pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

क़ुतुब जैसी, दिल्ली के ही हस्तसाल की मीनार

क़ुतुब मीनार विश्व प्रसिद्ध है पर उसके निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक को कम ही लोग जानते हैं, वहीँ शाहजहाँ को कौन नहीं जानता पर उसके द्वारा बनवाई गयी मीनार को उसी के शहर के लोग नहीं जानते !!

समय की मार 
#हस्तसाल,दिल्ली के पश्चिमी इलाके में स्थित शहर में तब्दील होता एक गांव। यहां मुग़ल बादशाह शाहजहां के हाथियों की देख-रेख की जाती थी इसीलिए इस जगह का नाम हस्तसाल पड गया। यहीं पर शाहजहां ने 1650 में अपनी शिकारगाह में शिकार में सहूलियत के लिए एक मीनार बनवायी थी। क़ुतुब की तर्ज पर बनी इस मीनार में भी लाल पत्थरों का उपयोग किया गया है। पर आज जहां दिल्ली की पहचान बन चुकी क़ुतुब दुनिया भर में मशहूर है वहीँ यह "हस्तसाल की लाट" गुमनामी और उपेक्षित हालात में बदहाली के आंसू बहा रही है। इत्तेफ़ाक़ देखिए क़ुतुब मीनार विश्व प्रसिद्ध है पर उसके निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक को कम ही लोग जानते हैं, वहीँ शाहजहाँ को कौन नहीं जानता पर उसके द्वारा बनवाई गयी मीनार को उसी के शहर के लोग नहीं जानते !!
द्वार 
हस्तसाल के एक तरफ विकासपुरी और दूसरी ओर नजफगढ़ रोड से लगा उत्तम नगर का इलाका है। यहीं एक संकरी गली में 17 मीटर यानी करीब 56 फिट ऊंची यह तीन मंजिला मीनार आज भी मुग़ल काल के वैभव की याद दिलाती खड़ी है। इसे ईंटों और लाल बलुई पत्थरों से बनाया गया है। हालांकि यह मीनार क़ुतुब जैसी भव्य नहीं है फिर भी अपने आप में इतिहास तो संजोए हुए है ही। जैसा की बताया जाता है कि इसे पांच मंजिला बनाया गया था जिस पर ऊपर एक छतरी भी लगी थी जो 1803 में आए भूकंप से जमींदोज हो गयी। अब इस मीनार की तीन मंजिलें ही बची हैं। क़ुतुब की तरह ही इसमें भी वर्तुलाकार सीढ़ियां बनी हुई हैं वैसे ही हर मंजिल पर दरवाजा भी बना है 

बुलंदी 
फिलहाल अभी सुरक्षा की दृष्टि से इसको बंद रखा गया है। पर जैसे हमारे हर शहर में अवैध कब्जे की बिमारी घुन की तरह फैली हुई है, यहां भी इसी तरह से चारों ओर से हथियाई जाती सिकुड़ती जमीन के कब्जों ने इस ऐतिहासिक इमारत की अच्छी-खासी, लम्बी-चौड़ी जगह को ख़त्म कर रख दिया है। इसके चारों ओर फैला मलबा और कूड़े ने इसको ऐसा घेर रखा है कि इस तक पहुँचना भी दूभर हो गया है। दिल्ली सरकार की करीब 250 ऐसी इमारतों, जिन्हें सुरक्षा की जरुरत है में इसका नाम होने के बावजूद इसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। कभी-कभी कोई चौकीदार या गार्ड आ कर यहां सफाई वगैरह कर खानापूर्ति कर जाता है नहीं तो गांव वालों की मेहरबानी पर ही इसका भाग्य निर्भर हो कर रह गया है। 
ऊपर जाने की सीढियाँ 
कूड़े भरा पहुँच मार्ग       

सिकुड़ती जगह 

बदहाली 




गंदगी भरा परिसर 

  सेल्फ़ी तो बनती है :-) 


अतीत के गौरव के रूप में नहीं पर इसकी बदहाली देखने के लिए रोहतक रोड से नांगलोई या फिर नजफगढ़ रोड से उत्तम नगर होते हुए हस्तसाल पहुंचा तो जा सकता है पर मीनार तक जाने के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है। संकरी गली में एक तरफ ढहना शुरू कर चुकी यह उपेक्षित यह मीनार खड़ी है। इसके मुख्य द्वार पर तो ताला जड़ा हुआ है पर पीछे से टूटी-ढही दीवाल के रास्ते इसके पास जाया जा सकता है। पर गुमनामी का यह हाल है कि रिक्शा चालकों को भी इसके बारे में कुछ पता नहीं है सो मुझे पैदल ही भटकते हुए इस तक पहुँचना पड़ा था। यहां के रहवासियों को इस बात का तो गुमान है कि यहां विदेशों से भी लोग इसे देखने पहुंचते हैं पर ना उन्हें ना उनके द्वारा चुने हुए प्रतिनिधियों को यह एहसास है कि इसे देखने के बाद वे अपने मन में यहां की कैसी छवि ले कर जाते होंगे। सरकार द्वारा फिलहाल कोई पहल न भी हो रही हो तो और कुछ नहीं तो इस ऐतिहासिक जगह को साफ़-सुथरा तो रखा ही जा सकता है।         

