शनिवार, 7 जून 2014

लो कर लो बात :-)


बेटे की नौकरी चेन्नई मे लग गयी। अच्छी पगार थी, सो उसने पांच हजार की एक साडी माँ के लिये ले ली। पर 
 वह माँ का स्वभाव जानता था, सो उसने साडी के साथ एक पत्र भी भेज दिया कि पहली पगार से यह साडी भेज रहा हूं, दिखने में मंहगी है पर सिर्फ़ दो हजार की है, कैसी लगी बतलाना। अगले हफ़्ते ही माँ का फोन आ गया, बेटा खुश रहो। साडी बहुत ही अच्छी थी। मैने उसे तीन हजार में बेच दिया है, तुरंत वैसी दस साडियां और भिजवा दे, अच्छी मांग है।

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शिक्षक दिवस पर दिल्ली में बच्चों को हवाई यात्रा का आंनद दिलाने के लिए सरकार ने हेलिकाप्टर मुहैया करवाया। एक बार में दो बच्चे और एक शिक्षक को घूमाने का इंतजाम था। अभी कुछ ही ट्रिप लगी थीं कि एक स्थानीय नेताजी भी पहुंच गये और उन्होंने भी घूमने की इच्छा जाहिर की। मजबूरीवश एक बच्चे को हटा उनका इंतजाम किया गया। पर इस बार हेलिकाप्टर के उडते ही उसमे खराबी आ गयी। पायलट ने बताया कि सिर्फ़ तीन ही पैराशूट हैं, चूंकी सरकार को मेरी बहुत जरूरत है सो मैं एक ले कर कूदता हूं और वह कूद गया। इधर नेताजी बोले कि देश को मेरी बहुत जरूरत है सो एक मुझे चाहिए यह कह कर उन्होंने आव देखा ना ताव वे भी यह जा वह जा। ऐसी मुसीबत में भी शिक्षक ने अपनी मर्यादा कायम रक्खी और बच्चे से कहा, बेटा, मैंने तो अपनी जिंदगी जी ली। तुम देश का भविष्य हो तुम बाकी बचा पैराशूट ले कर कूद जाओ। बच्चे ने जवाब दिया नहीं सर हम दोनों ही कूदेंगें। शिक्षक बोले कैसे। तो छात्र ने बताया कि नेताजी मेरा स्कूल बैग ले कर कूद गये हैं।

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बाढ़ग्रस्त इलाके में तैनात कर्मचारियों से वायूसेना ने पूछा कि लोगों को निकालने के लिये कितनी ट्रिप लगेंगी। जवाब दिया गया कि तीस-एक ट्रिप में गांव खाली हो जायेगा। बचाव अभियान शुरु हो गया। एक-दो-तीन-पांच-दस-बीस, पचास फेरे लगने के बाद भी लोग नज़र आते रहे, तो सेना ने पुछा कि आपने तीस फेरों की बात कही थी यहां तो पचास फेरों के बाद भी लोग बचे हुए हैं ऐसा कैसे। नीचे से आवाज आयी कि सर, गांव वाले पहली बार हेलिकॉप्टर  में बैठे हैं तो जैसे ही उन्हें बचाव क्षेत्र में छोड़ कर आते हैं, वे फिर तैर कर वापस यहीं पहुंच जाते हैं।

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नमस्ते सर, मैं आपका पियानो ठीक करने आया हूं। पर मैने तो आप को नहीं बुलवाया। नहीं सर, आपके
पडोसियों ने मुझे बुलवाया है।

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अरे भाई, ये सेव कैसे दिये। सर साठ रुपये किलो। पर वह तुम्हारा सामने वाला तो पचास में दे रहा है। तो सर उसीसे ले लिजीए। ले तो लेता पर उसके पास खत्म हो गये हैं। सर जब मेरे पास खत्म हो जाते हैं तो मैं भी पचास में देता हूं ।




