pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2014

वह सांड को सर के ऊपर उठा कसरत करता था

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा।

सोच के बाहर है कि अपने शारीरिक बल को बढ़ाने के लिए कोई इंसान एक सांड को अपने सर के ऊपर उठा कर कसरत करता होगा। पर ऐसा हुआ है।  करीब 600 साल ईसा पूर्व, इटली के क्रोटोन में एक बालक का जन्म हुआ।  बचपन में साधारण कद-काठी का  बच्चा ही था।  पर उसकी इच्छा दुनिया का सबसे ताकतवर इंसान बनने की थी।  परंपरागत तरीके की कसरतों से उसका मन नहीं भरता था।  एक दिन उसने अपने घर के पास मार्ग के बीचो-बीच एक नवजात बछड़े को पड़े देखा तो वह उसे उठा किनारे ले गया।  फिर पता नहीं उसे क्या सूझा वह रोज बिना नागा, बिना किसी की परवाह के निश्चित समय पर उस बछड़े को अपने सर के ऊपर उठाने लगा। समय बीतता गया दिन हफ्ते में और हफ्ते महीनों में बदलते गए पर उसने, आंधी हो, तूफान हो, गरमी हो, सर्दी हो, अपना नियम कभी नहीं बदला। उस बालक का नाम था मिलो। 

उधर बछड़ा भी  सांड बन गया था पर मिलो उसे ही उठा कर अपना रियाज पूरा करता था। देखने वाले
जब दांतों तले उंगलियां दबाते थे तो उसे और भी आनंद आता था।उसके शरीर में मानों ताकत का सागर ठाठें मारता था।  अपनी ताकत का प्रदर्शन करना उसका शौक था।  इसके लिए वह अपनी मुट्ठी में एक अनार रख लोगों से उसे छीनने को कहता था पर इसमें कोई सफल नहीं होता था। आश्चर्य की बात तो यह थी कि ताकत से मुट्ठी भींचने के बावजूद कभी फल को नुक्सान नहीं पहुंचता था।  ऐसे ही कभी वह एक तैलीय फर्श पर खड़ा हो अपने को धकेल कर पर करने की चुन्नोती देता था पर इसमें भी कोई उसे हरा नहीं पाता था।  उसके हाथ में इतनी ताकत थी कि वह अपने मुक्के के एक ही प्रहार से अच्छे खासे भैंसे को मार गिराता था।  अपने एक पसंदीदा करतब में वह अपने माथे पर बंधी रस्सी को अपने सर की शिराओं को  फुला कर तोड़ डालने की क्षमता रखता था।  ऐसे महाबली और महान खिलाड़ी ने प्राचीन ओलंपिक खेलों में भी भाग लिया था और एक या दो बार नहीं छह-छह बार विजेता घोषित किया गया था।  अपने चौबीस वर्षीय खेल जीवन में वह कभी भी पराजित नहीं हुआ था।   

कहते हैं कि मिलो ने एक बार महान ग्रीक दार्शनिक और गणितज्ञ पाइथागोरस की जान बचाई थी, जिससे प्रभावित हो पाइथागोरस ने अपनी लड़की की शादी मिलो से करवा दी थी। अपनी ताकत के बलबूते पर उसने अपने देश की सेना में भी जगह बना ली थी और कई युद्धों में भाग लेकर जीत भी दिलवाई थी। 

बढ़ती उम्र के बावजूद उसे अपने शारीरिक बल पर बहुत भरोसा और नाज था। इसी अति-आत्मविश्वास और  ताकत के घमंड के कारण उसे अपनी जान से भी हाथ धोना पड़ा। एक बार घूमते-घूमते मिलो को एक मजबूत वृक्ष दिखाई पड़ा, जिसके तने में दरार पड़ी हुई थी।  मिलो ने उसे उखाड़ने  ली। उसने पेड़ को जड़ से हिला तो दिया पर इस जोर आजमाईश में उसके हाथ बुरी तरह पेड़ की दरार में फस गए और लाख कोशिशों के बाद भी मिलो उन्हें छुड़ा नहीं पाया और उसकी बेबसी का फ़ायदा जंगली जानवरों ने उसे मार कर उठाया।  इस तरह एक विश्व विजेता का दारूण अंत हो गया।       

