शनिवार, 19 मार्च 2016

विद्या ददाति विनयम ???

आज शिक्षण एक व्यवसाय है जहां ज्ञान नहीं, "सूचनाओं" की जानकारी दे बच्चों को मशीनों की तरह परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है।  इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं .......  

एक बहुत लोकप्रिय सूक्ति है -
"विद्या ददाति विनयम - विनयाद याति पात्रताम | पात्रत्वाद धनमाप्नोती - धनाद धर्मस्तत: सुखं" 
यानी विद्या से विनम्रता, विनम्रता से योग्यता, योग्यता से धन और धन से धर्म और सुख की प्राप्ति होती है।


इस सूक्ति को आजकल कई विद्यालयों-महाविद्यालयों ने अपना आदर्श वाक्य बना दिवालों पर चस्पा तो कर रखा है पर उसपर आचरण कम, दिखावा ज्यादा होता है। क्योंकि जब इस सूक्ति का आभिर्भाव हुआ था, तब और आज की विद्या में आमूलचूल यानी जमीन-आसमान का फर्क आ चुका है। तब गुरु को भगवान से भी ऊँचा स्थान प्राप्त था। वह पूजनीय शख्शियत हुआ करता था तथा अपने शिष्यों और समाज के प्रति पूरी तरह समर्पित हो निष्काम भाव से अपना पूरा ज्ञान सौंप दिया करता था। उनका मुख्य ध्येय ही होता था शिक्षित, ज्ञानवान पीढ़ी का निर्माण। उस समय विद्या और शिक्षा का तकरीबन एक ही मतलब होता था। आज स्थिति पूर्णतया बदल चुकी है। शिक्षा और विद्या पर भी, "जैसा बोओगे वैसा काटोगे, बोया बीज बबूल का तो आम कहां से होय", जैसी कहावतें चरितार्थ होने लगी हैं।   


आज शिष्यों का मूल उद्देश्य केवल पढ़ लेना, या यूं कहिए कि रट लेना, परीक्षा देना और पास होना ही रह गया है। डिग्री-धारी का ठप्पा लग जाना ही सबसे बड़ी उपलब्धि माना जाने लगा है। शिक्षा का उद्देश्य केवल नौकरी या आजीविका का अर्जन हो कर रह गया है जबकि विद्या से मनुष्य को ज्ञान मिलता है। आज के शिक्षक भी यह समझते हैं। इसीलिए विद्यालय दुकानें बन गए हैं और शिक्षण एक व्यवसाय और वह भी ऐसा-वैसा व्यवसाय नहीं बल्कि जिसने अब देश के कई राज्यों की अर्थ-व्यवस्था को अपने ऊपर निर्भर करवा लिया है, जहां जिसे ज्ञान कह कर बेचा जा रहा है, वह केवल सूचना है | मशीनों की तरह बच्चों को परीक्षाओं के लिए तैयार कर उन्हें एक चलता फिरता सूचना संग्रहालय बनाया जाने लगा है। इस अंधी प्रतिस्पर्धात्मक दौड़ में अभिभावक भी पैसा फेंकते जाओ और तरह-तरह की उपाधियां हासिल करते जाओ, जैसी होड़ में मजबूरन शामिल हैं। जाहिर है ऐसी उपाधियां नौकरी तो दिला सकती हैं, ज्ञान नहीं ! इसीलिए ऐसी शिक्षा में विवेक का अभाव रहता है, जिससे विनय के स्थान पर अहंकार की उत्पत्ति होती है। साथ ही यह भी सच है कि ऐसे लोगों को धन तो प्राप्त हो जाता है पर ये लोग सदा अहंकार से ग्रसित रहते हैं। उनमें विनम्रता का सदा अभाव रहता है। इनकी तुलना उन पेड़ों से की जा सकती है जिनमें फल नहीं लगते और पेड़ वही झुकता है जिसमें फल लगते हैं। उसी तरह ऐसे तथाकथित विद्वानों में विनय की आशा करना ही बेमानी है। ऐसी विद्या विनय नहीं अहम को जन्म देती है। 

समाज के हर तबके में ऐसे लोगों की भरमार हो चली है। जिसका उदाहरण रोज ही देखने को मिल जाता है। एक बात जरूर है ऐसे लोग "समदर्शी" हो जाते हैं। अपने अहम के चश्मे के पीछे से इन्हें हर इंसान, जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े से नज़र आने लगते हैं। अपने लिए उठा ज़रा सा विरोध का स्वर इन्हें जहर लगने लगता है। हर प्राणी जो इनके रास्ते में आए या खिलाफत करे वह दुश्मन नज़र आने लगता है। सोचने की बात है कि, क्या हमारी शिक्षा प्रणाली में ही तो कोई ऐसी खामी नहीं पैठ गयी है, जिससे  संस्कारी, विचारवान, विवेकशील, सहनशील, परोपकारी, गुणवान, मानवतावादी इंसानों की खेप आनी ही बंद हो गयी है ?      

