रविवार, 20 नवंबर 2016

अफवाहें नहीं सच्चाई को सामने लाया जाए

पहले भी ऐसी खबरें आती थीं कि फलां अस्पताल ने पैसे ना होने की वजह से बीमार को बाहर निकाल दिया या किसी डॉक्टर ने मरीज का इलाज अपनी फीस मिलने में देर होने की वजह से नहीं किया। तब इसे डॉक्टर या अस्पताल के अमानवीय व्यवहार के रूप में प्रचारित किया जाता था, आज उसे नोटों की तंगी से जोड़ा जा रहा है,.........मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से एवेंई, दुबले होते जा रहे हैं 

आजकल देश में जो एक ही मुद्दा छाया हुआ है उस पर तरह-तरह की बेबुनियाद, फिजूल, भ्रामक, भड़काऊ खबरें रोज ही उछाली जा रही हैं। ऐसा नहीं है कि लोग परेशान नहीं हैं, उन्हें दिक्कत नहीं हो रही पर उनकी सहनशीलता उन्हें साधुवाद का पात्र बनाती है। दूसरी ओर मीडिया रुपी मौलवी शहर के अंदेशे से एवेंई, दुबले होते जा रहे हैं। 

पहले भी ऐसी खबरें आती थीं कि फलां अस्पताल ने पैसे ना होने की वजह से बीमार को बाहर निकाल दिया या किसी डॉक्टर ने मरीज का इलाज अपनी फीस मिलने में देर होने की वजह से नहीं किया। तब इसे डॉक्टर या अस्पताल के अमानवीय व्यवहार के रूप में प्रचारित किया जाता था, आज उसे नोटों की तंगी से जोड़ा जा रहा है। यदि कोई चिकित्सालय या चिकित्सक ऐसा अमानवीय काम पैसों के ना मिलने की वजह से करते हैं तो उन पर कार्यवाही होनी चाहिए ना कि उसे नोटबंदी से जोड़ा जाना चाहिए !!

ऐसे भी खबरें उछाली गयीं हैं कि पैसों की कमी के कारण खाना न खरीद पाने की वजह से एक-दो लोग भूख से मर गए ! पहले तो ऐसा होना संभव नहीं है यदि ऐसा हुआ भी है तो इसकी सच्चाई का पता किसने लगाया ? हम इतने हृदयहीन नहीं हो गए हैं कि हमारे सामने कोई भूख से तड़प रहा हो और हम नोटों की लाइन में खड़े उसका तमाशा देखें। आज जगह-जगह से खबरें मिल रही हैं कि गली-मोहल्ले वाले कतार में खड़े लोगों को चाय-पानी-नाश्ता उपलब्ध करवा रहे है। सिख समाज तो निःस्वार्थ-भाव से वर्षों-वर्ष से भूखों को भोजन करवाता आ रहा है। कई मन्दिर और संस्थाएं जरूरतमंदों के लिए लंगर चलाते हैं। यदि पीड़ित व्यक्ति वहां ना भी सका हो तो आस-पास के लोगों से ही अपनी तकलीफ व्यक्त कर सकता था। अरे हमारे यहां तो जानवरों तक को भूखा रखना पाप समझा जाता है। किसी इंसान को कैसे ऐसी हालत में प्राण त्यागने दे सकता है ?

ऐसी ही एक स्थिति थकान की है, बुजुर्गों की है, उसमें भी आस-पास की सहायता आसानी से ली जा सकती है, अपने सामने-पीछे वाले को अपनी हालत बता, कतार से हट कर बैठा जा सकता है। इसमें बैंक वाले यदि टोकन के साथ समय भी इंगित कर दें तो और भी आसानी हो सकती है।

राजधानी के बड़े अखबार खोज-खोज कर ऐसे-ऐसे सरकार विरोधी डिजायनर "बंदों" से लेख लिखवा रहे हैं जिनकी एक सिटिंग का सिगरेट-शराब का खर्चा हजारों में होता है। कोई मोदी द्वारा देश को दसियों साल पीछे ले जाने की बात करता है तो कोई स्वाइपिंग मशीनों की कमी का रोना रोता है। वह यह नहीं बताता कि अब तक देश में नगदी में ही अधिकतम काम होता था, इसलिए जरुरत ही नहीं पड़ती थी अब ज्यादा उपलब्ध करवानी पड़ेंगी। विरोध कर अपनी उपस्थिति दर्ज करवानी है बस इसीलिए कुछ भी उगला जा रहा है।

