया पर ना ही बच्चे पर असर पड़ा नाहीं उसके अभिभावकों पर। कुछ देर बाद खिड़की के पास बैठने की बात मनवा उसने अपनी माँ से मोबाईल फोन माँगा, इस बार गेम खेलने की चाहत उत्पन्न हुई थी। सदा की तरह माँ ने झिड़का, बैटरी ख़त्म हो जाएगी, किसी का फ़ोन आ जाएगा इत्यादि-इत्यादि। पर वहाँ किसने सुनना था, एक ही रट, बोर हो रहा हूँ, गेम खेलना है ! माँ ने फोन पकड़ा दिया बड़बड़ाते हुए कि बैटरी ख़त्म हुई तो देखना, गाडी से उतार दूँगी !

छोटे भाई साहब उधर फोन में व्यस्त हुए, इधर कुछ शांति छाई। तब तक श्रीमती जी का सहयात्रियों से वार्तालाप शुरू हो चुका था। पता चला महिला किसी स्कूल में कार्यरत हैं, श्रीमती जी भी शिक्षिका रह चुकी हैं, बस फिर क्या था, बहनापा जुड़ गया। सामने वाली ने बताया कि स्कूल में उनका काफी रौब-दाब है। उनकी एक ही आवाज से बच्चे दुबक जाते हैं। प्रिंसिपल तक बिना उनके परामर्श के कोई कदम नहीं उठातीं। मैं सोच रहा था, नमूना तो यहां दिख ही रहा है ! बातों ही बातों में औपचारिकता कुछ कम होने लगी, खान-पान का लेन-देन हुआ। बच्चे  की फिर कोई मांग उठी उसका शमन हमें यह बताते हुए किया गया कि बहुत जिद्दी है, अपनी बात मनवा कर ही हटता है। बीच में ही बात काट कर श्रीमती जी बोलीं पर बच्चा माँ-बाप के कारण ही जिद्दी होता है।  मैं देख रही हूँ कि पहले आप हर चीज के लिए मना करते हैं और फिर कुछ देर बाद पकड़ा देते हैं, वह भी समझ गया है कि जिद करने पर मेरी बात मान ली जाएगी इसी लिए वह ऐसा करता है। यदि आपको कुछ देना है तो तुरंत दे दें नहीं तो कितना भी कहे अपनी बात पर कायम रहें तो उसे भी समझ आ जाएगा कि जिद करने से कुछ नहीं होने वाला।

अब बच्चे के पापा की बारी थी बोले, स्कूल में तो बिलकुल कुछ बोलता ही नहीं है। क्लास टीचर तो बहुत इम्प्रेस है इससे, कहती है बहुत डिसिप्लिंड बच्चा है। शार्प भी बहुत है मुझे कई बार मोबाईल फोन की बात समझाता है। मोबाईल गेम में तो इसको कोई हरा ही नहीं सकता। इसकी अपनी घर की आया से बहुत बनती है। उसके बिना तो इसका दिन निकलना मुश्किल है। वह भी इसका बहुत ख्याल रखती है। वही बतलाती है कि फोन पर बड़े-बड़े स्कोर करता है। टी.वी. पर हफ्ते भर की आने वाली फिल्मों की लिस्ट इसको याद रहती है। फिर हसते हुए बोले, पर टेबल याद करने में हफ्ता लगा देता है फिर भी पूरा नहीं हो पाता। हमारी समझ में सब आ रहा था। बच्चा आया के पास पलता है। माँ-बाप पूरा समय नहीं दे पाते। इस कमी को उसकी हर जिद पूरी कर दूर करने की कोशिश कर बच्चे को जिद्दी और अक्खड़ बना दिया है। गलती उनकी भी नहीं है समय ही ऐसा चल रहा है जिसमें अपना तथाकथित कैरियर बनाने के चक्कर में सारे नाते-रिश्ते, फर्ज, संबंध, जिम्मेवारियां सब तिरोहित हो जाते हैं। कुछ-कुछ समझ जाने के बावजूद फिर भी मैंने पूछ लिया आपकी शादी को कितना समय हो गया ? उत्तर मिला बारह साल हो गए। मामला साफ़ था बढती उम्र में संतान-लाभ हुआ था, तो प्रेम उड़लना स्वाभाविक था, नतीजा उद्दंड संतान।

काफी देर हो चुकी थी छोटे भाई साहब को फोन पर बिना सर उठाए, पलकें झपकाए, खेलते हुए।  माँ को याद आया तो झपट कर फोन छीना फिर जैसे ही निगाह बैटरी पर पड़ी, चीखीं, बेवकूफ बैटरी पांच परसेंट रह गयी है, बंद हो गया तो क्या करेंगे। चार्जर भी नहीं है। इधर मैं सोच रहा था..........गलती किस की है ?

