शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2016

कोलकाता का "चायनीज काली मंदिर"

चीन और हमारे बोल-चाल, रहन-सहन, खान-पान हर चीज में काफी अंतर है। यहां तक कि दोनों देशों के आपसी संबंध भी कुछ मधुर नहीं हैं, इसके बावजूद इस मंदिर ने दोनों समुदायों को जोड़ कर रखा है। दो अलग-अलग संस्कृतियाँ एकजुट हो जैसे यहाँ पूजा-अर्चना करती हैं, वह विश्व में एक मिसाल ही कही जाएगी।   इसके निर्माण में टैंगरा  के हर चीनी परिवार ने अपना यथाशक्ति सहयोग दिया है


1962 में शम्मी कपूर के दोहरे रोल वाली एक फिल्म आई थी "चाइना टाउन"। जिसमें कलकत्ते के एक कोने में आज भी स्थित चीनी बहुल आबादी वाले एक ऐसे बदनाम इलाके का चित्रण था, जहां अपराध और अपराधियों के इस स्वर्ग में किसी की तलाश में जाने के पहले पुलिस को कई बार सोचना पड़ता था। चाहे मादक द्रव्यों की उपलब्धता की बात हो या खून-खराबे, गुंडा-गर्दी की बात हो या लूट-मार की, स्मगलिंग की वारदात हो या गैर कानूनी हथियारों की, ग़ढ हुआ करती थी यह जगह हर इस तरह के जयाराम पेशों और गैर-कानूनी कामों की। 1837 के आस-पास से इसकी बसाहट का इतिहास मिलता है। सत्तर के दशक में इसका पराभव होना शुरू हो गया था। उस समय कलकत्ते में चीनी जूतों और चीनी दंत चिकित्सकों की भरमार हुआ करती थी, हालांकि  कुछ लोग बढ़ई-गिरी के काम में भी संलग्न थे, जो इनकी पहचान बन गयी थी।

कलकत्ते के, अंग्रजों के समय में, देश की राजधानी होने के कारण कई विदेशी लोगों का वहाँ आना-जाना लगा रहता था और इसी कारण उनके अलग-अलग मोहल्ले भी बन गए थे। वैसा ही एक इलाका "धापा" था जिसको बोल-चाल में चायना टाउन भी कहा जाता था। यहां लगभग 95 प्रतिशत आबादी चीनियों की होने के कारण उसका ऐसा नाम पड़ा था।इसके दो हिस्से हुआ करते थे, पुराने वाला हिस्सा टीरेट्टा या टीरेट्टी बाजार और नया हिस्सा टैंगरा कहलाता था। पर जैसे अन्य समुदायों के लोग स्थानीय लोगों से घुल-मिल गए थे वैसा चीनी बिरादरी नहीं कर पायी थी। धापा में इनके चमड़ा शोधन के कारखाने थे, जो कलकत्ते में खासकर धर्मतल्ला के पास स्थित जूतों-चप्पलों और चमड़े की सैकड़ों दुकानों को उनकी जरुरत का सामान उपलब्ध करवाते थे। पर जैसे कि हर जाति, समुदाय या देशवासियों में कुछ लोग मिलनसार, एक-दूसरे के सुख-दुःख में प्रतिभागी होने की प्रकृति वाले होते हैं, वैसे ही कुछ लोग टैंगरा में भी थे। उनके स्थानीय लोगों के साथ भाईचारे, मित्रता और सौहाद्र का प्रतीक, काली माता का मंदिर आज भी वहाँ गवाह के रूप में मौजूद है।                      

कलकत्ता, आज के कोलकाता, में एक अलग तरह का काली माता का मंदिर, जिसे "चायनीज काली मंदिर" (ऐसा ही मंदिर के नाम-पट्ट पर लिखा हुआ है) के नाम से जाना जाता है, लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। काली पूजा के दिन हिन्दुओं से ज्यादा यहां चीनी भक्तों की भीड़ होती है। यहां के लोगों के अनुसार यह मंदिर करीब साठ साल पुराना है। उस समय एक पेड़ के नीचे एक काले पत्थर के पिंड पर सिंदूर-फूल चढ़ा कर पूजा-अर्चना की जाती थी। चीनी समुदाय की इस मंदिर और काली माँ में आस्था तब हुई जब चीनी परिवार का एक बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। डाक्टरों ने जवाब दे दिया था। बचने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी। हताश-निराश माँ-बाप ने बच्चे को उसी पेड़ के नीचे लिटा कर काली माँ से उसके प्राणों को बचाने की  प्रार्थना की। दिल की गहराइयों से की गयी करुण याचना के फलस्वरूप बच्चा स्वस्थ हो गया और लोगों की माँ में अटूट श्रद्धा हो गयी। तब से वहाँ रहने वाले चीनी लोग भी, जिनमें ज्यादातर बौद्ध और क्रिश्चियन थे, यहाँ पूजा-अर्चना करने लग गए। 