आज मीडिया को अपने पर "बिके हुए" का तमगा हटाने का मौका मिला है। आज वह चाहे तो अपने-आप को विश्वसनीय और निष्पक्ष सिद्ध करने का प्रयास कर सकता है। अपनी लुटी-पिटी साख वापस पा सकता है। उसे सिर्फ सच्चाई को लाना है बस।    

शुक्रवार, 18 नवंबर 2016

अपने मुंह में खबरिया चैनलों के शब्दों को जगह ना दें

आज  "मरीज" खुद  भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह किसी भी तरह का कष्ट किसी भी हद तक सहने को राजी है पर उसे भड़काया जा रहा है, अरे ! तुम्हारा आपरेशन होगा, तुम्हें कष्ट होगा, तुम्हें परेशानी होगी। आज कल नहाने का मौसम है तुम नहाओगे कैसे, तुम्हें सोचने -समझने का  समय ही नहीं दिया गया इत्यादि, इत्यादि। बजाए मरीज का हौसला बढ़ाने और उसकी मदद करने के उसे भरमाया जा रहा है, जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर कुछ लोग शायद चाहते भी यही हैं .....      

धन तो सदा ही आदमी को नचाता रहा है, हो तब भी और ना हो तब भी। अब जब उसके रूप-रंग में कुछ बदलाव आ रहा है तब भी इंसान चकरघिन्नी बना हुआ है। पर इस तिगनी के नाच में कुछ मजबूरीवश, कुछ घबड़ाहट के तहत, कुछ अफवाहों के चलते तो कुछ "प्रयोजित लोग" भी शामिल हैं, जो अलग-अलग गुटों में बंटे खबरिया चैनलों  की बीन की धुन पर, बिना अपने जमीर की सुने नाचे जा रहे हैं, नाचे जा रहे हैं। 

अभी एक मित्र की बच्ची की शादी के सिलसिले में जयपुर जाना हुआ था। बारात अगवानी के पहले जब हम कुछ लोग विवाह स्थल का जायजा लेने पहुंचे तो वहां माइक थामे एक मैडम, जो हिंदी चैनल में होने के बावजूद इंग्लिश में बतिया रही थीं, अपने सहयोगी कैमरा-मैन के साथ उपस्थित थीं। हमें देखते ही उनका पहला सवाल यह था कि नोटों के बदलने से आप को जो परेशानी हो रही है, उसके बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?  मेरे मित्र ने कहा यह देश-हित में उठाया गया कदम है और इससे हमें कोई परेशानी नहीं हैं। हम सब प्लान कर के ही चल रहे है। उनके लिए यह एक अप्रत्याशित उत्तर था, क्योंकि उनके आका शादियों के मौसम में इस कदम को मुद्दा बना सरकार के कदम को अनुचित सिद्ध करने में जुटे हुए है ! माइक-धारी महिला ने फिर सवाल उछाला, तो आप इस सारे खर्च का पेमेंट कैसे करेंगे, उसमें तो आपको असुविधा होगी ! मित्र का जवाब था, वह मेरी व्यक्तिगत समस्या है, जिससे पार पाने के लिए मैंने हर संभव इंतजाम कर रखे हैं। जिनको भुगतान करना है वह भी वस्तुस्थिति से अवगत हैं और वे भी पूरा सहयोग कर रहे हैं। 