सोमवार, 16 नवंबर 2015

बेहतर क्या है,स्वर्ग या नरक

सभी आख्यानों में  यही  बताया जाता है कि पुण्य करते रहने से स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पाप करने से नरक में जाना होता है  पर  हमारे कानूनी दांवपेंचों की तरह यहां भी कई पेचो-खम मौजूद हैं। जिनके चलते, जैसे मानवी दुनिया में चतुर-चंट वकील कानून की आंखों की पट्टी का लाभ अपने मुवक्किल को दिला देते हैं, वैसे ही ज्ञानी-ध्यानी, गुरुजनों ने अपने प्रिय शिष्यों के लिए कुछ संकरी गलियां खोज रखी हैं.....। इस लेख को हलके-फुल्के तौर पर ही लें  कोई गूढ़ार्थ न निकालें    

स्वर्ग-नरक का अस्तित्व है कि नहीं इस पर लम्बी बहस हो सकती है पर इनकी धारणाएं दुनिया के हर ग्रंथ में पाई जाती हैं। नरकस्वर्ग का विलोमार्थक है। विश्व की प्राय: सभी जातियों और धर्मों की मान्यता के अनुसार मरणोपरांत इंसान की आत्मा को उसके कर्मों के अनुसार इन्हीं में से एक जगह ले जाया जाता है। सभी आख्यानों में करीब-करीब यही बताया गया है कि पुण्य करते रहने से स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पाप करने से नरक में जाना होता है जहां अधर्मी, नास्तिक, पापी और अपराधी दुष्टात्माएँ दंडित होती हैं।  

पर हमारे कानूनी दांवपेंचों की तरह यहां भी कई पेचो-खम मौजूद हैं। जिसके चलते जैसे मानवी दुनिया में चतुर-चंट वकील कानून की आंखों की पट्टी का लाभ अपने मुवक्किल को दिला देते हैं, वैसे ही ज्ञानी-ध्यानी, गुरुजनों ने अपने प्रिय शिष्यों के लिए कुछ संकरी गलियां खोज रखी हैं। जैसे युद्ध भूमि में लड़ते हुए मारे जाने से स्वर्ग मिलता है फिर वह चाहे कितना बड़ा भी अत्याचारी क्यों न हो! उसी तरह पापी से पापी इंसान यदि अपनी अंतिम सांस लेते समय प्रभू का नाम ले ले तो भी सीधा स्वर्ग जाता है। मरने के पहले गंगाजल या तुलसी-दल भी स्वर्ग की राह प्रशस्त करने में सक्षम होते हैं। इन उपधाराओं के चलते बड़े से बड़े खलनायक, जिन्होंने धरती पर हर तरह का उत्पात मचाया हो, जीवों की नाक में दम कर रखा हो, वे भी यहां का सारा सुख भोग स्वर्ग में भी अपनी सीट बुक करवा लेते हैं। महाभारत के वीरों को ही देख लीजिए हर तरह के दुष्कर्मों के रचयिता कौरव सीधे स्वर्ग गए और युद्ध के बाद विजयी होने, प्रभू का साया सदा सर पर बने रहने के बावजूद पांडवों को नरक जाने से रोकने के लिए युद्धिष्ठिर को कितनी जद्दोजहद का सामना करना पड़ा था। हालांकि ये सब किस्से-कहानियों के रूप में लिया जाता है,फिर भी.........   

ऐसा बताया जाता है कि मानव जीवन बहुत पुण्यों के बाद, प्रभू की अनुकंपा से ही मिल पाता है। अब स्वर्ग की व्याख्या क्या है,ऐशो-आराम, सुख-चैन, कोई काम धाम नहीं, हर चीज की उपलब्धता, कोई हारी-बिमारी नहीं, चिंता-फ़िक्र नहीं। सुख ही सुख। उधर नरक में रोज की मार-कुटाई, हर तरह के दुःख-तकलीफों से आमना-सामना, वहां के समयानुसार हर पल काम में जुते रहना, ना खाने का ठिकाना ना सोने का।

