आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती।
साफ़-सुथरा माहौल, साफ-सफाई किसे अच्छी नहीं लगती। इसकी अच्छाइयों, इसके फायदों से भी सभी वाकिफ हैं। पर नजरिया सब का तंग है। 'मैं साफ मेरा घर साफ' बस और इसी तंगख्याली के चलते अपने घर का कूड़ा लोग नुक्कड़ों या सड़क किनारे डाल निश्चिंत हो जाते हैं बिना यह सोचे कि वह एक जगह एकत्र हुई गंदगी, क्या नहीं कहर बरपा सकती। पर लोगों की, उचित दिशा निर्देश न होने के कारण, मजबूरियां भी होती हैं। इन्हीं सब बातों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के बाद जब मोदी जी ने सफाई के व्यापक अभियान का आह्वान किया तो जैसे लोगों में एक जोश की लहर दौड़ गयी। सब को ऐसा लगा कि बस हाथ में झाड़ू पकड़ा और गंदगी नौ-दो-ग्यारह हुई। कुछ लोग इच्छा से और कुछ 'एज यूजुअल' अनिच्छा से इस अभियान में जुटे। पर आशा के अनुरूप नब्बे प्रतिशत वही हुआ जिसका अंदेशा था। सांकेतिक अभियान के दौरान इधर-उधर का कूड़ा एकत्र कर किसी एक कोने में ढेर लगा लोग फोटो खिंचवा, प्रेस विज्ञप्ति भिजवा सब खुशी-खुशी अपने घर रवाना हो गए।
इरादा जरूर नेक है, अधिकांश लोग समझ भी रहे हैं, करना भी चाहते हैं, पर निराकरण और समापन कैसे किया जाए इसका उपाय नहीं है। नाही कोई 'गाइड लाइन" है कि उस एकत्र किए गए कूड़े-कर्कट को कैसे ठिकाने लगाया जाए। दूसरी बात, करोड़ों लोगों को जिनको गंदगी फैलाना ज्यादा आसान लगता है उनको जागरूक करना टेढ़ी खीर होगा। आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती। इसीलिए इस सफाई अभियान की सफलता को लेकर थोड़ी आशंका उत्पन्न हो रही है। जब तक देश का एक-एक नागरिक जागरूक नहीं हो जाता, अपने कर्तव्य को धर्म नहीं मानने लगता तब तक इतने बड़े अभियान की सफलता प्रश्न चिन्ह के दायरे में ही रहेगी। इसके लिए शुरुआत बिल्कुल पहले पायदान से करना जरूरी है। स्कूलों और घरों से ही बच्चों को इसकी अहमियत बतानी होगी। अपनी और अपने घर की सफाई के साथ उन्हें अपने माहौल की सफाई के प्रति जागरूक करना होगा। इसके साथ ही सरकार को भी नई-नई तकनीकियों को तुरंत लागू कर लोगों के प्रयासों को उनकी मेहनत को जाया जाने से बचाना होगा।
.jpg)
दो अक्टूबर के दिन प्रधान मंत्री ने पहल कर सब को साथ ले जिस जोश के साथ राह दिखाई वह कबीले तारीफ जरूर था पर ऐसा रोज-रोज तो हो नहीं सकता। प्रतिदिन मंत्री-संत्री अपना काम छोड़ सड़क पर नहीं उत्तर सकते।देश, समाज को चलाने के लिए, अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग महकमे और लोग नियुक्त किए जाते हैं। इसी के तहत देश के हर शहर, जिले, वार्ड, मोहल्ले के लिए सफाई-कर्मियों की नियुक्ति की जाती है। जरूरत है कि यह ध्यान रखा जाए कि जिसे जो काम सौंपा गया है वह अपनी पूरी जिम्मेदारी से उसे पूरा करे। हर कोई यदि अपना काम पूरा करे तो भी एक हद तक कई परेशानियां दूर हो सकती हैं। पर कड़वी सच्चाई और विडंबना यह है कि हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति के तहत जाति, धर्म, अशिक्षा का भरपूर उपयोग अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए लोगों को बरगला कर देश और समाज के हित को अनदेखा कर दिया जाता है।