यहां अपने मन-मुताबिक़ जवाब ना पाने पर माइक और कैमरा दोनों ने साज-सज्जा तथा स्टालों को अपना निशाना बनाना शुरू किया और वहां खड़े स्टाफ से कुछ ना कुछ उगलवाना चाहा पर जब वहां भी उन्हें अपने चैनल के नाम, अपनी भाषा और अपने रोब-दाब से भी मनवांछित फल नहीं मिला, तब उन्होंने बौखला कर तरह-तरह के उल-जलूल उदाहरण और सवाल-जवाब शुरू किए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने पूरे सौजन्यता के साथ अंग्रेजी में ही उनसे कहा कि क्यों आप हमारे मुंह में अपने शब्द  में डालने की कोशिश कर रही हैं और हिंदी भाषी चैनल के बावजूद यह बीच-बीच में धारा-प्रवाह इंग्लिश क्यूँ ? हर तरफ अपना विरोध देख उनका हत्थे से उखाडना लाजमी था, फिर वैसा ही हुआ जैसा हम अक्सर फिजूल की बहसें ऐसे चैनलों पर देखते-झेलते रहते हैं। टी वी पर तो रिमोट अपने हाथ होता है पर यहां तो साक्षात आमना-सामना था ! उसी सिलसिले में मैंने कहा कि सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि आपलोग किसी की सुनना नहीं चाहते सिर्फ अपनी बात को सही मनवाना चाहते हैं।  आप इसलिए नहीं माइक थामे हैं कि आप सरकार के कदम को गलत साबित करें यह जिम्मेदारी इसलिए दी गयी है कि आप सही छवि लोगों के सामने लाएं नाकि अपनी बनाई हुई तस्वीर !  अगली के हाथ में माइक था वे अपनी आदतानुसार बोले भी जा रही थीं पर उपस्थित लोगों की सहमति मेरे साथ होने के कारण पस्त भी थीं। मैंने कहा कि यदि किसी बीमार व्यक्ति का आपरेशन जरूरी हो तो भी आप विरोध में चिल्लाने लगिएगा कि देखो उस पर कितना अत्याचार हो रहा है उसके शरीर पर चाक़ू चलाया जा रहा है, इत्यादि-इत्यादि, जब कि उस आदमी को बचाने के लिए आपरेशन जरुरी है। यहां तक कि "मरीज" भी चाहता है कि वह ठीक हो, उसके हालात सुधरें, जिसके लिए वह कष्ट सहने को भी राजी है पर आप उसे भड़का रहे हो। इस पर माइक से जवाब आया कि उसके पहले मरीज को एनेस्थेसिया दिया जाता है, दवाएं दी जाती हैं। मैंने कहा वैसे उपाय यहां भी किए गए हैं, आप उन्हें भी तो "हाइलाइट" कीजिए, लोगों को हौसला बनाए रखने में मदद करने की बजाए आप सिर्फ कमियों का रोना रोए जा रहे हो जिससे लोगों में और घबड़ाहट फ़ैल रही है ! पर आप शायद चाहते भी यही हो !! 

बहस का अंत तो होना नहीं था, समय बीत रहा था सारे इंतजाम भी देखने थे, सो वातावरण को बोझिल ना बना, बात ख़त्म कर उन्हें कुछ लेने का आग्रह किया पर वे भी हताशा-वश वहां के विपरीत माहौल से निकलने का मौका तलाश रहे थे सो ज़रा सा इशारा पाते ही जल्दी से खिसक लिए।

आज लगता है कि देश कहीं पीछे छूट गया है। देश-प्रेम की भावना तिरोहित हो चुकी है। अपने ज़रा से हित के लिए, ज़रा सी सहूलियत के लिए बिना भविष्य की सोचे दिवास्वपन दिखलवाने वालों के बहकावे में आ जाते है। हम अपने जमीर का उपयोग करना चाहते ही नहीं। अफवाहें कहीं भी, कभी भी हमें बेवकूफ बना सकती हैं। हमें पकी-पकाई खाने की आदत पड़ चुकी है। हमारी भेड़-चाल ख़त्म नहीं होने वाली, हमारे कंधे मौकापरस्तों की बंदूकों के लिए अलभ्य नहीं होने वाले, झूठ को सौ बार कह-दिखा कर सच बनाने वाले अपनी आदतों से बाज नहीं आने वाले। इतिहास गवाह है कि हमें लतखोरी की आदत पड़ी हुई है, बिना डंडे के हम सुधर नहीं सकते !!

