pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

लोहड़ी का त्योहार और दुल्ला-भट्टी

कल लोहड़ी जलाने पर कुछ पड़ोसियों ने पूछा कि क्या आज कोई आप का (यानी पंजाबियों का) त्योहार है? मैंने कहा है तो पूरे देश का पर सिमट कर रह गया है देश के उत्तरी हिस्से में।  
हम सदा से उत्सव-धर्मी रहे हैं। इसी कारण हमारा देश तीज-त्योहारों का देश है। तीज-त्योहार यानी खुशियां मनाने, बांटने के मौके। जो संदेश देते रहते हैं कि हजार परेशानियां हों पर उन्हें भूल कर जीवन को चलायमान रखना जरूरी है। इसी को अपना मूल मंत्र मानता है हमारे देश का उत्तरी भाग, ख़ास कर पंजाब। वहाँ के लोगों की जिंदा-दिली का कोई जवाब नहीं है. जो छोटी-छोटी बातों में भी खुशियां ढूँढ निकालते हैं. उसी का उदाहरण है "लोहड़ी".
वैसे तो इसके बारे में कई कथाएं हैं पर मूल कारण शीत ऋतु का समापन है।  वैसे तो वैज्ञानिक सबसे छोटा दिन 21-22 दिसंबर को मानते हैं पर हमारे यहाँ सूर्य के उत्तरायण होने से दिनों के बड़ा होने की शुरुआत माना जाता है जिसे पूरा देश "मकर संक्रांति" के रूप में मनाता है. इसीलिए लोहड़ी को मकर संक्रांति के एक दिन पहले की रात को सर्द दिनों की विदाई और अगले दिन से दिनों के बड़े होने की खुशी में मनाया जाता है। हर साल तेरह जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार एक तरह से ऊर्जा के स्रोत आग का पूजन है।  
इस दिन सुबह से ही बच्चे लोहड़ी से संबंधित गीत, जो "दुल्ला भट्टी " से जुड़े होते हैं गाते हुए घर-घर जाते हैं जिसके बदले में उन्हें हर घर से मूंगफली, तिल, गुड, रेवड़ी, गजक के साथ-साथ पैसे भी दिए जाते हैं। बच्चों को खाली हाथ लौटाना अच्छा नहीं माना जाता। फिर रात होने पर हर घर के सामने या मोहल्ले में एक जगह, होलिका दहन की तरह छोटे-बड़े अलाव जलाए जाते हैं. उसके चारों और नाचते-गाते, परिक्रमा करते हुए उसमें तिल, गुड, मूंगफली की आहुति दी जाती है. यह कार्यक्रम देर रात तक चलता रहता है. यह उन परिवारों के लिए और ख़ास हो जाता है जहां हाल ही में शादी-ब्याह हुआ हो या नवजात का आगमन, क्योंकि दोनों उर्वरता और फलप्रद स्थिति के द्योतक होते हैं और प्रकृति भी तो उसी दिन से ऊर्जा यानी सूर्य की और रुख करती है।

पंजाब में बंगाल की तरह ही दूसरा दिन नए साल की शुरुआत का होता है। जब पंजाब और हरियाणा का किसान फिर अपने खेतों को नए सिरे से संवारता है, तैयार करता है नयी फसल और अपने उज्जवल भविष्य के लिए। जिससे फिर वह अपने नाते-रिश्तेदारों, मित्रों के साथ खुशियां मना सके, दुल्ला-भट्टी के गीत गा सके।

पर यह दुल्ला-भट्टी है कौन? जिससे लोग इतनी आत्मीयता से जुड़े हुए हैं। जिसका नाम हर लोहड़ी के गीत की आवश्यकता है।  
कहते हैं बादशाह अकबर के जमाने में पंजाब में अराजकता फैल गयी थी। हिंदू कन्याओं का जबरन अपहरण कर उन्हें खाडी के देशों में बेच दिया जाता था. पिंडी भट्टियां के शासकों भट्टी सरदारों के खानदान के युवक दुल्ला-भट्टी को यह नागवार गुजरा। वह एक दिलेर इंसान था जिसने ग़रीबों की सहायता के लिए अमीरों को तंग कर रखा था। अपहरण की गयी हिंदू कन्याओं को बचा कर उनका सम्मान पूर्वक विवाह करवाना तथा उनकी गृहस्ती बसाना उसका मुख्य उद्देश्य हुआ करता था। ऐसी ही दो लड़कियों के नाम सुंदरी और मुंदरी थे, जिनका उसने पूरी शानो-शौकत से विवाह करवाया था। य़े वही सुंदरी-मुंदरी हैं जिनका नाम लोहड़ी के गीतों में शामिल होता आ रहा है।       