समय के साथ-साथ यहां मंदिर का निर्माण हुआ। आज का स्वरूप करीब बारह वर्ष पूर्व का है। इसमें पुरानी पीडिंयों के साथ ही माँ काली की प्रतिमा की स्थापना की गयी है। टैंगरा के हर चीनी परिवार ने इसके निर्माण में अपना यथाशक्ति सहयोग दिया है। माँ की पूजा हिन्दू रीती-रिवाज से ही होती है। पर उसमें अपनी भक्ति से वशीभूत कुछ लोग श्रद्धावश अपनी तरफ से चीनी प्रथाओं को भी जोड़ देते हैं। जैसे बड़ी मोमबत्तियां तथा सुंगधित द्रव्य जलाना, आकाश में कैंडिल या आकाश-दीप छोड़ना आदि। पर इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत और अनोखी बात यहां चढने वाले प्रसाद में है, जिसमें नूडल्स, चॉप्सी, चावल, हरी सब्जियों       जैसे पदार्थ भी शामिल रहते हैं।           
चीन और हमारे बोल-चाल, रहन-सहन, खान-पान हर चीज में काफी अंतर है। यहां तक कि दोनों देशों के आपसी संबंध भी कुछ मधुर नहीं हैं, इसके बावजूद इस मंदिर ने दोनों समुदायों को जोड़ कर रखा है। दो अलग-अलग संस्कृतियाँ एकजुट हो जैसे यहाँ पूजा-अर्चना करती हैं, वह विश्व में एक मिसाल ही कही जाएगी। भले ही साल के अन्य दिनों में यहां के लोग एक-दूसरे से उतना नहीं मिल पाते हों पर काली पूजा के दिन सुबह से ही दोनों समुदायों के लोग यहां एकत्रित होना शुरू हो जाते हैं। वहाँ हरेक को कुछ ना कुछ जिम्मेदारी सौंप दी जाती है जिसे वह पूरी श्रद्धा भाव से पूरा करता है। वैसे भी मंदिर के सामने से गुजरने वाले चीनी स्त्री-पुरुषों का वहाँ रुक अपने जूते वगैरह उतार देवी माँ के सामने हाथ जोड़ना एक आम बात है। रोजाना की पूजा-आरती का जिम्मा एक बंगाली ब्राह्मण पंडित जी के जिम्मे है। जब की पूरी देखभाल की जिम्मेदारी ईशोन चेन नाम के समर्पित चीनी सज्जन पर है। जो वर्षों से श्रद्धापूर्वक, पूरी आस्था और विश्वास के साथ बिना किसी भेद-भाव के अपना फर्ज निभाते आ रहे हैं। ऐसे ही लोगों के कारण कभी बदनाम रहा धापा आज अपनी एक नई पहचान बनाने में सफल रहा है।   

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

कागजों की भूलभुलैया

इस वार्तालाप को पढ़ कर हंसी तो आती है, पर यह एक कड़वी सच्चाई है। हालात में एक्का-दुक्का प्रतिशत बदलाव भले ही आया हो, पर अभी भी लाखों ऐसे लोग हैं जो इस तरह के भंवर जाल में फंसे हुए हैं। दफ्तरों के चक्कर, वहाँ की लाल फीताशाही, वहाँ बैठे बाबुओं के असहयोगिता पूर्ण रवैये और अपनी आधी-अधूरी जानकारी के कारण अनपढ़ और अर्धशिक्षित लोग परेशानी से बचने के लिए जरूरी कागजात बनवाने से कतराते रहते हैं। पर जब अति आवश्यक हो जाता है, ऐसा कोई दस्तावेज, तो फिर दलालों की चांदी हो जाती है जो ऐसे लोगों से मनचाही रकम वसूलते हैं, तरह-तरह की परेशानियों का जिक्र और कागज बनवाने के नाम पर       

ट्रैफिक हवलदार ननकू से, अपना  ड्रायविंग लायसेंस दिखाओ            
ननकू - लायसेंस तो नहीं है, साहब 

ट्रैफिक हवलदार - अरे ! क्या तुमने ड्रायविंग लायसेंस बनवाया ही नहीं है?

ननकू - नहीं, साहब  

ट्रैफिक हवलदार - क्यों नहीं बनवाया ?


ननकू - एक बार बनवाने गया था, वे लोग बोले, पहचान पत्र लेकर आओ। पर मेरे पास अपना मतदाता पहचान पत्र तो है ही नहीं। 

ट्रैफिक हवलदार - अरे भाई ! यह तो बहुत जरूरी होता है, तुम अपना मतदाता पहचान पत्र बनवाओ जाकर।

ननकू - साहब मैं पहचान पत्र बनवाने गया तो वहाँ के साहब लोग बोले, अपना राशन कार्ड ले कर आओ। अब का करें मेरा तो राशन कार्ड भी नहीं बना  है।
 
ट्रैफिक हवलदार - अरे कैसे आदमी हो तुम ? कोई भी कागज़ तुम्हारे पास नहीं है जाओ पहले राशन कार्ड बनवाओ अपना ! 

ननकू - उसके लिए मैं  नगर निगम गया था, वहाँ मेरी बैंक की पास-बुक मांगी गयी पर मेरा तो किसी बैंक में खाता ही नहीं है। 

ट्रैफिक हवलदार - तो मेरे बाप बैंक खाता खुलवा ले।

ननकू -  अब कैसे खुलवा लूँ साहब, बैंक वाले ड्रायविंग लायसेंस दिखाने को कहते हैं। 


हवलदार अभी तक बेहोश है। 

सोमवार, 22 फ़रवरी 2016

अ-रामायणनामा

क्या ताम-झाम, शोर-शराबे, उत्सवनुमा माहौल में जो नामी-गिरामी हस्तियां अपनी गरिमामयी उपस्थिति में किसी पुस्तक का या किसी उत्पाद का विमोचन करती हैं, वे क्या कभी उस पुस्तक के कथानक या उस उत्पाद की गुणवत्ता पर भी ध्यान देती हैं या ऐसे ही मेजबान को उपकृत कर चल देती हैं ? क्या इस पुस्तक पर हस्ताक्षर करने वाले नामी-गिरामी लोगों ने इसके कथानक के बारे में कोई जानकारी हासिल की थी ? 

कुछ दिनों पहले एक पुस्तक "SCION OF IKSHVAKU" पर श्री अमिताभ बच्चन, शेखर कपूर, शशि थरूर जैसे दिग्गजों की टिप्पणियाँ, उसके आवरण पृष्ठ के विमोचन पर अक्षय कुमार का उपस्थित होना और कथानक का दावा कि यह श्री राम कथा को आधुनिक परिपेक्ष्य में रख रची गयी कथा है, को देख, कुछ अलग जानकारी और पढने को मिलेगा, इसलिए इसे ख़रीदा था। जेहन में नरेंद्र कोहली जी की रामायण और महाभारत पर पढ़ी बेहतरीन पुस्तकों की याद ताजा हो आई थी।  पर कुछ हट कर क्या मिला ! घोर आक्रोश और निराशा !! पर देश के आज कल के माहौल को देख अराजकता में कहीं और इजाफा न हो जाए इसलिए चुप रहना ही बेहतर लगा।  पर आज फेस बुक पर अमेजन द्वारा इसी की बिक्री का विज्ञापन फिर दिखा तो कुछ लिखने से रहा ना गया !