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

फर्क है कुलू के दशहरे में और विजयादशमी में

सात दिनों तक चलने वाले इस त्योहार में पहाड़ी जन-जीवन की मासूमियत, ज़िंदा-दिली, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक-आर्थिक अवस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों, सबकी झलक एक जगह देखने को मिल जाती है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं किया जाता।
दशहरे का उत्सव 


आश्विन माह के दसवें दिन विजया दशमी या दशहरे का त्यौहार धूम-धाम से पूरे देश में मनाया जाता है। बुराई पर अच्छाई की जीत को दर्शाने के लिए सांकेतिक रूप से हर साल रावण का पुतला अग्नि को समर्पित किया जाता है। पर जब सारे देश में विजयादशमी के दिन दशहरा उत्सव संपन्न हो जाता है, ठीक उसके दूसरे दिन हिमाचल के कुल्लू शहर में शुरू होता है "कुल्लू का दशहरा।" यह अपने आप में एक ऐसा बड़ा उत्सव है जिसे देखने देश-विदेश से पर्यटक उमड़ पड़ते हैं। सात दिनों तक चलने वाले इस त्यौहार में पहाड़ी जन-जीवन की मासूमियत, ज़िंदा-दिली, धार्मिक मान्यताएं, सामाजिक-आर्थिक अवस्था के साथ-साथ इतिहास, संस्कृति और रीति-रिवाजों सबकी झलक एक जगह देखने को मिल जाती है। देश के दूसरे हिस्सों की तरह यहां रावण, कुम्भकर्ण और मेघनाद का दहन नहीं किया जाता। यहां के दशहरे के प्रारंभ होने और मनाने की एक अलग कथा है।  
वर्षों पहले 1637  में कुल्लू घाटी में राजा जगत सिंह का राज था।  वैसे तो राजा लोक-प्रिय था, प्रजा
दरबार में पधारे देवी-देवता 
का भला चाहने वाला था पर उसे बहुमूल्य चीजों का संग्रह करने का शौक पागलपन की हद तक था। उसी के राज के टिपरी गांव में दुर्गा दत्त नाम का एक गरीब ब्राह्मण पूजा-पाठ कर अपना गुजर-बसर किया करता था। ब्राह्मण से किसी बात पर खफा एक आदमी ने राजा के कान भर दिए कि दुर्गा दत्त के पास कटोरा भर अति सुन्दर, बहुमूल्य तथा नायाब मोती हैं, जिन्हें उसने छिपा कर रखा हुआ है। राजा ने तुरंत दुर्गा दत्त के पास उन मोतीयों को राज खजाने में जमा करवाने का आदेश भिजवाया। दुर्गा दत्त ने हर नाकाम कोशिश की राजा को समझाने की कि उसके पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है पर राजा न माना। उसके

राजघराने के वंशज 
उत्पीड़न से तंग आ ब्राह्मण ने अपने परिवार सहित अपने को घर में बंद कर आग लगा कर प्राण त्याग दिए। उसके दुखी मन से निकली आह के कारण कुछ ही समय पश्चात राजा को कोढ़ की बीमारी ने आ दबोचा उसे हर ओर कीड़े ही कीड़े नजर आने लगे। उसका खाना-पीना सब मुहाल हो गया।  उसकी बीमारी की खबर आग की तरह चारों दिशाओं में फैल गयी। कई तरह के इलाज आजमाए गए, हकीम, वैद्यों, ओझाओं, साधू-संतों के उपाय किए गए पर कोई फ़ायदा नहीं हुआ। अंत में एक बैरागी बाबा जिनका नाम किशन दास था, उन्होंने राजा को अपने राज में रघुनाथ जी की मूर्ती की स्थापना कर अपना सब कुछ उनको अर्पित कर देने की सलाह दी। राजा ने अपने ख़ास आदमी दामोदर दास को अयोध्या भेज वहां के 'त्रेत नाथ' के मंदिर से रघुनाथ जी की मूर्ति को मंगवा कर कुल्लू के सुल्तानपुर इलाके में पूरे विधी-विधान से स्थापित करवाया। इसके लिए अयोध्या के विद्वान पंडितों को भी बुलवाया गया। पूजा-अर्चना के बाद प्रभु की मूर्ति के चरणामृत को ग्रहण करने के पश्चात राजा को
अपने आराध्यों को लाते भक्त 
बिमारी से मुक्ति मिली। 