सोमवार, 6 जनवरी 2014

उस दिन तो प्रभू ही हमारे साथ थे

कोई माने या ना माने मेरा दृढ़ विश्वास है कि उस दिन सच्चे मन से निकली गुहार के कारण ही प्रभू ने हमारी सहायता की थी। प्रभू कभी भी अपने बच्चों की अनदेखी नहीं करते और यह मैने सुना नहीं देखा और भोगा है।

घटना करीब तीस साल पुरानी है। शादी को अभी ज्यादा दिन नहीं हुए थे। तब हम दिल्ली के राजौरी गार्डेन में रहते थे। मेरी बुआ जी की बेटी यानि मेरी फुफेरी बहन का रिश्ता हरियाणा के करनाल शहर में तय हुआ था। उसी के सिलसिले मे वहां जाना था। मैने नया-नया स्कूटर लिया था, जो अभी तक दो सौ कि. मी. भी नहीं चला था. सो शौक व जोश में मैंने अपने चाचाजी से गुजारिश की कि स्कूटरों पर ही करनाल चला जाए. उन दिनों सडकों पर इतनी भीड़-भाड़ नहीं होती थी। सो थोड़ी सी ना-नुकुर के बाद उन्होंने स्वीकृति तो दी ही खुद भी स्कूटर पर चलना तय कर लिया। परिवार के आठ जनों ने जाना था। जिसमें छह लोग तीन स्कूटरों पर और मेरी दो बुआओं का बस से जाना तय हुआ। सबेरे सात बजे हम सब करनाल के लिए रवाना हो लिए। यात्रा बढ़िया रही, वहां भी सारे कार्यक्रम खुशनुमा माहौल में संपन्न होने के बाद हम सब करीब पांच बजे वापस दिल्ली के लिए वापस हो लिए।

लौटने का क्रम भी सुरक्षा और सावधानी हेतु सुबह की तरह ही रखा गया था। सबसे आगे चाचाजी तथा चाची जी अपने स्कूटर पर, बीच में  मैं सपत्निक, तथा तीसरे स्कूटर पर मेरे दोनों फूफाजी। सब ठीकठाक ही चल रहा था कि अचानक दिल्ली से करीब 35किमी पहले मेरा स्कूटर बंद हो गया। मेरे आगे एक स्कूटर तथा पीछे एक स्कूटर था. आगे वालों का ध्यान कोशिशों के बावजूद हैम आकर्षित नहीं कर सके। सो वे तो चलते चले गये। पर मन में संतोष था कि पीछे दो लोग आ रहे हैं। पर देखते-देखते, मेरे आवाज देने और हाथ हिलाने के बावजूद उनका ध्यान मेरी तरफ नहीं गया, एक तो शाम हो चली थी दूसरा हेल्मेट और फिर उनकी आपसी बातों की तन्मयता की वजह से वे मेरे सामने से निकल गये।

इधर लाख कोशिशों के बावजूद स्कूटर चलने का नाम नहीं ले रहा था। जहां गाडी बंद हुए थी, उसके पास एक ढ़ाबा था वहां किसी मेकेनिक मिलने की आशा में मैं वहां तक स्कूटर को ढ़केल कर ले गया, परंतु वहां सिर्फ़ ट्रक ड्राइवरों का जमावड़ा था। अब कुछ-कुछ घबडाहट होने लगी थी। ढ़ाबे में मौजूद लोग सहायता करने की बजाय हमें घूरने में ज्यादा मशरूफ़ थे। मैं लगातार मशीन से जूझ रहा था। मेरी जद्दोजहद को देखने धीरे-धीरे तमाशबीनों का एक घेरा हमारे चारों ओर बन गया था। कदमजी मन ही मन (जैसा कि उन्होंने मुझे बाद में बताया) लगातार महामृत्युंजय का पाठ करे जा रहीं थीं। हम दोनो पसीने से तरबतर थे, मैं स्कूटर के कारण और ये घबडाहट के कारण। अनजान जगह, ढाबे को छोड़ दूर-दूर तक किसी बस्ती का नामोनिशान नहीं। वहाँ मौजूद  दस-पंद्रह जनों में आधे से ज्यादा बंदे नशे की गिरफ्त में. अंधेरा घिरना शुरु हो गया था. 