बुधवार, 4 जून 2014

मोर, प्रकृति की अद्भुत रचना

अभी एक-दो दिन पहले नजफगढ़ के पास जाना हुआ तो वहाँ एक जगह पेड़ों के झुण्ड में चार-पांच मोर दिखाई पड़े। गरमी से बेहाल जरूर थे पर सुंदरता में किसी भी तरह की कोई कमी नहीं थी। आकर्षण जैसे आँखों को बाँधे लिए जा रहा था. नजरें हटने का नाम ही नहीं ले रहीं थीं. इसे राष्ट्रीय पक्षी का खिताब यूँही नहीं मिल गया, उसका सच्चा हकदार था यह. प्रकृति ने दिल खोल कर अपने रंगों का उपयोग किया है इस पर. किसी तरह उनके मोहपाश से शरीर को मुक्त कर वहाँ से चले पर दिमाग और मन जैसे उन्हीं में उलझ कर रह गया. 
वापस आ मोर के बारे में और जानकारियां हासिल करने के लिए अंतरजाल का सहारा लिया, जिसने बताया कि इस अद्भुत पक्षी का सबसे बड़ा बसेरा मध्य-प्रदेश का मुरैना जिला है. जिसका नाम ही मोरों के कारण पड़ा है। मोर+रैना, यानी जहां मोरों का निवास हो. वह भी शायद अपने देश में सबसे अधिक. 2001 के सर्वे में इनकी गिनती 150000 के ऊपर पायी गयी थी। इसकी एक प्रजाती सफेद रंग की भी होती है, जिसे श्री लंका  निवासी माना जाता है.   
मोर या मयूर, जैसा कि इसे संस्कृत में पुकारा जाता है, का हमारी संस्कृति से सदियों पुराना साथ रहा है. शायद ही ऐसा कोई ग्रंथ हो जिसमें इसका उल्लेख न किया गया हो. नख-शिख (पैरों को छोड़ दें तो) तक सुंदरता का स्वामी ऋषि-मुनियों-देव-गंधर्व-असुर-मनुष्य सब का चाहता रहा है. इसकी पूंछ पर बनी आँखों जैसी आकृति के कारण इसे हजार आँखों वाला पक्षी भी कहा जाता है.
इसके कोमल-चमकीले, रत्नों जैसी आभा वाले पंख किसी का भी मन मोह लेने केलिए कॅाफी हैं. हालांकि इसके कलाप गिराने के बाद फिर उग आते हैं फिर भी यही सुन्दरता इसकी जान की दुश्मन भी बन जाती है.  इसकी पूंछ के पंखों को उत्तम और पवित्र माना जाता है इसीलिए  हर धर्म के क्रिया-कलापों में उसका उपयोग सदियों से किया जाता रहा है.      

करीब-करीब सर्वभक्क्षी मोरों में नर मोर ही सुंदर होता है मादा बहुत साधारण सी होती है. जिसे रिझाने के लिए ख़ास कर सावन के समय  नर अपनी पूंछ के पंखों को फैला कर  दुनिया के अद्भुत नृत्यों में से एक को अंजाम देता है,पर उसी अनुपम दृश्य के कारण उसकी जान पर भी बन आती है. 1963 में देश का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किए जाने के बाद 1972 से इसके शिकार पर पूरी तरह से रोक लगा दी गयी थी. जिससे प्रभू की इस अनुपम कृति को बचाया जा सके. फिर भी मनुष्य के लालच की वजह से इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पायी है.           

मंगलवार, 3 जून 2014

आंधी ने दिल्ली वासियों की झंड कर दी.

शाम पांच बजे की हालत

पिछले शुक्रवार को एक अजीब से नाम की फ़िल्म आई, "कुक्कु माथुर की झंड हो गयी." अब उस फ़िल्म का या कुक्कु का क्या हुआ पता नहीं पर उसी दिन शाम को एक प्रचंड आंधी ने दिल्ली वासियों की झंड जरूर कर दी. शाम पांच बजे ही अन्धेरा छा गया. 

रहवासियों की हवा बंद कर हवा तो गुजर गयी पर सवा घंटे के उस प्राकृतिक प्रकोप ने सब उथल-पुथल कर दिया। ख़ासकर दक्षिणी-पश्चिमी दिल्ली वालों की तो नींद हराम हो गयी. चार रातों तक बिजली की आँख-मिचौली को देखते-झेलते रहे सब. बीच-बीच में 15-30 मिनटों के लिए झलक दिखलाती भी थी तो ठीक वैसे ही असर होता था जैसे तपते तंदूर पर डोसा बनाने वाले तवे पर पानी छिड़कने का होता है। 

बचाव की जद्दोजहद 
जितने भी सुविधा प्रदान करने वाले उपकरण थे सब मुंह बाए हाथ खड़े किए पड़े थे। बच्चे, बुजुर्ग और रुग्ण लोगों के लिए तो यह आफत प्रलयंकारी थी। काम पर जाने वालों की और भी मुसीबत थी, नींद पूरी न होने की वजह से ज्यादातर लोग अस्वस्थता महसूस कर रहे थे। पर कल रात के करीब दो बजे से हालात कुछ ठीक लगने लगे हैं, हालांकि अभी भी संशय बना हुआ है कि कहीं फिर यह गायब न हो जाए. फिर भी गाड़ी को जल्दी पटरी पर लाने के लिए बिजली-कर्मी साधूवाद के पात्र हैं, नहीं तो अखबारों में तो एक हफ्ते भर का समय और लगने की बात कही गयी थी.