इसके बाद राजा जगत सिंह ने वादे के अनुसार अपना सारा राज्य प्रभु को समर्पित कर उनका छड़ीबरदार बन प्रजा की सेवा करनी प्रारंभ कर दी। राजा ने घाटी के समस्त देवी-देवताओं को प्रभु रघुनाथ जी के दरबार में उनके सम्मान की खातिर हाजरी लगाने के लिए कुल्लू के ढालपुर इलाके में एकत्रित होने का आह्वान किया। 
तिल धरने को जगह नहीं रहती 

यह बात 1651 के आश्विन माह के पहले पखवाड़े की है। तब से यह प्रथा चलती आ रही है। चूँकि इसी समय देश भर में दशहरे के त्यौहार की धूम रहती है तो उसी कड़ी को थामते हुए इसका भी वैसा ही नामकरण हो गया। जिसने आज विश्व-व्यापी ख्याति हासिल कर ली है और इस अवसर पर यहां पैर धरने की जगह मिलना मुश्किल हो जाता है।                       

बुधवार, 1 अक्टूबर 2014

कोलकाता की "सफ़ेद-पोश" पुलिस

पश्चिम -बंगाल देश का अकेला राज्य है जहां की पुलिस के लिए दो तरह के रंग की "ड्रेस" निर्धारित की गयी है। महानगरीय पुलिस के लिए सफेद तथा बाक़ी के लिए खाकी।  


पश्चिम-बंगाल और कोलकाता प्रवास के दौरान बाहर से आए पर्यटकों ने वहां की पुलिस में कुछ को खाकी और कुछ को सफेद रंग की वर्दी  में देखा होगा। देश के बाक़ी हिस्सों में रहने वालों के मन में भी फिल्मों में कोलकाता की पुलिस दिखाई जाते समय उसके खाकी के बदले सफेद कपड़ों के बारे में शायद ही जिज्ञासा उत्पन्न हुई हो। पर जब देश के सारे हिस्सों में खाकी-वर्दी का बोल-बाला है तो कोलकाता की पुलिस सफेद-पोश क्यों ?  ज्यादातर लोग इस बात पर गौर नहीं करते।  पर इसका भी  कारण है।    

जब कभी घूमने-फिरने की बात आती है तो कोलकाता का नाम बाकी जगहों के काफी बाद आता है। जबकी अंग्रेजों के राज में हर बात में अग्रणी बंगाल का यह भव्य नगर  1911 तक  देश की राजधानी रहा था। यह कहावत काफी दिनों तक लोगों की जुबान पर रही थी कि वर्तमान में जो  बंगाल सोचता है वही भविष्य में देश की सोच होती है। गुलामी का समय था, पर बंगाली नौजवानों ने अंग्रेजों की नाक में दम कर रखा था। उन्हें देश छोड़ने को बाध्य करने के लिए हिंसक और अहिंसक दोनों मार्ग अख्तियार किए जाते रहे थे। फिर भी अराजकता की स्थिति होने के बावजूद अंग्रेजों ने राजधानी "कलकत्ता" की शानो-शौकत को बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।  आज भी उस जमाने के बनी महलनुमा इमारतें दर्शनीय हैं। इसीलिए कोलकाता को "महलों का शहर" भी कहा जाता है।  
सहायक के रूप में 
इसके व्यवस्थित और संस्थागत रख-रखाव के लिए उन्नीसवीं सदी के मध्य में 1856 में पुलिस विभाग में भी कई आमूल-चूल परिवर्तन किए गए। लंदन पुलिस की तरह गुप्तचरों को भर्ती किया गया। पुलिस को शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ख़ास अधिकार भी दिए गए। उसी समय प्रदेश की पुलिस से कलकत्ता पुलिस को अलग कर उसे एक अलग संगठन का रूप दे दिया गया तथा उस समय के मुख्य न्यायाधीश को इसका पहला कमिश्नर बनाया गया। इस तरह तब से कोलकाता में दो पुलिस फोर्स काम कर रहीं हैं, पहली वेस्ट-बेंगाल पुलिस तथा दूसरी कोलकाता पुलिस। कोलकाता पुलिस के अंतर्गत महानगरीय इलाका आता है जबकि वेस्ट-बेंगाल पुलिस बाकी इलाकों की देख-भाल करती है।       
प. बंगाल की खाकी वर्दी 
उसी समय कलकत्ता पुलिस को प्रदेश की पुलिस से अलग पहचान देने के लिए, खाकी के बदले सफेद वर्दी याने यूनिफार्म प्रदान की गयी।  बंगाल देश का अकेला राज्य है जहां की पुलिस के लिए दो तरह की "ड्रेस" निर्धारित की गयी है। यहां की यातायात पुलिस को एक और सुविधा मिली हुई थी जो देश की किसी अन्य पुलिस को उपलब्ध नहीं थी, और वह है कमर की बेल्ट में छाते को लगाने की सुविधा। जिससे यातायात नियंत्रण के लिए हाथ भी खाली रहते थे  और सूर्य की तीखी रौशनी से भी बचाव हो जाता था।  पता नहीं देश के अन्य प्रदेशों की पुलिस के आला अफसर अपने जवानों को यह सुविधा क्यों नहीं प्रदान करते ? 