जैसे-तैसे रात कटी, सुबह बच्चे को जगाया जाने लगा, उठ बेटा घर आने वाला है। ओ मेरा राजा बाबू, मेरा राजकुमार उठ बेटा। अब राजकुमार तो उठने में मनुहार करवाएगा ही। नजाकत से उठे। अभी ठीक से आँख खुली भी नहीं थी कि मांग शुरू। नमकीन दो। माँ बाग़-बाग़, कौन सा खाएगा बेटा ? खट्टा-मीठा या दूसरा ? जवाब मिला दूसरा। तुरंत पैकेट हाजिर। आँखें खुल नहीं रहीं, होठों पर लार काबिज, पर नमकीन ठूंसा जा रहा था, बाकायदा। श्रीमती जी से रहा नहीं गया, बोलीं अरे पेस्ट तो कर लो ! जवाब माँ की तरफ से आया, ये ऐसा ही है !सुनेगा नहीं ! बिना खाए तो खटिए से हिलता ही नहीं है !  इतना कह, फिर उसकी तीमारदारी में लग गयीं। सोना, बिस्कुट खाएगा ?  कौन सा खाएगा क्रीम वाला या चॉकलेट वाला ..........

निजामुद्दीन स्टेशन आने वाला था, गाड़ी धीमी हो रही थी। हम अपना सामान समेटे वितृष्णा से एक सूखी, निर्बल सी काया को बिस्कुट चबाते देख रहे थे।          

शनिवार, 29 अप्रैल 2017

क्या बालाजी धाम का ट्रस्ट 20-25 की.मी. की सड़क का रख-रखाव भी नहीं कर सकता ?

बात तो खटकने वाली होनी ही है, चाहे सरकार हो, नेता हो, संत्री हो, मंत्री हो, पंडा हो पुजारी हो सब के लिए मध्यम वर्ग, गरीब की बकरी है, जिसे कभी भगवान् के नाम पर, कभी सहूलियत के नाम पर, कभी देश के नाम पर, कभी कानून के नाम पर जो आता है, अपनी मर्जी से दुह कर चल देता है और चाहा जाता है कि वह उफ्फ भी ना करे !

धार्मिक स्थलों की यात्रा करने वाला हर यात्री आस्था, श्रद्धा, विश्वास से ओत-प्रोत हो कर ही अपने आराध्य के दर्शन करने हेतु तन-मन-धन से समर्पित हो घर से निकलता है। पर उसके भक्ति-भाव को तब ठेस पहुंचती है जब उसे धर्मस्थलों पर पैसों के लिए कुछ भी होते-करते दिखता है। पर उस सब को भी अपने धार्मिक स्वभाव के कारण वह उसे भी प्रभू की इच्छा मान सहज स्वीकार कर अपनी आस्था में कमी नहीं होने देता। पर मन में कहीं ना कहीं दुःख तो होता ही है। ऐसा ही एक बार फिर इस बार की सालासर धाम की यात्रा के दौरान हुआ। 