एक बात समझ में नहीं आती कि झटके में नाम और दाम कमाने की चाहत वाले ऐसे तथाकथित, स्वयंभू  "विद्वानों" के निशाने पर हिंदू धर्म के ग्रंथ, उनके देवी-देवता, उनके कथानक, उनकी संस्कृति, उनकी मान्यताएं ही क्यूँ रहती हैं ?  यदि आप इतने ही बड़े कथाकार हैं, चित्रकार हैं, फिल्मकार हैं, तो फिर आप अपने पात्र अलग नाम-स्थान से क्यों नहीं घढते ? क्यों आपको आपको अपने हुनर पर भरोसा नहीं रहता ? क्यों आपको लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ कर अपने को प्रकाश में लाने की जरूरत पड़ती है ? क्यों स्थापित पौराणिक चरित्रों के सहारे की आवश्यकता सदा बनी रहती है ? क्यों आप अपनी कहानियों, चित्रो, फिल्मों में उनकी छवि को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हो ? क्यों विवाद की आग भड़का कर अपनी रोटियां सेकना चाहते हो ?    

किसी भी लेखक को आजादी है कि वह अपने मन में आए विचारों को कथा का रूप दे लोगों के सामने रखे पर उसके लिए नैतिकता, सामाजिक सरोकार, लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ तो ना करे ! श्री राम कथा एक ऐसा कथानक है जो भारतवासियों के रोम-रोम में रचा-बसा है। गुलामी, बदहाली, दमन, अत्याचार के समय में इसने हज़ारों-लाखों, आवासी-प्रवासी, हिंदुओं के दिलो-दिमाग को संबल दिए रखा। भारतवासियों को एक सूत्र में बांधे रखा। एक आस्था, एक विश्वास, एक ऐसी धारणा पैदा कर दी कि लोगों के लिए यह कथानक एक आदर्श बन गया। इसके पात्र पूजनीय बन गए। इसमें वर्णित घटनाएं लोगों का मार्ग-दर्शक बन गयीं। भारत के घर-घर में और कुछ हो न हो मानस या उससे संबंधित पुस्तकों की प्रतियों ने जरूर अपना स्थान बना लिया। धर्म का पर्याय बन गयी यह कथा।

पर जैसे-जैसे समाज पर बाजार हावी होने लगा वैसे-वैसे धनार्जन के कई नैतिक-अनैतिक रास्ते भी उजागर होने लग गए उन्हीं में से एक उपधारणा यह उभर कर आई कि छवि-भंजक क्रिया धन का मार्ग प्रशस्त करती है। विवाद पैदा करो, नाम और दाम दोनों झोली में गिरने को आतुर हो जाते हैं। ऐसे लोगों की कुटिल व्यापारिक बुद्धि यह भी अच्छी तरह जानती थी कि इस देश में यदि हजार लोग उनका विरोध करेंगे तो सौ लोग अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर उनके पक्ष में भी आ खड़े होंगे और यही सौ उन हज़ार पर भारी पड़ उन्हें हर तरह की सफलता दिलवाएंगे। इसी कारण ऐसे लोगों के हौसले बुलंद होते रहते हैं।

रही इस किताब की बात, यदि लेखक ने समय, स्थान, परिवेश, नाम अलग रखे होते तो बात समझ में आती थी। उससे कथा को मौलिक रूप के साथ-साथ मूल पात्रों के चरित्र से छेड़-छाड़ भी महसूस नहीं होती या अखरती। पर दूसरों को बदनाम कर खुद के नाम कमाने की हवस यहां हावी रहती नजर आती है। एक प्रश्न और सर उठाता है कि क्या ताम-झाम, शोर-शराबे, उत्सवनुमा माहौल में जो नामी-गिरामी हस्तियां अपनी गरिमामयी उपस्थिति में किसी पुस्तक का या किसी उत्पाद का विमोचन करती हैं, वे क्या कभी उस पुस्तक के कथानक या उस उत्पाद की गुणवत्ता पर भी ध्यान देती हैं या ऐसे ही मेजबान को उपकृत कर चल देती हैं ?
एक नजर इस पुस्तक में वर्णित किए गए वाकयों पर डालने से एक असमंजस की स्थिति आ खड़ी होती है, जिसके अनुसार -     
* अयोध्या आर्थिक रूप से डांवाडोल,  भ्रष्टाचार में लिप्त, षडयंत्रों में फंसा राज्य था।  
* अयोध्या का खर्च मंथरा उठाती थी जिसके पास अकूत दौलत थी। वह षडयंत्रकारियों की प्रमुख थी। पूरे राज-परिवार पर उसका दबदबा था। 
* मंथरा की एक लड़की थी जो डाक्टर थी। लेखक ने उसी की मौत को मुद्दा बना राम के बनवास की घटना रची है। जिसके लिए मंथरा कैकेयी को उत्कोच देती है। 
* चूँकि जिस दिन रावण के हाथों युद्ध में दशरथ की बुरी तरह हार हुई थी, उसी दिन राम का जन्म हुआ था इसलिए दशरथ राम से नफरत करते थे। इसी कारण प्रजा में भी राम की छवि अच्छी नहीं थी।
* कुछ लोग राम को अपने रास्ते से हटाना चाहते थे।
* माता कौश्लया बेहद बेबस और हताशा भरा समय व्यतीत कर रही थीं। दशरथ उन्हें देखना तक नहीं चाहते थे। 
* अराजकता का बोलबाला था इसलिए जब चारों भाई गुरुकुल से लौटे तो राम को फ़साने के लिए "पुलिस विभाग" सौंपा गया और भरत को भावी राजा घोषित किया गया।    
* चारों भाइयों की उम्र में भी काफी फर्क था। 
* गुरु वशिष्ठ अपना गुरुकुल, वनवासियों की जमीन पर किराए पर चलाते थे।  वह भी दशरथ को राजसिंहासन से हटाना चाहते थे।
* वनवासियों की अयोध्या से दुश्मनी थी। इसलिए उनसे राजकुमारों की असलियत छिपा कर रखी गयी थी।
* वशिष्ठ आर्यावर्त या भारत को नहीं "इंडिया" से लगाव रखते थे।
* प्रणाम या नमस्कार के बदले "नमस्ते" का प्रयोग किया जाता था। 
* भरत की कई लड़कियों से दोस्ती थी। लक्ष्मण और शत्रुघ्न उन्हें "खिलाड़ी" मानते थे।
* गुरुकुल के नियमों की अवहेलना कर लक्ष्मण रात्रि-विहार किया करते थे।
* वनवास के चौदह में तरह सालों में एक बार भी लेखक ने उन्हें कंद-मूल लाने की बजाय हर बार शिकार कर अपना भोजन प्राप्त करते बताया है।