पर सच्चाई यह है कि हममें किसी भी परिस्थिति का सामना करने का माद्दा है। सेना की तो बात ही ना करें उनके समान तो कुछ हो ही नहीं सकता। पता नहीं सृष्टि ने उन्हें किस मिटटी का बनाया है, कौन से जज्बात भरे हैं दिलो-दिमाग में, किस धातु का हौसला घड़ा है कि सिवा देश के उन्हें और कुछ सूझता ही नहीं जबकि उसी देश के कुछ नाशुक्रिए पीछे नहीं रहते उनकी बेकद्री करने को। सेना जैसा ही कुछ जज्बा आज भीतरी "फ्रंट" पर तैनात बैंक कर्मियों ने पेश किया है उसके लिए पूरे देश को उन पर गर्व है। विपरीत परिस्थितियों में, गहरे दवाब में, थकान-भूख-प्यास को भूल उन्होंने दिनों-दिन, घंटे दर घंटे, लोगों की बेकाबू भीड़, उनके गुस्से, उनकी तकरार को सहते हुए खुद को शांत रख जिस कर्मठता के साथ अपने काम को अंजाम दिया है उसके लिए तो तारीफ में शब्द ही कम पड़ जाते हैं। साधूवाद है इन सारे कर्मियों के लिए। पर खेद यहां भी वही है कि उनके प्रयास को उतनी तवज्जो नहीं मिल पा रही जिसके वे हकदार हैं।     

सोमवार, 14 नवंबर 2016

भीड़ में सबसे पीछे खड़े का कौन सहारा !

तकरीबन सात-आठ साल से ब्लागिंग की दुनिया में रहने के बावजूद लगता है कि "वृत्तिकता" नहीं आ पायी है। यहां कभी-कभी पढने में या फोटुएं देख के लगता है कि कुछ लोग कितने जागरूक रहते हैं अपने आस-पास के माहौल को लेकर। यहां तो कई बार जान-बूझ कर मोबायल को घर पर छोड़ बाहर निकल जाता हूँ, फिर कुछ अलग सा देख-सुन कर, उस पल को संजो ना पाने का पछतावा भी होता है। वैसे भी आस-पास किसी घटना को सामान्य रूप से ले, भुला दिया जाता है जबकि उसका  वर्तमान के परिवेश से सीधा जुड़ाव होता है। 

यह बात तब फिर एक बार सही साबित हुई जब कल टी वी के किसी न्यूज चैनल पर, नोटों की बंदी पर रिक्शा चालकों, दिहाड़ी पर काम करने वाले मजदूरों, खोमचे वालों आदि के विचार लिए जा रहे थे। तभी मुझे ध्यान आया कि पांच-सात दिन पहले पर्यावरण को लेकर मचे हंगामें की प्रतिक्रिया में दिल्ली सरकार के भी जल्दबाजी में उठाए कुछ कदमों में, भवन निर्माण आदि पर कुछ दिनों के लिए रोक लगा दी गयी थी। उस काम में लगे दिहाड़ी के मजदूरों की परेशानी पर शायद ही किसी ने ध्यान दिया होगा। 

मेरे निवास के सामने ही एक बिल्डर द्वारा बहुमंजली इमारत बनाई जा रही है। उसमें काम करने वाले मजदूरों में एक का अपनी पत्नी और छोटे बच्चे के साथ वहीँ रहना होता है। उन्हीं दिनों एक सुबह घण्टी बजने पर जब श्रीमती जी ने द्वार खोला तो सामने काम करने वाली महिला एक छोटा सा बर्तन हाथ में लिए खड़ी थी, बोली आंटी जी थोड़ा दूध मिलेगा, बच्चा सुबह से भूखा है ! अब चाहे जिस कारण से भी उसने मांगा हो उसे दूध और जो कुछ भी हो सकता था उपलब्ध करवाया गया। फिर उसके सीधे-सरल, बिहार निवासी पति से ऐसे ही सहज भाव से कैसा-क्या है जानकारी ली तो उसने दिहाड़ी पर काम करने वालों की पचासों मुसीबतें गिना दीं। इसी सिलसिले में समय पर ठेकेदार से समय पर कुछ सहायता ना मिलने और जमा-पूँजी को पीछे गांव भेजने के कारण उठी उसकी बेबसी सामने आई। जिसके कारण उसे हमारे पास आना पड़ा था। 

वह तो, किसी प्रकार की जरुरत हो तो बिना झिझक बताने का आश्वासन पा, ढेर सी दुआ देता चला गया। यह तो एक सामने बैठा इंसान था, उस जैसे इस शहर में हजारों होंगे, फिर पूरे देश में ऐसे निरीह लोगों की कितनी संख्या होगी उसका तो सिर्फ अनुमान ही लगाया जा सकता है !  कौन सोचता हैं उनके बारे में ? कोई सोचता भी है कि नहीं ? उल्टे-सीधे, बड़े-छोटे, सरल-कठोर कानून थोपने से पहले देश के कर्णधार क्या कभी सचमुच ऐसे लोगों का ध्यान रख निर्णय लेते हैं ? या फिर........!!!      