ये तो आधुनिक तकनिकी का कमाल है कि मौसम के आने और होने वाले तेवरों का पहले ही पता चल जाता है. इसके बावजूद इस आफत से कईयों की जान गयी और काफी नुक्सान भी हुआ. पर यदि ऐसी आफतों का पहले पता न चले तो उसका अंजाम सोच कर ही दिमाग की झंड हो जाती है।

शुक्रवार, 30 मई 2014

रेलें असमाजिक तत्वों की सैर-गाह हो गयी हैं

जैसे ही रात गहराती है, दिन भर का थका यात्री जब रात के ग्यारह-बारह बजते-बजते सोने की तैयारी करता है तभी डिब्बे की सारी बत्तियां बंद कर दी जाती हैं और अँधेरे में शुरू हो जाता है  कुछ लोगों का अपना काला धंदा। अभी तो कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब बाकायदा टिकट लेकर चोरी को अंजाम देने की कोशिश की जाती रही है.

गाड़ियां ही गाड़ियां 
मोदी जी ने आते ही देश में बुलेट ट्रेन चलाने की अपनी  इच्छा जाहिर की थी।  अच्छी बात है सफर में समय कम लगेगा, काम जल्द निपटेंगे, लोगों के समय की बचत होगी, तरक्की में इजाफा होगा, देश उन विकसित राष्ट्रों की श्रेणी में आ जाएगा, जहां ऐसी तीव्रगामी ट्रेंने दौड़ती हैं।  पर उसके पहले जो गाड़ियां बदहाल अवस्था में जर्जर पटरियों पर चल रही हैं उनके सुधार के बारे में भी सोचना बहुत जरूरी है।  

हजारों करोड़ों के बजट के इस विभाग को सरकार भी निजी हाथों में नहीं देना चाहती। आमदनी के मामले में हमारी रेल कामधेनु के बराबर है।  दसियों सालों से देखा जा रहा है कि मिली-जुली सरकारें बनने पर इस विभाग को हथियाने के लिए तनातनी जरूर होती है।  सभी मलाई खाना चाहते हैं. पर इसकी बदहाली पर कोई ध्यान नहीं देता. दूध दुहने पर सब उतारू रहते हैं पर चारा देते समय पैसे का रोना ले बैठ जाते हैं. आज हाल यह है कि जिन गिनी-चुनी गाड़ियों पर रेल विभाग गर्व करता है वे भी बदहाली का शिकार हैं. फिर चाहे वो राजधानी एक्स. हो या फिर जन-शताब्दी, उनके डिब्बों के बाहरी और अंदरूनी हालात सोचनीय अवस्था को प्राप्त हो चुके हैं.   

बदहाल हालत 
आज रेल गाड़ियां में तरह-तरह के गैर-कानूनी कार्यों को असामाजिक तत्वों द्वारा अंजाम दिया जा रहा है। एक-दो उच्च श्रेणियों को छोड़ दिया जाए, तो अधिकतर में यात्री आशंकित हो कर ही यात्रा करते हैं. शायद ही कोई
दिन ऐसा जाता हो जब ऎसी खबर न मिलती हो की फलानी गाड़ी में फलाना घटना घट गयी।  शायद ही कोई ऐसा खुशनसीब हो जो सफर पूरा होने के बाद यात्रा को याद रखना चाहता हो।

आज ऐसा कौन सा दुष्कर्म नहीं है जो रात के अँधेरे में दौड़ती इन दूरगामी गाड़ी रूपी बस्तियों में नहीं होता. देह व्यापार से लेकर स्मगलिंग, उठाईगिरी, झपट-मारी, नशीले पदार्थों की उपलब्धी, आरक्षण के बावजूद लोगों की रेल-पेल, क्या कुछ नहीं झेल रहे यात्रा करते यात्री। जैसे ही रात गहराती है, दिन भर का थका यात्री जब रात के ग्यारह-बारह बजते-बजते सोने की तैयारी करता है तभी डिब्बे की सारी बत्तियां बंद कर दी जाती हैं और अँधेरे में शुरू हो जाता है  कुछ लोगों का अपना काला धंदा। अभी तो कुछ ऐसे मामले भी सामने आए हैं जब बाकायदा टिकट लेकर चोरी को अंजाम देने की कोशिश की जाती रही है.  


