बुधवार, 20 मई 2015

टेढ़ी नज़र पर सीधा चश्मा

पिछले कई दिनों से एक चश्मे ने गुल-गपाड़ा मचा रखा है।  बात, बात न रह कर बतंगड़ बन गयी है। अपने यहां की परिपाटी के अनुसार बात चाहे सही हो या गलत उस के पक्ष-विपक्ष में लोग खड़े हो कर जाने कहां-कहां के दबे मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। 

सोचा था पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में घटे चश्मा प्रकरण पर कोई टीका-टिप्पणी नहीं की जाएगी।  बिना मतलब की बहसबाजी का क्या मतलब। पर कल कई दिनों बाद ठाकुर जी का आगमन हुआ। चाय-नाश्ते के साथ ही न चाहते हुए फिर वही बात उठ खडी हुई। वैसे ठाकुर जी आए उसी मकसद से ही थे। बोले, शर्मा जी, पिछले कई दिनों से एक चश्मे ने गुल-गपाड़ा मचा रखा है।  बात, बात न रह कर बतंगड़ बन गयी है। अपने यहां की परिपाटी के अनुसार बात चाहे सही हो या गलत उस के पक्ष-विपक्ष में लोग खड़े हो कर जाने कहां-कहां के दबे मुर्दे उखाड़ने लगते हैं। 

बात देश के एक छोटे से राज्य के एक शहर के कलेक्टर की है, जब उसका परिचय देश के प्रधान मंत्री से करवाया जाता है तो उसका कीमती चश्मा अपनी जगह नहीं छोड़ता।  देखा जाए तो इसमें कोई हर्ज नही है। पर यदि वह भला आदमी आधे मिनट के लिए चश्मा उतार ही लेता तो बड़ाई उसी की होती, होती की नहीं ?

मैं चुप ही रहा।  ठाकुर जी मुझसे किसी प्रतिक्रिया की आशा कर रहे थे पर मेरी चुप्पी देख बोले, कुछ खब्ती दिमाग वाले तो ये यह कहने से भी बाज नहीं आए हैं कि जब चीन में हमारे प्रधान मंत्री टेराकोटा म्यूजियम देखने गए थे तो उन्होंने भी चश्मा नहीं उतारा था। ऐसे लोग सिर्फ भड़ास निकालना जानते हैं, उन्हें जगह और मौके से कोई मतलब नहीं होता। आप ही बताइये दोनों बातों में कोई तुक है या सिर्फ विद्वेष ? ऐसे ही लोगों का कहना है कि धूल-धक्क्ड़ और सूर्य की खतरनाक किरणों से आँखों पर बुरा असर पड़ता है इसीलिए चश्मा नहीं उतारना अपनी जगह ठीक है। पर किसी ने किसी को पूरा दिन तो चश्मा उतारने को नहीं कहा था सिर्फ आधे-एक-मिनट की बात थी, इससे ज्यादा समय तो चश्मे के कांच को साफ करने में लग जाता है। और फिर क्या अपने यहां धूल-धक्कड़ सिर्फ दिन में ही रहता है ? तो क्या आप रात को भी चश्मा चढ़ा कर बाहर निकलते हैं? आप क्या कहते हैं ?

मैं क्या कहूँ ! पर ठाकुर जी बात ऐसी है कि यदि आँखों में कोई तकलीफ हो तो अलग बात है पर साधारण शिष्टाचार या विवेक तो यही कहता है कि अपने से बड़े, चाहे उम्र में हों या ओहदे में, आंखों पर से काला पर्दा उतार कर ही बात करनी चाहिए। एकदम निश्चित नहीं है न ही बहस की बात है, फिर भी धूप का  चश्मा पहन कर किसी से बात करने पर ऐसा समझा जाता है कि आप अपने सामने वाले को गंभीरता से नहीं ले रहे या फिर उसमें आप को रूचि नहीं है, या फिर आप थोड़े से अहम भाव से ग्रस्त हैं। वैसे भी वार्तालाप करते समय सामने वाले की आँखों में देखते हुए ही बात करनी चाहिए न कि इधर-उधर ताकते हुए और गहरे रंग का चश्मा दो बात करने वालों के बीच एक पर्दा सा तो डाल ही देता है। इसलिए कभी भी किसी से भी बात करते समय यह आदमी के अपने विवेक पर निर्भर करता है कि उसे उस समय कैसा व्यवहार करना चाहिए।  

ठाकुर जी शायद मेरी बात से सहमत थे या शायद उन्हें देर हो रही थी इसलिए फिर आने का वादा कर वे रुखसत हो गए।      

मंगलवार, 12 मई 2015

अब कुत्तों के लिए भी कारें मिलनी शुरू हो चुकी हैं,

विज्ञापन में  उसकी मुलाकात एक "बॉस" टाइप, तजुर्बेदार कुत्ते से होती है, जिसकी अपनी कार है और वह उसे चलाता भी खुद है......... !

