pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

चलें, पकौड़ियां खाने

आज ठाकुर जी मिले तो कुछ अनमने से थे। मैने पूछा भईये क्या बात है? तो उन्होनें अपनी समस्या बताई। "समस्या" बड़ी दिलचस्प थी। उनका कहना था कि बरसाती मौसम में चाट-पकौड़ी खाने की बड़ी इच्छा होती है पर सेहत बिगड़ने का भी डर लगता है। उनकी जिज्ञासा थी कि दोनों इच्छापूर्तियाँ कैसे की जा सकती हैं? 

मैंने कहा लो, कर लो बात यह तो बडा आसान काम है।              
ठाकुर जी चमके, बोले, वो कैसे?
मैंने कहा महाराज, अपने मुंह और जीभ दोनों साथ-साथ रहते हैं, पर जहां मुंह से लिया गया पौष्टिक आहार शरीर को पुष्ट तथा निरोग रखता है वहीं जीभ के चटोरेपन से वही शरीर रोगों का घर बन जाता है। पर इसका यह मतलब थोडे ही है कि बेचारी जीभ को ललचाते ही रहने दो। हां ! बरसात के मौसम में पाचन शक्ति जरूर कुछ कमजोर व मंद पड़ जाती है। इसीलिए ज्यादा तले, मसालेदार, भारी भोजन से हर चिकित्सा में परहेज रखने की सलाह दी जाती है। वैसे भी अति हर चीज की नुकसानदायक होती है। पर यदि संतुलित, कभी-कभार, स्वच्छता से बने ऐसे व्यंजन ले भी लिए जाएं तो कोई हानि नहीं है। और यदि ऐसे पदार्थ घर में बने हों तो बेहतर रहते हैं। पर यदि बाहर खाना ही पड़े तो उन पर बरती गयी सफाई और उनके ताजेपन पर ध्यान जरूर देना चाहिए। यदि कभी लगे कि खाना खाने के बाद कुछ परेशानी हो रही है तो एक चम्मच कच्चा जीरा या अजवायन पानी के साथ ले लें।  कुछ ही देर में अच्छा महसूस होने लगेगा। 
ठाकुर जी चौंके, बोले एकदम कच्चा?
मैंने कहा हां, भाई, आजमा कर तो देखो।
बोले, अभी ले लूं?
मैं बोला, भईये ये भी एक तरह की औषध ही है। फिर इस मौसम में सेहत को सबसे ज्यादा खतरा पीने के पानी के अशुद्ध होने से होता है। इस लिए उसका ख़ास ध्यान रखना चाहिए और हर कहीं के पानी को ना पीने में ही बेहतरी है। पीने का पानी साफ और स्वच्छ हो तो आधा खतरा यूं ही टल जाता है। घर पर पानी साफ करने के दसियों तरीके हैं पर एक सबसे सरल तथा सुरक्षित उपाय है कि पीने के पानी के बर्तन में रात को एक चम्मच अजवायन डाल दें जो पांच-सात लीटर पानी के लिए काफी है। पानी के साथ-साथ इसे भी बदलते रहें। पानी पूरी तरह सुरक्षित रहता है। 

ठाकुर जी आप तो विज्ञान के शिक्षक हैं, आप तो जानते ही हैं कि हमारा शरीर खुद ही अपने को निरोग बनाए रखने में पूरी तरह सक्षम है। फिर भी यदि कुछ  बातें ध्यान में रख ली जाएं तो  स्वस्थ रहते हुए वर्षा ऋतु का पूरा आनंद उठाया जा सकता है। कुछ ज्यादा नही करना है, सुबह की चाय तीन-चार तुलसी के पत्तों के साथ बना कर पीएं। हल्का और सुपाच्य भोजन लें। भारी व्यंजन कम मात्रा और हफ्ते में एकाध बार ही लें।  देर रात या बेवक्त न खाएं। बासी तथा खुले भोजन से बचें। अपच तथा कब्ज न होने दें। स्वच्छ जल ग्रहण करें। बरसात में भीग गए हों तो तुरंत गीले कपडे बदल डालें। फिर देखिए मौसम कितना सुहाना लगता है। 