अब मुद्दा यह बनता है कि वहां जो भी है, सुक्ष्म शरीर या आत्मा, उसे कहां रह कर भगवान याद आऐंगे, स्वर्ग में या नरक में। जाहिर है नरक में हर क्षण तड़पने वाला ही हर पल प्रभू को याद करेगा और ग्रंथों के अनुसार इसका फल भी उसे मिलेगा ही। उधर स्वर्ग में मूढ़ इंसान की आत्मा क्या उतनी तन्मयता से अपने इष्ट को याद करेगी? शक होता है ! तो फिर किसका हश्र क्या होगा, जाहिर है, स्वर्ग वाला फिर धरा पर और नरक वाले को मोक्ष ! 
अब राम की माया तो राम ही जानें। हमारे अटकलपच्चू से क्या होता है और वैसे भी स्वर्ग तो सभी जाना चाहते हैं पर मरना कोई नहीं चाहता !!!    

सोमवार, 9 नवंबर 2015

वैसे लोगों को आजकल बेवकूफ समझा जाता है - द्वितीय किस्त

कुछ सहज होने के बाद मुझे उन्होंने गोद में लिया और समझाया कि वह उपहार नहीं रिश्वत थी जिसकी आड़ में वह मुझ पर कुछ भी गलत करने का जोर डाल सकता था। उस समय तो बात समझ में आ गयी पर आज जब खुले आम बेशर्मी से रिश्वत लेते-देते देखता हूँ तो कुछ सही-गलत समझ में नहीं आता।

कुछ यादें जो जीवन भर धूमिल नहीं होतीं। ऐसी ही स्मृतियाँ हैं अपने दादाजी की उम्र के डागा जी की, जो बाबूजी के भी बॉस थे, जिनके गुण सदा याद रहते हैं। पिछली पोस्ट में उनकी कर्तव्य निष्ठा के बारे में लिखा था। उनसे जुड़ा एक और वाकया है जो कभी नहीं भूलता।

मील के विशाल परिसर में रहने वाले अफसर ग्रेड के परिवारों को अनगिनत सहूलियतें उपलब्ध होती थीं। जैसे जलाने के लिए और संयुक्त गीजरों के लिए कोयला। टॉयलेट संबंधी विम, फिनायल, डस्टर, फ्लीट। उस समय फ्रिज उतने आम नहीं थे तो ढेरों बर्फ और घरेलू सहायक इत्यादि-इत्यादि। उन दिनों खाना कोयले के चूल्हे पर ही बना करता था। उसके लिए कोयले के ठीक से जलने तक चूल्हे बाहर खुले में रख दिए जाते थे। धुआं ख़त्म होने के बाद उन्हें घरों के अंदर ले जाया जाता था। उस समय रसोई गैस नई-नई बाज़ार में आई थी, जिसको ले कर लोगों में एक डर और आशंका भी बनी हुई थी।

बात शायद 1964-65 की होगी। विशाल आवास-गृहों की बाहर से रंग-पोताई हुई थी जिस पर करीब 18-20 हजार रुपये खर्च हुए थे, जो उस समय एक बहुत बड़ी रकम हुआ करती थी। ऐसे में एक दिन शाम को एक चूल्हा अपने पूरे शबाब के सा धुआं उगल रहा था जो फ्लैटों को अंदर-बाहर से लपेटता हुआ ऊपर उठा जा रहा था। उधर से डागा जी आफिस से लौट रहे थे। जैसे ही उन्होंने दीवारों पर धुएं को रेंगते देखा तुरंत उन्होंने गार्ड को बुलवाया और चूल्हे को उठवा कर सामने नदी में फिंकवा दिया और उलटे पाँव वापस आफिस गए और एक साथ बीस गैस कनेक्शनों का अर्जेंट आर्डर पास कर दिया।  घंटे भर में सभी फ्लैटों में गैस पहुँच गयी। यह अलग बात है कि लोग हफ़्तों उसे काम में लाने में झिझकते रहे। पर बात एक आफिसर के निर्णय की है जिसने तुरंत एक ऐसा समाधान खोजा जिससे दोनों पक्षों को लाभ मिला।     