अचानक स्पार्क प्लग में एक चिंगारी छूटी और इंजिन में जान आ गयी। मैने वैसे ही चालू हालत में स्कूटर को कसा-ढ़का और प्रभू को याद कर सड़क पर आ गया। उन दिनों दिल्ली में बाढ़ आई हुई थी। उस समय स्कूटरों में तकनीकी उतनी अच्छी नहीं होती थी सो गति धीमी होते ही हेड लाइट भी हलकी पड़ जाती थी सो चलते हुए कुछ ज्यादा ही सावधानी बरतनी पड रही थी ऊपर से यह आशंका कि कहीं गाड़ी फिर बंद ना हो जाए. राम-राम करते  रात करीब साढ़े दस बजे जब घर पहुंचे तो घर वालों की हालत खस्ता थी। उन दिनों मोबाइल की सुविधा तो थी नहीं और गाडी फिर ना बंद हो जाए इसलिए रास्ते से मैने भी फोन नहीं किया था। जैसा भी था हमें सही सलमात देख सबकी जान में जान आई।

दूसरे दिन मेकेनिक ने जब स्कूटर खोला तो सब की आंखे फटी की फटी रह गयीं क्योंकी स्कूटर की पिस्टन रिंग टुकड़े-टुकड़े हो चुकी थी जो कि नये स्कूटर के इतनी दूर चलने का नतीजा था। ऐसी हालत में गाडी कैसे स्टार्ट हुई कैसे उसने दो जनों को 50-55किमी दूर तक पहुंचाया कुछ पता नहीं। यह एक चमत्कार ही था। उस दिन को और उस दिन के माहौल के याद आने पर आज भी मन कैसा-कैसा हो जाता है।

कोई माने या ना माने मेरा दृढ़ विश्वास है कि उस दिन सच्चे मन से निकली गुहार के कारण ही प्रभू ने हमारी सहायता की थी। प्रभू कभी भी अपने बच्चों की अनदेखी नहीं करते और यह मैने सुना नहीं देखा और भोगा है।

रविवार, 5 जनवरी 2014

पूजन के बाद आरती, क्यूँ और कैसे


अपने यहाँ सबसे ज्यादा की जाने वाली  आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है।  यह जितनी लोक प्रिय है उतनी ही इसकी एक लाईन को गलत पढ़ा जाता है, वह है "नारद करत निरांजन" जिसे अधिकाँश महिला-पुरुष  "नारद करत निरंजन" उच्चारण करते हैं। 

आरती लेते  लोग 
अपने यहाँ हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना के बाद उनकी आरती, जिसे निरांजन, आरात्रिक या आरातिर्क भी कहते हैं,  करने का विधान है। जो पूजा के षोडशोपचार का एक अंग है। जिसमे गायन, वादन और करतल ध्वनी  के साथ-साथ दीप या बाती जला कर देवी या देवता के हर अंग को ध्यान में रख प्रतिमा के दायीं ओर से बाईं ओर घुमाते हुए किया जाता है और अंत में बाती की लौ पर वहाँ उपस्थित सारे लोग अपने दोनों हाथों की हथेलियों को घुमा कर अपने सर और आँखों से स्पर्श करवाते हैं। यह क्रिया घर, मंदिर, या सार्वजनिक पूजा या उत्सवों में कमोबेश ऐसे ही या तो कपूर या घी की बाती को प्रज्जवलित कर की जाती है। आरती करना और लेना पुण्य का काम माना जाता है।  

आरती जहां पूजा की समाप्ति की द्योतक है वहीं यह अंत में प्रभू के साथ अपने को जोड़ने के लिए किए गए ध्यान की भी क्रिया है। इसके साथ ही ऐसी मान्यता है कि अपने आराध्य की पूजा, मंत्रहीन और क्रियाहीन होने पर भी आरती कर लेने से उसमे पूर्णतया आने के साथ-साथ त्रुटि कि भी कमी पूरी हो जाती है। इसे अपने आराध्य को उनके मूल मंत्र से तीन बार पुष्पांजली दे कर जय-जयकार करते हुए वाद्यों के साथ कपूर या विषम संख्या की घी की बातियों, जिन्हें साधारणतया पांच की संख्या में लिया जाता है, को प्रज्जवलित कर गायन करते हुए किया जाता है। मन्त्र या स्तुति में शब्दों का शुद्ध उच्चारण होना आवश्यक है।  