रविवार, 21 सितंबर 2014

शिक्षा के 'ग्यारह' बजाने वाले

इसका हल तो तभी निकल सकता है जब शिक्षा विभाग की बाग-डोर राजनयिकों के हाथ से निकाल कर शिक्षा के सही जानकारों को सौंप दी जाए और उन पर किसी लाल-पीले-नीले फीते की बंदिश न हो।  नहीं तो आने वाले समय में इस देश में इतने पढ़े-लिखे अनपढ़ हो जाएंगे जो अपने आप  में ही एक समस्या होंगे।   


खबर है कि राष्ट्रीय चैनल दूरदर्शन ने चीनी राष्ट्रपति के नाम "शी जिनपिंग" के पहले नाम "Xi" को रोमन गिनती का नंबर समझ उसे "इलेवन" पढने वाली एंकर को  बर्खास्त कर दिया है। अब वहाँ के जिम्मेदार लोग सफाई देते फिर रहे हैं कि वह तो "कैजुएल" कर्मी थी। वर्तनी की ऐसी गलतियां इस चैनल पर होना आम है पर आज  दूरदर्शन पर चीनी राष्ट्रपति का नाम जिस तरह पढ़ा गया वह तो "ब्लंडर" था। ऐसे समय जब किसी राष्ट्राध्यक्ष, वह भी ऐसे अहम देश के, बारे में बुलेटिन हो तब तो ख़ास एहतियात बरती जानी बहुत जरूरी थी। पर हुआ इसका उल्टा, तो फिर इस विशेष अवसर को "कैजुएली" लेते हुए एक "कैजूएल" वाचक को वहाँ बैठने की अनुमति देने वाले को भी उतना ही दोषी माना जाना चाहिए।                      

