शनिवार, 19 अप्रैल 2014

रति में ज्यादा सुख किसे प्राप्त होता है? नर को या नारी को ?

स्त्री-पुरुष के आपसी संयोग में किसे ज्यादा सुख की अनुभूति होती है, ऐसा प्रश्न धर्मराज युधिष्ठिर के मन में कैसे आया, इसका जवाब तो खुद उनके पास भी नहीं था  !!!

प्रकृति द्वारा स्त्री-पुरुष की रचना इस लिए की गयी है कि इस धरा पर इनके प्रजनन के फलस्वरूप सदा जीवन बना रहे. इसके लिए दोनों में लगाव को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। यही लगाव दोनों को करीब लाता है, इसमें उन्हें जो सुख मिलता है उसे पाने के लिए प्रजनन के समय मर्मांतक पीड़ा के बावजूद इससे कोई मुंह नहीं मोड़ता। पर इसमें ज्यादा आनंद की अनुभूति किसे होती है यह प्रश्न सदियों से सर उठाता रहा है. यह  विषय बड़ा नाजुक है। पर जिज्ञासा तो जिज्ञासा है ! 

यह बात किसी आम इंसान को नहीं धर्मराज युधिष्ठिर के मष्तिष्क को भी मथती रहती थी. तभी तो महाभारत के भीष्म पर्व में, जब महामहिम भीष्म शरशय्या पर अपनी मृत्यु का इंतज़ार कर रहे थे तब उनसे ज्ञान पाने के लिए तमाम राजकुमार अपने-अपने प्रश्नों का समाधान प्राप्त कर रहे थे तब अचानक युधिष्ठिर ने यह प्रश्न उनके सामने रख दिया की आपसी संयोग में ज्यादा सुख किसे प्राप्त होता है? नर को या नारी को ? सवाल सुन एक बार तो भीष्म पितामह भी चौंक गए की युधिष्ठिर जैसे नीतिवान, ज्ञानी, संयमी इंसान की यह कैसी जिज्ञासा !!  पर प्रश्न तो प्रश्न था उत्तर तो देना ही था।  तब उन्होंने इससे संबंधित एक कथा सब को सुनाई।  

प्राचीन काल में भंगस्वर नामक एक बड़ा प्रतापी राजा था, पर संतान न होने के कारण सदा चिंतित रहता था. एक बार अपने गुरु के कहने पर उसने पुत्र प्राप्ति के लिए अग्निस्तुत यज्ञ किया, इस यज्ञ के विधान स्वरूप इसकी हवि सिर्फ अग्नी देव को ही दी जाती थी. यज्ञ सफल रहा और उसके फलस्वरूप राजा को सौ पुत्रों की प्राप्ति हुई।  पर यज्ञ में खुद को हिस्सा न मिलने के कारण देव राज इंद्र नाराज हो गए और उसने राजा को दंड देने की ठान ली।  कुछ दिनों बाद एक बार राजा शिकार के लिए जंगल में गया और रास्ता भटक गया. चलते-चलते थकान और प्यास के मारे बुरे हाल राजा को एक झील दिखाई दी, राजा ने आव देखा न ताव और झील के पानी में कूद पड़ा. वह झील मायावी थी और उसमें डुबकी लगाने वाला पुरुष नारी और नारी पुरुष बन जाता था। जब राजा पानी के बाहर आया तो उसने अपने आप को एक नारी के रूप में पाया। यह देख उसकी शर्मिंदगी की हद न रही. इस रूप में अपने राज्य में तो वह कतई नहीं जा सकता था सो इस महान दुःख के बावजूद कि उसे अपने बच्चों से अलग रहना पडेगा  उसने वन में रहने का ही निश्चय कर लिया। उसने अपने बच्चों और रानियों को सारी घटना का ब्योरा बताते हुए अपना संदेश घोड़े के माध्यम से अपने राज्य भिजवा दिया।