इसी के संदर्भ में एक चीनी कहानी समीचीन है। एक खूबसूरत किताब में चूहों को पकड़ने की विधियां बताई गयी थीं। एक दिन चूहों ने उस पर धावा बोल दिया. किताब गरूर से बोली, भागो यहां से तुम जानते हो मैं कौन हूं और मुझ में क्या लिखा है ? चूहे बोले, अरे तुम एक कागज की बनी किताब ही तो हो। पुस्तक गर्व से बोली, अरे बेवकूफो, मुझमें तुम्हें पकड़ने और मारने की विधियां बताई गयी हैं। क्यूँ अपनी मौत को दावत दे रहे हो।चूहे जोर से हस पड़े और कुछ मिनटों में ही किताब को कतरनों में बदल दिया। चूहे अक्लमंद थे वे जानते थे कि मात्र लिखा होने से कुछ नहीं होता जब तक उस पर अमल न किया जाए। कहीं ऐसा ही हाल हमारे सफाई अभियान का न हो जाए। फिर भी चाहे जो हो हमें अपनी तरफ से कोशिश करनी नहीं छोड़नी है ना ही हतोत्साहित होना है। हम कम से कम अपने स्तर पर अपने आस-पास का परिवेश तो स्वच्छ रख ही सकते हैं। शुरुआत में इतना ही बहुत है। तो चलिए आज से एक कदम बढ़ाते हैं।
साफ़-सुथरा माहौल, साफ-सफाई किसे अच्छी नहीं लगती। इसकी अच्छाइयों, इसके फायदों से भी सभी वाकिफ हैं। पर नजरिया सब का तंग है। 'मैं साफ मेरा घर साफ' बस और इसी तंगख्याली के चलते अपने घर का कूड़ा लोग नुक्कड़ों या सड़क किनारे डाल निश्चिंत हो जाते हैं बिना यह सोचे कि वह एक जगह एकत्र हुई गंदगी, क्या नहीं कहर बरपा सकती। पर लोगों की, उचित दिशा निर्देश न होने के कारण, मजबूरियां भी होती हैं। इन्हीं सब बातों पर लोगों का ध्यान आकर्षित करने के बाद जब मोदी जी ने सफाई के व्यापक अभियान का आह्वान किया तो जैसे लोगों में एक जोश की लहर दौड़ गयी। सब को ऐसा लगा कि बस हाथ में झाड़ू पकड़ा और गंदगी नौ-दो-ग्यारह हुई। कुछ लोग इच्छा से और कुछ 'एज यूजुअल' अनिच्छा से इस अभियान में जुटे। पर आशा के अनुरूप नब्बे प्रतिशत वही हुआ जिसका अंदेशा था। सांकेतिक अभियान के दौरान इधर-उधर का कूड़ा एकत्र कर किसी एक कोने में ढेर लगा लोग फोटो खिंचवा, प्रेस विज्ञप्ति भिजवा सब खुशी-खुशी अपने घर रवाना हो गए।
इरादा जरूर नेक है, अधिकांश लोग समझ भी रहे हैं, करना भी चाहते हैं, पर निराकरण और समापन कैसे किया जाए इसका उपाय नहीं है। नाही कोई 'गाइड लाइन" है कि उस एकत्र किए गए कूड़े-कर्कट को कैसे ठिकाने लगाया जाए। दूसरी बात, करोड़ों लोगों को जिनको गंदगी फैलाना ज्यादा आसान लगता है उनको जागरूक करना टेढ़ी खीर होगा। आदमी की फितरत है कि उसे जबरदस्ती या दवाब में काम करना पसंद नहीं आता। आप