गुरुवार, 17 मार्च 2016

प्रभुता पाइ काहु मद नाहीं

ऐसे लोगों का अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला के सम्पर्क में आ जब  इनके सत्ता का मद, उफान खा, विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं..... 

सैकड़ों साल पहले तुलसीदास जी ने इस बात की फिर पुष्टि कर दी थी, जता दिया था कि समय के साथ भले ही लोगों के स्वभाव में, उनके विचारों में, उनके रहन-सहन में, कितने भी बदलाव आ जाएं पर कुछ ऐसा है जो कभी नहीं बदल पाएगा। उसी में एक है यह मदांधता का स्वभाव। जैसे ही मनुष्य को सत्ता, धन, बल मिलता है उसका सबसे पहला असर उसके दिमाग पर ही होता है। अपनी शक्ति के नशे में अंधे हो जाना आम बात  हो जाती है।  उसे अपने सामने हर कोई तुच्छ कीड़ा-मकोड़ा नज़र आने लगता है। 

कुछ समय पहले तक हालत ऐसी नहीं थी। किसी उच्च पद को पाने के लिए, शिखर तक पहुंचने के लिए, कुछ हासिल करने के लिए, उसके लायक योग्यता होनी जरूरी समझी जाती थी, मेहनत करनी पड़ती थी अपने इष्ट को पाने के लिए। साबित करना पड़ता था अपने-आप को। इसलिए बड़े लोगों में भी विनम्रता, त्याग, मानवता जैसी भावनाएं कभी भी विलुप्त नहीं होतीं। ऐसे लोग बिरले ही होते हैं जो शक्तिशाली होते हुए भी विनम्र हों, क्योंकि शक्ति और विनम्रता दोनों विपरीत स्वभाव के गुण हैं, लेकिन अगर ये एक ही इंसान में आ जाएं तो उस व्यक्ति को महान बना देते हैं। 

आज सारे संसार में एक अजीब सा माहौल है। पता नहीं कैसी प्रतिस्पर्द्धा चल रही है कि हर कोई एक अंधी दौड़ में शामिल है। हरेक को कहीं न कहीं पहुंचने की हड़बड़ी है और विडंबना यह है कि ज्यादातर लोग मेहनत या योग्यता की सहायता से नहीं बल्कि कुछ तिकड़म से, कुछ बाहुबल से और ज्यादातर धन-बल के सहारे वह स्थान हासिल कर लेना चाहते हैं, और वे सफल भी हो जाते हैं। ऐसे लोगों में लियाकत तो होती नहीं इसलिए उन्हें सदा अपना स्थान खोने की आशंका बनी रहती है। इसी आशंका के कारण उनके दिलो-दिमाग में क्रोध और आक्रोश ऐसे पैवस्त हो जाते हैं कि उन्हें हर आदमी अपना दुश्मन और दूसरे की ज़रा सी विपरीत बात अपनी तौहीन लगने लगती है। फिर इनका अपने पर काबू नहीं रह जाता, इन्हें यह भी भान नहीं रहता कि क्रोध की ज्वाला पर सत्ता का मद जब उफान खा विस्फोट करता है तो उससे दूसरे का कम इनका खुद का नुक्सान ज्यादा होता है। ऐसे उदाहरण हमें आए-दिन दिखलाई दे जाते हैं। 

इस तरह के लोग समाज के हर तबके में उपलब्ध हैं। ये लियाकतहीन, मौकापरस्त, विवेकहीन लोग जहां भी रहते हैं वहीँ अराजकता विराजती है। पर सबसे चिंतास्पद बात यह है कि अब इस तरह के लोगों की पैठ राजनीती में भी बहुलता से होने लगी है। देश की नीतियों, योजनाओं, कार्य शैली पर भी इनके साये की छाया पड़ने लगी है। जो कि अशनि-संकेत की तरह है। इसके लिए आम नागरिक के साथ-साथ, मीडिया को, प्रबुद्ध-जनों को, राजनैतिक दलों को अपनी महत्वकांक्षाओं, अपने अहम, अपने स्वार्थ से ऊपर उठ, देश हित के लिए ऐसे लोगों को किसी भी कीमत पर दरकिनार करने की पुरजोर कोशिश करनी होगी। काम मुश्किल है, क्योंकि स्वार्थ आड़े आएगा पर कोशिश तो करनी ही है।      

शनिवार, 12 मार्च 2016

कौवे की धूर्तता, बकरी की सेल्फ़ी

आपको तो याद ही होगी उस प्यासे कौवे की कहानी, जिसकी अक्लमंदी और मेहनत की मिसाल आपलोग आज भी अपने बच्चों को देते हो ?  पर यह कोई नहीं जानता कि उसने यह प्रसिद्धि अपनी धूर्तता और मेरी परदादी के भोलेपन का फायदा उठा कर पाई थी.........