ऐसी ही एक अमिट याद मेरे बाबूजी से जुड़ी है जो नसीहत बन सदा मेरे साथ बनी रहती है। एक दिन बाबूजी अभी काम से लौटे नहीं थे कि एक आदमी पंद्रह सेर का देसी घी का टीन ले कर घर आया और माँ के सामने रख दिया, पूछने पर बोला कि साहब को उपहार के लिए है। उस समय इतना छल-कपट नहीं हुआ करता था।  माँ ने सहज भाव से उसे रख लिया।  अभी वह आदमी गया ही था कि बाबूजी आ गए, सामने ही टीन पड़ा था देखते ही पूछने पर सब बात जैसे ही पता चली तुरंत गार्ड को दौड़वाया और उस आदमी को बुलवाया। जैसे ही वह आया और कुछ बोलता कि उसे डाँटते हुए टीन को ले जाने के लिए कहा नहीं तो फिकवा देने की बात कही। उसके जाने के बाद माँ ने कहा कि बेचारा कितने आदर-मान से कुछ लाया था उसे बेकार में इतना डांट दिया ! मैं भी कुछ ऐसा ही भाव लिए दुबका खड़ा था। बाद में कुछ सहज होने के बाद मुझे उन्होंने गोद में लिया और समझाया कि वह उपहार नहीं रिश्वत थी जिसकी आड़ में वह मुझ पर कुछ भी गलत करने का जोर डाल सकता था। उस समय तो बात समझ में आ गयी पर आज जब खुले आम बेशर्मी से रिश्वत लेते-देते देखता हूँ तो कुछ सही-गलत समझ में नहीं आता। बस यही लगता है कि अब जो हो रहा है वही शायद समय की मांग हो क्योंकि ना तो वैसा समय रहा ना हीं वैसे लोग !!!   

शनिवार, 7 नवंबर 2015

वैसे लोगों को आजकल बेवकूफ समझा जाता है - 1

होश संभालने से लेकर किशोरावस्था का समय दिलो-दिमाग के परिपक्व होने का होता है। इस काल के दौरान घटी घटनाऐं या बातें ताउम्र के लिए अपनी छाप छोड़ जाती हैं। मेरे यादों के गलियारे की दीवारों पर टंगे फ्रेमों में लगीं कुछ तस्वीरें ऐसी हैं जो मुझे कभी नहीं भूलतीं। मैं उनके पदचिन्हों पर हूबहू ना भी चल पाया होऊं पर उनकी नैतिकता, उनके आदर्श, उनकी सच्चाई, उनका भोलापन, उनका ममत्व, उनकी निस्पृहता कभी भी मेरे मानस-पटल से ओझल नहीं हो पाते। 

इनमें सबसे ऊपर हैं मेरी दादीजी, लक्ष्मी देवी शर्मा।  एक आर्यसमाजी, सच्ची देश भक्त। कई बार जेल गयीं।उस समय हमारा परिवार कलकत्ता में रहा करता था। दादी जी के अक्सर जेल-प्रवास के दौरान बच्चों को तथा अपने कारोबार को संभालने की दोहरी जिम्मेदारी दादा जी बिना किसी शिकवे-शिकायत के संभाला करते थे। ऐसे ही एक दिन, जिसकी खासियत तो अब मुझे याद नहीं, बंगाली नेत्री 'आभा मायती' के साथ अलीपुर जेल में झंडोतोलन के समय सरकारी प्रतारणा के कारण आँखों पर लगी चोट ने धीरे-धीरे दादी जी की नेत्र-ज्योति भी छीन ली थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद आभा जी तो देश की मंत्री भी बनीं। पर इनको कई बार लोगों के कहने-समझाने पर भी इन्होंने पेंशन या सरकारी आवास या ऐसी ही कोई सरकारी सहायता या किसी तरह का लाभ लेने की कोई कोशिश नहीं की। जैसा भी था, दुक्खम-सुक्खम अपनी जिंदगी काट ली। उनका एक ही कहना था कि हमने जो भी किया वह सिर्फ देश के लिए किया किसी लालच या सपने को ध्यान में रख नहीं किया। उनके इन आदर्शों का उनके बच्चों पर भी असर रहा। दादीजी के ममत्व का ही असर है कि आर्यसमाज में खण्डेलवाल परिवार की एक सदस्य उनकी मुंह बोली बहन बनीं।  कहाँ कलकत्ते का एक मारवाड़ी परिवार और कहाँ देश के दूसरे हिस्से के राज्य पंजाब का परिवार पर वह रिश्ता आज भी चार पीढ़ियों से निभता चला आ रहा है। 