कहते हैं और सुनने में आता है कि समाचार वाचक जो कैमरे के रूबरू हो कर समाचार पढ़ते हैं वे भाषा में पारंगत होते हैं तथा पढ़ते समय सौ प्रतिशत शुद्ध उच्चारण के प्रति प्रतिबद्ध होते हैं। ऐसे लोगों से अच्छे सामान्य ज्ञान, समसामयिकी के बोध और प्रत्युत्पन्नमति होने की भी अपेक्षा रहती है। यहां तक कि छात्रों को सलाह दी जाती है कि वे खबरें सुन अपनी भाषा सवारें। पर आज तक जिस तरह हर चैनल पर भाषा की बेकद्री हो रही है तो कोई क्या सीखेगा और क्या समझेगा। 
आठवीं कक्षा तक बिना किसी रुकावट के और उसके बाद भी प्रतिस्पर्धा नहीं के बराबर होने का परिणाम क्या निकलेगा यह कभी गंभीरता से सोचा भी है नीतियां निर्धारित करने वालों ने।    
देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में स्नातक स्तर  के छात्र ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। 
कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहाँ क्या आशा की जा सकती है।  यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है.
पत्र अपनी कहानी खुद कह रहा है 
इसी के साथ देश में खुली सैंकड़ों-हजारों पढ़ाई की दुकाने कैसे शिक्षार्थीयों का उत्पादन कर रही हैं उस पर भी शिक्षा विभाग को ध्यान देने की जरूरत है। ज्यादातर इन रट्टू तोतों के हाथ में किसी भी तरह हासिल की गयी विश्व-विद्यालयों की सिर्फ कागज की डीग्री होती है शिक्षा नहीं। इनका एक ही मकसद होता है येन-केन-प्रकारेण सरकारी नौकरियों को हथियाना, क्योंकि प्रायवेट लिमिटेड कंपनियों के यहां इनकी दाल नहीं गलती। हर साल हजारों लाखों इंजीनियर, एम. बी. ए., पोस्ट ग्रैजुएट, बी. एड. पैसों के बदले उपाधियां जुगाड नौकरियों के लिए धक्के खाते दिख जाते हैं। क्या यह सब हमारी शिक्षा प्रणाली का दोष नहीं है ? क्या शिक्षा को तमाशा बनाने वाले तथाकथित शिक्षा विदों से इस बेकारी का जवाब मांगा जाता है ?  क्या हर साल इस पर प्रयोग करने वालों ने कभी देश के भविष्य के बारे में सोचा है ? जवाब एक ही है, नहीं !!! और सोचेगा भी कौन जबकि दुधारू गाय बन गया है यह शिक्षा का व्यवसाय और अधिकाँश संस्थान खुद नेताओं द्वारा स्थापित किए गए हैं।  इसीलिए अधिकांश फैसले देश को नहीं अपनी कुर्सी को मद्दे-नज़र रख किए जाते हैं। आज अंग्रेजी के फैशन के चलते न तो कोई ढंग से हिंदी बोल-लिख पाता है ना ही अंग्रेजी। सरकार को भी साक्षर की परिभाषा बदलने की जरूरत है।देखा जाए तो क्या फर्क है अंगूठा लगाने और सिर्फ तीन-चार अक्षरों का नाम लिख लेने में, जबकि अपने हस्ताक्षर करने वाले को यही मालुम न हो कि वह जिस कागज़ पर अक्षर जोड़-जोड़ कर अपना नाम लिख रहा है उसका मजमून क्या है। आज छात्रों को College और Collage या Principal और Principle में फर्क नहीं पता। अंग्रेजी को तो छोड़ें हिंदी तक में स्नातक स्तर के छात्र ढंग से एक प्रार्थना-पत्र तक नहीं लिख पाते। 

विडंबना है कि शिक्षित करने का जिम्मा इनका रहेगा 
सिर्फ अपना नाम लिख लेने से ही कोई साक्षर नहीं हो जाता, जैसा दिखा-दिखा कर कर सरकारी महकमे अपनी पीठ थपथपाते रहते हैं।
कहावत है कि नींव मजबूत होने पर ही इमारत बुलंद हो सकती है. पर जहां नींव ही हवा में हो वहां क्या आशा की जा सकती है? यही कारण है कि तरह-तरह के प्रलोभन दे बच्चों को हांक कर स्कूल तो ले आया जाता है पर जैसे-जैसे ऊंची कक्षाएं सामने आती हैं बच्चों की संख्या नीची होती जाती है. साथ दिए दोनों पत्र आज के स्नातक और भावी शिक्षकों की पोल खोल रहे हैं।   

इसका हल तो तभी निकल सकता है जब शिक्षा विभाग की बाग़-डोर राजनयिकों के हाथ से निकाल कर शिक्षा के सही जानकारों को सौंप दी जाए और उन पर किसी लाल-पीले-नीले फीते की बंदिश न हो।  नहीं तो आने वाले समय में इस देश में इतने पढ़े-लिखे अनपढ़ हो जाएंगे जो अपने आप  में ही एक समस्या होंगे।   

