यह सब देख-पढ़ कर पुरानी फिल्मों की याद आती है, जिनकी कहानी के आखीरी भाग में धूसर चरित्र को निभाने वाले प्राण साहब या प्रेम चोपड़ा जी जैसे खल-नायक नायिका को उसके न चाहने पर भी जबरदस्ती खींचते-खांचते-घसीटते हुए किसी जंगल-पहाड़ी या गुफा में ले जाते थे तथा वहां उपस्थित पंडित को तुरंत शादी करवाने का हुक्म देते थे।
आज यू. पी. के एक गांव में घटी घटना की खबर पढ़ी जहां निकाह के लिए गए बन्ने के सर पर से, एक बुजुर्ग महिला द्वारा आशीष देते हुए हाथ फेरने से उसका विग उतर गया। दूल्हे के गंजा होने की बात छिपाई गयी थी, लिहाजा लड़की ने शादी से इंकार कर दिया। आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं। कहीं लड़का अनपढ़ निकलता है, कहीं उसे शराब की लत होती है तो कहीं कोई रोग शरीर में घर किए बैठा होता है। ऐन मौके पर समय की नजाकत को न देखते हुए किसी मंहगी वस्तु की कामना तो आम बात हो गयी है जिससे दोनों पक्षों में कटुता फैल जाती है और एकाधिक बार रिश्ते टूटने की नौबत आ खड़ी होती है।
पुरानी फिल्मों की याद आती है, जिनकी कहानी के आखीरी भाग में धूसर चरित्र को निभाने वाले प्राण साहब या प्रेम चोपड़ा जी जैसे खल-नायक नायिका को उसके न चाहने पर जबरदस्ती खींचते-खांचते-घसीटते हुए किसी पहाड़ी पर ले जाते थे तथा वहां उपस्थित पंडित को तुरंत शादी करवाने का हुक्म देते थे। फिर नायक के आने के बाद कुछ देर ढिशुंग-ढिशुंग और फिर बुराई का अंत। पर यहां कहानी के सुखांत होने की बात नहीं हो रही। मान लिया जाए कि वह शादी हो जाती तो ! वैसे दो लोगों का खुश रहना तो दूर साथ रह पाना भी दूभर हो जाता। जबरदस्ती, धोखाधड़ी की बुनियाद पर बने रिश्ते कहां तक निभ पाते ? खैर वह तो फिल्मों की बात थी, पर आज वैसे ही लोग, जो झूठ की बुनियाद पर शादी का महल बनाने पहुँच जाते है, क्या उनके दिमाग में एक बार भी यह बात नहीं आती कि आज नहीं तो कल, एक न एक दिन तो उनके झूठ का भांडा फूटेगा ही तब क्या वे अपने संबंधों को बचा पाएंगे ? अब वो बात नहीं रही कि एक बार शादी हो जाए तो फिर कुछ नहीं हो सकता। चलो मान भी लिया जाए कि संस्कारिक लड़का या लड़की लोक-लाज के तहत बात को तमाशा न बनाने की ग़र्ज से बाहर न भी जाने दें तो भी उनकी अपनी जिंदगी क्या नरक नहीं बन जाएगी ? जो नफरत, तनाव एक-दूसरे के प्रति हिकारत पैदा होगी क्या उससे जीवन-यापन करना संभव हो पाएगा। फिर खुदा-न-खास्ता यदि बच्चे हो गए हों तो उनके भविष्य पर क्या असर पडेगा ?
दुनिया में शायद ही ऐसा कोई इंसान हो जिसमें कोई कमी न हो। वह खुद की बनाई भी हो सकती है और प्रकृति-प्रदत्त भी। खुद की बनाई कमी या लत को दूर किया जा सकता है पर प्राकृतिक देन को स्वीकारने में कोई दोष नहीं है। उसे उजागर होने दें और जो उसके साथ आपको सहर्ष स्वीकारे उसी को अपना जीवन साथी बनाएं। पर होता यह है कि अपनी औलाद की कमियों, खामियों को जानते-बूझते भी माँ-बाप उन्हें शादी के मंडप पर ले जा खड़ा करते हैं। इसके पीछे कोई भी कारण हो सकता है, उस कमी के कारण शादी न हो सकने का भय, लडके की बढाती उम्र, कुछ भी। पर ऐसा कर वे लोग अपने बच्चों का भविष्य बिगाड़ने में पूरा का पूरा योगदान भी करते हैं। जो आगे चल कर अधिकांश शादियों के टूटने और तलाक का कारण बनता है।
हमारे यहां शादी-ब्याह दो लोगों का नहीं दो परिवारों का मेल माना जाता है, सो दोनों तरफ से यह कोशिश होनी चाहिए कि बनने वाले संबंध बिना किसी लुकाव-छिपाव के पूरी तरह पारदर्शी यानी आईने की तरह साफ हों।