जर्जरावस्था 
सबसे बुरा हाल स्लीपर श्रेणी का होता है। हालांकि गाहे-बगाहे किसी-किसी गाड़ी में पुलिस की गस्त होती है पर उसका होना न होने के बराबर ही होता है.  कहने को तो टिकट चेकर पर सारी जिम्मेदारी होती है लोगों की सुरक्षित यात्रा की पर सीटों का हिसाब पूरा हो जाने के बाद वह शायद ही कभी नजर आता हो. रात भर लोग चढ़ते-उतरते रहते हैं. कोई कहीं भी जगह देख-खोज अपनी रात काटने का इंतजाम कर लेता है. रात के अँधेरे में कौन यात्री है कौन उठाईगीर कोई कैसे पता कर सकता है. उधर सुबह भी कहाँ चैन मिलता है. लोगों का रेला, ख़ास कर रेल-कर्मियों का हुजूम, जो रेल को घर की संपत्ति समझता है और यात्रियों को मुफ्तखोर, जहां मन आए मुंह उठा कर किसी की तकलीफ को न समझते हुए घुसा चला जाता  है, कोई पैसे देकर भी तकलीफ सहे उनकी बला से. तो सबसे पहले तो सरकार को यात्रियों की सुरक्षा और पैसे के बदले पूरी सहूलियत देने का सुदृढ़ इंतजाम करना चाहिए. रेल-कर्मियों के लिए कुछ अलग इंतजामात होने चाहिए.  यात्री अपने माल-असबाब की चिंता में रात को जागते रहने के लिए मजबूर न हो. टिकट चेकर महोदय अपनी निर्धारित जगह पर उपलब्ध रहें न कि खाना पूर्ती होते ही वातानुकूलित श्रेणी में जा सोने के. 
किसी भी तरह गंत्वय तक पहुँचाने की मजबूरी 

आज भी रेल, यात्रा का सबसे सस्ता साधन है और लाख मुसीबतों के बावजूद लोगों के लिए इसमें सफर करने के अलावा कोई और बेहतर विकल्प उपलब्ध नहीं हैं.  शायद ही कोई ऐसा इंसान हो जिसने अपने जीवन में इस सुविधा का लाभ न उठाया हो. पर इसमे यात्रा करने की सोचते ही आम आदमी को तरह-तरह के बखेड़ों का सामना करने के लिए मजबूर होना पड़ जाता है, फिर चाहे वो टिकट का इंतजाम हो, चाहे जगह के लिए मारा-मारी करनी पड़ती हो, चाहे यात्रा के दौरान सुरक्षा और खाने-पीने के इंतजामात की हो, कुछ भी हो आम आदमी की मजबूरी है  इसमे अपने गंत्वय तक जाने के लिए इसके उपयोग की. सो पहले मौजूदा गाड़ियों को सुरक्षित करना पहला लक्ष्य होना चाहिए।
    

शनिवार, 24 मई 2014

गुरु तो गुरु ही होता है

"गुरू ने अपनी सात फिट की म्यान से तीन फिट की तलवार निकाल शिष्य की गरदन पर रख दी "


पूराने समय में शिष्य आश्रमों में रह कर शिक्षा ग्रहण किया करते थे। गुरू भी अपनी समस्त विद्याएं अपने होनहार विद्यार्थियों को सौंप उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर होने का पथप्रदर्शित कर संतोष का अनुभव करते थे। समय के साथ-साथ गुरू शिष्य के रिश्ते भी बदलते गये। कुछ "होनहार" अपने को गुरू से भी ज्यादा अक्लमंद समझने लग गये। आज कल तो ऐसे ही चेलों का बोलबाला है।  ऐसे ही एक शिष्य की यह कहानी है।

एक मठ में एक बहुत ही योग्य गुरूजी पूरे तन-मन से अपने शिष्यों को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दिया करते थे। उनके यहां से शिक्षा प्राप्त युवकों को अनेक राज्यों में अच्छे पद प्राप्त हो जाते थे। उन्हीं के यहां सोमदत्त नाम का युवक शिक्षा ग्रहण किया करता था। वह काफी होनहार तथा मेधावी युवक था। गुरूजी भी उस पर विशेष ध्यान दिया करते थे। अपने लगाव के चलते उन्होंने उसे सर्वगुण संम्पन्न बना दिया। अब वह किसी भी तरह अपने गुरू से कम नहीं था। धीरे-धीरे उसमें घमंड ने स्थान बना लिया। उसे लगने लगा कि उम्र की ढलान पर खड़े गुरू से वह कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है। लोग नाहक ही गुरू को सम्मान देते हैं। इसी द्वेष के मारे उसने अपने गुरू को द्वंद युद्ध की चुन्नौती दे दी। गुरूजी ने इस चुन्नौती को स्वीकार कर एक महीने बाद का दिन निश्चित कर दिया।                           