कुछ दिनों बाद उसकी भेंट एक तपस्वी से हुई और दोनों साथ-साथ रहने लगे। समय के साथ इनके भी सौ पुत्र हुए पर इस बार बिना किसी यज्ञ के।  पर इतने बच्चों का लालन-पालन जंगल में करना बहुत कठिन था सो महिला बने राजा ने अपने इन पुत्रों को साथ ले अपने राज्य जा कर अपने पुरुष योनी से उत्पन्न पुत्रों का सबसे परिचय करवाया और इन सौ भाइयों का भी वहीं रहने का प्रबंध कर वापस जंगल लौट आया।  पर राजा की यह खुशी भी इंद्र को बर्दास्त नहीं हुई. उसने सोचा कि मैंने राजा को दंड दे दुखी करने का सोचा था पर यहां तो इसके सुख का भंडार ही भरता जा रहा है. उसने क्रोधित हो राजा के राज्य में जा उसके पहले के पुत्रो को भड़का कर उन दो सौ राजकुमारों में युद्ध करवा उन सब को मरवा डाला।  जब राजा को इस सब का पता चला तो वह बड़ा दुखी हुआ और इंद्र से इस नाराजगी का कारण जानना चाहा।  इंद्र ने कहा तुमने अपने यज्ञ में मेरा हिस्सा न दे जो अनादर किया था, यह उसी का फल है।
राजा ने उससे क्षमा याचना की. इंद्र ने खुश हो कहा मैं तुम्हारे सौ पुत्रों को जीवित कर सकता हूँ, बताओ कौन से सौ पुत्रों का जीवन तुम्हें चाहिए ?
राजा ने कुछ देर सोचा और फिर कहा की माँ  के रूप में मैंने जिन्हें जन्म दिया है, उनका जीवन लौटा दें।  इंद्र ने पूछा ऐसा क्यों ? तो राजा ने जवाब दिया कि माँ की ममता अपने बच्चों पर अधिक होती है इसलिए।
इंद्र ने खुश हो उसके सारे पुत्रों को जीवन दान दे कर कहा कि मैं तुम्हारा पुरुषत्व भी लौटा देता हूँ.
पर राजा ने उनकी बात नहीं मानी और कहा देव, आपसी संयोग में पुरुष की बजाए नारी को अधिक सुख प्राप्त होता है इसलिए मैं नारी ही बना रहना चाहता हूँ।

पूरी कहानी सुना भीष्म पितामह ने, युधिष्ठिर जो सारे राजकुमारों के साथ सर झुकाए खड़े थे की ओर देखा और कहा, लगता है तुम्हारी जिज्ञासा का शमन हो चुका होगा, पर ऐसे प्रश्न का विचार तुम्हारे मन में कैसे आया ? इस बात का जवाब शायद युधिष्ठिर के पास नहीं था।   

शुक्रवार, 18 अप्रैल 2014

गुड़ फ्राइडे यानी पावन शुक्रवार

ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सिर्फ छुट्टी या मौज-मस्ती से मतलब होता है, उन्हें उस दिन विशेष के इतिहास या उसकी प्रासंगिकता से कोई मतलब नहीं होता।

आज  गुड़फ्रायडे की छुट्टी थी। सुबह-सुबह एक सज्जन का फोन आ गया। छूटते ही बोले, सर हैप्पी गुडफ्रायडे । मुझसे कुछ बोलते नहीं बन पडा! पर फिर धीरे से कहा, भाई कहा तो गुड फ्रायडे ही जाता है, लेकिन है यह एक  दुखद दिवस। इसी दिन ईसा मसीह को मृत्यु दंड दिया गया था। किसी क्रिश्चियन को बधाई मत दे बैठना।