शुक्रवार, 12 सितंबर 2014

सिर्फ पीसा की मीनार ही झुकी हुई नहीं है




पीसा के अलावा दसियों ऐसी इमारतें हैं जो सीधी न हो कर किसी एक तरफ झुकी हुई हैं। वे पीसा जितनी ना सही पर अपने आप में अजूबा जरूर हैं। अपने देश में भी है एक अनोखा शिव मंदिर। यह  विश्व का अकेला  मंदिर है जो एक तरफ झुका हुआ है।  

हुमा मंदिर, उड़िसा  
आम धारणा है कि इटली में स्थित पीसा की मीनार ही दुनिया में अकेली झुकी हुई इमारत है। जबकि सच्चाई यह है कि  उसके अलावा भी दर्जनों ऐसे निर्माण हैं जो धरती पर सीधे न खड़े रह पा कर किसी एक ओर झुक गए हैं। इसका कारण चाहे भूकंप हो, चाहे उस स्थान की सतह में कोई गड़बड़ी हो या फिर वातावरण का असर हो।  हालांकि आज की उन्नत तकनीक के कारण उनका संरक्षण असंभव नहीं रह गया है।  अब तो खुद इंजीनियर और वास्तुकार भी इमारतों को अलग रूप देने के लिए उन्हें टेढ़ा-मेढ़ा, चक्राकार या झुका हुआ रूप देने लगे हैं। पीसा के अलावा दसियों ऐसी इमारतें हैं जो सीधी न हो कर किसी एक तरफ झुकी हुई हैं। वे पीसा जितनी ना सही पर अपने आप में अजूबा जरूर हैं।                      

हमारे अपने देश में भी इस तरह की एक इमारत है। जो ओडिसा राज्य के संबलपुर जिले से 23 की.
मंदिर में बिंबलेश्वर महादेव 
मी. दूर गांव हुमा में महानदी के किनारे स्थित है। यह एक शिव मंदिर है जहां शिव जी का विम्बलेश्वर रूप स्थापित है। यह मंदिर एक  200 x 120 फिट के चबूतरे पर बना हुआ है। वर्षों पहले इसने अपनी नींव से उत्तर-पूर्व की और बहने वाली नदी की ओर  झुकना शुरू किया था पर आश्चर्यजनक रूप से पिछले पचास सालों से यह स्थिर बना हुआ है। इसका झुकना और थमना अभी भी एक रहस्य बना हुआ है।  सबसे चमत्कृत करने वाली बात यह है कि उस परिसर की चीज झुकी हुई अवस्था में है पर जिधर मंदिर झुका है उसकी विपरीत दिशा में। फिर वह चाहे छोटे मंदिर हों या फिर चारदीवारी। यहां दूर-दूर से लोग आते हैं और मार्च के महीने में शिव-रात्रि पर भव्य मेला भी लगता है।   

   
 ऐसी ही एक ईंटों से बनी मीनार है, रूस के कजान शहर में वोल्गा नदी के तट के पास जो पीसा की मीनार से भी दो मीटर ऊंची है। इसे Soyembika  मीनार के नाम से जाना जाता है। छह मंजिला, 58 मीटर ऊंची यह इमारत करीब  1. 87 मीटर झुकी हुई है।  समय के साथ कमजोर होती इस मीनार की नींव में पंपों के जरिए कंक्रीट भर कर इसे मजबूती प्रदान की गयी, जिससे इसके गिरने का खतरा टल गया। इसको रूसी जार इवान द टेरीबल ने अपनी प्रेमिका के लिए जल्दबाजी में तैयार करवाया था।     
 रूस के ही NEVYANSK शहर में एक ऎसी इमारत है जो अपनी नींव से दाहिनी तरफ करीब सात फुट तक झुकी हुई है। 57. 6 मीटर ऊंची, सैंकड़ों टन के वजन वाली इस मीनार के झुकने का कारण इसके नीचे स्थित जल-परवाह को माना जाता है जिसके कारण इसकी नींव का छरण होने की वजह से यह एक और को झुक गयी। समय रहते इसको बचाने के प्रयासों के कारण इसे संरक्षित करना संभव हो पाया।  इसे किस लिए बनाया गया था इसके बारे में तरह-तरह की अटकलें प्रचलित हैं। कोई इसे  "वाच टॉवर" और कोई  कैदखाना बताता है। जो भी हो यह है अपने आप में  एक नमूना है।  