ऐसे  ही कल्पित और विवादित घटनाओं का पुलिंदा है यह उपन्यास।
किसी की इच्छा या अनिच्छा से किसी वस्तु का आंकलन करना ठीक नहीं होता इसलिए लगता है कि इस पुस्तक को अधिक से अधिक लोग पढ़ें जिससे इसका मूल्यांकन और इसकी गुणवत्ता को लोग परख कर अपनी राय सबके सामने रख सकें जिससे भविष्य में लिखने वाले, छापने वाले और बेचने वाले पहले सोचें फिर कोई कदम उठाएं। 

गुरुवार, 18 फ़रवरी 2016

बसंत भी उद्विग्न है

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे  नकार भी नहीं पा रहा था। सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में एक सर्द लहर उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का...... 

अभी पौ फटी नहीं थी कि दरवाजे पर कुछ आहट सी सुनाई पड़ी। बांह की चोट के कारण रात भर अर्द्ध-सुप्तावस्था की हालत रही थी, इसीलिए  सच और भ्रम का पता ही नहीं चल पा रहा था। पर कुछ देर बाद फिर लगा बाहर कोई है। इस बार उठ कर द्वार खोला तो एक गौर-वर्ण अजनबी व्यक्ति को खड़े पाया। आजकल के परिवेश से पहनावा कुछ अलग था। धानी धोती पर पीत अंगवस्त्र, कंधे तक झूलते गहरे काले बाल, कानों में कुण्डल, गले में तुलसी की माला, सौम्य-तेजस्वी चेहरा,  होठों पर आकर्षित कर लेने वाली मुस्कान। इसके साथ ही जो एक चीज महसूस हुई वह थी एक बेहद हल्की सुवास, होसकता है वह मेरे प्रांगण में लगे फूलों से ही आ रही हो। 
मेरे चेहरे पर प्रश्न सूचक जिज्ञासा देख उसने कहा, अंदर आने को नहीं कहिएगा ? उनींदी सी हालत, अजनबी व्यक्ति, सुनसान माहौल !! पर आगंतुक के व्यक्तित्व में कुछ ऐसा आकर्षण था कि ऊहापोह की स्थिति में भी मैंने एक तरफ हट कर उसके अंदर आने की जगह बना दी। बैठक में बैठने के उपरांत मैंने पूछा, आपका परिचय नहीं जान पाया हूँ ? 
वह मुस्कुराया और बोला, मैं बसंत।
बसंत ! कौन बसंत ?  मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा था !                                               
मैंने कहा, माफ़ कीजिएगा, मैं अभी भी आपको पहचान नहीं पाया हूँ !
अरे भाई, वही बसंत देव, जिसकी अभी-अभी पंचमी मनाई है आप लोगों ने।                      
मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था ! क्या कह रहा है सामने बैठा इंसान !! यह कैसे हो सकता है ? 
घबराहट साफ़ मेरे चेहरे पर झलक आई होगी, जिसे देख वह बोला, घबड़ाइये नहीं, मैं जो कह रहा हूँ वह पूर्णतया सत्य है। 

मेरे मुंह में तो जैसे जबान ही नहीं थी। लौकिक-परालौकिक, अला-बला जैसी चीजों पर मेरा विश्वास नहीं था। पर जो सामने था उसे  नकार भी नहीं पा रहा था।  सच तो यह था कि मेरी रीढ़ में एक सर्द लहर उठने लगी थी। आश्चर्य यह भी था कि ज़रा सी आहट पर उठ बैठने वाली श्रीमती जी को भी कोई आभास नहीं हुआ था, मेरे उठ कर बाहर आने का। परिस्थिति से उबरने के लिए मैंने आगंतुक को कहा, ठंड है मैं आपके लिए चाय का इंतजाम करता हूँ, सोचा था इसी बहाने श्रीमती जी को उठाऊंगा, एक से भले दो। पर अगले ने साफ़ मना कर दिया कि मैं कोई भी पेय पदार्थ नहीं लूँगा, आप बैठिए। मेरे पास कोई चारा नहीं था। फिर भी कुछ सामान्य सा दिखने की कोशिश करते हुए मैंने पूछा, कैसे आना हुआ ?