वैसे यह सवाल बच्चों को तो क्या बड़ों को भी उलझन में डाल  देता है की जब इस दिन इतनी दुखद घटना घटी थी तो इसे "गुड" क्यों कहा जाता है?  ऐसे बहुत से लोग हैं जिन्हें सिर्फ छुट्टी या मौज-मस्ती से मतलब होता है, उन्हें उस दिन विशेष के इतिहास या उसकी प्रासंगिकता से कोई मतलब नहीं होता। अब इसी दिन को लें, पिछले दिन की बधाई को याद रख, दूसरे दिन काम पर जा बहुतेरे लोगों से इस दिन के बारे में पूछने पर इक्के-दुक्के को छोड कोई ठीक जवाब नहीं दे पाया। उल्टा उनका भी यही प्रश्न था कि फिर इसे गुड क्यों कहा जाता है। इसका यही उत्तर है कि यहाँ "गुड" का अर्थ  "HOLY" यानी पावन के अर्थ में लिया जाता है. क्योंकि  इस दिन यीशु ने सच्चाई का साथ देने और लोगों की भलाई के लिए, पापों में डूबी मानव जाति की मुक्ति के लिए उसमें सत्य, अहिंसा, त्याग और प्रेम की भावना जगाने के लिए अपने  प्राण त्यागे थे।  उनके के अनुयायी उपवास रख पूरे दिन प्रार्थना करते हैं और यीशु को दी गई यातनाओं को याद कर उनके वचनों पर अमल करने का संकल्प लेते हैं।

शुक्रवार का दिन बाइबिल में अनेक महत्वपूर्ण घटनाओं से जुडा हुआ है जैसे सृष्टि पर पहले मानव का जन्म शुक्रवार को हुआ। प्रभु की आज्ञाओं का उल्लंघन करने पर आदम व हव्वा को शुक्रवार के दिन ही अदन से बाहर निकाला गया। ईसा शुक्रवार को ही गिरफ्तार हुए, जैतून पर्वत पर अंतिम प्रार्थना प्रभु ने शुक्रवार को ही की और उन पर मुकदमा भी शुक्रवार के दिन ही चलाया गया।

मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

सेल्फी, खुद की खुद खींची गयी तस्वीर

सेल्फी तब अत्यंत लोकप्रिय हो गयी जब जोहानसबर्ग में नेल्सन मंडेला मेमोरियल के कार्यक्रम में श्रंद्धाजली देते वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के द्वारा डेनिश और ब्रिटिश प्रधान मंत्रियों के साथ मुस्कुराते हुए अपनी सेल्फी लेते हुए की फ़ोटो छप गयीं। 

समय और सुविधा के साथ लोगों में तरह-तरह के शौक पनप जाते हैं. जैसे इन दिनों "सेल्फी" का शौक सल्फी के नशे की तरह लोगों पर छाता जा रहा है। जिसके पास भी ज़रा ढंग का मोबाईल कैमरा है वही इस शौक की गिरफ्त में आ अपनी फ़ोटो 'अपलोड' करने पर तुला हुआ है। वैसे अपनी फ़ोटो लेने के प्रयास कैमरे की ईजाद के साथ ही शुरू हो चुके होंगे। जाने-अनजाने बहुतों ने खुद अपनी फ़ोटो खींचने की कोशिश जरूर की होगी; हाँ परिणामों के बारे में नहीं कहा जा सकता कि हर बार ठीक-ठाक ही मिलते हों।  
रॉबर्ट कॉर्नेलियस
खोज-बीन से पता चला है कि दुनिया की अब तक की सबसे पुरानी सेल्फी अमेरिका के एक फोटोग्राफर रॉबर्ट कॉर्नेलियस ने बड़ी मेहनत से 1839 में ली थी। समझा जा सकता है कि उस समय सीमित साधनों के चलते  उसे कितनी मुश्किलातों का सामना करना पड़ा होगा।     
है क्या यह सेल्फी ? यह उस फ़ोटो को कहते हैं जिसे कोई व्यक्ति खुद अपनी तस्वीर अपने डिजिटल कैमरे या मोबाईल फोन के कैमरे से खींच कर किसी सोशल साइट पर चस्पा करता है। इसके लिए या तो कैमरे को अपने सामने हाथ फैला कर या फिर आईने को माध्यम बना फ़ोटो ली जाती है।  इसमें खुद के अलावा किसी और को भी शामिल किया जा सकता है। वैसे तो यह विधा पुरानी है तथा महिला और पुरुषों में सामान रूप से चली आ रही थी पर अचानक यह पिछले दिनों खबरों में छा कर तब अत्यंत लोकप्रिय और व्यापक हो उठी जब जोहानसबर्ग में नेल्सन मंडेला मेमोरियल के कार्यक्रम में श्रंद्धाजली देते वक्त अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के द्वारा डेनिश और ब्रिटिश प्रधान मंत्रियों के साथ मुस्कुराते हुए अपनी सेल्फी लेते हुए की फ़ोटो छप गयीं। इसके बावजूद की इस काम की दुनिया भर में आलोचना हुई, सेल्फी रातों-रात दुनिया भर में मशहूर हो गयी।  
24 साल पहले खींची फ़ोटो जो अब सेल्फी कहलाती है 
वैसे तो फेस-बुक या माय स्पेस जैसी साइटों पर, सोशल मीडिया की लोकप्रियता के साथ-साथ लोगों ने अपनी फ़ोटो डालना शुरू कर दिया था जिसमें खुद के द्वारा खींची गयी फ़ोटो का भी अच्छा-खासा प्रतिशत हुआ करता था पर उन्हें "सेल्फी" की संज्ञा  2005 में  एक फोटोग्राफर जिम क्राउस ने दी. टाइम पत्रिका के अनुसार 2012 के अंत तक आते-आते तो इसने एक जनून का रूप ले लिया था. जिसके चलते ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ने इसे अपने में स्थान देते हुए इसे साल का सबसे लोक-प्रिय शब्द घोषित कर दिया। इसकी ख्याति का इसी से अंदाज लग सकता है कि अब यह दुनिया की सीमा लांघ कर अंतरिक्ष में जा एक नया नाम "स्पेस सेल्फी" भी पा चुका है, जो अंतरिक्ष में जाने वाले यात्रियों द्वारा खींची गयी अपनी फ़ोटो को दिया गया है।   
यदि आपने अभी तक ऐसी कोई कोशिश नहीं की है तो आज ही ऐसा उपक्रम कर डालें और उससे मिलाने वाली वाह-वाही का आनंद लें।         

मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

जेबें यानी "पॉकेट्स", कैसे प्रचलन में आईं

जेबें यानी "पॉकेट्स"  कैसे  और  कब  इसकी जरूरत  महसूस  की गयी होगी और कैसे यह चलन में आईं होगीं, यह एक खोज का विषय है।  आज के परिधानों की कल्पना बिना जेबों के की ही नहीं जा सकती। पर सबसे   पहले कब इंसान ने इसे बनाया होगा?  वैसे तो किसी एक इंसान को इसका श्रेय नहीं जाता पर  जेबों को आज का रूप देने में अमेरिका के   जेम्स एल. पॉकेट का बहुत बड़ा हाथ है।    

शुरुआती दौर के बाद जब इंसान का परिवार बना होगा, उसने रहने का कोई स्थाई प्रबंध भी कर लिया होगा और तब तक अधोवस्त्रों का चलन भी शुरू हो चुका होगा। तब उसे भोजन के लिए शिकार के साथ-साथ और भी कुछ वस्तुओं को अपने निवास पर ले जाने की जरूरत पड़ी होगी, जिन्हें वह कमर में यहाँ-वहाँ खोंस लेता होगा। धीरे-धीरे परिस्थितियों के तहत शरीर ढकने के उपायों की इजाद हुई होगी। पर कपड़ों के साथ सिली जेबें नहीं बनी होंगीं। उसके पहले कोई छोटी-बड़ी थैली-नुमा चीज बनी होगी जिसे हाथ में लटकाया जाता होगा या कमर में बाँध लिया जाता होगा। हो सकता है इसका ख्याल उसे कंगारू के बच्चे को अपनी माँ की प्रकृति-प्रदत्त जेब में बैठा देख कर आया हो। पर सुरक्षा की दृष्टि से ऐसी छोटी थैलियां या "पॉउच" असुरक्षित ही होते थे इन पर उठाईगिरे आसानी से हाथ साफ कर जाते थे. इससे बचने के लिए उन थैलियों को कपड़ों के अंदर सीना शुरू किया गया पर वह बाजार-हाट में व्यवहारिक नहीं हो पाया। कई भुलक्कड़ इसे जहां-तहां रख कर भूल भी जाते थे। पर धीरे-धीरे जरुरत और सहूलियत को सामने रख आज की जेबों के पितामह का जन्म संभव हुआ जिसका सुधारा रूप हमारे सामने है।      