सोमदत्त ने अपने गुरू को ललकार तो दिया था पर उसके मन के किसी कोने में यह डर था कि शायद गुरू ने उसे सारे दांव ना सिखाये हों, इसीलिये वह छिप कर एक दिन अपने गुरू को अभ्यास करते देखने आया। उसने पाया कि उसके गुरू सात फुट की तलवार से अभ्यास कर रहे हैं। यह देख उसने भी वापस आ सात फुट की तलवार से अभ्यास करना शुरू कर दिया। निश्चित दिन अपार जन समुह के बीच दोनो योद्धा अपने अस्त्रों के साथ मैदान में उतरे। दोनों के हाथों में सात-सात फुट की म्यानें थीं। डंके पर चोट पड़ते ही सोमदत्त ने अपनी सात फुटी तलवार निकालने की कोशिश की, पर तब तक गुरूजी ने अपनी सात फुट की म्यान से तीन फुट की तलवार निकाल सोमदत्त की गरदन पर टिका दी। गुरूजी की जयजयकार होने लगी। सोमदत्त शर्मिंदगी से जैसे भूमी में गड़ा जा रहा था।

रविवार, 27 अप्रैल 2014

धर्मतल्ला के सिनेमाघर

उस समय कलकत्ते में लगभग सौ सिनेमा हॉल थे।  इलाके के हिसाब से उनमें फिल्मेँ लगा करती थीं। बहुत कम ऐसा होता था कि ये हॉल चली आ रही परंपरा को छोड़ किसी दूसरी भाषा की फिल्म लगा लेँ। जैसे श्याम बाजार के इलाके में एक-दो   (दर्पणा,  मित्रा और  टाकी शो हाउस) को छोड़ कर सब में बांग्ला भाषा की फिल्में ही लगा करती थीं।  धर्मतल्ला में भी हिंदी और अंग्रेजी फिल्मोँ के बंधे-बधाए हॉल हुआ करते थे।

बंगाल का दिल कोलकाता और कोलकाता की जान धर्मतल्ला, जिसे चौरंगी और एस्प्लेनेड के नाम से भी जाना जाता है। इस जगह से मेरी अनगिनत यादें जुडी हुई हैं. जिनमे ज्यादातर सिनेमा से संबंधित हैं। स्कूल से कालेज और फिर नौकरी, इस सफर में और इसके बाद भी कभी किसी व्यसन की लत नहीं पङी पर सिनेमा जरूर एक शौक रहा। इसीलिए मौका मिलते ही सिनेमा का चौका लग जाता था। इस चौके में किसी तरह का भेद-भाव नहीं था, फिल्म हिंदी की हो अँग्रेज़ी की या बंगला भाषा की सब अपने को प्रिय थीं। उन दिनों फिल्म जगत के दिग्गज निर्माता-निर्देशक सक्रीय भी थे। वैसे यह शौक मुझे विरासत में मिला था।  :-) 

पहली-पहली नौकरी का स्वाद उस समय के कलकत्ते के पास आगरपाड़ा और सोदपुर कस्बों के बीच स्थित कमरहट्टी नाम की जगह में कमरहट्टी जूट मिल मे चखने को मिला. यहां से धर्मतल्ला पहुँचने में मुश्किल से 45 - 50 मिनट लगते थे। पांच बजे अवकाश मिलते ही जरा सा फ्रेश हो टैक्सी या बस जो भी मिले ले कर हॉल मे हाजीरी लग जाती थी. कब  कहाँ जाना है ये तो पहले से ही तय रहता ही था। 