जबसे सेवानिवृत्ति का समय शुरू हुआ है, दिवास्वपनों की बारंबारता कुछ ज्यादा ही बढ़ गयी है। जल्द समझ ही नहीं आता कि हकीकत कब होती है और स्वप्न कब ! सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ था। पर उसकी छोड़ी हुई फोटुएं ???
आज जैसे ही घर से निकलने लगा एक बकरानुमा आदमी या आदमीनुमा बकरा दरवाजे पर आ खड़ा हुआ। मैं कुछ समझूँ या पूछूँ उसके पहले ही वह यह कहता हुआ अंदर आ गया कि आपके लिए एक सनसनीखेज खबर लाया हूँ, सुन लीजिए, आपका ही भला है, जिस चैनल को भी आप इसे देंगे उसके तो पौ-बारह हो ही जाएंगे, आपको भी आस-पास के लोग जानने लगेंगे। कब तक ब्लॉग पर मिली पांच-सात टिप्पणियों पर इतराते रहेंगे। मुझे भी सामने पोस्ट आफिस तक एक संपादक को तकाजे का पत्र पोस्ट करने ही जाना था, पर उसको अपने समय की अहमियत जताने के लिए घडी देखता हुआ बैठ गया। एक बार तो मन में आया कि इसकी मेरे पर ही मेहरबानी क्यों ? फिर सोचा मारो गोली ! देखते हैं शायद कुछ काम की ही बात निकल आए।

मेरे बैठते ही बकरे ने इधर-उधर देखा और बोला, आज आपको एक ऐसे झूठ का सच बताने जा रहा हूँ, जिसे सुन
कर आप गश खा जाएंगे। अब तो मेरी भी कुछ-कुछ उत्सुकता बढ़ने लगी थी। पर मैं कुछ बोला नहीं, उसकी तरफ देखता रहा। उसने कहना शुरू किया, यह घटना वर्षों पुरानी है, मेरी परदादी के समय की और उन्हीं से संबंधित। आपको तो याद ही होगी उस प्यासे कौवे की कहानी, जिसकी अक्लमंदी और मेहनत की मिसाल आपलोग आज भी अपने बच्चों को देते हो ?  पर यह कोई नहीं जानता कि उसने यह प्रसिद्धि अपनी धूर्तता और मेरी परदादी के भोलेपन का फायदा उठा कर पाई थी। हमारे खानदान में तो सब को असलियत मालुम पड़ गयी थी पर फिर भी अपने सीधेपन और किसी की बुराई न करने के कारण इतने दिन किसी को कुछ नहीं बताया। पर आज जब उसके वंशजों का वर्चस्व देश में दिनों-दिन बढ़ता देखा तो रहा नहीं गया। चलिए पूरी बात बताता हूँ -
   
वर्षों पूर्व भी छल-कपट, द्वेष, ईर्ष्या, लोभ, धूर्तता जैसी नियामतें हुआ करती थीं पर इनको धारण करने वाले महापुरुषों की संख्या नगण्य होती थी। सरलता, अच्छाई, भलाई, भलमानसता, भोलेपन का ज़माना होते हुए भी इस कौवे में ये सारी खूबियां भरी हुई थीं। पर उसे समाज में चतुर सुजान समझा जाता था।

उन दिनों भयंकर गर्मी पड़ी थी, अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले, पोखर-तालाब, बावड़ी-कुएं सूखने की कगार पर पहुंच गए थे। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच गई थी। ऐसे ही एक दिन मेरी परदादी प्यास के मारे बदहाल हो पानी की तलाश में भटक रही थी। तभी
कुछ दूर एक झोंपड़ी के पास उन्हें एक पक्षी कुछ हरकत करते दिखा। उत्सुकतावश पास जाने पर पाया कि गर्मी से बेहाल, लस्त-पस्त, थका-हारा सा एक कौवा एक मटके में, पास पड़े कुछ कंकड़ों को उठा-उठा कर डाल रहा है। मेरी परदादी ने एक झाडी के पीछे खड़ी हो उसके क्रिया-कलाप के साथ ही अपनी भी "सेल्फ़ी" ले डाली। पर कुछ ही देर बाद कौवे ने थकान के मारे अपना प्रयास बंद कर दिया। इसी बीच उसकी नज़र मेरी परदादी पर पड़ी, पहले तो वह चौंक गया पर तुरंत जैसे संभल कर उसने उन्हें पास बुलाया और बोला, मटके के तले के पानी को मैं कंकड़ डाल-डाल कर ऊपर ले आया हूँ, तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो इसलिए तुम पहले पानी पी लो। वह तो बेहाल थी ही तुरंत मटके तक पहुंची पर पीना तो दूर उसे पानी दिखाई तक नहीं दिया। तभी कौवा अक्लमंदी दिखाते हुए बोला, एक काम करो, अपने सर की ठोकर से मटके को उलट दो जिससे पानी बाहर आ जाएगा, तब हम उसे पी लेंगे। ऐसा कर दोनों ने अपनी प्यास बुझाई ।    
मेरी परदादी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का जम कर ऐसा प्रचार किया कि सभी जगह उसकी भलमानसता तथा अक्लमंदी का गुणगान होने लगा। जो आज तक बदस्तूर जारी है। हम बकरा जाति को किसी बात को समझने में कुछ समय लग जाता है इसीलिए कुछ समय उपरांत ही हम सब को कौवे की धूर्तता का पता चल गया था। पर इसे भलमानसता समझिए या
अपनी बेवकूफी के प्रचार का डर हम आज तक चुप ही रहे ! पर अब आपसे गुजारिश है कि आप सच्चाई लोगों के सामने लाएं। प्रमाण के लिए मैं कुछ पुरानी फोटो भी साथ ले आया हूँ शायद आपके काम आ सकें।