जो भी रहा हो जरूरत के अनुसार और समय के साथ-साथ कपड़ों के अंदर-बाहर जेबों का अस्तित्व चलन में आया। आज की तरह पहले इंसान के पास इतना ताम-झाम नहीं होता था, घर से बाहर निकलने पर कुछ पैसे और घर की चाबियाँ यही उसके साथ होता था जिसके लिए एक दो जेबें काफी थीं, हाँ महिलाओं को जरूर कुछ ज्यादा जगह की जरूरत होती थी इसलिए उनकी जेबें कुछ बड़े आकार की बनाई जाती थीं जिन्हें सुरक्षा की दृष्टि से उनके अंतरंग वस्त्रों में जोड़ा जाता था। 

समय बदलता गया. वस्त्रों के आकार-प्रकार-डिजाइन भी उसके साथ ढलते गए। उसके साथ ही तरह-तरह की जेबें भी बनती चली गयीं। पहले कलाई घड़ियों का चलन न होने से घड़ी के लिए एक अलग जेब होती थी। चश्मे के लिए, ट्रेन के टिकट के लिए, सिक्कों के लिए, अलग तरह की जेबें बनाई गयीं।  कुछ बड़े कागज-पत्रों के लिए अलग जेब बनी जो "कार्गो पॉकेट" कहलाई, जो जींस में नजर आती है।  कपड़ों के साथ -साथ जेबें भी उनके अनुसार बनाने लगीं।  कमीज, जैकेट, कोट, पैंट, जींस सब की अपनी तरह की जेबें होने लगी।

हालांकि इसने एक कुख्यात वर्ग "पाकेटमार" को भी पलने-बढ़ने में सहायता की है, लोगों की सिर-दर्दी बढ़ाई है. फिर भी सोचिए यह न होती तो और कितनी मुश्किलें सर उठाने लगती। अब तो इसका दायरा इतना बढ़ गया है कि लोग हर चीज में जेब खोजते हैं, चाहे छोटे पर्स हो, बड़े बैग हों, अटैची हों, बक्से हों, और तो और अब तो तैराकी के वस्त्रों और जूतों तक में जेबें लगनी शुरू हो चुकी हैं।

सोमवार, 24 मार्च 2014

रबर के छोटे-छोटे छल्ले, रबर बैंड

रंग-बिरंगे रबर बैंड 
रबर बैंड, एक छोटा सा गोल महीन रबर का टुकड़ा। जो छोटा होते हुए भी रोजमर्रा के छोटे-छोटे कामों में बेहद उपयोगी है. चाहे महिलाओं को अपने खुले, बिखरते बालों को बचाना हो, चाहे व्यवस्थित कागजों को संभालना हो, चाहे किसी पोलिथिन के लिफाफे का मुंह बंद करना हो या फिर छोटी-मोटी चीजों को एकजुट रखना हो, इससे बेहतर और कोई चीज मुफीद नहीं है।  यह सब तो इसकी छोटी-मोटी उपादेयताएं हुईं। बावजूद इसके कि इसकी हमें आदत पड चुकी है, यह सर्वसुलभ है, फिर भी यह उपेक्षित ही है। इसके बारे में हमें जानकारी बहुत कम है.

इसका सबसे बड़ा उपभोक्ता अमेरिका का डाक विभाग है। जहां इसकी सालाना खपत टनों का आंकड़ा पार कर जाती है। इसके अलावा यह दुनिया भर की न्यूज पेपर इंडस्ट्री, डाक विभागों, फूलों के व्यवसाय, वनस्पति उद्योग की ख़ास जरूरत बन चुका है।  दुनिया भर में इसकी मांग भारी-भरकम रूप से दिन-दूनी-रात-चौगुनी की रफ्तार से बढती ही जा रही है।  