शनिवार, 12 नवंबर 2016

"उनका" किफायती धन !

मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि  तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे   

मनुष्य के प्रादुर्भाव के बाद समय के साथ-साथ उसके खान-पान, रहन-सहन सबमें बदलाव आता चला गया। जिंदगी में स्थायित्व आया। जिम्मेदारी का एहसास जगा। घर, परिवार बना जिसमे भरण-पोषण-उपार्जन का जिम्मा पुरुष के कंधों पर आया और नारी ने घर की जिम्मेदारी संभाल ली। यही वह समय होगा जब अधिकतम नारियों को पुरुषों का आश्रित होना पड़ा होगा, अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती के लिए उसका मुंह जोहना पड़ता होगा, अति आवश्यक जरुरत को पैसे के अभाव के कारण पूरा न कर पाने पर जन्मी होगी असुरक्षा और संबल पाने की भावना। ऐसी स्थितियों से पार पाने के लिए महिलाओं ने घर खर्च से बचे या घर खर्च में कुछ कटौती कर, घर वालों की नज़र से बचा कर, कुछ न कुछ संचय करना शुरू कर दिया होगा। पर इसमें भी उसका कोई अपना स्वार्थ या हित नहीं था। यह सब उसका किसी अनचाही और कठिन घडी में परिवार को उबारने के लिए उठाया गया कदम भर था। पर पता नहीं ऐसी तरकीब सारी भारतीय माताओं और पत्नियों को एक साथ कैसे सूझी, जो समय के साथ-साथ उनमें एक आदत में तब्दील होती चली गयी !! अक्सर यह जमा-पूंजी संचयकर्ता की हैसियत को देखते हुए हैरत-अंगेज आंकड़ों में तब्दील होते पाई गयी है।  

आज सरकार के एक कठोर निर्णय की वजह से पूरे देश में अफरा-तफरी मची हुई है। सर्वोच्च कीमत वाले नोटों को लेकर तरह-तरह की अटकलें लगाईं जा रही हैं। हर कोई बिना नुक्सान के अपने धन को सुरक्षित करना चाहता है और कर भी रहा है। हमारे हर घर में पुरुषों को "आभास" रहता है कि घर की किसी अनजान जगह में, कहीं न कहीं, कुछ ना कुछ नोटों की शक्ल में जरूर पड़ा हुआ है। इसे कोई अन्यथा लेता भी नहीं है। उसी आभास के तहत सहज भाव से अभी दो दिन पहले मेरे मित्र ठाकुर जी ने अपनी पत्नी को कहा कि यदि  तुम्हारे पास कुछ 500-1000 के नोट पड़े हैं तो दे दो उन्हें बदलवा लेते हैं। पत्नी भी राजी हो गयीं पर जब उन्होंने अपनी जमा-पूँजी ठाकुर जी के सामने रखी तो वे बेहोश होते-होते बचे, उनके सामने पूरे तीन लाख रुपये पड़े थे, जो उनकी ठकुराइन ने अपने कला-कौशल से इकट्ठा किए थे।    