ऐसे ही एक सज्जन जो मुझे कभी नहीं भूलते वे थे डागा जी। इसी नाम से उन्हें हर छोटा-बड़ा संबोधित करता था। मेरे बाबूजी कलकत्ते से रेल मार्ग से 35 की.मी. दूर जिस जूट मील में कार्यरत थे, वहीँ के वे चीफ एक्जिक्यूटिव थे। साठ के आस-पास की उम्र, प्रभावशाली व्यक्तित्व,  शांत-सौम्य स्वभाव पर रुआब ऐसा कि बिना उनकी आज्ञा के पत्ता भी इधर से उधर ना हो। मालिक, जो कलकत्ता में रहा करते थे वे भी उनसे पूछे बगैर कोई कदम नहीं उठाते थे। मील हालांकि जूट के उत्पाद बनाती थी पर उसकी कार्यक्षमता इतनी विशाल थी कि जरुरत का हर सामान वहाँ बनाया जा सकता था। वहाँ के 10-12 बड़े अफसरों को परिसर के अंदर ही निवास स्थान उपलब्ध होता था और ये सारे लोग एक परिवार की तरह ही रहते थे, कोई भेद-भाव नहीं था। उन फ्लैटों में अलग-अलग तरह का सुंदर, कलात्मक टीक की लकड़ी का कीमती फर्नीचर हुआ करता था। एक दिन डागा जी की पुत्र-वधु को हमारे यहां का कप-बोर्ड बहुत पसंद आया और उन्होंने अपने ससुर जी यानी डागा जी को पूछ लिया कि क्या वैसा ही कप-बोर्ड बनवा लें ? डागा जी ने उसी समय ड्रायवर को बुलाया उसको पैसे दे कलकत्ता भेज कर वैसी ही चीज खरीद कर लाने का हुक्म जारी कर दिया। चाहते तो वैसे दसियों कप-बोर्ड वे मील से ही मुफ्त में बनवा सकते थे।जबकी ऐसा करने का उनको हक़ और छूट दोनों थे बिना किसी जवाबदारी के। पर इसका उन्होंने कभी   अनुचित लाभ नहीं उठाया। 

कल अगली क़िस्त          

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

जो दिखता है, वही टिकता है

नाम और दाम पाने के लिए सर्वोच्च स्थान पर टिके रहना आवश्यक हो गया है और उसके लिए जरुरी है दिखते रहना यानी लोगों के जेहन में बने रहना। इसीलिए तो खुद ही लोग पहुँच जाते हैं, स्वरचित नाटक को दिखाने, जनता के सामने। इन्हें अच्छी तरह मालुम होता है कि मेरे ऐसा करने से क्या प्रतिक्रिया होने वाली है और उससे मुझे कितना फ़ायदा होने वाला है.............................. 

बाज़ार का मानना था कि आदमी की यादाश्त कमजोर होती है। इसके चलते उसने अपनी रणनीति में एक ब्रह्म-वाक्य जोड़ लिया कि जो दिखता है वही बिकता है। उसका आकलन सही भी था। इसका सबसे बड़ा उदाहरण 'निरमा' और 'मैगी' हैं जिन्होंने गुणवत्ता में अपने से कहीं ऊपर हिंदुस्तान लीवर के उत्पादों की बिक्री में सेंध लगा दी थी।  फिर टी. वी. के आने के बाद तो इस विधा में क्रांतिकारी परिवर्तन आ गया। बाजार ने चौबीसों घंटे आँख और कान के पास अपने ढोल बजा कर इंसान की बुद्धि ऐसी कुंद कर दी कि वह मंत्रमुग्ध सा उधर ही चल पड़ा जिधर बाज़ार के आका चाहते थे। 

इस करामात को देख समाज के कुछ चंट, चालाक, धूर्त, मौकापरस्त लोगों ने इस दिखने की ताकत को पहचान, उसे अपने फायदे के लिए अपनाने में देर नहीं की। उन्हें समझ आ गया कि यदि अपने क्षेत्र में बने रहना है, लोगों में अपनी पहचान बनाए रखनी है तो किसी भी तरह खबरों में बने रहना होगा। इस श्रेणी में हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर तबके, हर दल के लोग शामिल हो गए और इसी के साथ ही शुरू हो गया बेहयाई का नंगा नाच। सारी तहजीब, सारी नैतिकता, लज्जा, संकोच, आदर-सम्मान सब को दरकिनार कर दिया गया। पद, मर्यादा, छोटे-बड़े किसी चीज का लिहाज नहीं बचा। बची तो सिर्फ अपनी मतलबपरस्ती। तभी तो ऐसे-ऐसे महानुभाव जिन्हें देश तो क्या उनके प्रदेश के लोग भी पूरी तरह नहीं जानते थे, जिनके लेखन को सिर्फ घरवाले ही जानते थे, जिनकी तथाकथित कला को उनके "फ्रेंड सर्कल" से बाहर शायद ही कोई भाव देता था,  वे भी आजकल छोटे पर्दे पर घंटों बैठे दिखने लग गए हैं। ऐसे लोग जहां भी ज़रा सी भी गुंजाइश पाते हैं, कवरेज पाने की तो मौका हाथ से जाने नहीं देते। इसके लिए अपशब्दों के प्रयोग में,  दूसरे की बखिया उधेडने में,  किसी की लानत-मलानत करने में, किसी के इतिहास-भूगोल खंगाल कर उसकी बदनामी करने में, अपनी खुद की ही ऐसी की तैसी करवा कर उसको मुद्दा बनाने में कोई गुरेज नहीं किया जाता। जाहिर है इनका एक ही मूल मंत्र है, बदनाम हुए तो क्या हुआ, नाम तो हुआ !! ऐसे "स्मार्ट" लोग जानते हैं कि करोड़ों की आबादी वाले इस देश में कुछ भी करो समर्थन मिल ही जाएगा। सौ-पचास लोग तो ऐसे ही पक्ष में आ खड़े होंगे। ऊपर से यदि किसी राजनैतिक दल से जुड़े होने का सौभाग्य प्राप्त है फिर तो इन्हें कुछ भी ऊल-जलूल बोलने और करने की स्वतंत्रता वैसे भी हासिल हो चुकी होती है। इन्हें रातों-रात शोहरत पाने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत सिर्फ विवादास्पद बयान जारी करना होता है।  उधर उनकी पार्टी और खबरचियों को एक लाइन लिखवानी पड़ती है कि ये श्रीमान अमुक के निजी विचार हैं।  मान लीजिए कुछ ज्यादा ही बखेड़ा खड़ा हो भी जाता है तो बड़े भोलेपन से दूसरे दिन यह भी कहा जा सकता है कि मेरे कथन को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है, मेरे कहने का मतलब कुछ और था।        