उस समय सिंगल स्क्रीन सिनेमा घर ही हुआ करते थे. जिनमें कईयों की  क्षमता हजार से ऊपर दर्शकों को समोने की थी। उस पर भी छुट्टियों के दिन या किसी ख्यातनाम हीरो की फिल्म लगने पर पांच-सात रुपये की टिकट पचास-साठ रुपये मे मिलनी मुश्किल होती थी। ज्यादातर अपरान्ह 3, 6, 9 बजे से शो शुरू होते थे। हिंदी फिल्मों के पहले डॉक्यूमेंटरी या न्यूज-रील दिखाने का चलन था और इंग्लिश पिक्चर उन दिनों इंटरवल के बाद शुरु होती थीं इस काऱण अपन कभी क्लास में लेट नहीं होते थे। वैसे तो उस समय कलकत्ते में लगभग सौ सिनेमा हॉल थे।  इलाके के हिसाब से उनमें फिल्मेँ लगा करती थीं। बहुत कम ऐसा होता था कि ये हॉल चली आ रही परंपरा को छोड़ किसी दूसरी भाषा की फिल्म लगा लेँ। जैसे श्याम बाजार के इलाके में एक-दो (दर्पणा, मित्रा और टाकी शो हाउस) को छोड़ कर सब में बांग्ला भाषा की फिल्में ही लगती थीं.  धर्मतल्ला में भी हिंदी और अंग्रेजी फिल्मोँ के बंधे-बधाए हॉल हुआ करते थे।  

धर्मतल्ला तो जैसे पिक्चर हॉल का ग़ढ़ हुआ करता था. वहाँ डेढ़-दो किलोमीटर के दायरे में सब मिला कर करीब 17-18 सिनेमा हॉल थे. जिनमें मेट्रो, लाइट-हाउस, न्यू एंपायर, एलिट, ग्लोब, टायगर, मिनर्वा, चैप्लिन इँग्लिश फिल्मों और ज्योति, हिंद, पैराडाइज, ओरिएंट, रॉक्सी, सोसायटी, जनता, लोटस, न्युसिनेमा, ओपरा आदि हिंदी फ़िल्में दर्शकों को मुहैय्या करवाते थे। इनमें कुछ ऐसे हॉल थे जो अपनी विशेषताओं के काऱण दर्शकोँ मेँ कुछ ज्यादा लोक-प्रिय थे।         

मेट्रो :-  चौरंगी के बीचो-बीच स्थित एक बेहतरीन सिनेमा घर. इस की कई खासियतें थीं. इसकी कुर्सियां इतनी आरामदेह थीं कि वे सोफे को भी मात देती थीं। हॉल में प्रवेश द्वार से अंदर जाने पर सीटों की कतार शुरु होने के पहले करीब 50x8 फिट की जगह खाली रहती थी, जिससे फिल्म शुरु होने के बाद आने वालों को मार्ग-दर्शक द्वारा स्थान दिखाये जाने के पहले धक्का-मुक्की का सामना नहीं करना पड़ता था। पूरे हॉल में एक इंच मोटा कालीन बिछा होता था, जो आराम का एहसास देने के साथ-साथ पद-चाप की ध्वनि भी नहीं होने देता था।इसके स्क्रीन का काला बॉर्डर जरूरत के हिसाब  छोटा बडा होता रहता था, जो आंखों पर अंधेरे-उजाले के खेल के प्रभाव को कुछ हद तक कम करता था। उसे विज्ञापनों और खबरों पर 35 मी.मी. और सिनेमा स्कोप पर अलग-अलग जरूरत के अनुसार यह फिट किया जाता था.

लाइट हाउस :-  अपने समय के इस सबसे बड़े सिनेमा घर की बनावट बड़ी अनोखी थी. इसका पिछला हिस्सा नीचा था तथा फ्लोर जैसे-जैसे पर्दे की ओर बढ़ता था ऊंचा होता जाता था पर पीछे बैठने वाले को कभी भी सामने की कतार में बैठे दर्शक के सिर से अड़चन नहीँ होती थी।  उन दिनों भी आज जैसी ही व्यवस्था थी कि बिना शो का टिकट लिए कोई किसी हाल का टॉयलेट काम में नहीं ला सकता था।  पर लाइट-हाउस में यह सुविधा थी कि बिना पिक्चर का टिकट लिए भी इसके वाश-रूम का उपयोग किया जा सकता था। इसलिए कई जरुरतमंदों के लिए यह एक वरदान स्वरूप था, खासकर महिलाओँ के लिए। यह ध्यान देने की बात है कि उन दिनों के कलकत्ते में महिलाओं की तो छोड़िए पुरुषों तक के लिए इक्की-दुक्की जगहों को छोड़ टॉयलेट की सुविधा उपलब्ध नहीं थी।

न्यू-अंपायर  :- यह लाइट हाउस का जुड़वां भाई था।  दोनों एक ही कंपनी की मिल्कियत थे।  ये अंदर से भी आपस में जुड़े हुए थे। पर इसका निर्माण थियेटर के आयोजन के लिए किया गया था।  इसलिए इसमे बैठने की व्यवस्था भी सिनेमा हॉल के ठीक विपरीत थी यानी स्टेज के पास आराम दायक सोफे जिनकी टिकट दर  सबसे ज्यादा होती थी और पीछे की सीटों की कम यहां तक कि बालकनी की सबसे कम। इसीलिए इसमें बालकनी की टिकट, आरामदायक कुर्सियों के ना होने पर भी,  पहले बुक हो जाती थी।