सब जगह हड़कंप तो मचा ही है पर उससे ज्यादा बड़ा झंझावात तो ऐसी गृहणियों के मनों में छाया हुआ है जिन्होंने पता नहीं कितनी किफ़ायत कर-कर के, कितनी बार अपनी इच्छाओं को दबा कर, कितनी बार अपनी जरूरतों को किनारे कर परिवार के भविष्य के लिए कुछ न कुछ जमा-जुगाड़ कर रखा है। आज की परिस्थिति में उनको समझ ही नहीं आ रहा है कि अपने पास की "उस तरह" की जमा राशि को वे कैसे बचाएं ! किस की सलाह लें! यदि वे किसी को नहीं बताती हैं तो सारी पूँजी के सिफर हो जाने का खतरा है और बताने पर पोल खुल जाती है और रहस्य उजागर हो जाता है। अभी तो खैर सारा पैसा बैंक में जमा हो जाएगा पर सब को पता चल जाने की वजह से वह "आम संपत्ति" हो जाएगी, जिसे जो चाहेगा, जब चाहेगा, थोड़ा-थोड़ा ले-मांग कर सिफर तक पहुंचा देगा। क्या करें क्या ना करें उनकी समझ में कुछ नहीं आ रहा और इस बारे में तो उनकी सहायता नाहीं मोदी जी कर पाएंगे नाहीं जेटली जी !!!!
आपके पास कोई राह, कोई उपाय, कोई युक्ति है क्या ?                              

शुक्रवार, 11 नवंबर 2016

मेजबानी जुकाम की

फिर वही हुआ जो होना लाज़िमी था, एक दिन घर लौटते ही छींकों की लड़ी ने आँख-नाक के सारे रास्ते खोल दिए, शरीर की टंकी में जमा पानी ऐसे बहने लगा जैसे किसी वाशर के खराब हो जाने पर नल से पानी टपकता रहता है  

पिछले दिनों दिल्ली अपने पर्यावरण के कारण काफी चर्चा में रही थी। सही कहें तो उसने दुनिया के सबसे प्रदूषित शहर होने का खिताब पाते ही, "बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ" वाले मुहावरे को सही सिद्ध कर दिया। वर्षों-वर्ष बीत गए, चाहे  कहीं भी रहूं, मुझ पर बदलता मौसम कभी भी अपना असर नहीं डाल पाया। ऐसा नहीं है कि कभी सर्दी-जुकाम हुआ ही ना हो पर बदलता मौसम कभी परेशान नहीं कर पाया। पर इस बार उसकी जीत हो ही गयी।   

यूं तो दिल्ली का वातावरण, बरसात के कुछ दिनों को छोड़ सदा प्रदूषित ही रहता है। यहां के वाशिंदे इसके साथ रहने के, मजबूरीवश ही सही, आदी हो गए हैं। उनकी इसी आदत का फायदा यहां का प्रशासन और प्रशासक दोनों उठाते रहे हैं। इस बार अक्टुबर के खत्म होते-होते शाम के समय ठंड की पदचाप सुनाई देने लगी थी।दिल्ली और आस-पास के इलाके धूएं, धूल और कोहरे की कोठरी में सिमटने लग गए थे। दिवाली की रात के बाद जब लोग सुबह अलसाए से उठे तो पाया कि सारा शहर उस कोठरी के दम-घोंटू माहौल के बदले "स्मॉग" के गहरे, मोटे, अपारदर्शी जान-लेवा गैस-चैंबर में कैद हुआ पड़ा है। पहले दिवाली के एक-दो दिन बाद मौसम में बदलाव आ जाता था पर इस बार जैसे यह स्थाई हो कर रह गया था। आँखों में जलन, गले में खराश, सीने में घुटन, सर्दी-जुकाम-खांसी से लोग परेशान हो गए। मरीजों की अस्पतालों में लाइनें लग गयीं। स्कूल बंद कर
दिए गए। अस्वस्थ, बुजुर्गों को घर में ही रहने की सलाह दी गयी। एक अघोषित आपातकाल सा लागू हो गया।

हर तरह के लाभ-हानि, सलाह-उपदेश, जोड़-घटाव के बावजूद मुझसे कभी सुबह की सैर का आंनद स्थाई तौर पर नहीं लिया जा सका। इसीलिए शाम के समय मैंने घूमने की आदत बना रखी थी जो इन दिनों भी जारी थी। इधर सूरज ढलते ही पार्कों में धूएं-धूल की मोटी परत का शामियाना तनने लग गया था। उसके संभावित खतरे के अंदेशे-अंदाजे के होने-लगने के बावजूद बाहर निकलना जारी रहा। फिर वही हुआ जो होना लाज़िमी था, एक दिन घर लौटते ही छींकों की लड़ी ने आँख-नाक के सारे रास्ते खोल दिए, शरीर की टंकी में जमा पानी ऐसे बहने लगा जैसे किसी वाशर के खराब हो जाने पर नल से पानी टपकता रहता है। अब रूमालों की जरुरत और नाक की हालत का हाल मत ही पूछिएगा !            