लौ को प्रतिमा के चरणों में चार बार, नाभी परदेश में दो बार, मुख मंडल पर एक बार तथा समस्त अंगों पर सात बार घुमाने का विधान है। आरती के पांच अंग होते हैं।  दीप माला के द्वारा, जलयुक्त शंख से, कोरे वस्त्र से, आम या पीपल के पत्तों से और साष्टांग दंडवत से। इसके कर लेने से अपने द्वारा की गयी अपने आराध्य की पूजा अर्चना में पूर्णतया का भाव आ जाता है।    

अपने यहाँ सबसे ज्यादा की जाने वाली  आरती "ॐ जय जगदीश हरे" है।  यह जितनी लोक प्रिय है उतनी ही इसकी एक लाईन को गलत पढ़ा जाता है, वह है "नारद करत निरांजन" जिसे अधिकाँश महिला-पुरुष "नारद करत निरंजन" उच्चारण करते हैं।     

@मंदिर के पुजारी श्री रामजी महाराज से ली गयी जानकारी पर आधारित।                

गुरुवार, 26 दिसंबर 2013

पति पत्नी और घोड़ा "आप" पर लागू थोडा-थोडा


ठीक यही हाल आज केजरीवाल और उनके दल का है। लोग ताक लगाए बैठे रहते हैं कि ये बंदा कुछ भी करे हमें "कमेंट" करना ही है। अब देखना यह है कि कहीं तानों से घबड़ा कर पति-पत्नी घोड़े को ही तो नहीं सर पर उठा लेते :-)  

आज दिल्ली में केजरीवाल की हालत और उन पर होते शब्द बाणों के प्रहार से एक पुरानी कहानी याद आ रही है।  
एक बार एक व्यक्ति अपनी पत्नी और अपने घोड़े के साथ भ्रमण पर निकलता है। घोड़े के साथ दोनों पैदल चल रहे थे।  उन्हें देख लोग हंसने लगे , देखो मूर्खों को साथ में घोड़ा है फिर भी पैदल चल रहे हैं। ऐसा सुन उस व्यक्ति ने अपनी पत्नी को घोड़े पर बैठा दिया और खुद साथ-साथ चलने लगा. कुछ देर बाद वे लोग एक गांव से गुजरे तो वहाँ के लोग उसकी पत्नी पर ताना मारने लगे कि देखो पति बेचारा पैदल चल रहा है और ये महारानी घोड़े पर सवार है।  ऐसा सुन गांव के बाहर आ पति घोड़े पर बैठ जाता है और पत्नी घोड़े की रास थाम पैदल चलने लगती है।  कुछ दूरी पर उन्हें  महिलाओं का झुंड मिलता है जो उन्हें देख कर गुस्से में आ पति को फटकारने लगता है कि देखो कितना निर्दयी पति है खुद तो घोड़े पर बैठा है और बेचारी पत्नी को पैदल घसीट रहा है। धिक्कार है ऐसे व्यक्ति पर।  
इतना सुनते ही पति ने पत्नी को भी घोड़े पर बैठा लिया। पर क्या दुनिया में सब को खुश रखा जा सकता है ? अभी कुछ ही दूर गए थे कि कुछ लोगों ने इन्हें घेर लिया और डांटते हुए बोले कि क्या तुम मे ज़रा सी भी दया-ममता नहीं है। एक निरीह जानवर पर दोनों जने लदे हुए हो शर्म नहीं आती ?  

ठीक यही हाल आज केजरीवाल और उनके दल का है। लोग ताक लगाए बैठे रहते हैं कि ये बंदा कुछ भी करे हमें "कमेंट" करना ही है। अब देखना यह है कि कहीं तानों से घबड़ा कर पति-पत्नी घोड़े को ही तो नहीं सर पर उठा लेते :-) 

बुधवार, 18 दिसंबर 2013

दिल के रिश्ते

एक छोटे से स्कूल में छोटी सी तनख्वाह पाने वालों का मन कितना विशाल हो सकता है इसका प्रमाण उसी दिन मैंने जाना। उनके उपकार का सिला तो मैं जिंदगी भर नहीं चुका पाऊँगी पर खून के रिश्तों से परे दिल के रिश्तों में पहले से भी ज्यादा विश्वास करने लग गयी हूँ..............