अब तक तो यही सुना था कि देश-विदेश में पालतू कुत्तों की सार-संभार, साजो-सामान, खाने-सजाने के लिए भी दुकानें खुल चुकी हैं। उनके लिए भी "ब्रांडेड" सामान बनने-बिकने लगा है। जाहिर है यह सब सुविधाएं उनके मालिकों द्वारा ही उन्हें उपलब्ध करवाई जाती हैं। पर यह पता नहीं था कि अब कुत्तों के लिए उनकी पसंद की कारें भी मिलनी शुरू हो चुकी हैं, जहां से वे अपनी पसंद की कार अपने लिए ले कर खुद चला भी सकते हैं। विश्वास नहीं होता ! तो काफी दिनों से टी. वी. पर परोसा जा रहा एक विज्ञापन देखें जिसमें एक प्यारा सा कुत्ता, जिसे अपनी खुद की कार लेने और चलाने की इच्छा है, कार पाने के लिए सडकों पर गाड़ियों के पीछे दौड़ता रहता है क्योंकि उसे यह नहीं मालुम कि कारें कैसे और कहाँ से मिलती हैं !

तभी उसकी मुलाकात एक "बॉस" टाइप तजुर्बेदार कुत्ते से होती है, जिसकी अपनी कार है और वह उसे चलाता भी खुद है, वह बतलाता है कि हर तरह की चाहे जैसी भी कार लेनी हो उसे फलानी जगह से लिया जा सकता है। फिर क्या था अपना वह मासूम सा कुत्ता भी कार ले आता है और "बॉस" को "जॉय राइड" पर ले जाते हुए बिंदास सडकों पर कार दौड़ता है।  यह अभी ज्ञात नहीं हो पाया है कि इनके लिए यातायात नियम और "ड्रायविंग लायसेंस" की प्रक्रिया क्या होगी :-)  

विज्ञापन से एक बात और भी साफ नहीं होती कि क्या उस जगह से क्या सिर्फ कुत्ते ही कार खरीद सकते हैं ?    

शनिवार, 9 मई 2015

गांव से माँ आई है

अधिकतर कथा-कहानियों में संतान द्वारा बूढ़े माँ-बाप की बेकद्री, अवहेलना, बेइज्जती इत्यादि को मुद्दा बना कर कथाएं गढ़ी जाती रही हैं। होते हैं ऐसे नाशुक्रे लोग, पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो मजबूरी-वश अपने माँ-बाप से अलग रहने को बाधित होते हैं। आज की विषम परिस्थितियों में, रोजी-रोटी के लिए चाह कर भी संयुक्त परिवार में नहीं रह सकते।  ऐसी ही एक कल्पना है यह !  

गांव से माँ आई है। गर्मी पूरे यौवन पर है। गांव शहर में बहुत फर्क है। पर माँ को यह मालुम नहीं है। माँ तो शहर आई है अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के पास, प्यार, ममता, स्नेह की गठरी बांधे। माँ को सभी बहुत चाहते हैं पर इस चाहत में भी चिंता छिपी है कि कहीं उन्हें किसी चीज से परेशानी ना हो। खाने-पीने-रहने की कोई कमी नहीं है दोनों जगह न यहां न गांव में। पर जहां गांव में लाख कमियों के बावजूद पानी की कोई कमी नहीं है वहीं शहर में पानी मिनटों के हिसाब से आता है और बूदों के हिसाब से खर्च होता है। यही बात दोनों जगहों की चिंता का वायस है। भेजते समय वहां गांव के बेटे-बहू को चिंता थी कि कैसे शहर में माँ तारतम्य बैठा पाएगी, शहर में बेटा-बहू इसलिए परेशान कि यहां कैसे माँ बिना पानी-बिजली के रह पाएगी। पर माँ तो आई है प्रेम लुटाने। उसे नहीं मालुम शहर-गांव का भेद।