झुकी हुई इमारतों की श्रेणी में सर्वोपरि है जर्मनी का एक चर्च जिसे  Suurhusen Tower के नाम से जाना जाता है।  गिनीज रेकार्ड के अनुसार तेरहवीं शताब्दी में बनी यह विश्व की सबसे ज्यादा झुकी हुई, 90 फिट ऊंची इमारत है जो अपनी नींव से करीब 5.19 डिग्री का कोण बना चुकी है। इसकी नींव लकड़ी से बनाई गयी थी जो जमीन की नम मिट्टी के कारण अपने भार को संतुलित न कर पाई और एक ओर झुकती चली गयी।  पर स्थानीय निवासियों और इंजीनियरों की मेहनत से आज यह चर्च सर उठाए खड़ा  है।    

ऐसी कई इमारतें और मीनारें हैं जो इस तरह की अवस्था में सैलानियों को आकर्षित करती हैं पर उतनी विख्यात नहीं हैं जितनी पीसा की झुकी मीनार। उनकी खोज-खबर फिर कभी।    

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

गणेश जी को भेजे गए पत्रों को पहुंचाने के लिए नियुक्त है एक डाकिया

जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। 

हमारे देश में लोगों में सर्वोच्च सत्ता के प्रति जितनी आस्था है, विश्वास है, समर्पण है वैसा शायद और किसी देश में नहीं होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि हमारे दूरदर्शी विद्वान पूर्वजों ने शायद आने वाली नस्लों की उच्श्रृंखलता का अंदाज लगा लिया होगा इसीलिए प्रकृति और मानवता को बचाने के लिए उन्होंने उसी समय से तरह-तरह के उपायों की घुट्टी किस्से-कहानियों, उपदेशों व शिक्षा के जरिए पिलानी शुरू कर दी
त्रिनेत्र गणेश 
थी। उसी का परिणाम है की आज हम पशु-पक्षियों में, पेड़-पौधों में, नदी-समुद्र में, यहां तक कि  चित्रों-मूर्तियों में भी प्रभू की मौजूदगी को मानते हैं। अपने दुःख-सुख में उन्हें भागीदार बनाते हैं। हर तरफ से निराश-हताश हो जाने पर या किसी अनहोनी से सुरक्षा पाने के लिए उनकी शरण में शांति की गुहार लगाते हैं। हमारे इतने विशाल देश में जितनी तरह की संस्कृतियां, रस्मो-रिवाज तथा मान्यताएं हैं, उतनी ही तरह की उन्हें पूरा करने और मनाने की विधियां और आस्थाएं हैं। ऐसी ही एक अनोखी और अनूठी परंपरा है, राजस्थान के रणथम्भोर किले में स्थित श्री गणेश जी को विवाहोत्सव पर पहला निमंत्रण देने की। फिर वह चाहे खुद जा कर दिया जाए या फिर पत्र द्वारा। खुद उपस्थित हो कर हजारों श्रद्धालू अपना प्रेम तो प्रगट करते ही हैं पर यह शायद दुनिया का अकेला मंदिर है जहां देश और दुनिया भर से रोज हजारों की संख्या में गणेश जी को निमंत्रण देने के लिए डाक से पत्र भी आते हैं और यह सिलसिला सालों-साल से चला आ रहा है। इन पत्रों को गणेश जी तक पहुंचाने के लिए भारतीय डाक विभाग ने अलग से एक डाकिया नियुक्त किया हुआ है जो रोज तकरीबन दस किलो भार के निमंत्रण पत्र मंदिर तक पहुंचाता है। मंदिर में पहुंचते ही यदि पत्र हिंदी या अंग्रेजी में हो तो पुजारी जी उसे खुद पढ़ कर गणेश जी को सुनाते हैं पर यदि किसी और भाषा में पत्र लिखा गया हो तो उसे खोल कर गणेश जी के सामने रख दिया जाता है।  ऐसी मान्यता है कि गणेश जी को निमंत्रित करने से विवाह बिना किसी विघ्न के पूर्ण हो जाता है।  
गणेश मंदिर, रणथम्भोर 