हमारी जिंदगी तरह-तरह की अनुभूतियों, खट्टे-मीठे अनुभवों, अनोखे घटना चक्रों से भरी पड़ी होती है। इन्हीं में से कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं जो सदा मन-मस्तिष्क पर अपनी छाप ताउम्र के लिए छोड़ जाती हैं, कर जाती हैं   इंसान को कायल इंसानियत का, बाँध जाती हैं परायों को भी एक अनोखे रिश्ते में।  

ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी हुआ। मैं एक छोटे से स्कूल की शिक्षिका हूँ। बात करीब सात साल पहले की है। कुछ समय पहले जबर्दस्त आर्थिक नुक्सान से अभी पूरी तरह उबर नहीं पाए थे पर इसी बीच मेरे छोटे बेटे का पूना के एक एम. बी. ए. संस्थान में चयन हो गया।  उसकी कड़ी मेहनत रंग लाई थी, खुशी का माहौल था। पर मन के एक कोने में दाखिले की भारी-भरकम फीस के पैसों की चिंता भी जरूर थी, पर पढ़ाई के लिए मिलने वाले बैंक लोन के लुभावने विज्ञापनों से निश्चिंतता भी थी कि पैसों का इंतजाम हो ही जाएगा। इसके पहले कभी लोन लेने की जरूरत न पड़ने से ऐसे इश्तहारों की सच्चाई से हम अनभिज्ञ ही थे। पर जब बैंकों के चक्कर लगने शुरू हुए तो असलियत से सामना हुआ। बैंक में वर्षों से अच्छा भला खाता होने के बावजूद कर्मचारियों का रवैया ऐसा था मानो हम बैंक को ठगने आए हों। जिरह ऐसी जैसे इनकम टैक्स की चोरी की हो. उनकी रूचि लोन देने में नहीं न देने में ज्यादा थी। एक बार तो बैक के एक वरीयता प्राप्त सज्जन को शेखी बघारते भी सुना कि उन्होंने अपने कार्य काल में कभी किसी का लोन पास नहीं किया, कौन मुसीबत मोल ले। वहाँ किसी को भी इस बात का मलाल नहीं था कि वह किसी के भविष्य से खिलवाड़ कर रहा है। बीस दिन निकल गए थे। सारे कागजात पूरे होने के बावजूद काम सिरे नहीं चढ़ रहा था। कभी किसी कर्मचारी का तबादला हो जाता था, कभी कोई अफसर अवकाश पर चला जाता था, कभी निश्चित दिन और कोई अड़चन आड़े आ जाती थी। ज्यों-ज्यों फीस जमा करवाने की तारीख नजदीक आती जाती थी त्यों-त्यों हमारी मानसिक हालत बदतर होती जाती थी।  भीषण मानसिक तनाव के दिन थे।  ऐसा लगता था कि बेटे का भविष्य हाथ से निकला जा रहा है।  अब सिर्फ चार दिन बचे थे और किसी तरह आधी रकम का ही इंतजाम हो पाया था। 

उस दिन परेशानी की हालत में मैं स्कूल के स्टाफ रूम में बैठी थी, मन उचाट था, धैर्य जवाब दे चुका था. ऐसे में मन पर काबू न रहा और आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। वजह तो सहकर्मियों से छुपी न थी, सब मुझे घेर कर ढाढस बधाने लग गए। पर फिर जो कुछ हुआ उसकी तो मैंने कल्पना भी नहीं की थी, वह सब याद आते ही आज भी आँखें भर आती हैं। दो-तीन घंटे के अंतराल में ही मेरे सामने मेज पर दो लाख. जी हाँ दो लाख रुपयों का ढेर लगा हुआ था। ऐसी रकम जो हफ्तों से आँख-मिचौनी कर रही थी, मेरे सामने पड़ी थी। समझ नहीं आ रहा था कि क्या कहूँ क्या न कहूँ। हालत यह कि जुबान बंद, आँखें भीगी हुई और मन अपने सहयोगियों के उपकार के आगे नतमस्तक था।  ऐसे आड़े  वक्त जब हम चारों ओर से थक-हार कर निराश हो चुके थे तब स्कूल में कुछ घंटे साथ बिताने वाले सहकर्मी देवदूत बन कर सामने आए। सुना था कि प्रभू किसी न किसी रूप में अपने संकट-ग्रस्त बच्चों की सहायता जरूर करते हैं, उस दिन ईश्वर ही मानों मेरे सहकर्मियों के रूप में आए थे।  