जुकाम को कोई बिमारी ही नहीं मानता। पर जिसे जकड़ता है उसकी ऐसी की तैसी कर डालता है। पहले कहा जाता था कि इसके होने पर यदि डाक्टर के पास जायें तो यह तीन दिन में ठीक हो जाता है पर यदि कुछ ना भी करें तो यह अपने-आप 72 घंटे में ठीक हो जाता है। पर आजकल यह भी थोड़ा "ढीठ" हो गया है और अब कम से कम पांच दिन का अनचाहा मेहमान तो बन ही जाता है। तो इस अतिथि को पांच दिनों बाद विदा कर अब चैन की सांस ली है।   

मंगलवार, 1 नवंबर 2016

मैं #छत्तीसगढ हूं

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज सँभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है 

मैं #छत्तीसगढ हूं। आज एक नवम्बर है मेरा जन्मदिन। सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयों से अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को मेरा जन्म-दिन याद रहता है
यह मेरा सौभाग्य है। यह मेरा सोलहवां साल है, सपनों का साल, बाल्यावस्था से किशोरावस्था में पदार्पण करने का साल। कुछ कर गुजरने का साल, सपनों को हकीकत में बदलने के लिए जमीन तैयार करने का साल।   

आप को भी याद ही होगा जब मुझे मध्य प्रदेश से अलग अपनी पहचान मिली थी तो  देश के दूसरे भाग में रहने वाले लोगों को मेरे बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी, उनमें मुझे लेकर तरह-तरह की भ्रांतियां पनपी हुई थीं, लोग मुझे एक पिछडा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते थे । इस धारणा को बदलने में समय तो लगा, मेहनत करनी पड़ी, जितने भी साधन उपलब्ध थे उनका उचित प्रयोग किया गया, धीरे-धीरे तस्वीर बदलने लगी जिसका उल्लेख यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों की जुबानी देशवासियों में होने लगा। लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका
मिला तो उनकी आंखें खुली की खुली रह गयीं उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद मैं इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।

वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्न-गर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया।

कालांतर से मेरा नाम बदलता रहा, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-
अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का। है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्र्ंश है। आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी राजधानी "रायपुर" से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढती लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी शुरू हो चुका है, जो पूर्ण होने के बाद देश के सबसे सुन्दर और अग्रणी  शहरों में शुमार हो जाएगा। अभी की राजधानी रायपुर से करीब बीस की. मी. की दूरी पर यह मलेशिया के "हाई-टेक" शहर पुत्रजया की तरह निर्माणाधीन है। जिसके पूर्ण होने पर मैं गांधीनगर, चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की श्रेणी में शामिल हो जाऊंगा।

एक बात जरूर कहना चाहूंगा कि मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम से ओत-प्रोत मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे  आदर्श प्रदेश के  रूप में जाना जाऊं,  जो देश के किसी भी कोने से आने वाले
 देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूं ही उन्हें #छत्तीसगढिया #सबसे #बढिया का खिताब हासिल नहीं हुआ है।

मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि मेरी बागडोर किस पार्टी के हाथ में है, जो भी यहां की जनता की इच्छा से राज
सँभालता है उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है।

मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।

जय हिंद
जय छत्तीसगढ़ 

शुक्रवार, 28 अक्टूबर 2016

बंटती थीं खुशियां दिवाली पर

माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था    
      
जब भी कोई त्योहार आता है तब-तब उससे जुडी पुरानी यादें ताजा हो जाती हैं। अभी दो-एक दिन के बाद दीपावली आ रही है इसके साथ ही उससे जुडी दशकों पहले की बचपन की यादों ने ताजा-तरीन हो महकना शुरू कर दिया है। जो सबसे पुरानी बातें याद आ रही है वह शायद पचास एक साल पहले की हैं।