पहले ही दिन मां नहाने गयीं। उनके खुद के और उनके बांके बिहारी के स्नान में ही सारे पानी का काम तमाम हो गया। सारे परिवार को गीले कपडे से मुंह-हाथ पोंछ कर रह जाना पडा। माँ तो गांव से आई है। जीवन में बहुत से उतार-चढाव देखे हैं पर पानी की तंगी !!! यह कैसी जगह है, यह कैसा शहर है जहां लोगों को पानी जैसी चीज नहीं मिलती। जब उन्हें बताया कि यहां पानी बिकता है तो उनकी आंखें इतनी बडी-बडी हो गयीं कि उनमें पानी आ गया।

माँ तो गांव से आई हैं उन्हें नहीं मालुम कि अब शहरों में नदी-तालाब नहीं होते जहां इफरात पानी विद्यमान रहता था कभी। अब तो उसे तरह-तरह से इकट्ठा कर, तरह-तरह का रूप दे तरह-तरह से लोगों से पैसे वसूलने का जरिया बना लिया गया है।

माँ तो गांव से आई है उसे कहां मालुम कि कुदरत की इस अनोखी देन का मनुष्यों ने बेरहमी से दोहन कर इसे अब देशों की आपसी रंजिश का वायस बना दिया है। उसे क्या मालुम कि संसार के वैज्ञानिकों को अब नागरिकों की भूख की नहीं प्यास की चिंता बेचैन किए दे रही है। मां तो गांव से आई है उसे नहीं पता कि लोग अब इसे ताले-चाबी में महफूज रखने को विवश हो गये हैं।

 माँ तो गांव से आई है जहां अभी भी कुछ हद तक इंसानियत, भाईचारा, सौहाद्र बचा हुआ है। उसे नहीं मालुम कि शहर में लोगों की आंख तक का पानी खत्म हो चुका है। इस सूखे ने इंसान के दिलो-दिमाग को इंसानियत, मनुषत्व, नैतिकता जैसे सद्गुणों से विहीन कर उसे पशुओं के समकक्ष ला खडा कर दिया है।

माँ तो गांव से आई है जहां अपने पराए का भेद नहीं होता। बडे-बूढों के संरक्षण में लोग अपने बच्चों को महफूज समझते हैं पर शहर के रसविहीन समाज में कोई कब तथाकथित अपनों की ही वहिशियाना हवस का शिकार हो जाए कोई नहीं जानता।        

ऐसा नहीं है कि बेटा-बहू को मां की कमी नहीं खलती, उन्हें उनका आना-रहना अच्छा नहीं लगता। उन्हें भी मां के सानिध्य की सदा जरूरत रहती है पर वे चाहते हैं कि माँ  इस शुष्क, नीरस, प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दि वापस चली जाए  उतना ही अच्छा।

सोमवार, 4 मई 2015

माँ की सीख जो आज भी सामयिक है

बचपन घी लगे, सिके और फूले हुए फुल्के (रोटी) की ऊपरी पतली परत बहुत स्वादिष्ट लगती थी तो कई बार थाली में रोटी आते ही उसे उतार कर खा लिया करता था। एक बार माँ ने देखा तो टोकते हुए बोलीं कि किसी के पर्दे नहीं उघाड़ने चाहिए। उस समय तो पूरी बात समझ में नहीं आई थी पर समय के साथ यह ज्ञान हुआ कि रोटी का उदाहरण दे माँ ने कितनी बड़ी बात समझा दी थी। 

बड़ों द्वारा दी गयी गयी कुछ नसीहतें या सीखें ऐसी होती हैं जो मन में गहरे पैठ सदा मष्तिष्क से संपर्क बनाए रखती हैं इससे भविष्य में कभी भटकन के दौरान सही-गलत का अंदाजा होता रहता है। मेरी माताजी ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं, पर व्यवहारिक ज्ञान, विवेकशीलता और दुनियादारी के चश्मे से देखा जाए तो वे विदुषी हैं। बातों-बातों में बड़ी सहजता से उन्होंने मानवता का दयालुता पाठ हमें पढ़ाया है। यही कारण है कि मनुष्य तो मनुष्य किसी जीव-जंतु, कीड़े-मकौड़े तक को अकारण कष्ट देना उचित नहीं लगता।   