एक छोटे से स्कूल में छोटी सी तनख्वाह पाने वालों का मन कितना विशाल हो सकता है इसका प्रमाण उसी दिन मैंने जाना। उनके उपकार का सिला तो मैं जिंदगी भर नहीं चुका पाऊँगी पर खून के रिश्तों से परे दिल के रिश्तों में पहले से भी ज्यादा विश्वास करने लग गयी हूँ।  

बाद में लोन तो मिला पर कैसे मिला उसका जिक्र नाही किया जाए तो बेहतर है. आज मेरा बेटा बैंक में ही मैनेजर के पद पर है पर उसे यही सीख दी है कि किसी भी जरुरत मंद को जूते ना घिसने पड़ें यह सदा याद रखे।

सच्ची घटना पर आधारित।         

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ कम है

वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती, ना हारी ना बीमारी, ना चिंता ना क्लेश, न लड़ाई न झगड़ा। कुछ भी तो नही था "टेस्ट" बदलने को. वैसे यह सब किस चिड़िया का नाम है, वहाँ के लोग जानते भी नहीं थे।  समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन, मौज-मस्ती। एकरसता से जीवन जैसे ठहर गया था।  

बात काफी पुरानी है। प्रभू ने नया-नया शौक पाला था, सृजन का। वे दिन-रात अपनी सृष्टि में मग्न रहा करते थे। नई-नई तरह की आकृतियां, वस्तुएं, कलाकृतियां बना-बना कर अपने क्रीड़ास्थल को सजा-सजा कर खुश होते रहते थे। समय के साथ और लगातार कुछ न कुछ निर्माण होते रहने से हो-हल्ला बढ़ने लगा. जगह की तंगी भी महसूस होने लगी। ऊपर से धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाली उनकी सर्वोत्तम रचनाएं वहां की एक जैसी जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गयीं। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती, ना हारी ना बीमारी, ना चिंता ना क्लेश, न लड़ाई न झगड़ा। कुछ भी तो नही था "टेस्ट" बदलने को. वैसे यह सब किस चिड़िया का नाम है, वहाँ के लोग जानते भी नहीं थे।  समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन, मौज-मस्ती। एकरसता से जीवन जैसे ठहर गया था।  

फिर वही हुआ जो होना था। सब जा-जा कर प्रभू को तंग करने, उनके काम में बाधा डालने लग गए। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर रहा होता है। अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है, मंहगाई क्या है, अभाव क्या होता है। उन्हें आलू-प्याज या आटे-दाल का भाव क्या मालुम था।  

भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त कर उसके अनुसार फिर अपना हक़ प्राप्त करना था। पर इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो प्रभू ने काफी चिंतन-मनन के बाद पृथ्वी का निर्माण किया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति। इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी. एकरसता ना रहे इसका पूरा ध्यान रखा गया।  किसी को गोरा, किसी को काला, किसी को पीत, किसी को गेहुंवां वर्ण दिया गया. रहने के लिए भी अलग-अलग वातावरणों की व्यवस्था की गयी।  किसी भी तरह की किसी को भी कोई कमी न हो इसका पूरा ध्यान रख प्रभू ने सब को धरा पर भिजवा दिया।  जहां स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।

अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं। अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भुला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया। पर कुछ पहुंचे हुए भी थे जो नरक के लायक भी नहीं थे,  ऐसे महानुभावों के लिए के लिए पृथ्वी पर ही "व्यवस्था" कर दी गयी।  

अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को भी आपस में अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।

प्रभू निश्चिन्त हो आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

सोच, पहली बार मतदाता बने युवाओं की

 इनमें इक्का-दुक्का ही ऐसे थे जिन्होंने परिपक्वता का कुछ आभास देते हुए शहर के विकास को मद्देनज़र रख अपना मत दिया था। कुछ का मापदंड सायकिल और लैपटॉप रहे। अच्छे खासे प्रतिशत ने अपने परिवार का अनुसरण किया था। कईयों ने ऐसे ही "नाटो" को आजमाया था तो कईयों ने बिना सोचे समझे मौज-मस्ती में पहली बार मिली इस जिम्मेदारी को खिलवाड़ समझ दो-तीन बटन दबा दिए थे बिना परिणाम की चिंता किए।  