बसंत के चेहरे पर स्मित हास्य था, बोला मैं तो हर साल आता हूँ। आदिकाल से ही जब-जब शीत ऋतु के मंद पडने और ग्रीष्म के आने की आहट होती है, मैं पहुँचता रहा हूँ।  सशरीर ना सही पर अपने आने का सदा प्रमाण देता रहा हूँ । आपने भी जरूर महसूस किया ही होगा कि मेरे आगमन से सरदी से ठिठुरी जिंदगी एक अंगडाई ले आलस्य त्याग जागने लगती है। जीवन में मस्ती का रंग घुलने लगता है। सर्वत्र माधुर्य और सौंदर्य का बोलबाला हो जाता है। वृक्ष नये पत्तों के स्वागत की तैयारियां करने लगते हैं। सारी प्रकृति ही मस्ती में डूब जाती है। जीव-जंतु, जड़-चेतन सब में एक नयी चेतना आ जाती है। हर कोई एक नये जोश से अपने काम में जुटा नज़र आता है। मौसम की अनुकूलता से मानव जीवन में भी निरोगता छाई रहती है, मन प्रफुल्लित रहता है जिससे चारों ओर प्रेम-प्यार,  हास-परिहास, मौज-मस्ती, व्यंग्य-विनोद का वातावरण बन जाता है। इस मधुमास या मधुऋतु का, जिसे आपलोग फागुन का महीना कहते हो, कवि आकंठ श्रृंगार रस में डूब कर अपनी रचनाओं में चिरकाल से वर्णन करते आए हैं।  इतना कह वह चुप हो गया। जैसे कुछ कहना चाह कर भी कह ना पा रहा हो।  

मैं भी चुपचाप उसका मुंह देख रहा था। उसके मेरे पास आने की वजह अभी भी अज्ञात थी। 

वह मेरी ओर देखने लगा। अचानक उसकी आँखों में एक वेदना सी झलकने लगी थी। एक निराशा सी तारी होने लगी थी। उसने एक गहरी सांस ली और कहने लगा, पर अब सब धीरे-धीरे बदलता जा रहा है। ऋतुएँ अपनी विशेषताएं खोती जा रही हैं, उनका तारतम्य बिगड़ता जा रहा है। इसी से मनुष्य तो मनुष्य, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं को भी गफलत होने लगी है। सबकी जैविक घड़ियों में अनचाहे, अनजाने बदलावों के कारण लोगों को लगने लगा है कि अब बसंत का आगमन शहरों में नहीं होता गलती उन की भी नहीं है। बढ़ते प्रदूषण, बिगड़ते पर्यावरण, मनुष्य की प्रकृति से लगातार बढती दूरी की वजह से मैं कब आता हूँ कब चला जाता हूँ किसी को पता ही नहीं चलता।  जब कि मैं तो अबाध रूप से सारे जग में संचरण करता हूँ। यह दूसरी बात है कि मेरी आहट प्रकृति-विहीन माहौल और संगदिलों को सुनाई नहीं पडती। दुनिया में यही देश मुझे सबसे प्यारा इसलिए है क्योंकि इसके हर तीज-त्यौहार को आध्यात्मिकता के साथ प्रेम और भाई-चारे की भावना से जोड़ कर मनाने की परंपरा रही है। पर आज उस सात्विक उन्मुक्त वातावरण और व्यवहार का स्थान व्यभिचार, यौनाचर और कुठाएं लेती जा रही हैं। भाईचारे, प्रेम की जगह नफरत और बैर ने ले ली है। मदनोत्सव तो काम-कुंठाओं से मुक्ति पाने का प्राचीन उत्सव रहा है इसे मर्यादित रह कर शालीनता के साथ बिना किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाए, बिना किसी को कष्ट या दुख दिए मनाने में ही इसकी सार्थकता रही है। पर आज सब कुछ उल्टा-पुल्टा, गड्ड-मड्ड होता दिखाई पड़ रहा है। प्रेम की जगह अश्लीलता, कुत्सित चेष्टाओं ने ले ली है। लोग मौका खोजने लगे हैं इन तीज-त्योहारों की आड़ लेकर अपनी दमित इच्छाओं, अपने पूर्वाग्रहों को स्थापित करने की।  


आज मेरा आपके पास आने का यही मकसद था कि वक्त आ गया है गहन चिंतन का, लोगों को अपने त्योहारों, उनकी विशेषताओं, उनकी उपयोगिताओं, को बताने का, समझाने का। जिससे इन उत्सवों की गरिमा वापस लौट सके। ये फकत एक औपचारिकता ना रह जाएं बल्कि मानव जीवन को सुधारने का उद्देश्य भी पूरा कर सकें। 

कमरे में पूरी तरह निस्तबधता छा गयी। विषय की गंभीरता के कारण मेरी आँखें स्वतः ही बंद हो गयीं। पता नहीं इसमें कितना वक्त लग गया ! तभी श्रीमती जी की आवाज सुनाई दी कि रात सोने के पहले तो अपना सामान संभाल लिया करो। कंप्यूटर अभी भी चल रहा है। कागज बिखरे पड़े हैं। फिर कुछ इधर-उधर होता है तो मेरे पर चिल्लाते हो। हड़बड़ा कर उठा तो देखा आठ बज रहे थे, सूर्य निकलने के बावजूद धुंध, धुएं, कोहरे के कारण पूरी तरह रौशनी नहीं हो पा रही थी।

मैंने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, कमरे में मेरे सिवा और कोई नहीं था। ऐसे बहुत वाकये और कहानियां पढ़ी हुई थीं जिनमें किसी अस्वभाविक अंत को सपने से जोड़ दिया जाता है, पर जो भी घटित हुआ वह सब मुझे अच्छी तरह याद था।  मन यह मानने को कतई राजी नहीं था कि मैंने जो देखा, महसूस किया, बातें कीं वह सब रात के आर्टिकल की तैयारी  और थके दिमाग के परिणाम  का  नतीजा  था। कमरे में फैली वह सुबह वाली हल्की सी सुवास भी तो मुझे अभी भी किसी की उपस्थिति महसूस जो करवा रही थी !!!        

बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

सूरजकुंड का मेला

मेला परिसर में लोगों की नदी नहीं सागर मंडरा रहा था चारों ओर। हर तरफ लोग ही लोग, मजे लेते लोग, खाने के ठीहों पर लोग, स्टालों पर लोग, सेल्फ़ी प्वाइंट्स पर लोग, बैठे लोग, सुस्ताते लोग, खड़े लोग, चलते लोग, बैठने की जगह ढूंढते लोग, एक-दूसरे को खोजते लोग और तो और प्रकृति की पुकार से ग्रसित, महिलाओं और पुरुषों के टॉयलेट के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े कसमसाते लोग। दूसरे दिन अखबार से पता लगा कि रविवार को 90 से 95 हजार लोगों ने मेले में शिरकत की थी     

सालों-साल लोकप्रियता के नए-नए कीर्तिमान बनाते सूरजकुंड मेले में जाने की इच्छा कई कारणों से पूरी नहीं हो पा रही थी। पर इस बार, मौका-दस्तूर-समय-संगसाथ सबके ग्रह मिल गए और वर्षों से दमित कामना की पूर्ति पिछले रविवार, 07.02, को  हो ही गयी। मौसम के उखड़े मिजाज के बावजूद, "आज नहीं तो फिर नहीं"
प्रवेश द्वार 

मेले में रेला  
की सोच के साथ करीब एक बजे दोपहर को पहुँच ही गए।  वहाँ का तो हाल, बेहाल था।  चप्पे-चप्पे पर मानुष-जात उमड़ी पड़ी हुई थी। यह तो हमारी दूरगामी सोच का नतीजा था कि हमने रास्ते में उत्तम नगर मेट्रो से मेले की टिकटें ले लीं थीं। वहाँ तो एक-एक टिकट घर पर सैकड़ों लोग कतार में लगे घंटों के हिसाब से समय खर्च कर रहे थे। अंदर भी वही हाल था, स्त्री-पुरुष-जवान-बुजुर्ग-बच्चों से सारा परिसर पटा पड़ा था। कंट्रोल-कक्ष हर क्षण एक-दूसरे से अलग हुए लोगों के बारे में जानकारी प्रसारित करता जा रहा था। लोगों की नदी नहीं सागर मंडरा रहा था चारों ओर। हर तरफ लोग ही लोग, खाने के ठीहों पर लोग, स्टालों पर लोग, सेल्फ़ी प्वाइंट्स पर लोग, बैठे लोग, सुस्ताते लोग, खड़े लोग, चलते लोग, बैठने की जगह ढूंढते लोग, एक-दूसरे को खोजते लोग और तो और प्रकृति की पुकार से ग्रसित महिलाओं और पुरुषों के टॉयलेट के सामने लम्बी-लम्बी कतारों में खड़े कसमसाते लोग। दूसरे दिन अखबार से पता लगा कि रविवार को 90 से 95 हजार लोगों ने मेले में शिरकत की थी।       


पिछले साल की थीम पर स्थापित गेट 

दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान से गुजरने वाली अरावली पर्वत श्रेणी के साये में, हरियाणा के फरीदाबाद शहर के पास बहरपुर और लक्करपुर गांवों के बीच सूरजकुंड एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। इसे दसवीं सदी में तोमर राज, सूरज पाल ने पानी की बर्बादी को रोकने और उसे  जनहित में लाने के वास्ते बनाया था। अपने
सूरजकुंड, इसी के पास और नाम से मेला लगता है  
नामानुसार सरोवर की आकृति
 उगते सूरज की तरह अर्द्ध वृताकार है, जो आस-पास की चट्टानों में काटी गई सीढियों से घिरा हुआ है। वैसे अब तो यह कुंड सूखा ही रहता है पर बरसातों में इसकी छटा देखने लायक होती है। इसी से कुछ दूरी पर अरावली श्रृंखला के पास अनगपुर डैम है। जिसमे पहाड़ियों से आ कर पानी जमा होता रहता था। उसी के एक जलस्रोत से इस सरोवर की जलापूर्ति होती थी। पर दक्षिणी दिल्ली से महज आठ की.मी. दूर होने पर भी यहां लोगों की आवाजाही बहुत कम थी आज इसकी प्रसिद्धि का सारा श्रेय #हरियाणा सरकार को जाता है, जिसने इसके पास खाली पड़े भूभाग पर 1987 में हस्त-शिल्प और बुनकरों की भलाई को मद्दे-नज़र रख एक मेले की शुरुआत की। जिसने धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय  ख्याति प्राप्त कर ली और उसके साथ ही 'सूरजकुंड' भी दुनिया में मशहूर हो गया।  


मेले के आकर्षण 
हरियाणा सरकार द्वारा जब शिल्पकारों और बुनकरों की मदद और उनके शिल्प को प्रोत्साहित करने के लिए रूप-रेखा तैयार हुई तो वहाँ के पर्यटन विभाग को इस जगह की ऐतिहासिकता और इसके दिल्ली के करीब होने के कारण इसे मेले के लिए चुनने में दो बार सोचना नहीं पड़ा। सबसे पहले 1987 में यहां मेले का आयोजन किया गया था। लोगों को वह इतना पसंद आया कि सूरजकुंड का मेला अपने-आप में एक अनोखा उत्सव बन गया।  तब से हर साल इन्ही दिनों 1 से 15 फरवरी तक यह आयोजित किया जाता है। हर साल देश के किसी एक राज्य की "थीम" पर यहां मेले का आयोजन होता है। इस साल  "तेलंगाना"  का नंबर था। पिछली बार यह 



गौरव छत्तीसगढ़ राज्य को प्राप्त हुआ था।  यहां भारत के सभी राज्यों के उत्कृष्ट शिल्प उत्पादों को एक ही स्थान पर देखा और ख़रीदा जा सकता है। इस शिल्प मेले में सबसे अच्छे हथकरघा और देश के सभी हस्तशिल्प को तो पाया ही जा सकता है साथ ही विदेशों के कारीगरों की अनूठी कृतियों और शिल्पों को देखने और खरीदने का सुयोग भी प्राप्त हो जाता है। मेला मैदान में ग्रामीण परिवेश की अद्भुत झलक और भारतीय पकवानों का आकर्षण आगंतुकों को बरबस अपनी ओर आकर्षित करता तो है ही साथ ही महोत्सव के दौरान पर्यटक यहाँ कलाकारों और शिल्पकारों द्वारा प्रदर्शित विभिन्न कलाकृतियों के अलावा 