वैसे अभी क्या विचार है? बारिश की संभावना लग रही है, चलें! चाय के साथ भाभी जी के हाथ के गर्मा-गरम पकौडों का आनंद लेने?  
ठाकुर जी की तो जैसे मन की बात हो गयी, बोले भईये बढ लो, इसके पहले कि कपडे भीग जाएं। 

सोमवार, 8 जुलाई 2013

सौ साला फिल्मों में दोहरे किरदारों का रोल

अब तक 293 दोहरे या ज्यादा किरदार वाली हिन्दी फिल्में बन चुकी हैं। जिनमे सब से ज्यादा नब्बे के दशक में 79 फिल्मों का निर्माण हुआ। एक ही साल में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने का रिकार्ड 1974 का है जिस साल कुल 12 फिल्में इस विधा की बनीं। जबकि सबसे कम ऐसी फिल्में पचास के दशक में बनीं थीं जिनकी गिनती दस थी।

फिल्में खुद अपने आप में एक जादू भरा अजूबा हैं। दादा साहब फाल्के की हिम्मत, साहस, लगन और समर्पण से इस विधा ने हमारे देश में "राजा हरिश्चन्द्र" के रूप में पदार्पण किया। तब से सौ साल हो गये फिल्मों को हमें हंसाते, रुलाते, बहलाते। हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गयीं हो जैसे. इन्हीं की कूवत थी, जिसने थके - हारे - पीड़ित - नकारे,  सर्वहारा  आम आदमी को  एक दूसरी दुनिया  में  ले  जा  कर,  अपने ग़मों को भुला
राजा हरिश्चन्द्र का एक दृश्य 
सपनों के संसार मे जीना सिखाया, भले ही कुछ देर के लिए सही। यह इसी का जादू है कि अंधेरे कमरे में बैठा धनहीन-बलहीन-शोषित दर्शक भी इस के साथ एकाकार हो अपने आप को मुख्य पात्र से जोड खुद को वैसा ही समझने लगता है।  पर्दे पर चलती छायाओं से भरी कहानी में दर्शक अपना दर्द, खुशी यहाँ  तक कि  अपनी जिन्दगी को भी एकाकार कर लेता है। फ़िल्म की कहानी के पात्र के दुःख में आंसू बहाता है और उसकी सफलता पर खुश हो ताली बजाता है। ऐसा नहीं है कि यह बात सिर्फ सिनेमा के हाल तक ही रहती हो कई बार तो पात्र का दुःख-दर्द हफ्तों उस पर तारी रहता है। ऐसी अवस्था से सिर्फ दर्शक ही दो-चार नहीं होते बल्कि बहुतेरी बार अभिनेता को भी अपने निभाए गए चरित्र से निकलने में मशक्कत करनी पड जाती है। पृथ्वी राज कपूर, अशोक कुमार, मोती लाल, दिलीप कुमार, मीना कुमारी, सुचित्रा सेन जैसे निष्णात कलाकार इसके अप्रतिम उदाहरण रहे हैं। 

अब तो खैर हर चीज में बहुत बदलाव आ गया है। इस कला को भी लोग बहुत हद तक समझने-बूझने लग गये
देवानंद 
हैं पर शुरुआत मे तो जैसे ही 'सिनेमा हाल' के दरवाजे पर लटके काले-भारी पर्दे को हटा दर्शक अंदर जाता था तो उसे लगता था जैसे किसी जादूनगरी में प्रवेश कर गया हो। सामने हंसती-गाती छायाओं को अपने आस-पास महसूस कर रोमांचित हो उठता था। डूब जाता था किरदारों के दुःख-सुख मे। सक्षम अभिनेता बहा ले जाते थे अपने अभिनय के द्वारा उसे किसी और लोक मे। भूल जाता था वह इस दुनिया को।

