#ऋषि_पतंजलि तो ख़ुश हो रहे होंगे कि उनके जाने के सैंकड़ों सालों बाद भी कोई उनका नाम जीवित रख रहा है। नहीं तो आज कितने लोगों को "चरक", "वाग्भट" जैसे महान विद्वानों के नाम याद हैं ? स्वर्ग इत्यादि जैसी यदि कोई जगह है तो ये लोग वहाँ बैठे हुए पतंजलि जी को बधाइयां ही देते होंगे कि उनके ज्ञान का उपयोग आज भी लोगों की भलाई के लिए हो रहा है।
पहले यह साफ़ कर देना जरूरी है कि ना तो मैं बाबा रामदेव का अनुगामी हूँ और नाही उनके दो-चार उत्पादों को छोड़ सब का उपयोग करता हूँ नाही उनके योग शिविरों में आता-जाता हूँ। पर जब तकरीबन रोज लोगों की प्रतिक्रियाएं पढने को मिलती हैं जो बाबा रामदेव के बढ़ते-फैलते व्यापार पर तंज कसती हैं तो समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग चाहते क्या हैं ? उन्हें तकलीफ किस बात की है, क्या उत्पादित वस्तुएं मापदंड पर खरी नहीं उतर रही हैं ? क्या उनके उपयोग से ग्राहक को कोई नुक्सान पहुँचने का खतरा है ? क्या वे बाजार में
बिकने वाली अपनी समकक्ष चीजों से ज्यादा कीमत पर बेचीं जा रही हैं ? क्या उत्पाद करते समय किसी कानून का उललंघन हो रहा है ? क्या इन सब चीजों के लिए विदेशी मुद्रा का नुक्सान हो रहा है ? यदि ऐसा कुछ नहीं है तब तो यही लगता है कि भड़ास सिर्फ मानव सुलभ ईर्ष्या के कारण निकाली जा रही है। यह कुछ लोगों को हजम नहीं हो पा रहा है कि कैसे एक आदमी कुछ ही दिनों में बाज़ार पर कब्जा कर बैठा, वह भी भगवा कपडे पहन कर ! ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता जब विदेशी कंपनियां अपने घटिया, हानिकारक और मंहगे उत्पाद हमारे मत्थे मढ़ती जाती हैं और हम खुशी-ख़ुशी खुद तो काम में लेते हैं ही अपने बच्चों को भी उनका उपयोग करवा कर गौरवान्वित महसूस करते हैं।
पहले यह साफ़ कर देना जरूरी है कि ना तो मैं बाबा रामदेव का अनुगामी हूँ और नाही उनके दो-चार उत्पादों को छोड़ सब का उपयोग करता हूँ नाही उनके योग शिविरों में आता-जाता हूँ। पर जब तकरीबन रोज लोगों की प्रतिक्रियाएं पढने को मिलती हैं जो बाबा रामदेव के बढ़ते-फैलते व्यापार पर तंज कसती हैं तो समझ में नहीं आता कि ऐसे लोग चाहते क्या हैं ? उन्हें तकलीफ किस बात की है, क्या उत्पादित वस्तुएं मापदंड पर खरी नहीं उतर रही हैं ? क्या उनके उपयोग से ग्राहक को कोई नुक्सान पहुँचने का खतरा है ? क्या वे बाजार में
बिकने वाली अपनी समकक्ष चीजों से ज्यादा कीमत पर बेचीं जा रही हैं ? क्या उत्पाद करते समय किसी कानून का उललंघन हो रहा है ? क्या इन सब चीजों के लिए विदेशी मुद्रा का नुक्सान हो रहा है ? यदि ऐसा कुछ नहीं है तब तो यही लगता है कि भड़ास सिर्फ मानव सुलभ ईर्ष्या के कारण निकाली जा रही है। यह कुछ लोगों को हजम नहीं हो पा रहा है कि कैसे एक आदमी कुछ ही दिनों में बाज़ार पर कब्जा कर बैठा, वह भी भगवा कपडे पहन कर ! ऐसे लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता जब विदेशी कंपनियां अपने घटिया, हानिकारक और मंहगे उत्पाद हमारे मत्थे मढ़ती जाती हैं और हम खुशी-ख़ुशी खुद तो काम में लेते हैं ही अपने बच्चों को भी उनका उपयोग करवा कर गौरवान्वित महसूस करते हैं।
आज ही फेस बुक पर पढ़ा कि ऊपर बैठे ऋषि पतंजलि भी अपने अनुगामियों द्वारा अपनी विद्या के इस तरह के उपयोग पर दुःखी हो रहे होंगे। ये भी तो संभव है कि उन्हें ख़ुशी हो कि उनके जाने के सैंकड़ों सालों बाद भी कोई उनका नाम जीवित रख रहा है। नहीं तो आज कितने लोगों को "चरक", "वाग्भट" जैसे महान विद्वानों के नाम याद हैं ? हमारी नई पीढ़ी के अधिकाँश सदस्यों ने तो शायद ये नाम सुने भी नहीं होंगे ! स्वर्ग इत्यादि जैसी यदि कोई जगह होगी तो ये लोग तो पतंजलि जी को बधाइयां ही देते होंगे कि उनके ज्ञान का उपयोग आज भी लोगों की भलाई के लिए हो रहा है।
वैसे भी हमें ख़ुशी होनी चाहिए की जो काम अकेले अपने बूते पर टाटा, बिड़ला, अंबानी नहीं कर पाए वह एक भगवाधारी बाबा ने कर दिखाया, भले ही पूरी सफलता नहीं मिली हो, पर शुरुआत तो हुई, कोई तो खड़ा हुआ "मल्टीनेशनल कंपनियों" की हिटलरशाही के विरुद्ध। हम सामान खरीदें या ना खरीदें ये हमारी मर्जी है पर इतना तो कर ही सकते हैं कि फिजूल की बातों से किसी को हतोत्साहित ना करें।
फोटो के लिए अंतरजाल का आभार
वैसे भी हमें ख़ुशी होनी चाहिए की जो काम अकेले अपने बूते पर टाटा, बिड़ला, अंबानी नहीं कर पाए वह एक भगवाधारी बाबा ने कर दिखाया, भले ही पूरी सफलता नहीं मिली हो, पर शुरुआत तो हुई, कोई तो खड़ा हुआ "मल्टीनेशनल कंपनियों" की हिटलरशाही के विरुद्ध। हम सामान खरीदें या ना खरीदें ये हमारी मर्जी है पर इतना तो कर ही सकते हैं कि फिजूल की बातों से किसी को हतोत्साहित ना करें।
फोटो के लिए अंतरजाल का आभार