ग्रामीण भारत के रंगो और परिवेश के अहसास को यहां प्रस्तुत लोकनृत्य, संगीत, हवाई करतब और जादू के शो के द्वारा भी प्राप्त कर सकते हैं। जैसे-जैसे इस मेले की ख्याति बढ़ती जाती है, वैसे-वैसे दुनिया भर से पर्यटक  बड़ी संख्याऔर प्रतिभागी  इस मेले में आने लगे हैं, जिनकी संख्या लाखों तक पहुँचने लगी है। छुट्टी के दिनों में तो दर्शकों की संख्या लाख के आंकड़े को भी पार कर जाती है।

लोगों के मनोरंजन के अलावा यह मेला सरकार की आमदनी में अच्छा-खासा इजाफा करने वाला सिद्ध हो रहा है। भले ही हरियाणा सरकार मनोरंजन कर से छूट देती हो पर उसके बाद भी 120 रुपये का प्रवेश शुल्क और गाडी पार्किंग के 70 रुपये आम जनता को भारी पड़ते हैं। बच्चों के लिए लगे मंहगे झूलों के अलावा आमदनी का एक और रास्ता, हेलीकाप्टर के रूप में खोज लिया गया है, जिसकी पाँचेक मिनट की उड़ान का शुल्क 2500/- वसूला जाता है। बेहिसाब आमदनी को नज़र में रख बारह साल के बच्चों और गाड़ियों की पार्किंग पर
थकान 
से शुल्क हटाया जा सकता है। एक बात और भी सालती है कि सूरजकुंड को प्रसिद्धि तो बहुत मिली, सरकारों के खजाने में बेहिसाब-बेतहाशा मुद्रा की आवक भी बढ़ी पर कुंड के रख-रखाव और उसकी भलाई के बारे में उतना किसी ने नहीं सोचा जितने का वह हकदार था। उसके जलाभरण के लिए या उसे और खूबसूरती प्रदान करने के लिए अब तक कोई कदम नहीं उठाया गया है।  हालंकि यहां भी पांच रुपये का प्रवेश शुल्क उगाहा जाता है।

दुनिया में  कुछ चीजें या जगहें ऐसी होती हैं, जिनके बारे में कितने भी मालूमात इकट्ठे कर लिए जाएं पर उनका आनंद उनको साक्षात देख कर ही लिया जा सकता है। यह भी एक ऐसी ही जगह है। जगह थोड़ी अलग हट कर और शहर के बाहर जरूर है पर कुछ समय निकाल कर वहाँ जाना बनता है। 

सोमवार, 8 फ़रवरी 2016

कुंडों में कुंड, हरियाणा का सूरजकुंड

अपने नाम के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक यह आम पर्यटक के लिए, पांच रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क के साथ खुला रहता है। आज इसकी प्रसिद्धि का सारा श्रेय हरियाणा सरकार को जाता है, जिसने इसके पास खाली पड़े भूभाग पर 1987 में हस्त-शिल्प और बुनकरों की भलाई को मद्दे-नज़र रख एक मेले की शुरुआत की। जिसने धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कर ली, उसके साथ ही सूरजकुंड भी दुनिया में मशहूर हो गया 

कुछ जगहें ऐसी होती हैं जो समय के साथ अपनी पहचान खोती चली जाती हैं। भागम-भाग के इस युग में लोगों को फुर्सत ही नहीं रहती अपने मतलब के सिवा कुछ देखने-सुनने की। यहां तक की उसके आस-पास रहने वाले लोग भी उसकी ऐतिहासिक महत्ता को भूल जाते हैं। पर फिर शायद संयोगवश कुछ ऐसा घटित हो जाता है, जिससे वह जगह या स्थान देश ही नहीं विदेश में भी अपनी पहचान बनाने में कामयाब रहता है। 


सूरजकुंड, जैसा अभी है 
जंगल से विचरने आए वानर 



सूरजकुंड, दिल्ली-हरियाणा-राजस्थान को छूती अरावली पर्वत श्रृंखला के पास हरियाणा के फरीदाबाद शहर के नजदीक बहरपुर और लक्करपुर गांवों के बीच, दसवीं सदी का बना हुआ मानवनिर्मित प्राचीन सरोवर या झील है। सतह से करीब 15 से 20 फिट गहरा, एक फ़ुटबाल के मैदान के बराबर, इसका तल हरी-पीली घास से
सरोवर तल 

घिरा रहता है। उगते सूरज की तरह इसकी आकृति अर्द्ध वृताकार है। जिसकी तुलना किसी खुली नाट्यशाला की बनावट से भी की जा सकती है जिसमें नीचे तल तक जाने के लिए चट्टानों को काट कर सीढ़ियां बनाई गयी हैं। जिसका प्रतीकात्मक महत्व भी है। इसके नामकरण के पीछे भी दो धारणाएं हैं।  पहली तो इसकी बनावट को कारण मानती है, दूसरी के अनुसार क्योंकि इसे सूर्य भक्त तोमर राज, सूरज पाल ने बनवाया था, इसलिए
सीढ़ियों के अलावा समतल उर्ध्वगामी पथ 



जंगल को छूता एक छोर 
इसका नाम सूरजकुंड होना ज्यादा उचित है। राजा सूरजपाल ने इसके साथ ही एक सूर्य मंदिर का निर्माण भी करवाया था जिसके भग्नावशेष अभी भी दिख जाते हैं। वैसे तो यह कुण्ड सूखा ही रहता है पर बरसातों में इसकी छटा देखने लायक होती है। यहाँ से कुछ दूरी पर एक सिद्ध कुण्ड भी है जिसके बारे में धारणा है कि उसके पानी में चर्म रोगों से मुक्त करने की तासीर है। सूरजकुण्ड से करीब दो की.मी. दूर अरावली पर्वत श्रृंखला के पास अनगपुर डैम है। जिसमे पहाड़ियों से आ कर पानी जमा होता रहता था, उसी से एक जलस्रोत सूरजकुंड को पानी उपलब्ध करवाता था। इतिहासकारों ने तो खुदाई कर इसका संबंध प्रैतिहासिक काल और प्रस्तर युग से भी खोज निकाला है। उनके अनुसार यह क्षेत्र उस समय के मानव की रिहायश के बहुत अनुकूल था।   
संरक्षण