ग्लोब 
ग्लोब  :-  न्यूमार्केट के किनारे लिंडसे स्ट्रीट पर स्थित इस हॉल की खासियत इसके स्क्रीन को पुरी तरह ढकने वाला पीले सिल्क का विशाल पर्दा हुआ करता था, जो हर शो की शुरुआत और खात्मे पर संगीत की मधुर ध्वनि के साथ धीरे-धीरे  उठ और गिर कर दर्शकों को मंत्र-नुग्ध कर देता था. इसकी सीटें भी बहुत आरामदायक और सोफेनुमा थीँ।

पैराडाइज   :-  बेंटिक स्ट्रीट पर इंकम-टैक्स की इमारत से लगे हुए इस हॉल में सबसे पहले  "बैक-पुश" कुर्सियां लगी थीं। यह राज कपूर का पसंदीदा हॉल था।  उनकी "जिस देश में गंगा बहती है" तक की सारी फिल्में इसी में रीलीज होती रही थीं।  उसके बाद किसी विवाद के बाद उन्होंने इसके बदले इसी के पास बने ओरिएंट सिनेमा घर को अपनी फिल्में देना आरंभ कर दिया था.

ज्योति 

ज्योति :-  शहर  का या यूं कहें बंगाल का पहला छवि-गृह जिसमें पहली बार 70 मी.मी. का "डीप कर्व्ड" स्क्रीन लगाया गया था।  उस समय यह हॉल अपने पर्दे और ध्वनि सिस्टम के कारण एक अजूबा था लोगों के लिए। सामने परदे के पास वाले दर्शक तो पूरा दृश्य देखने के लिए गरदन ही घुमाते रह जाते थे। इसमें फ़िल्म देखने का असली आनंद ऊपर बालकनी मे बैठ कर ही लिया जा सकता था।  कलकत्ता वासी इसके बड़े पर्दे पर   "शोले" देख  अभिभूत हो गये थे।

रॉक्सी :-  एक बड़ा, भव्य और बेहतरीन सिनेमा-घर।  यही वह हॉल था जिसमें अशोक कुमार की "किस्मत" फिल्म ने लगातार तीन साल चल कर कीर्तिमान बनाया था।

चैप्लिन 
चैप्लिन  :-    मशहूर फनकार चार्ली चैप्लिन को प्रदेश की आदरांजली स्वरूप  शहर  के सबसे पुराने इस हॉल की एक विशेष बात यह भी थी कि अपने जमाने के सुप्रसिद्ध, बंगाली फिल्मों के सर्वमान्य महानायक उत्तम कुमार के पिताश्री यहां प्रोजक्टर आपरेटर का काम संभालते थे। इसकी
 बलि भी काल के हाथों चढ़ चुकी है।

समय बदला उसकी मार से ये बेहतरीन एकल स्क्रीन मनोंरंजन गृह भी अछूते नही रह पाए. अधिकांश को बदल कर मॉल या मल्टीप्लेक्स का रूप दे दिया गया है।  जो बचे भी हैं वे भी अपने वजूद के लिए संघर्ष-रत हैं। किसी ने अपनी सीटें आधी कर दी हैं, तो कोई इसके साथ-साथ कमाई के लिए कुछ और उपाय करने मे जुटा है। पर आधुनिकता की इस आंधी से उपजे अंधकार में देश के बाकि हिस्सों के सिनेमा घरोँ की तरह इनका भविष्य भी धुंधला ही दिखाई पड़ रहा है।   
                  

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

एक ऐसा विवाह जिसने पंजाब का इतिहास बदल दिया

कभी-कभी जाने-अनजाने वैभव प्रदर्शन भी घातक सिद्ध हो जाता है। यही हुआ था वर्ष 1837 में, महिना था मार्च का। उस समय महाराजा रणजीत सिंह की अथक मेहनत और चातुर्य से पंजाब सुख-समृद्धी से लबरेज था. जमीन सोना उगल रही थी, धन-धान्य की प्रचुरता थी, जन-जीवन खुशहाल था। हालांकि देश में अंग्रेजों का वर्चस्व बढ़ रहा था पर पंजाब में रंणजीत सिंह जी के शौर्य के कारण उन की हिम्मत पस्त थी सो मजबूरन उन्हें वहाँ दोस्ती का नाटक करना पड़ रहा था।  