आज कहीं ये लिखा पढ़ कर, कि दुनिया में सब खाली हाथ आते है और खाली हाथ ही जाते हैं, वर्षों पहले की उनकी एक बात याद आ गयी कि अपने-आप में शाब्दिक रूप में यह कहावत ठीक है और इससे यह सीख मिलती है कि जीवन की नश्वरता सबको याद रहे और इंसान लालच से बचे। यहां खाली हाथ जाने का मतलब यह है कि जाते समय कोई संपत्ति  यानी भौतिक संपदा नहीं ले जा पाता। पर कुछ लोग खाली हाथ नहीं जाते। क्योंकि  मनुष्य गुमनाम तो आता है, पर यह उसके परिश्रम और कर्मों पर निर्भर करता है कि जाते समय वह गुमनामी में न जाए। जाना तो सभी ने है। जिसने भी जन्म लिया है वो जाएगा जरूर। पर अच्छे कर्म करने वाले, दीन-दुखियों के सहायक, देश व समाज के प्रति समर्पित, इंसानियत के पैरोकार अपने पीछे अपनी कीर्ति-पताका को फहराता छोड़ जाते हैं और यही उनका खाली हाथ न जाना है। 

बचपन घी लगे, सिके और फूले हुए फुल्के (रोटी) की ऊपरी पतली परत बहुत स्वादिष्ट लगती थी तो कई बार थाली में रोटी आते ही उसे उतार कर खा लिया करता था। एक बार माँ ने देखा तो टोकते हुए बोलीं कि किसी के पर्दे नहीं उघाड़ने चाहिए। उस समय तो पूरी बात समझ में नहीं आई थी पर समय के साथ यह ज्ञान हुआ कि रोटी का उदाहरण दे माँ ने कितनी बड़ी बात समझा दी थी कि किसी भी हालात से मजबूर, समय के मारे, किसी मजलूम की हालत को सार्वजनिक नही करना चाहिए। सबको अपनी इज्जत प्यारी होती है पता नही किस की क्या मजबूरी हो ! तबसे हर बार खाने पर यह सीख याद आ जाती है।  

इसी तरह उनकी एक बात और नहीं भूलती। पुस्तक में एक पाठ हुआ करता था कि जोर के तूफान के आगे घास व नर्म पौधे तो बच जाते हैं पर बड़े-बड़े वृक्ष टूट कर ढह जाते हैं। माँ की व्याख्या कुछ अलग थी उन्होंने कहा, बेटा मौके की नजाकत को देख अपनी जान बचाने के लिए यदि सभी मौकापरस्त हो जाते तो देश को महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, गांधी जी जैसे नर-नाहर कैसे प्राप्त होते। यदि हम जुल्म के सामने झुके रहते या उसका विरोध न करते तो क्या आज देश आजाद होता ?   

समय के साथ-साथ बहुत कुछ बदल गया है। अब उस बदलाव का क्या बार-बार उल्लेख करना !                         

गुरुवार, 30 अप्रैल 2015

प्रश्नवाचक चिह्न (?) कहाँ से आया

जब बिल्ली किसी खोज में, जिज्ञासा में या अंचभित सी अवस्था में होती है तो उसकी पूंछ प्रश्नवाचक चिह्न जैसा आकार ले लेती है। कहते हैं कि उसी से प्रेरित हो कर यह चिह्न अस्तित्व में आया .........     

किसी भी भाषा के लेखन में शब्दों के मायाजाल का संसार तो जरुरी है ही पर उसके साथ-साथ अल्प विराम, पूर्ण विराम,  प्रश्न चिह्न, विस्मयादिबोधक चिह्न का उचित प्रयोग भी अत्यंत आवश्यक होता है। इन छोट-छोटे चिह्नों के न होने से   न शब्द ही अपना जादू बिखेर पाते हैं नही पढने वाला कुछ ढंग से ग्रहण कर पाता है। इसीलिए आवश्यकतानुसार ये चिह्न अस्तित्व में आते गए और लेखन की सुंदरता में इजाफा होता गया। अब जैसे प्रश्नवाचक चिह्न को ही लें, इसके बिना वाक्य के अर्थ का अनर्थ हो जाना तय है। यह एक ऐसा चिह्न है जिसे संसार भर में मान्यता मिली हुई है। पर इसके अस्तित्व में आने को लेकर कई तरह की भ्रांतियां भी हैं। जिसमें एक तो बड़ी ही रोचक है, इसके अनुसार यह चिह्न बिल्ली की पूंछ से प्रेरित हो बनाया गया है। जब बिल्ली किसी खोज में, जिज्ञासा में या अंचभित सी अवस्था में होती है तो उसकी पूंछ प्रश्नवाचक चिह्न जैसा आकार ले लेती है। कहते हैं कि उसी से प्रेरित हो कर यह चिह्न अस्तित्व में आया। पता नहीं वे लोग सांप के फन से क्यों नहीं प्रेरित हुए !     