ऐसी परंपरा क्यों शुरू हुई उसकी एक कथा है। कहते हैं जब श्री कृष्ण जी और रुक्मणी का विवाह निश्चित हुआ तो भूल-वश गणेश जी को निमंत्रण नहीं भेजा जा सका। इससे उनके वाहन मूषक को क्रोध आ गया और मूषक सेना ने बारात के पूरे रास्ते को ऐसा काट-कुतर दिया कि उस पर चलना असंभव हो गया। इस विघ्न को दूर करने के लिए विघ्न-हर्ता से प्रार्थना की गयी और उन्हें प्रसन्न करने के पश्चात ही विवाह संपन्न हो पाया। कहते हैं तब से गणेश जी को पहला निमंत्रण भेजने की यह प्रथा चली आ रही है।

रोज आने वाले इन हजारों लाखों पत्रों का क्या किया जाए यह भी एक विचारणीय प्रश्न था मंदिर की समिति के सामने।  उन्हें ऐसे ही नष्ट नहीं किया जा सकता था, हजारों-लाखों लोगों की आस्था जुड़ी हुई थी उन पत्रों से। फिर इसका उपाय निकाला गया।  साल भर तक तो उन पत्रों को संजो कर रखा जाता है फिर उनकी लुग्दी बना विभिन्न क्रियाओं से गुजार कर फिर कागज़ बना लिया जाता है। 

दर्शन करने और निमंत्रण देने आए भक्त 
गणेश जी का यह प्राचीन मंदिर सवाई माधोपुर से बारह कि. मी. दूर रणथम्भोर के किले में स्थित है। कहते हैं कि 1299 में राजा हम्मीर और अल्लाउद्दीन ख़िलजी में जब युद्ध शुरू हुआ तो हम्मीर ने प्रजा और सेना की जरूरतों को देखते हुए ढेर सा खाद्यान और जरूरत की वस्तुओं को सुरक्षित रखवा लिया था।  पर युद्ध लंबे अरसे तक खिच जाने की वजह से हर चीज की तंगी होने लगी थी।  राजा, जो गणेश जी का भक्त था,  हताश और परेशान हो उठा। तभी रात को उसे स्वप्न में गणेश जी ने दर्शन दे कहा कि चिंता मत करो कल युद्ध समाप्त हो जाएगा।  दूसरे दिन सुबह गणेश जी की एक तीन नेत्रों वाली आकृति किले की दिवार पर उभर आई और आश्चर्य जनक रूप से  उसी समय युद्ध भी समाप्त हो गया, जब ख़िलजी की सेना अपनी घेराबंदी ख़त्म कर वापस लौट गयी। राज्य फिर से धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। हम्मीर ने 1300 में भगवान गणेश के इस मंदिर का निर्माण करवाया। जिसमें गणेश जी के अलावा उनकी पत्नियों ऋद्धि-सिद्धि तथा
उनके पुत्रों शुभ-लाभ के साथ-साथ उनके वाहन मूषक की भी प्रतिमा स्थापित की गयी है।

यहां जाने के लिए देश के हर हिस्से से सुविधा उपलब्ध है। उसके लिए सवाई माधोपुर पहुँचना होता है। जहां के लिए रेल सुविधा के अलावा बढ़िया सड़क मार्ग भी उपलब्ध है। यहां से रणथम्भोर की दूरी सिर्फ ग्यारह कि. मी. की है। इसके अलावा कोटा से भी आसानी से यहां जाया जा सकता है।         

गुरुवार, 28 अगस्त 2014

क्या आँखों देखा सदा सच होता है ?

सदा से धारणा रही है की कानों सुनी पर विश्वास नहीं करना चाहिए, जब तक कि आँखों से देख नहीं लिया जाए. पर क्या आँखें सदा सच दिखलाती हैं ?  नीचे दिए चित्र तो कुछ और ही बताते हैं :-

लगता नहीं कि मोहतरमा जादुई कालीन पर खड़े हो भाषण दे रही हैं ? 


ये क्या ?  इतना धुँआ वह भी मूर्ती के बिगुल से ?

गजब! मुंह से इन्द्रधनुष 



ये कौन है भाई ? अर्द्ध घोडीश्वर 
तो अब क्या विचार है ?  

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