नाम और दाम ने अच्छाई और बुराई के अर्थ बदल दिए हैं। इन्हें पाने के लिए सर्वोच्च स्थान पर टिके रहना आवश्यक हो गया है और उसके लिए जरुरी है दिखते रहना यानी लोगों के जेहन में बने रहना। इसीलिए तो खुद ही लोग कीचड़ में लथ-पथ हो पहुँच जाते हैं और कई बार पहुंचवा दिए जाते हैं, स्वरचित नाटक को दिखाने, जनता के सामने। ऐसा नहीं है कि इन्हें अपनी करनी का इल्म नहीं होता या उसके अंजाम से ये लोग अनजान होते हैं। इन्हें अच्छी तरह मालुम होता है कि मेरे ऐसा करने से क्या प्रतिक्रिया होने वाली है और उससे मुझे कितना फ़ायदा होने वाला है और इस मौके को कब, कैसे और कहाँ भुनाना है। 

रविवार, 1 नवंबर 2015

मैं छत्तीसगढ हूं, मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर..............................

मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम से भरे मेरे मन की यही इच्छा है कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं,  जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं बरता जाता हो, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती हो, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का सदस्य समझें।  जहां कोई भूखा न सोता हो, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत सब को मुहैय्या हो। मेरा यह सपना दुर्लभ भी नहीं है। यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबले बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है .....................................

छत्तीस गढ़ 
मैं #छत्तीसगढ हूं। आज एक नवम्बर है, मेरी जन्मतिथि । आज सुबह से ही आपकी शुभकामनाएं, प्रेम भरे संदेश और भावनाओं से पगी बधाईयां पा कर अभिभूत हूं। मुझे याद रहे ना रहे पर आप सब को मेरा जन्म-दिन याद रहता है यह मेरा सौभाग्य है। किसी देश या राज्य के लिए पंद्रह साल समय का बहुत बड़ा काल-खंड नहीं होता। पर मुझे संवारने-संभालने, मेरे रख-रखाव, मुझे दिशा देने वालों ने इतने कम समय में ही मेरी पहचान देश ही नहीं विदेशों में भी बना कर एक मिसाल कायम कर दी है।

वन-संपदा, खनिज, धन-धान्य से परिपूर्ण मेरी रत्न-गर्भा धरती का इतिहास दक्षिण-कौशल के नाम से रामायण और महाभारत काल में भी जाना जाता रहा है। वैसे यहां एक लंबे समय तक   कल्चुरी राज्यवंश का आधिपत्य रहा है। पर मध्य प्रदेश परिवार से जुडे रहने के कारण मेरी स्वतंत्र छवि नहीं बन पाई थी और देश के दूसरे हिस्सों के लोग मेरे बारे में बहुत कम  जानकारी रखते थे।                                            
वास्तु कला का बेतरीन नमूना 
 जिसके कारण देश के विभिन्न हिस्सों में मेरे प्रति अभी भी कई तरह की भ्रांतियां पनपी हुई हैं। अभी भी लोग मुझे एक पिछडा प्रदेश और यहां के आदिवासियों के बारे में अधकचरी जानकारी रखते है। पर जब यहां से बाहर जाने वालों से या बाहर से यहां घूमने आने वाले लोगों को मुझे देखने-समझने का मौका मिलता है तो उनकी आंखें खुली की खुली रह जाती हैं।
रेलवे स्टेशन 
उन्हें विश्वास ही नहीं होता कि किशोरावस्था के द्वार पर खड़ा मैं, इतने कम समय में, सीमित साधनों के और ढेरों अडचनों के बावजूद इतनी तरक्की कर पाया हूं। वे मुझे देश के सैंकडों शहरों से बीस पाते हैं। 