मुझे समझ नहीं आ रहा है कि कैसे और क्या किया जाए ! इसलिए सारी कहानी, फोटो समेत आपके सामने रख रहा हूँ, सलाह और मार्गदर्शन की प्रतीक्षा रहेगी।

मंगलवार, 8 मार्च 2016

महिला दिवस, एक छलावा

महिला दिवस ? दुनिया की आधी आबादी के लिए, साल भर में सिर्फ एक दिन ! इतिहास की बात और थी, समय और था,  पर अब ? महिलाओं को यह गवारा ही कैसे है यह बेतुका भेद-भाव ! क्या वे कोई वस्तु हैं ? भुलाया जाता रस्मो-रिवाज हैं ? लुप्त होती प्रजाति है ? कहाँ है पुरानीु पीढ़ियों को तोड़ने को आतुर, मंदिरों-देवालयों में प्रवेश को ले आंदोलन को आयोजित करने वाले संगठन ? उन्हें यह भेद-भाव क्यों नहीं दिखाई देता ? विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं !! 
महिला दिवस। अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर सबसे पहले इसे 28 फ़रवरी 1909  अंतर्राष्ट्रीय कामगार महिला दिवस के रूप में मनाया गया। 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन के सम्मेलन में इसे अंतर्राष्ट्रीय दर्जा दिया गया और इसे महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा, आदर और प्यार प्रकट करते हुए उनकी आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य के तौर पर समर्पित कर इसके लिए फरवरी का आखरी इतवार निश्चित कर दिया गया। 1917 में रूस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिये हड़ताल पर जाने का फैसला किया। उस समय रूस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनो की तारीखों में कुछ अंतर होता है।
जुलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 की फरवरी का आखरी इतवार 23 फ़रवरी को पड़ा था जबकि ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च थी। चूँकि इस समय पूरी दुनिया में (यहां तक रूस में भी) ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। इसी लिये 8 मार्च महिला दिवस के रूप में मनाया जाने लगा।   
पर धीरे-धीरे ऐसा लगने लगा है जैसे यह दिवस भी एक अौपचारिकता, एक रस्म, एक तारीख भर हो कर रह गया है। क्योंकि सौ साल से भी ज्यादा समय गुजर जाने के बावजूद महिलाओं की स्थिति में कोई उल्लेखनीय या बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं आ पाया है। अभी भी वे शोषण का शिकार हैं ! अभी भी दुनिया भर में उन्हें दोयम दर्जा ही उपलब्ध है !  सोचने की बात यह है कि दुनिया की आधी आबादी, कायनात के आधे हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन किसने निश्चित किया है ? इतिहास की बात और थी, समय और था, पर अब ? महिलाओं को यह गवारा ही कैसे है यह बेतुका भेद-भाव ! क्या वे कोई वस्तु हैं ? भुलाया जाता रस्मो-रिवाज हैं ? लुप्त होती प्रजाति है ? जिसके संरक्षण के लिए एक दिन निर्धारित कर उसे बचाने के उपाय सोचे-बताए जाते हैं ! कहाँ है पुरानीु पीढ़ियों को तोड़ने को आतुर, मंदिरों-देवालयों में प्रवेश को ले आंदोलन को आयोजित करने वाले संगठन ? उन्हें यह भेद-भाव क्यों नहीं दिखाई देता ? वह शायद  इसलिए, क्योंकि यह सब निर्धारित करने वाला आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। उपर से यह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे।  विडंबना तो यह है कि इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी, मीडिया में कवरेज पाने के लिए,  कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर मीडिया, फिल्म या राजनीती की मेहरबानी से समाज में ऐसा स्थान पा चुकी हैं जिसकी  चकाचौंध उनके कर्मों के अँधेरे को छुपाने में सफल रहती है। आज जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की, अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की। 
ऐसा भी नहीं है कि महिलाएं उद्यमी नहीं हैं, लायक नहीं हैं, मेहनती नहीं हैं। उन्होंने हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है। पर पुरुष वर्ग ने बार-बार, हर बार उन्हें दोयम होने का एहसास करवाया है। आज सिर्फ माडलिंग को छोड दें, हालांकि वहां भी बहुत से तरीके हैं शोषण के, तो हर जगह, हर क्षेत्र में महिलाओं का वेतन पुरुषों से कम है। हो सकता है इक्की दुक्की जगह इसका अपवाद हो। कोई क्यों नहीं इसके विरुद्ध आवाज उठाता।  
जब भी कभी इस आधी आबादी के भले की कोई बात होती है तो वहां भी पुरुषों की ही प्रधानता रहती है। वहां इकठ्ठा हुए बहूरूपिए क्या कभी खोज-खबर लेते हैं, सिर पर ईंटों का बोझा उठा मंजिल दर मंजिल चढती रामकली की। अपने घरों में काम करतीं, सुमित्रा, रानी, कौशल्या, सुखिया की? कभी सोचते हैं तपती दुपहरी में खेतों में काम करती रामरखिया के बारे में? कभी ध्यान देते हैं दिन भर सर पर सब्जी का बोझा उठाए घर-घर घूमती आसमती की मेहनत पर ? नहीं ! क्योंकि उससे अखबारों में सुर्खियां नहीं बनतीं, टी.वी. पर चेहरा नज़र नहीं आता ! और कभी अपने मतलब के लिए यदि ऐसा करने की मजबूरी आन पड़ती है तो पहले कैमरे और माईक का इंतजाम कर अपनी छवि को गरीबों का मसीहा प्रचारित करने पर सारा जोर लगा दिया जाता है। ऐसे दिखावे जब तक खत्म नहीं होंगें, महिला खुद जब तक महिला का आदर करना नहीं शुरु करेगी तब तक चाहे एक दिन इनके नाम करें चाहे पूरा साल। कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। 
आज जरूरत है उस समाज की सोच बदलने की, जो बच्चियों को श्राप समझता है। जिसे इतनी भी समझ नहीं कि ये ना होंगी तो हम क्या दुनिया ही नहीं होगी जरुरत है, इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। महिलाओं को दिल से बराबरी का दर्जा देने की। हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की। इस सब के लिए महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करनी होगी। यह इतना आसान नहीं है,  उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं। यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों?  पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं !!