इसको बनाने के लिए अधिकतर प्राकृतिक रबर का ही उपयोग किया जाता है क्योंकि इसमें सिंथेटिक रबर से ज्यादा लचीलापन होता है। छल्ले या बैंड बनाने के रबर को कई चरणों से गुजरना पड़ता है।  इस दौरान रबर को ख़ास गोल नालियों में भर उसे गर्म और शुद्ध कर मशीनों से एकसार कर फिर आवश्यकतानुसार अलग-अलग नाप, माप और आकार में काट लिया जाता है।  फिर इन पर लम्बाई, चौड़ाई और मोटाई के हिसाब से  पहचान के लिए अलग-अलग नम्बर डाल दिए जाते हैं, जिससे इनकी खरीदी-बिक्री में आसानी रहती है।  

जाने-अनजाने, पहला रबर बैंड बनाने का श्रेय इंग्लैण्ड के थॉमस हैनकॉक को जाता है जिसने एक रबर की बोतल को छोटे-छोटे छल्लों के रूप में काट कर उनका उपयोग "गार्टर" और कमरबंद के रूप में किया था। यह बात 1943 की है।  पर इस नन्हीं सी चीज की उपयोगिता को देख लोग इसकी ओर आकृष्ट होते चले गए. इसकी उपयोगिता और लोकप्रियता को देखते हुए इंग्लैण्ड के ही स्टेफन पेरी ने समय को भांपते हुए 17 मार्च 1945 में  इसका पेटेंट करवा इसे लोकप्रियता की नयी उंचाईयों पर पहुंचा दिया। 

इस तरह अमेरिकन चार्ल्स गुडइयर की रबर की खोज और इंग्लैण्ड के थॉमस, पेरी के प्रयास और मेहनत के फलस्वरूप दुनिया को यह अनूठी और बहूउपयोगी वस्तु सर्वसुलभ  हो सकी।                

रविवार, 9 मार्च 2014

"शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों करते हैं ?

एक परिक्रमा खुद की भी होती है जो घर इत्यादि में पूजा की समाप्ति पर एक जगह खड़े होकर घूमते हुए की जाती है जो याद दिलाती है कि हमारे भीतर भी  वही प्रभू, वही शक्ति, वही परम सत्य विराजमान हैं जिनकी प्रतिमा की हम अभी-अभी पूजा-अर्चना किए हैं।      

आज शाम टहलने निकला तो रास्ते में पंडित रामजी मिल गए। उनके साथ बतियाते हुए भोले नाथ के मंदिर प्रांगण में पहुँच गया।  वहां कुछ लोग शिवलिंग की प्रदक्षिणा कर रहे थे तो वैसे ही राम जी से पूछ लिया कि हम प्रदक्षिणा क्यों करते हैं ?

राम जी ने बताया कि जिस तरह सूर्य को केंद्र में रख सारे ग्रह उसका चक्कर लगाते हैं जिससे सूर्य की ऊर्जा उन्हें मिलती रहे, उसी तरह हम प्रभू यानी सर्वोच्च सत्ता, जो सारे विश्व का केंद्र है, वही कर्ता है, वही सारी गतिविधियों का संचालक है, उसी की कृपा से हम अपने नित्य प्रति के कार्य पूर्ण कर पाते हैं, उसी से हमारा जीवन है. फिर प्रभू समदर्शी हैं अपने सारे जीवों पर एक समान दया भाव रखते हैं इसका अर्थ है कि हम सभी उनसे समान दूरी पर स्थित हैं और उनकी कृपा बिना भेद-भाव के सब पर बराबर बरसती है। परिक्रमा करना भी उनकी पूजा अर्चना का एक हिस्सा है जो उनके प्रति अपनी कृतज्ञतायापन का एक भाव है, उन्हें अपने प्रेम-पाश में बांधने की एक अबोध कामना है। केवल प्रभू  ही नहीं जिनका भी हम आदर करते हैं, जो बिना किसी कामना के हमें लाभान्वित करते हैं, उनके प्रति आभार व्यक्त करने के लिए हम उनकी परिक्रमा करते हैं, चाहे वे हमारे माता-पिता हों, गुरुजन हों, अग्नि हो या वृक्ष हों। एक परिक्रमा खुद की भी होती है जो घर इत्यादि में पूजा की समाप्ति पर एक जगह खड़े होकर घूमते हुए की जाती है जो याद दिलाती है कि हमारे भीतर भी  वही प्रभू, वही शक्ति, वही परम सत्य विराजमान हैं जिनकी प्रतिमा की हम अभी-अभी पूजा-अर्चना किए हैं।        