एक और धारणा के अनुसार इस चिह्न की उत्पत्ति लेटिन भाषा के शब्द quaestio से हुई है।  जिसका अर्थ प्रश्न होता है। जो समय के साथ बदलते-बदलते qo हो गया और फिर इसे और आसानी से लिखने की वजह से एक अक्षर में ढाल कर आज जैसा रूप मिल गया।  


पर सबसे सटीक धारणा भाषा वैज्ञानिकों के अनुसार यह है कि इंग्लैण्ड के यॉर्क के निवासी अलक़ुइन, जिसने ढेरों किताबें लिखी थीं और जिसे आगे चल कर संत की उपाधि भी मिली, द्वारा इस चिह्न की ईजाद की गयी थी। उस समय किताबों में सिर्फ "डॉट" का प्रयोग विराम चिह्न के रूप में किया जाता था जो कि पुस्तक का पूरा प्रभाव देने में असहाय सिद्ध होता था। अलक़ुइन ने उसमें थोड़ा सुधार कर उसके ऊपर एक टेढ़ी से आकृति बना दी, जो ऐसी लगती थी जैसे आकाश से बिजली गिर रही हो। वर्षों बाद जब विराम चिह्नों को व्यवस्थित किया गया तो अलक़ुइन के इस चिह्न को थोड़ा सुधार  कर प्रश्नवाचक चिह्न के रूप में मान्यता दे दी गयी। इसे इतना पसंद किया गया कि अरबी लिपि में भी, जो दाएं से बांए लिखी जाती है, इसे स्थान प्राप्त हो गया। ऐसी मान्यता है कि इससे मिलते-जुलते चिह्न का सर्वप्रथम उपयोग सीरियक भाषा में किया गया था। इक्कसवीं सदी आते-आते यह करोड़ों-अरबों लोगों का पसंदीदा चिह्न बन गया।      

शनिवार, 25 अप्रैल 2015

यह है देश का सबसे पुराना रेलवे स्टेशन

रोयापुरम, तब 
भारत में पहली बार रेल 16 अप्रैल 1853 के दिन चली थी। इसके बाद धीरे-धीरे इसे अपनी सुविधा के अनुसार अंग्रेजों ने देश भर में इसका विस्तार किया। इसके साथ ही रेलवे स्टेशनों की भी आवश्यकता महसूस होनी ही थी। सो उनका भी निर्माण शुरू हो गया। उस समय उन्हें बड़े भव्य रूप में बनाया जाता था, जिसके फलस्वरूप आज हमारे पास हावड़ा, शिवाजी टर्मिनस तथा चेन्नई सेन्ट्रल जैसे विशाल तथा कलात्मक स्टेशन मौजूद हैं। पर सबसे पुराने यानी पहले स्टेशन को, जो अभी भी कार्यरत हो, खोजा जाए तो रोयापुरम स्टेशन का नाम सामने आता है, (बंबई और थाणे के स्टेशन अब काम में नहीं लिए जाते हैं) इसे दक्षिण भारत के पहले रेलवे स्टेशन होने का गौरव भी प्राप्त है।

रोयापुरम, अब 

यह चेन्नई-अराकोणम सेक्शन में स्थित है। इसका निर्माण 28 जून 1856 में संपन्न हुआ था। कुछ ही दिनों बाद 1 जुलाई 1856 से यहां से गाड़ियों का चलना भी आंरभ हो गया था। शुरू में यहां से दो गाड़ियां चलाई गयीं जो रोयापुरम से अम्बुर और तिरुवल्लुर के लिए चलती थीं।  एग्मोर स्थान्तरित होने के पहले 1922 तक यह मद्रास और महराठा रेलवे का हेड ऑफिस भी रहा। रख-रखाव के अभाव में इसका अधिकाँश भाग खंडहर में बदल गया था जिसका जीर्णोद्धार 2005 में जा कर संभव हो पाया। आज देश के 800 स्मारकों की धरोहर में इसका भी स्थान है।      

बुधवार, 22 अप्रैल 2015

आम का नाम लंगडा क्यों ?