गुरुवार, 3 मार्च 2016

कौवे का पीछा छोड़ पहले अपना कान टटोल लें

यह तो हमारे समाज की विशेषता है कि वह सदा से ही सहिष्णु रहा है। उल-जलूल बातों पर लोग ज्यादातर ध्यान ही नहीं देते। पर गलत हरकतें या बातें  कुछ न कुछ तो अपना असर डालती ही हैं भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो।   इसलिए, खासकर आज के हालात और वातावरण को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि बिना पूरी जांच-पड़ताल के किसी का या उसकी बात का विश्वास यूँही ना कर लिया जाए.... 

कहा गया है, "नीम-हकीम खतराए जान।" यानी आधी-अधूरी जानकारी सदा से ही खतरनाक रही है, फिर वह चाहे किसी भी विषय की हो, किसी भी विधा की हो, किसी के भी बारे में हो। कटु सत्य यह भी है कि कमजोर यादाश्त के साथ-साथ अवाम का एक अच्छा खासा प्रतिशत इस कमी से भी ग्रस्त है, जिसका फ़ायदा, माहौल को अपने पक्ष में करने के लिए, कुछ लोगों द्वारा सदा से उठाया जाता रहा है। ऐसे लोग भीड़ में यदि कह देते हैं कि, तुम्हारा कान कौवा ले उड़ा है तो भीड़ पहले कान टटोलने की जगह कौवे के पीछे दौड़ पड़ती है। जब तक
बात समझ में आती है तब तक तो बंटाधार हो चुका होता है। इसलिए, खासकर आज के हालात और वातावरण को देखते हुए यह जरुरी हो गया है कि बिना पूरी जांच-पड़ताल के किसी का या उसकी बात का विश्वास यूँही ना कर लिया जाए।      
                दुनिया भर के धार्मिक ग्रंथों में कुछ ऐसे चरित्रों का उल्लेख है, जिन्होंने जाति-धर्म से ऊपर उठ मानवता और समाज के लिए अपना सारा जीवन खपा कर लोगों को जीने की सही राह दिखाई। उनके कर्मों, उनके आदर्शों, उनके उपदेशों के कारण उन्हें मानव से इतर देवताओं या संतों का दर्जा मिला। आज भी लोग जात-पांत से परे उन्हें अपना इष्ट, अपना आदर्श, अपना संबल मान उनकी पूजा-अर्चना-इबादत करते हैं। पर कुछ मनोविकारी लोग अवाम की इसी आस्था को खंडित कर उसमें जाति-धर्म, भेद-भाव के विषाणु डाल समाज के टुकड़े-टुकड़े कर अपने घृणित मनसूबे पूरा करना चाहते हैं। इस तरह के घृणित कृत्यों के लिए ज्यादातर देवी-देवताओं को निशाने पर रखा जाता है।   
                    रविवार सुबह की सैर करने के दौरान ठाकुर जी ने एक एस.एम.एस. दिखाया। उसे पहले भी मैं देख चुका था और भी कई लोगों ने इस जहर फैलाते संदेश की शिकायत की थी। इसमें वर्ग विशेष को संबोधित कर उन्हें सचेत और जागरूक करने का दिखावा करते हुए प्राचीन ग्रंथों और पौराणिक कथाओं को सच-झूठ की मिक्सी में तोड़-मरोड़ कर ऐसे सामने रखा गया था, जिससे उन कथाओं की सीख, उनका अर्थ, उनका संदेश बिलकुल ही अलग और विवादास्पद लगने लगे। ठीक उसी तरह जैसे आजकल ऑडिओ-विडिओ टेप के साथ छेड़-छाड़ कर अपने मतलब की बात रेकॉर्ड कर ली जाती है।