किसी को सिर्फ एक घंटा कहीं बैठने को कह दें तो वह छटपटाता रहेगा पर अपनी मर्जी से भले ही वह एक ही जगह दो-तीन घंटे बैठा रहे उसे तकलीफ नहीं होती। इसीलिए इस सफाई अभियान की सफलता को लेकर थोड़ी आशंका उत्पन्न हो रही है। जब तक देश का एक-एक नागरिक जागरूक नहीं हो जाता, अपने कर्तव्य को धर्म नहीं मानने लगता तब तक इतने बड़े अभियान की सफलता प्रश्न चिन्ह के दायरे में ही रहेगी। इसके लिए शुरुआत बिल्कुल पहले पायदान से करना जरूरी है। स्कूलों और घरों से ही बच्चों को इसकी अहमियत बतानी होगी। अपनी और अपने घर की सफाई के साथ उन्हें अपने माहौल की सफाई के प्रति जागरूक करना होगा। इसके साथ ही सरकार को भी नई-नई तकनीकियों को तुरंत लागू कर लोगों के प्रयासों को उनकी मेहनत को जाया जाने से बचाना होगा।.jpg)
दो अक्टूबर के दिन प्रधान मंत्री ने पहल कर सब को साथ ले जिस जोश के साथ राह दिखाई वह कबीले तारीफ जरूर था पर ऐसा रोज-रोज तो हो नहीं सकता। प्रतिदिन मंत्री-संत्री अपना काम छोड़ सड़क पर नहीं उत्तर सकते।देश, समाज को चलाने के लिए, अलग-अलग काम के लिए अलग-अलग महकमे और लोग नियुक्त किए जाते हैं। इसी के तहत देश के हर शहर, जिले, वार्ड, मोहल्ले के लिए सफाई-कर्मियों की नियुक्ति की जाती है। जरूरत है कि यह ध्यान रखा जाए कि जिसे जो काम सौंपा गया है वह अपनी पूरी जिम्मेदारी से उसे पूरा करे। हर कोई यदि अपना काम पूरा करे तो भी एक हद तक कई परेशानियां दूर हो सकती हैं। पर कड़वी सच्चाई और विडंबना यह है कि हमारे देश में वोट बैंक की राजनीति के तहत जाति, धर्म, अशिक्षा का भरपूर उपयोग अपने निजी स्वार्थों को पूरा करने के लिए लोगों को बरगला कर देश और समाज के हित को अनदेखा कर दिया जाता है।
इसी के संदर्भ में एक चीनी कहानी समीचीन है। एक खूबसूरत किताब में चूहों को पकड़ने की विधियां बताई गयी थीं। एक दिन चूहों ने उस पर धावा बोल दिया. किताब गरूर से बोली, भागो यहां से तुम जानते हो मैं कौन हूं और मुझ में क्या लिखा है ? चूहे बोले, अरे तुम एक कागज की बनी किताब ही तो हो। पुस्तक गर्व से बोली, अरे बेवकूफो, मुझमें तुम्हें पकड़ने और मारने की विधियां बताई गयी हैं। क्यूँ अपनी मौत को दावत दे रहे हो।चूहे जोर से हस पड़े और कुछ मिनटों में ही किताब को कतरनों में बदल दिया। चूहे अक्लमंद थे वे जानते थे कि मात्र लिखा होने से कुछ नहीं होता जब तक उस पर अमल न किया जाए। कहीं ऐसा ही हाल हमारे सफाई अभियान का न हो जाए। फिर भी चाहे जो हो हमें अपनी तरफ से कोशिश करनी नहीं छोड़नी है ना ही हतोत्साहित होना है। हम कम से कम अपने स्तर पर अपने आस-पास का परिवेश तो स्वच्छ रख ही सकते हैं। शुरुआत में इतना ही बहुत है। तो चलिए आज से एक कदम बढ़ाते हैं।






.jpg)
.jpg)

.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)
.jpg)

.jpg)