फिर एक बार फलों के राजा आम का मौसम आ गया है। सैंकड़ों प्रजातियों के साथ दुनिया में बहुतायद में उगाया जाने वाला फल। इसीलिए शायद इसका नाम आम पड़ा हो। पर सुगंध, मिठास, स्वाद तथा अपने दैवीय रस के कारण ख़ास मुकाम हासिल कर फ़लों का राजा कहलाता है। क्या बच्चा क्या बूढ़ा, क्या युवक क्या जवान, शायद ही कोई ऐसा हो जो इसे पसंद न करता हो। तरह-तरह के नाम हैं इसके - हापुस, अल्फांसो, चौसा, हिमसागर, सिंदुरी, सफ़ेदा, गुलाबखास, दशहरी इत्यादि-इत्यादि, प्रत्येक की अपनी सुगंध, अपना स्वाद। हरेक अपने आप में लाजवाब। पर बनारस का एक कलमी आम सब पर भारी पडता है। यह खुद जितना स्वादिष्ट होता है उतना ही अजीब नाम है इसका #लंगडाआम। यह आमों का सरताज है। इसका राज फ़ैला हुआ है बनारस के रामनगर के इलाके में। इसका नाम ऐसा क्यों पडा इसकी भी एक कहानी है। 

बनारस के राम नगर के शिव मंदिर में एक सरल चित्त पुजारी पूsoरी श्रद्धा-भक्ती से शिवजी की पूजा अर्चना किया करते थे। एक दिन कहीं से घूमते हुये एक साधू महाराज वहां पहुंचे और कुछ दिन मंदिर मे रुकने की इच्छा प्रगट की। पूजारी ने सहर्ष उनके रुकने की व्यवस्था कर दी। साधू महराज के पास आम के दो पौधे थे जिन्हें उन्होंने
मंदिर के प्रांगण में रोप दिया। उनकी देख-रेख में पौधे बड़े होने लगे और समयानुसार उनमें मंजरी लगी जिसे साधू महराज ने शिवजी को अर्पित कर दिया। रमता साधू शायद इसी दिन के इंतजार मे था, उन्होंने पुजारीजी से अपने प्रस्थान की मंशा जाहिर की और उन्हें हिदायत दी कि इन पौधों की तुम पुत्रवत रक्षा करना, इनके फ़लों को पहले प्रभू को अर्पण कर फ़िर फ़ल के टुकडे कर प्रसाद के रूप में वितरण करना, पर ध्यान रहे किसी को भी साबुत फ़ल, इसकी कलम या टहनी अन्यत्र लगाने को नहीं देनी है। पुजारी से वचन ले साधू महाराज रवाना हो गये। समय के साथ पौधे वृक्ष बने उनमें फ़लों की भरमार होने लगी। जो कोई भी उस फ़ल को चखता वह और पाने के लिये लालायित हो उठता पर पुजारी किसी भी दवाब में न आ साधू महाराज के निर्देशानुसार कार्य करते रहे। फ़लों की शोहरत काशी नरेश तक भी पहुंची, उन्होंने प्रसाद चखा और उसके दैवी स्वाद से अभिभूत रह गये। उन्होंने पुजारी को आम की कलम अपने माली को देने का आदेश दिया। पुजारीजी धर्मसंकट मे पड गये। उन्होंने दूसरे दिन खुद दरबार में हाजिर होने की आज्ञा मांगी।सारा दिन वह परेशान रहे। रात को उन्हें आभास हुआ जैसे खुद शंकर भगवान उन्हें कह रहे हों कि काशी नरेश हमारे ही प्रतिनिधी हैं उनकी इच्छा का सम्मान करो। दूसरे दिन पुजारीजी ने टोकरा भर आम राजा को भेंट किये। उनकी आज्ञानुसार माली ने उन फ़लों की अनेक कलमें लगायीं। जिससे धीरे-धीरे वहं आमों का बाग बन गया। आज वही बाग बनारस हिंदु विश्वविद्यालय को घेरे हुये है। यह तो हुई आम की उत्पत्ती की कहानी। अब इसके अजीबोगरीब नाम की बात। 

शिव मंदिर के पुजारीजी के पैरों में तकलीफ़ रहा करती थी, जिससे वह लंगडा कर चला करते थे। इसलिये उन आमों को लंगडे बाबा के आमों के नाम से जाना जाता था। समय के साथ-साथ बाबा शब्द हटता चला गया और आम की यह जाति लंगडा आम के नाम से विश्व-विख्यात होती चली गयी।

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अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...