                        उदाहरणार्थ संदेश में ऋग्वेद का उल्लेख कर श्री कृष्ण जी को असुर बताया गया है। किसी को भी भड़काने के लिए यह बात काफी है, क्योंकि आज की पीढ़ी के अधिकांश सदस्यों को तो शायद इस ग्रंथ का नाम ही मालुम नहीं होगा, तो उसमे लिखा क्या है इसको जानने की जहमत कौन उठाएगा ! इसी कमजोरी के कारण विष-बीज-रोपण का दुःसाहस किया गया है। जबकि उसी ग्रंथ में साफ़ शब्दों में बताया गया है कि असुर, वह जो सुर यानी देवता न हो। असु+र से बनने वाले इस शब्द का अर्थ बनता है, प्राण+वाला = प्राणवान या शक्तिमान। ऋग्वेद में ही इसका प्रयोग वरुण देव और अन्य देवों के साथ-साथ मानव से श्रेष्ठ गुणों वाले विद्याधरों के लिए भी किया गया है। यह अलग बात है कि समय के साथ इसका अर्थ भौतिक शक्ति मान लिया गया। 
                        ऐसे ही बहुत सफाई से "अबीर" को "अवीर" यानी कमजोर चिन्हित करने वाला बता, उसे होली के दिन उपयोग में न लाने को कहा गया है। जबकि देव-दानव और दानव-देव का घालमेल कर लोगों को भ्रमित कर उलझाने और उकसाने का प्रयास किया गया है। यह बात सफाई से छिपा दी गयी है कि ग्रंथों में इस बात का साफ़-साफ़ उल्लेख है कि सुरों के अलावा अन्य जातियों में भी परम प्रतापी लोगों की कभी कमी नहीं रही है।  
                       इसी तरह रात में शव दहन की बात को सच्चाई छिपाते हुए मुद्दा बनाने की कोशिश की गयी है कि हिंदू धर्म में सारे धार्मिक कार्य देवों को साक्षी मान किए जाते हैं। इसलिए खासकर मनुष्य के जीवन का यह अंतिम संस्कार सूर्य देव, जिनको आत्मा का कारक माना जाता है, वही जीवन और चेतना भी हैं, के सामने ही किया जाता है और फिर अन्धकार यानी रात्रि काल को कुछ अशुभ भी माना जाता है। जबकि इस प्रथा का एक कारण यह भी हो सकता है कि पहले यह क्रिया आबादी से बाहर की जाती थी एतएव जंगली जानवरों इत्यादि से बचाव के लिए इसे दिन में ही किए जाने का प्रावधान रखा गया हो। इसी तरह की कई आधी सच्चाई आधे झूठ वाली बातों को गड्ड-मड्ड कर समाज को दो-फाड़ करने का कुत्सित प्रयास इस एस.एम.एस. में किया गया है।  
                        इस संदेश से यह बात तो साफ़ है कि समाज की शांति, भाईचारे, सौहार्द, को नष्ट कर, वैमनस्य फैलाने का यह कुत्सित प्रयास है। यह तो हमारे समाज की विशेषता है कि वह सदा से ही सहिष्णु रहा है, ऐसी उल-जलूल बातों पर लोग ज्यादातर ध्यान ही नहीं देते। पर इस तरह की हरकतें कुछ न कुछ तो अपना असर डालती ही हैं भले ही वह कुछ समय के लिए ही हो। इसलिए आधे-अधूरे सच में लिपटे ऐसे तथ्यों की सच्चाई और जानकारी लोगों के सामने तुरंत आनी और लानी चाहिए। क्योंकि आजकल चारों ओर जैसा माहौल है उसमें इस तरह की हरकत आग में घी का काम ना करे इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है। जिसके लिए जागरूकता की अति आवश्यकता है। हम सब को अपनी जाति, अपने धर्म, अपने हित को किनारे कर, दलगत लाभ से ऊपर उठ, एक साथ मिल कर, ऐसी ओछी हरकतों की भर्त्सना तो करनी ही चाहिए साथ ही ऐसे उपाय भी करने चाहिए जिससे ऐसी मानसिकता वाले लोगों और उनकी असलियत का समाज के सामने पर्दाफाश हो सके जिससे भविष्य में अपनी ऐसी घिनौनी हरकतों से समाज में भेद-भाव का बीजारोपण करने का कभी भी दुःसाहस ना करे सकें।        

शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

कोलकाता का "चायनीज काली मंदिर"