इस बार बैसाखी के दिन तेरह अप्रैल को फिर सालासर का कार्यक्रम बना। इस बार भी कोरम में पिछली यात्रा पर जाने वाले सारे सदस्य थे। आठ बड़े और दो बच्चे। पर इस बार सिर्फ सालासर बालाजी के दर्शनों का ही लक्ष्य रखा गया था। हनुमान जयंती बीत चुकी थी, इसलिए भीड़-भाड़ बहुत
कम थी। दर्शन भी बहुत आराम और तसल्ली से हुए। पर वहीँ एक छोटी सी बात भी खटकी। दर्शनों के दौरान वहाँ खड़े पंडों में से एक ने मेरे सामने वाले तोंदियल पंडे को, चढ़ावे में से लोगों को कुछ दे देने को कहा, पर सामने वाले ने साफ़ मना कर दिया। एक क्षण के लिए मन में आया कि कैसे लालची लोग प्रभू की सेवा में नियुक्त हुए, हुए हैं। जो मुफ्त के चढ़ावे को भी वितरित न कर खुद हड़पना चाहते हैं। जबकि दर्शनार्थियों की जेब से तरह-तरह के बहानों से पैसा निकलवाने से नहीं चूका जाता। लगता है भगवान भी पंडों और ट्रस्टियों की अमानत बन कर रह गए हैं। नहीं तो ऐसा क्यों कि ट्रस्टियों, पंडों, उनके रिश्तेदारों या उनके जान-पहचान के लोगों को अलग से सहूलियतें दी जाती हैं, गर्भ-गृह तक जाने की इजाजत मिलती है, पूजा में समय अड़चन नहीं बनाया जाता, और इधर आम इंसान लाइन में लगा कीर्तन ही करता रहता है। TRUST यानी भरोसा। मतलब जिन पर भरोसा कर प्रभू की पूजा, अर्चना, रख-रखाव  सौंपा जाता है वही अपने-आप को आम से ख़ास मान सुविधाएं संजोने लगता है। पंडे-पुजारी तो भगवान् को अपनी धरोहर ही समझते आए हैं सदा से !! दूसरी ओर आम इंसान, जिसकी आस्था और धन पर स्थल को ख्याति मिलती है उसके हिस्से में धक्के ही आते हैं !!!  

बात तो खटकने वाली ही है, चाहे सरकार हो, नेता हो, संत्री हो, मंत्री हो, पंडा हो पुजारी हो सब के लिए मध्यम वर्ग, गरीब की बकरी है जिसे कभी भगवान् के नाम पर, कभी सहूलियत के नाम पर, कभी देश के नाम पर, कभी कानून के नाम पर जो आता है, अपनी मर्जी से दुह कर चल देता है और चाहा जाता है कि वह उफ्फ भी ना करे ! 

इधर दो-तीन साल से लक्ष्मण गढ़ की तरफ से, #राजमार्ग_65_से_सालासर_बालाजी_धाम तक जाने वाली #सड़क को यात्रियों की सुविधा के नाम पर #टोल_मार्ग कर दिया गया है। पहली नजर में तो यह बात अच्छी लगती है, पर करोड़ों रुपयों का चढ़ावा संभालने वाला #बालाजी_धाम-का_ट्रस्ट-क्या #20-25_की.मी. की सड़क का रख-रखाव भी नहीं कर सकता जबकि पंडों-पुजारियों के घरों की कीमत पचासों लाख के भी ऊपर है। ऊपर से यह मार्ग ट्रस्टियों, ख़ास लोगों, पण्डे-पुजारियों की गाड़ियों के लिए कर मुक्त है। 

देश में सैकड़ों ऐसे धर्म-स्थल हैं, जहां की आमदनी की कोई हद नहीं है। पर कुछेक को छोड़ कर किसी की ओर से भी जनता के पैसे को जनता के लिए शायद ही खर्च किया जाता हो।जबकि उनसे जुड़े लोगों के घर, महल-अट्टालिकाओं में बदलते रहते हैं। हम सदा से धर्म-भीरु रहे हैं। जन्मों-जन्म से धर्म के नाम पर लुटते-पिटते आए हैं। जानते-बुझते जगह-जगह जेबें ढीली कर देते हैं। पर ऐसी जगहों पर होती अनियमितताओं के खिलाफ कभी खड़े नहीं होते। कभी विरोध न होने की वजह भी है कि सामनेवाला सदा मध्यम-वर्ग को कोई तवज्जो नहीं देता।    

मंगलवार, 25 अप्रैल 2017

ऑर्गेनिक के नाम पर कहीं यह भरमाने का प्रयास तो नहीं ?

जब पतंजलि की तरफ से इजाजत नहीं मिली है तो फिर कैसे ये लोग उसके नाम और लोगो का इस्तेमाल कर रहे है। ऐसा तो नहीं कि उन्होंने सोच रखा हो कि इजाजत मिलने में तो समय लगेगा ही तब तक उनके नाम का इस्तेमाल करते रहो, पब्लिक को क्या पता कि अधिकृत हैं की नहीं, वह तो नाम देखती है, यदि इजाजत ना भी मिली तब तक पब्लिक को आदत पड़ चुकी होगी !!  
पिछले कुछ दिनों से मीडिया पर #पतंजलि-के-नाम-का-रेस्त्रां खुलने की खूब चर्चा हो रही है। जिसे अपने आप को बाबा रामदेव का अनुयायी कहने वाले दो  सज्जनों द्वारा "पौष्टिक" नाम से पंजाब के जीरकपुर इलाके में खोला गया है। उनका दावा है कि उनके द्वारा सिर्फ पतंजलि के उत्पाद ही उपयोग में लाए जाते हैं। वैसे तो उनके अनुसार अभी बाबा रामदेव की तरफ से हरी झंडी नहीं मिली है, जिसके लिए उन्होंने आवेदन कर रखा है, फिर भी उनके रेस्त्रां में हर जगह बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण के फोटो के साथ-साथ पतंजलि के उत्पादों से दीवालें सजी पड़ी हैं, यहां तक की उनके मेनू-कार्ड पर भी पतंजलि का 'लोगो' लगा हुआ है। 