रायपुर हवाई अड्डा  
कईयों की जिज्ञासा होती है मेरी पहचान अभी सिर्फ पंद्रह सालों की है उसके पहले क्या था? कैसा था? तो उन सब को नम्रता पूर्वक यही कहना चाहता
हूं कि जैसा था वैसा हूं यहीं था यहीं हूं। फिर भी सभी की उत्सुकता शांत करने के लिए कुछ जानकारी बांट ही लेता हूं। सैंकडों सालों से मेरा विवरण इतिहास में मिलता रहा है। मुझे दक्षिणी कोसल के रूप में जाना जाता रहा है। रामायण काल में मैं माता कौशल्या की भूमि के रूप में ख्यात था। मेरा   परम सौभाग्य है कि मैं किसी भी तरह ही सही प्रभू राम के नाम से जुडा रह पाया। कालांतर से नाम बदलते रहे, अभी की वर्तमान संज्ञा "छत्तीसगढ" के बारे में विद्वानों की अलग-अलग राय है। कुछ लोग इसका कारण
उन 36 किलों को मानते हैं जो मेरे अलग-अलग हिस्सों में कभी रहे थे, पर आज उनके अवशेष नहीं मिलते। कुछ जानकारों का मानना है कि यह नाम कल्चुरी राजवंश के चेडीसगढ़ का ही अपभ्र्ंश है। 
भारतीय गणराज्य में 31 अक्टूबर 1999 तक मैं मध्य प्रदेश के ही एक हिस्से के रूप में जाना जाता था। पर अपने लोगों के हित में, उनके समग्र विकास हेतु मुझे  अलग राज्य का दर्जा प्राप्त हो गया।   इस मुद्दे पर मंथन
नगर निगम भवन 
तो 1970 से ही शुरु हो गया था, पर गंभीर रूप से इस पर विचार 1990 के दशक में ही शुरु हो पाया  जिसका प्रचार 1996 और 1998 के चुनावों में अपने शिखर पर रहा जिसके चलते अगस्त 2000 में मेरे निर्माण का रास्ता साफ हो सका। इस ऐतिहासिक घटना का सबसे उज्जवल पक्ष यह था कि इस मांग और निर्माण के तहत किसी भी प्रकार के दंगे-फसाद, विरोधी रैलियों या उपद्रव इत्यादि के लिए कोई जगह नहीं थी।हर काम शांति, सद्भावना, आपसी समझ और गौरव पूर्ण तरीके से संपन्न हुआ। इसका सारा श्रेय यहां के अमन-पसंद,
भोले-भाले, शांति-प्रिय लोगों को जाता है जिन पर मुझे गर्व है। आज मेरे सारे कार्यों का संचालन मेरी राजधानी
क्रिकेट स्टेडियम 
'रायपुर' से संचालित होता है। समय के साथ इस शहर में तो बदलाव आया ही है पर राजधानी होने के कारण बढती लोगों की आवाजाही, नए कार्यालय, मंत्रिमंडलों के काम-काज की अधिकता इत्यादि को देखते हुए नए रायपुर का निर्माण भी शुरू हो चुका है, बन जाने के बाद यह देश के सबसे सुन्दर और अग्रणी  शहरों में शुमार हो जाएगा ।  चंडीगढ़ और भुवनेश्वर जैसे व्यवस्थित और पूरी तरह प्लान किए गए शहरों की तरह मुझे ढाला जा रहा है।   

मुझे कभी भी ना तो राजनीति से कोई खास लगाव रहा है नाहीं ऐसे दलों से। मेरा सारा प्रेम, लगाव, जुडाव सिर्फ
सुंदर सपाट सड़कें 
और सिर्फ यहां के बाशिंदों के साथ ही है। कोई भी राजनीतिक दल आए, मेरी बागडोर किसी भी पार्टी के हाथ में हो उसका लक्ष्य एक ही होना चाहिए कि छत्तीसगढ के वासी अमन-चैन के साथ, एक दूसरे के सुख-दुख के साथी बन, यहां बिना किसी डर, भय, चिंता या अभाव के अपना जीवन यापन कर सकें। मेरे नाम में आंकड़े जरूर "36" के हैं पर प्रेम भरे मेरे मन की यही इच्छा है  कि मैं सारे देश में एक ऐसे आदर्श प्रदेश के रूप में जाना जाऊं, जो देश के किसी भी कोने से आने वाले देशवासी का स्वागत खुले मन और बढे हाथों से करने को तत्पर रहता है। जहां किसी के साथ भेद-भाव नहीं
बरता जाता, जहां किसी को अपने परिवार को पालने में बेकार की जद्दोजहद नहीं करनी पडती, जहां के लोग सारे देशवासियों को अपने परिवार का समझ, हर समय, हर तरह की सहायता प्रदान करने को तत्पर रहते हैं। जहां कोई भूखा नहीं सोता, जहां तन ढकने के लिए कपडे और सर छुपाने के लिए छत मुहैय्या करवाने में वहां के जन-प्रतिनिधि सदा तत्पर रहते हैं। मेरा यह सपना कोई बहुत दुर्लभ भी नहीं है क्योंकि यहां के रहवासी हर बात में सक्षम हैं। यूंही उन्हें "छत्तीसगढिया सबसे बढिया" का खिताब हासिल नहीं हुआ है।