चीन और हमारे बोल-चाल, रहन-सहन, खान-पान हर चीज में काफी अंतर है। यहां तक कि दोनों देशों के आपसी संबंध भी कुछ मधुर नहीं हैं, इसके बावजूद इस मंदिर ने दोनों समुदायों को जोड़ कर रखा है। दो अलग-अलग संस्कृतियाँ एकजुट हो जैसे यहाँ पूजा-अर्चना करती हैं, वह विश्व में एक मिसाल ही कही जाएगी।   इसके निर्माण में टैंगरा  के हर चीनी परिवार ने अपना यथाशक्ति सहयोग दिया है


1962 में शम्मी कपूर के दोहरे रोल वाली एक फिल्म आई थी "चाइना टाउन"। जिसमें कलकत्ते के एक कोने में आज भी स्थित चीनी बहुल आबादी वाले एक ऐसे बदनाम इलाके का चित्रण था, जहां अपराध और अपराधियों के इस स्वर्ग में किसी की तलाश में जाने के पहले पुलिस को कई बार सोचना पड़ता था। चाहे मादक द्रव्यों की उपलब्धता की बात हो या खून-खराबे, गुंडा-गर्दी की बात हो या लूट-मार की, स्मगलिंग की वारदात हो या गैर कानूनी हथियारों की, ग़ढ हुआ करती थी यह जगह हर इस तरह के जयाराम पेशों और गैर-कानूनी कामों की। 1837 के आस-पास से इसकी बसाहट का इतिहास मिलता है। सत्तर के दशक में इसका पराभव होना शुरू हो गया था। उस समय कलकत्ते में चीनी जूतों और चीनी दंत चिकित्सकों की भरमार हुआ करती थी, हालांकि  कुछ लोग बढ़ई-गिरी के काम में भी संलग्न थे, जो इनकी पहचान बन गयी थी।

कलकत्ते के, अंग्रजों के समय में, देश की राजधानी होने के कारण कई विदेशी लोगों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था और इसी कारण उनके अलग-अलग मोहल्ले भी बन गए थे। वैसा ही एक इलाका "धापा" था जिसको बोल-चाल में चायना टाउन भी कहा जाता था। यहां लगभग 95 प्रतिशत आबादी चीनियों की होने के कारण उसका ऐसा नाम पड़ा था।इसके दो हिस्से हुआ करते थे, पुराने वाला हिस्सा टीरेट्टा या टीरेट्टी बाजार और नया हिस्सा टैंगरा कहलाता था। पर जैसे अन्य समुदायों के लोग स्थानीय लोगों से घुल-मिल गए थे वैसा चीनी बिरादरी नहीं कर पायी थी। धापा में इनके चमड़ा शोधन के कारखाने थे, जो कलकत्ते में खासकर धर्मतल्ला के पास स्थित जूतों-चप्पलों और चमड़े की सैकड़ों दुकानों को उनकी जरुरत का सामान उपलब्ध करवाते थे। पर जैसे कि हर जाति, समुदाय या देशवासियों में कुछ लोग मिलनसार, एक-दूसरे के सुख-दुःख में प्रतिभागी होने की प्रकृति वाले होते हैं, वैसे ही कुछ लोग टैंगरा में भी थे। उनके स्थानीय लोगों के साथ भाईचारे, मित्रता और सौहाद्र का प्रतीक, काली माता का मंदिर आज भी वहाँ गवाह के रूप में मौजूद है।                      

कलकत्ता, आज के कोलकाता, में एक अलग तरह का काली माता का मंदिर, जिसे "चायनीज काली मंदिर" (ऐसा ही मंदिर के नाम-पट्ट पर लिखा हुआ है) के नाम से जाना जाता है, लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। काली पूजा के दिन हिन्दुओं से ज्यादा यहां चीनी भक्तों की भीड़ होती है। यहां के लोगों के अनुसार यह मंदिर करीब साठ साल पुराना है। उस समय एक पेड़ के नीचे एक काले पत्थर के पिंड पर सिंदूर-फूल चढ़ा कर पूजा-अर्चना की जाती थी। चीनी समुदाय की इस मंदिर और काली माँ में आस्था तब हुई जब चीनी परिवार का एक बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। डाक्टरों ने जवाब दे दिया था। बचने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी। हताश-निराश माँ-बाप ने बच्चे को उसी पेड़ के नीचे लिटा कर काली माँ से उसके प्राणों को बचाने की  प्रार्थना की। दिल की गहराइयों से की गयी करुण याचना के फलस्वरूप बच्चा स्वस्थ हो गया और लोगों की माँ में अटूट श्रद्धा हो गयी। तब से वहाँ रहने वाले चीनी लोग भी, जिनमें ज्यादातर बौद्ध और क्रिश्चियन थे, यहाँ पूजा-अर्चना करने लग गए। 