आज हर आदमी स्वास्थ के प्रति जागरूक होने लगा है। उसका रुझान ऑर्गेनिक यानी प्राकृतिक वस्तुओं की तरफ बढ़ता जा रहा है। इसी मनोवृत्ति का फ़ायदा व्यवसायिक वर्ग उठाने में लगा हुआ है। FMCG बनाने वाली हर कंपनी हर दूसरे दिन कोई न कोई नया पदार्थ "आर्गेनिक" का ठप्पा लगा बाज़ार में उतार देती है। पर इनमें से अधिकांश पर सिर्फ ठप्पा ही लगा होता है जो सिर्फ लोगों को भरमाने का ही काम करता है। इसका मुख्य कारण पतंजलि के वे उत्पाद हैं जिन्होंने देसी-विदेशी हर उपभोक्ता वस्तुओं को बनाने वाली कंपनियों के नाक के नीचे से बाजार खींच कर उस पर कब्जा कर लिया है। पतंजलि और बाबा रामदेव का नाम बाजार में "हॉट केक" बना हुआ है। लोग आँख बंद कर उनके उत्पादों का उपयोग करने लग गए हैं। शहर-शहर, गांव-गांव, गली-गली पतंजलि के उत्पादों की दुकानें खुल चुकी हैं। छोटे-बड़े हर घर में उसकी उपस्थिति दर्ज है। उनके नाम से हर कोई जुड़ना 
चाहता है। उसकी लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए लालायित हो रहा है। इसीलिए इस रेस्त्रां पर भी तुरंत भरोसा करने का मन नहीं हो पा रहा। हो सकता है कि इसके संस्थापकों की मंशा जन-हित की ही हो पर इससे नकारा भी नहीं जा सकता कि आज के समय में सिर्फ संस्था का नाम उपयोग कर लोगों को आकर्षित कर अपने को सफल करने का प्रयास किया जा रहा हो। आज जहां बाजार आर्गेनिक-आर्गेनिक के खेल में दस की चीज को सौ का बता खपाने में माहिर है। वहीँ आम-जन अपनी सेहत को लेकर कुछ भी खर्च करने को तत्पर नजर आता है। इसलिए शक की गुंजायश कुछ ज्यादा ही हो रही है।   

#पतंजलि_को_ब्रांड_बनने_और_लोगों_का_विश्वास_जीतने_में_वर्षों_का_समय_और_मेहनत_लगी_है। आज वह जिस मुकाम पर है वहां उन्हें किसी भी चीज के लिए किसी का मुंह जोहने  की जरुरत नहीं है। वे आज इतने सक्षम हैं कि पतंजलि के नाम से पांच सितारा होटलों की श्रृंखला खोली जा सकती है। इसलिए उन्हें इस तरह के किसी भी प्रस्ताव और प्रस्तावित करने वाले की मंशा को बहुत सोच-समझ कर ही स्वीकार करना चाहिए। क्योंकि साख बनाने में सालों लग जाते हैं उसे मिटने में वक्त नहीं लगता। इस रेस्त्रां की एक और बात खटकने वाली है कि जब पतंजलि की तरफ से इजाजत नहीं मिली है तो फिर कैसे ये लोग उसके नाम और लोगो का इस्तेमाल कर रहे है। ऐसा तो नहीं कि उन्होंने सोच रखा हो कि इजाजत मिलने में तो समय लगेगा ही तब तक उनके नाम का इस्तेमाल करते रहो, पब्लिक को क्या पता कि अधिकृत हैं की नहीं, वह तो नाम देखती है, यदि इजाजत ना भी मिली तब तक पब्लिक को आदत पड़ चुकी होगी !!  जिसका फ़ायदा तो मिलता ही रहेगा !!!

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