मेरे साथ ही भारत में अन्य दो राज्यों, उत्तराखंड तथा झारखंड भी अस्तित्व में आए हैं और उन्नति के मार्ग पर अग्रसर हैं। मेरी तरफ से आप उनको भी अपनी शुभकामनाएं प्रेषित करें, मुझे अच्छा लगेगा।  फिर एक बार आप सबको धन्यवाद देते हुए मेरी एक ही इच्छा है कि मेरे प्रदेश वासियों के साथ ही मेरे देशवासी भी असहिष्णुता छोड़ एक साथ प्रेम, प्यार और भाईचारे के साथ रहें।  हमारा देश उन्नति करे, विश्व में हम सिरमौर हों।

जयहिंद।  

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

डॉक्टरी नुस्खों की कलिष्ट भाषा

दूर पोस्टिंग पर गए डॉक्टर ने घर पत्र लिखा तो माँ ने बहू से कहा जा सामने वाले केमिस्ट से पढवा कर ला। थोड़ी देर बाद बहू लौटी तो माँ ने पूछा क्या लिखा है चिठ्ठी में ? बहू बोली पता नहीं माँ दूकान वाले ने तो ये दवा पकड़ा दी है :-)  

यह तो हुई मजाक की बात। पर सच्चाई यही है कि अभी भी डाक्टरों के द्वारा लिखे गए नुस्खे और उनमें दी गयी हिदायतें आम मरीजों या उनके घरवालों की समझ से बाहर होती हैं। शायद एक-दो प्रतिशत लोग ही ऐसे होंगे जो दूकान से दवा ले कर फिर से डाक्टर को दिखाने जाते होंगे, नहीं तो सभी केमिस्ट के भरोसे ही चलते और रहते हैं। यह तो हुई दवा की बात, उसके सेवन की मात्रा और बारंबारता को भी सरल भाषा में ना लिख कर वही वर्षों से चली आ रही लेटिन भाषा के चिन्हों से ही दर्शाया जाता है। जैसे BDS, CST, a.c.,a.c. & h.s., c.m.s., alt.dieb, ind, mane, p.c., q.d.am, q.d.pm आदि। यदि इन्हें सरल शब्दों में लिखा जाए जैसे दिन में एक-दो बार, खाने-सोने के पहले, खाली पेट इत्यादि, तो मरीज और उनके घर वालों को सहूलियत हो जाए बजाए बार-बार डॉक्टर या दवा की दूकान पर जा कर पूछने से। वैसे कुछ डॉक्टर इस बात की तरफ ध्यान देने लगे हैं पर अधिकतर नुस्खे अभी भी उसी ढर्रे पर लिखे चले आ रहे हैं। पता नहीं इस ओर संबंधित लोगों का ध्यान जाता नहीं कि जान बूझ कर ऐसा किया जाता है। वैसे भी डॉक्टरों के इर्द-गिर्द ऐसा आभामंडल रच दिया गया है जिससे साधारण आदमी उनसे ज्यादा बात करने में भी संकोच करने लगा है। विडंबना ही है कि डॉक्टरों, अस्पतालों की आकाश छूती फीस चुकाने के बाद भी आम आदमी अपनी समस्या या जिज्ञासा पर डॉक्टर से पूरी तरह खुल कर बात करने झिझकता है। इसमें डॉक्टरों का भी दोष नहीं है। अपनी तरफ से तो वे पूरी बात समझा देते हैं फिर मरीजों की लंबी कतारें उन्हें भी मजबूर कर देती हैं सबको जल्दी-जल्दी निपटाने के लिए। इसी पूछने की जहमत या झिझक के कारण कई बार मरीज द्वारा दवा लेने में गलतियों का होना भी नकारा नहीं जा सकता। ऐसा होने पर इस बात का दोष मरीज या उसके घरवालों का ही माना जाता है।   

मरीज को डॉक्टर से और डॉक्टर को मरीज से अलग नहीं किया जा सकता, पर नुस्खे और हिदायतों को सरल भाषा में लिख कर कुछ तो एक दूसरे की सहायता की जा सकती है। आशा है समय के साथ इस पर भी ध्यान दिया जाएगा।      

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