समय के साथ-साथ यहां मंदिर का निर्माण हुआ। आज का स्वरूप करीब बारह वर्ष पूर्व का है। इसमें पुरानी पीडिंयों के साथ ही माँ काली की प्रतिमा की स्थापना की गयी है। टैंगरा के हर चीनी परिवार ने इसके निर्माण में अपना यथाशक्ति सहयोग दिया है। माँ की पूजा हिन्दू रीती-रिवाज से ही होती है। पर उसमें अपनी भक्ति से वशीभूत कुछ लोग श्रद्धावश अपनी तरफ से चीनी प्रथाओं को भी जोड़ देते हैं। जैसे बड़ी मोमबत्तियां तथा सुंगधित द्रव्य जलाना, आकाश में कैंडिल या आकाश-दीप छोड़ना आदि। पर इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत और अनोखी बात यहां चढने वाले प्रसाद में है, जिसमें नूडल्स, चॉप्सी, चावल, हरी सब्जियों       जैसे पदार्थ भी शामिल रहते हैं।           
चीन और हमारे बोल-चाल, रहन-सहन, खान-पान हर चीज में काफी अंतर है। यहां तक कि दोनों देशों के आपसी संबंध भी कुछ मधुर नहीं हैं, इसके बावजूद इस मंदिर ने दोनों समुदायों को जोड़ कर रखा है। दो अलग-अलग संस्कृतियाँ एकजुट हो जैसे यहाँ पूजा-अर्चना करती हैं, वह विश्व में एक मिसाल ही कही जाएगी। भले ही साल के अन्य दिनों में यहां के लोग एक-दूसरे से उतना नहीं मिल पाते हों पर काली पूजा के दिन सुबह से ही दोनों समुदायों के लोग यहां एकत्रित होना शुरू हो जाते हैं। वहाँ हरेक को कुछ ना कुछ जिम्मेदारी सौंप दी जाती है जिसे वह पूरी श्रद्धा भाव से पूरा करता है। वैसे भी मंदिर के सामने से गुजरने वाले चीनी स्त्री-पुरुषों का वहाँ रुक अपने जूते वगैरह उतार देवी माँ के सामने हाथ जोड़ना एक आम बात है। रोजाना की पूजा-आरती का जिम्मा एक बंगाली ब्राह्मण पंडित जी के जिम्मे है। जब की पूरी देखभाल की जिम्मेदारी ईशोन चेन नाम के समर्पित चीनी सज्जन पर है। जो वर्षों से श्रद्धापूर्वक, पूरी आस्था और विश्वास के साथ बिना किसी भेद-भाव के अपना फर्ज निभाते आ रहे हैं। ऐसे ही लोगों के कारण कभी बदनाम रहा धापा आज अपनी एक नई पहचान बनाने में सफल रहा है।   

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

कागजों की भूलभुलैया

इस वार्तालाप को पढ़ कर हंसी तो आती है, पर यह एक कड़वी सच्चाई है। हालात में एक्का-दुक्का प्रतिशत बदलाव भले ही आया हो, पर अभी भी लाखों ऐसे लोग हैं जो इस तरह के भंवर जाल में फंसे हुए हैं। दफ्तरों के चक्कर, वहाँ की लाल फीताशाही, वहाँ बैठे बाबुओं के असहयोगिता पूर्ण रवैये और अपनी आधी-अधूरी जानकारी के कारण अनपढ़ और अर्धशिक्षित लोग परेशानी से बचने के लिए जरूरी कागजात बनवाने से कतराते रहते हैं। पर जब अति आवश्यक हो जाता है, ऐसा कोई दस्तावेज, तो फिर दलालों की चांदी हो जाती है जो ऐसे लोगों से मनचाही रकम वसूलते हैं, तरह-तरह की परेशानियों का जिक्र और कागज बनवाने के नाम पर       

ट्रैफिक हवलदार ननकू से, अपना  ड्रायविंग लायसेंस दिखाओ            
ननकू - लायसेंस तो नहीं है, साहब 

ट्रैफिक हवलदार - अरे ! क्या तुमने ड्रायविंग लायसेंस बनवाया ही नहीं है?

ननकू - नहीं, साहब  

ट्रैफिक हवलदार - क्यों नहीं बनवाया ?


ननकू - एक बार बनवाने गया था, वे लोग बोले, पहचान पत्र लेकर आओ। पर मेरे पास अपना मतदाता पहचान पत्र तो है ही नहीं। 

ट्रैफिक हवलदार - अरे भाई ! यह तो बहुत जरूरी होता है, तुम अपना मतदाता पहचान पत्र बनवाओ जाकर।

ननकू - साहब मैं पहचान पत्र बनवाने गया तो वहाँ के साहब लोग बोले, अपना राशन कार्ड ले कर आओ। अब का करें मेरा तो राशन कार्ड भी नहीं बना  है।
 
ट्रैफिक हवलदार - अरे कैसे आदमी हो तुम ? कोई भी कागज़ तुम्हारे पास नहीं है जाओ पहले राशन कार्ड बनवाओ अपना ! 

ननकू - उसके लिए मैं  नगर निगम गया था, वहाँ मेरी बैंक की पास-बुक मांगी गयी पर मेरा तो किसी बैंक में खाता ही नहीं है। 

ट्रैफिक हवलदार - तो मेरे बाप बैंक खाता खुलवा ले।

ननकू -  अब कैसे खुलवा लूँ साहब, बैंक वाले ड्रायविंग लायसेंस दिखाने को कहते हैं। 


हवलदार अभी तक बेहोश है। 

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