बाबूजी (मेरे पिताजी) तब के कलकत्ता के पास एक उपनगर, कोन्नगर, की एक जूट मिल में कार्यरत थे। मिल के स्टाफ में हर प्रांत के लोग थे, मारवाड़ी, पंजाबी, मराठी, बंगाली, बिहारी, ओड़िया, मद्रासी (तब भारत के दक्षिण हिस्से से आने वाले को सिर्फ मद्रासी ही समझा और कहा जाता था) भाषा-रिवाज अलग होने के बावजूद किसी में कोई भेद-भाव नहीं था। कोई छोटा-बड़ा नहीं, कोई जाति-भेद नहीं, कोई ऊँच-नीच नहीं। मुख्य त्योहार होली और दिवाली ऐसे मनाए जाते थे जैसे एक ही परिवार उन्हें मना रहा हो।  

हमारे परिसर में तीन बंगले थे, जिनमें हमारे अलावा दो गुजराती परिवार थे। मैं उन्हीं के परिवार का अंग बन गया था इसीलिए मेरा पहला अक्षर ज्ञान गुजराती भाषा से ही शुरू हुआ था। बाकी के स्टाफ के लिए कुछ दूरी पर क्वार्टर बने हुए थे, दोनों रिहायशों के बीच बड़ा सा मैदान था, जो खेल-कूद के साथ-साथ पूजा वगैरह और त्योहारों की गतिविधियों के काम भी आता था। दिवाली के पहले धनतेरस को ही कलकत्ता से मिठाई और ढेर
सी, बड़ा सा टोकरा भर कर, आतिशबाजी मेरे लिए आ जाती थी। वैसे  कहने को सारे पटाखे-फुलझड़ियाँ इत्यादि मेरे लिए ही होते थे, पर माँ दिवाली के पहले जब सारे स्टाफ को मिठाई भेजती थीं तो हर घर के बच्चों के लिए उसके साथ ही पटाखे, फुलझड़ियाँ, अनार वगैरह आवश्यक रूप से साथ जरूर रखती थीं। अपने उन साथियों, हमजोलियों, सखाओं को इस तरह मिली अतिरिक्त ख़ुशी को देख मुझे भी बहुत आंनद आता था। आज भी किसी को कुछ देकर मिलने वाली ख़ुशी पाने की आदत के बीज शायद बचपन से ही पड़ गए थे। इस में मेरे बाबूजी का बहुत बड़ा योगदान था। मैंने जब से होश संभाला तब से ही उन्हें दूसरों के लिए कुछ न कुछ करते ही पाया,  वह भी चुपचाप बिना किसी तरह का एहसान जताए। खुद सादगी और किफायती रहने के बावजूद अपने माता-पिता और चार भाई-बहनों को कभी कोई अभाव महसूस नहीं होने दिया। वे भी उन्हें सदा पिता समान मानते रहे। वैसे भी परिवार के सदस्य हों या फिर दोस्त, मित्र या जान-पहचान वाले, कोई भी कभी भी उनके पास से खाली हाथ नहीं गया था। इसके साथ ही एक और
खासियत, जिसने मेरे गहरी छाप छोड़ी वह थी उनकी ईमानदारी, जिस पोस्ट पर वह थे वहां पर ईमान डगमगाने के अनेक बहाने और अवसर  आते रहते थे पर उनका मन कभी भी नहीं डोला, दो-तीन वाकये तो मेरे सामने ही घटित हुए जिन्हें मैं आज तक नहीं भूल पाया हूँ। उनको यह संस्कार मेरी दादी जी यानी उनकी माँ से मिले थे जिन्होंने अंग्रेजों की खिलाफत करते हुए जेल में अपनी आँखें गवां दी थीं पर एवज में सरकार से कभी कुछ नहीं चाहा।  बात कहाँ की थी कहाँ पहुँच गयी। पर आज जब लोगों को सिर्फ मैं, मेरा, मेरे, करते पाता हूँ तो आश्चर्य होता है कि क्या वैसे लोग भी थे, जो सिर्फ दूसरों का सोचते थे ! यदि वे बिल्कुल मेरे ना होते तो शायद विश्वास भी ना होता ऐसी बातों पर !!

चलिए लौटते हैं वर्तमान में क्योंकि रहना तो इसीमें है ! शुभ पर्व दिवाली की आप सभी मित्रों,  अजीजों को सपरिवार शुभकामनाएं। 

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