मैंने फिर पूछा कि परिक्रमा प्रतिमा को दाहिने रख कर यानी घड़ी की सूई की चाल के अनुसार ही क्यों की जाती है ?  यह सुन कर वहाँ बैठे एक सज्जन बोले कि इससे आपस में लोग भिड़ने से बचे रहते हैं नहीं तो कोई दाएं से चलेगा और कोई बांए से आएगा तो मार्ग अवरुद्ध होने लगेगा।  
पंडित जी मुस्कुरा कर बोले, ऐसा नहीं है. हमारे यहाँ दाएं भाग को ज्यादा पवित्र और सकारात्मक माना जाता है, इसीलिए जो हमारी सदा रक्षा करते हैं, हर ऊँच-नीच से बचाते हैं, सदा हमारा ध्यान रखते हैं उन प्रभू को हम अपनी दाईं और रख अपने आप को सदा सकारात्मक रहने की याद दिलाते हुए, उनकी परिक्रमा करते हैं।

मैंने पंडित जी से फिर पूछा कि पूजा समाप्ति पर हम "शांति" का उच्चारण तीन बार क्यों करते हैं ?
पंडित जी बोले, शांति एक प्राकृतिक प्रक्रिया है। यह सब जगह सदा विद्यमान रहती है। जब तक इसे हमारे या हमारे क्रिया-कलापों द्वारा भंग ना किया जाए। इसका यह भी अर्थ है कि हमारी गति-विधियों से ही शांति का क्षय होता है पर जैसे ही यह सब ख़त्म होता है शांति पुन: बहाल हो जाती है। यह जहां भी होती है वहां सदा खुशियों का डेरा रहता है। इसीलिए शांति की प्राप्ति के लिए हम प्रार्थना करते हैं. जिससे हमारी मुसीबतों, दुखों, तकलीफों का अंत होता है और मन को शांति मिलती है। जीवन में कुछ ऐसी  प्राकृतिक आपदाएं होती हैं जिन पर किसी का वश नहीं चलता, जैसे भूकंप, बाढ़ इत्यादि। कुछ ऐसी विपदाएं होती हैं जो हमारे द्वारा या हमारी गलतियों से घटती हैं जैसे प्रदूषण, दुर्घटना, जुर्म इत्यादि।  सारी रुकावटें, दुःख और परेशानियों का कारण तीन स्रोत, आदि-दैविक, आदि-भौतिक, आध्यात्मिक हैं। इसलिए हम प्रभू से प्रार्थना करते हैं कि वे हमारे दुखों, तकलीफों, तथा जीवन में आने वाली अड़चनों का शमन करें। चूँकि ये मुसीबतें तीन ओर से आती हैं इसलिए शांति का उच्चारण भी तीन बार किया जाता है।
शाम गहरा गयी थी पंडित जी को मंदिर का अपना कार्य पूरा करना था, इधर घर पर मेरा इंतजार भी शुरू हो चुका था  इसलिए उनसे आज्ञा और नई जानकारियां ले मैं भी घर की ओर रवाना हो गया।


शनिवार, 8 मार्च 2014

कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व हो तुम !!!

आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे।

क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को दिल से बराबरी का हकदार मानता है? वैसे ऐसे समाज, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का? आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। यह इतना आसान नहीं है, हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं।


 यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है? यदि ऐसा नहीं है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता? पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।
आश्चर्य होता है, दुनिया के आधे हिस्से के हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए, उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन निश्चित किया गया है। इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए, जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर समाज ने, समाज में  उन्हें इतना चौंधिया दिया होता है कि वे अपने कर्मों के अंधेरे को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की. अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की।
कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व  हो तुम !!!  

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यूपी का रहस्यमयी मेंढक मंदिर

ओयल कस्बे में स्थित लगभग 200 साल पुराने नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है, इसके साथ ही यहां एक और आश्चर्यजनक बात...