नौनिहाल सिंह 
पर समय को कुछ और ही मंजूर था. उन्हीं दिनों महाराजा ने अपने पुत्र खड़गसिंह के सपुत्र नौनिहाल सिंह का विवाह अपने ही एक जागीरदार शामसिंह अटारीवाला की पुत्री से करवाना निश्चित कर दिया। अपने समय का यह सर्वाधिक चर्चित विवाह था। इसमें पूरे देश से लगभग पांच लाख मेहमानों को न्यौता दिया गया था।  जिसमें अंग्रेजों के कई स प्रतिनिधी भी शामिल थे। जिनकी अगवानी के लिए दूल्हे के पिता और चाचा के साथ-साथ अनेकों परिजन बेशकीमती कपड़ों, बहुमूल्य हीरे-जवाहरातों और जेवरों को अपने वस्त्रों और पगड़ियों पर धारण कर सदा तत्पर रहते थे। खुद महाराजा रणजीत सिंह बेशकीमती वस्त्र धारण कर सारी व्यवस्था पर नजर रख रहे थे। उन्होंने अपनी बांह पर विश्व प्रसिद्ध हीरा कोहेनूर धारण कर रखा था। अतिथियों की आँखें इतना वैभव देख चौंधियायी जा रही थीं। वहाँ आने वाले हर मेहमान  को पांच-पांच हजार की थैली से नवाजा जा रहा था. इनके ठहरने की जगह की व्यवस्था तो और भी अनुपम थी। साक्षात इंद्रलोक को जमीन पर उतार दिया गया था।  

जब बारात अटारी की और चली तो वह नजारा भी अद्भुत था. हाथी पर सवार नौनिहाल सिंह के वस्त्रों, गले और पगड़ी पर बेशकीमती जवाहरात टंके हुए थे। ख़ास मेहमानों को भी हाथियों पर बैठाया गया था।  उनके पीछे तरह-तरह के वाहन थे जिसके बाद पैदल चलने वालों का अपार समूह था। उस दिन तो जैसे सारा लाहौर ही सडकों पर उतर आया था। क्या घराती, क्या बराती सभी ग़रीबों को दान देने में पीछे नहीं हटना चाह रहे थे।  

उधर लड़की वालों ने भी बरात के स्वागत का शानदार आयोजन कर रखा था। रास्ते कालीनों से अटे पड़े थे। सारा आकाश तोपों और बंदूकों की आवाज से कंपायमान था। नर्तकियां अपनी कला का प्रदर्शन कर रही थीं। बरात के पहुंचते ही महाराजा की सौ स्वर्ण मुद्राओं और पांच घोड़ों की भेंट दे मिलनी की गयी। दूल्हे के पिता खड़गसिंह की इक्यावन  स्वर्ण मुद्राओं और एक घोड़े की भेंट से तथा परिवार के अन्य सदस्यों की ग्यारह स्वर्ण मुद्राओं और एक-एक घोड़े की भेंट दे मिलनी की गयी.  दूल्हे-दुल्हन के बैठने की जगह पूरी तौर से स्वर्ण-रजत निर्मित थी. रात भर जश्न चलता रहा।  दूसरे दिन होली का त्यौहार था, किसी भी मेहमान को जाने नहीं दिया गया, पूरे उल्लास से सबने मिल कर त्यौहार मनाया।  फिर सब को भारी-भरकम भेंट दे विदा किया गया।

यहीं से विरोधियों और खासकर अंग्रेजों के दिलों में ईर्ष्या की भावना पैदा हुई।  इतना वैभव, इतना ऐश्वर्य, इतनी समृद्धि देख उनकी आँखें फटी की फटी रह गयीं।  अंग्रेज सेनाध्यक्ष के मन में पाप और लालच घर कर गया. दोस्ती धरी की धरी रह गयी. शादी के डेढ़ साल के अंदर महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्गवास हो गया. दुर्भाग्य यहीं ख़त्म नहीं हुआ, षडयंत्र के तहत उन्हीं के वजीर ध्यान सिंह द्वारा दो साल के अंदर ही उनके बड़े बेटे खड़गसिंह और उसके कुछ दिनों बाद ही नौनिहाल सिंह की भी ह्त्या कर दी गयी। यहीं से जो भाग्य ने जो पल्टी खाई तो पंजाब, रणजीत सिंह जी के छोटे बेटे दिलीप सिंह के सत्ता में आते-आते पूरी तरह से ब्रितानिया सरकार की झोली में जा गिरा।                

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