अभी-अभी संपन्न हुए चुनावों में लाखों युवाओं को, जो एक आंकड़े नुमी उम्र को पार कर गए थे, शिरकत करने का सिर्फ उस आंकड़े को पार करते ही अवसर मिल गया। आज नहीं तो कल उन्हें इस प्रक्रिया में आना ही था। पर सवाल यह उठता है कि क्या उस आंकड़े को छू जाने से ही बालक से युवा हुआ व्यक्ति क्या इतना परिपक्व हो जाता है कि वह अपनी बुद्धि से अच्छे-बुरे, हानि- लाभ की पहचान बिना किसी बाहरी प्रभाव के कर सके ? बालपन में अपनी ही दुनिया में रहने वाले को अचानक बड्डपन का भार दे क्या उससे यह आशा की जा सकती है कि वह देश की भलाई के लिए देश पर शासन करने वालों का चुनाव कर देश का भविष्य निर्धारित कर सके ? कहने का मतलब यह नहीं है कि यह उम्र अभी कम है या सारे युवा परिपक्व नहीं होते। कभी न कभी तो उन्हें यह भार अपने कंधों पर लेना ही है पर अधिकाँश ऐसे नए मतदाता पेशोपेश में रहते हैं. अपनी समझ, अपनी बुद्धी या अपनी सोच पर दृढ नहीं होते। ज्यादातर अपने परिवार के बड़ों का अनुसरण करते हैं।  कुछेक अपने साथियों के कहने पर चलते हैं, कुछेक के लिए यह छुट्टी की मौज-मस्ती का एक मनोरंजक पहलू होता है।  

यह सत्य मेरे सामने तब आया जब मैंने पहली बार मतदाता बने अपने भतीजे से पूछा कि उसने किसे वोट दिया। उसका जवाब बड़ा अप्रत्याशित था, उसने कहा कि वह सब को खुश रखने के लिए हर बार अलग-अलग दलों को वोट देगा। इस बार "इस" को दिया है अगली बार "उस" को और फिर किसी तीसरे को।  मैंने पूछा ऐसा क्यों ? तो बोला हमारे ग्रुप ने ऐसा ही फैसला किया है। हो सकता है कि अगले एक दो साल में उसे मतदान का महत्व समझ में आ जाए पर उसके पीछे आने वाली पीढ़ी भी क्या ऐसा ही करेगी? 
   
यह सुन मेरे में एक जिज्ञासा जगी कि कुछ ऐसे ही बच्चों से बात की जाए। यह कोई "सर्वे" नही था नहीं किसी नतीजे पर पहुँचने का मार्ग, सिर्फ एक जिज्ञासा को शांत करने का जरिया था। मैंने अलग-अलग जगहों के 100  बच्चों का लक्ष्य रखा था पर समयाभाव के कारण  63 से ही बात कर सका, जिनके जवाब गरीब तो नहीं अजीब जरूर थे।  इनमें इक्का-दुक्का ही ऐसे थे जिन्होंने परिपक्वता का कुछ आभास देते हुए शहर के विकास को मद्देनज़र रख अपना मत दिया था। कुछ का मापदंड सायकिल और लैपटॉप रहे। अच्छे खासे प्रतिशत ने अपने परिवार का अनुसरण किया था। कईयों ने ऐसे ही "नाटो" को आजमाया था तो कईयों ने बिना सोचे समझे मौज-मस्ती में पहली बार मिली इस जिम्मेदारी को खिलवाड़ समझ दो-तीन बटन दबा दिए थे बिना परिणाम की चिंता किए।  
अब सवाल यह उठता है कि क्या हमारी या शिक्षण संस्थानों की जवाबदेही नहीं बनती कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी देने के पहले उस पौध को उसकी गंभीरता से अवगत करवा दिया जाए? उसे बताया और समझाया जाए कि इस जिम्मेदारी की  देश के भविष्य को तय करने में कितनी अहम् भूमिका है।  उनकी नासमझी कितने गलत हाथों को सक्षम बनाने की उत्तरदायी हो सकती है।  

यह तो शहर के पढने-लिखने वाले स्कूली शिक्षा पाने वाले बच्चों का हाल है. सोच कर ही मन घबड़ाता है कि दूर-दराज के ज्यादातर उचित शिक्षा विहीन उम्र के इस आंकड़े को प्राप्त करने वाले युवा कैसे-कैसे प्रलोभनों से और किस-किस से प्रभावित हो कैसे-कैसे लोगों को अधिकार सौंप देते होंगे।    

                 

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