दक्षिण दिल्ली से महज 8 किमी की दूरी पर स्थित, कभी अपनी पहचान को खोता सूरजकुंड, आज एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल और प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट बन चुका है। आज इसकी देख-रेख, संरक्षण का भार भारत सरकार के पास है। अपने नाम के अनुसार सूर्योदय से सूर्यास्त तक यह आम पर्यटक के लिए, पांच रुपये प्रति व्यक्ति शुल्क के साथ खुला रहता है। 


आज इसकी प्रसिद्धि का सारा श्रेय #हरियाणा सरकार को जाता है, जिसने इसके पास खाली पड़े भूभाग पर 1987 में हस्त-शिल्प और बुनकरों की भलाई को मद्दे-नज़र रख एक मेले की शुरुआत की। जिसने धीरे-धीरे अंतर्राष्ट्रीय  ख्याति प्राप्त कर ली है। उसके साथ ही सूरजकुंड भी दुनिया में मशहूर हो गया।  एक फरवरी से पंद्रह फरवरी तक चलने वाले इस मेले में आज दर्जनों विदेशी देश भी अपनी कला और कलाकारों के साथ भाग लेते हैं। 


- कल मेले की यात्रा 

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

फूँक-फूँक कर कदम रखना

पिछले रविवार, एक स्टूल से उतरते समय अपने कदमों को जमीन पर रखने से पहले फूंकना भूल गया और पैरों के बजाए कमर के बल फर्श पर लंबायमान हो गया।  इस क्रिया के दौरान हाथों ने पैरों की नाफ़र्मानि को सुधारने की कोशिश की होगी, पर जिसका काम उसी को साजे वाली कहावत को ध्यान में नहीं रख पाए होंगे और बस आका को बचाने की कोशिश में खुद को चोटिल कर बैठे....

कहते हैं ना कि चलना ही जिंदगी है। जानवरों की तो रहने दें, वे तो जन्म लेते-लेते ही रेंगने-दौड़ने लगते हैं।  हाँ, इंसान इस क्रिया को आरंभ करने में चार-छह महीने लगा देता है। पर एक बार जो शुरू हुआ तो अपनी अंतिम यात्रा तक चलता ही चला जाता है। घुटनों से पैरों तक आने में जो भी वक्त लगे, फिर उसके पाँव एक जगह टिक नहीं पाते हैं। इसीलिए इस क्रिया को लेकर तरह-तरह के ढेरों मुहावरे भी चलन में चलते आ रहे हैं। उसी में एक कहावत है, "फूँक-फूँक कर कदम रखना।" वैसे तो इसका भावार्थ है, कि किसी भी काम को करने के पहले सोच-विचार कर, एहतियाद बरत कर, सावधानी पूर्वक काम करना चाहिए। पर शाब्दिक अर्थ के भी कुछ ऐसे ही
मायने बनते हैं। जैसे ही चालन क्रिया हरकत में आती है और बच्चा जैसे-जैसे घुटनों से पैरों तक आता जाता है उसे संभालना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी बन जाती है।  हर समय ध्यान रखना पड़ता है कि किसी चीज से उसके हाथ-पैरों में चोट ना लग जाए। फूँक-फूँक कर जगह साफ़ रखनी होती है। फिर जब वह किशोरावस्था से  युवावस्था में कदम रखता है तो बहुत संभावना रहती है कि उसकी चाल, उसकी दिशा सही हो। यह वह समय होता है जब बिन पीए ही इंसान के दिग्भ्रमित होने के आसार बन जाते हैं।  दिमाग में महत्वकांक्षाऐं घर कर लेती हैं। दिलो-दिमाग पर बस नहीं रहता। ऐसे में पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। जरूरी हो जाता है, उसके हर कार्य को मर्यादा के दायरे में लाना। फूँक-फूँक कर हर कार्य का निर्धारण करना पड़ता है।  फिर आता है बुढ़ापा, आँखों से दिखना कम हो जाता है, शरीर के अंग बेकाबू से होने लगते हैं।  तब दिमाग से नहीं शारीरिक कमजोरी के कारण पैरों पर भी नियंत्रण कम होने लगता है। पैरों को रखना कहीं होता है पर वे निगोड़े पड़ते कहीं और जा कर हैं। उनका यह कहीं और जा पड़ना, बचपन और जवानी से ज्यादा खतरनाक साबित होता है। बचपन की चोट, जवानी की भूल ठीक होने में ज्यादा वक्त नहीं लेती पर बुढ़ापे की चूक हफ़्तों, कभी-कभी महीनों, बिस्तर के आगोश में पड़े रहने को मजबूर कर देती है।  उस पर भी उसका दर्द जिंदगी भर सालता रह सकता है। यही वह समय होता है जब सही मायनों में कदम रखने से पहले फूंकना यानी देखना और संभलना जरुरी हो जाता है। अब चाहे जैसे भी फूँकें, फूंके जरूर।  

अब देखिए नसीहत देना कितना आसान है! दो पैरा लिख मारे !!  पर खुद पिछले रविवार, एक स्टूल से उतरते समय अपने कदमों को जमीन पर रखने से पहले फूंकना भूल गया और पैरों के बजाए कमर के बल फर्श पर लंबायमान हो गया।  इस क्रिया के दौरान हाथों ने पैरों की नाफ़र्मानि को सुधारने की कोशिश करते हुए बीच में आ संभालने की चेष्टा की, पर जिसका काम उसी को साजे वाली कहावत को ध्यान में नहीं रख पाए और आका को बचाने की कोशिश में खुद को चोटिल कर बैठे। हफ्ता ख़त्म होने को आया मालिश, सेक, परहेज के बावजूद अभी भी दाएं वाला अपने काम पर बदस्तूर हाजिर नहीं हो पा रहा है। 

 काश ! उतरते समय, कदम रखने से पहले फूँक लिया होता !!

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