फिर समय, कहानी की मांग और कुछ नये की चाहत में पर्दे पर एक नये आविष्कार ने जन्म लिया, एक अनोखा माया जाल रचा गया। एक ही नायक या नायिका के दो रूप यानी "डबल रोल" का। इसने तो जैसे हंगामा ही मचा दिया। दर्शक भौंचक्का रह गया। फिल्म देखते हुए उसका ध्यान इसी उधेड़बुन में लगा रहता था कि आखिर ये दृश्य फिल्माया कैसे गया होगा। कैमरा ट्रिक का राज बाद

नरगिस 
में साफ होता तो चला गया। पर किरदारों का डबल रोल हिट फॉर्मूले के रूप में निर्माताओं द्वारा अपना लिया गया। क्योंकि डबल रोल का मतलब एक ही टिकट में डबल मजा। अपने चहेते नायक को और ज्यादा देर पर्दे पर देखने का मौका। दर्शक इसी लालच से सिनेमाघर तक खिंचने लगे। ये चलन बरसों चला। दशकों पहले के पारंगत तलवारबाज हीरो रंजन से लेकर अभी हालिया रीलीज औरंगजेब तक बीसीयों  अभिनेताओं ने  परदे पर दो - दो किरदार जीए.  देश की  हर  भाषा में  बनने  वाली फ़िल्म में ऐसे प्रयोग किए जाते रहे। जिनमे बहुतेरे सफल भी हुए और लोकप्रिय भी।  बीच में तीन-तीन किरदारों और एकाध बार नौ किरदारों को लेकर भी फिल्में रची गयीं पर ये प्रयोग उत्कृष्ट अभिनय के बावजूद सफल नहीं हो पाए।  

मगर यह सब इतना आसान भी नहीं था। हिन्दी फिल्मों में पुरुष और महिला कलाकारों द्वारा इस तरह की ढेरों कोशिशें की गयी हैं। पर दिलीप कुमार, देवानंद, संजीव कुमार, वैजंयती माला, साधना, हेमा मालिनी आदि कुछ चंद कलाकारों के ही रोल याद रखे जा सके। 

दिलीप कुमार 
वैसे डबल रोल की शुरुआत एक मजबूरी के तहत शुरू हुई थी। 1917 की फिल्म लंका दहन में मराठी फिल्मों के अभिनेता हरि सालुंके ने स्त्री पात्र ना मिलने की मजबूरी में और कोई उपाय न होने के कारण राम और सीता की दोहरी भूमिका की थी। पर उसे डबल रोल नहीं कहा जा सकता। 1932 की फिल्म "आवारा शहजादा" में पहली बार अभिनेता साहू मोदक ने राजा और रंक की दोहरी भूमिका की। कालांतर में यह प्रयोग कई कलाकारों के लिए बेहद आकर्षण का विषय बन गया। असल में डबल रोल हमेशा एक जिज्ञासा का विषय रहा है। हर अच्छा अभिनेता, जो कुछ हासिल करना चाहता है, इस चुनौती को कबूल करता है। अमिताभ, सलमान, अक्षय हो या शाहरुख, कोई भी इस सम्मोहन से नहीं बच पाया है। सिर्फ आमिर खान के विज्ञापनों को छोड दें तो उन्होंने अभी तक किसी फिल्म में डबल रोल नहीं किया है। 

महमूद 
असल मे हीरोइनों से ज्यादा हीरो में यह डबल रोल करने की चाहत ज्यादा होती है। इसलिए ज्यादातर
हीरोज ने डबल रोल करने का अपना शौक पूरा किया है। जहां तक हीरोइन का सवाल है, उन्हें  इस मामले में ज्यादा मौके नहीं मिल पाए हैं फिर भी  नरगिस, शर्मिला टैगोर, राखी, हेमा मालिनी, नीतू सिंह, माधुरी दीक्षित, श्रीदेवी, काजोल आदि कुछ हीरोइन को यह मौका मिला और उन्होंने इसे भलीभांति निभाया भी। । एकाध अपवाद की बात जाने दें, तो डबल रोल में इनके अभिनय की खूब तारीफ भी हुई। हेमा मालिनी ने सीता और गीता में, वैजंती माला ने मधुमती में, साधना ने वह कौन थी में  अपने अभिनय की बुलंदीयों को छुआ था। बड़े कलाकारों ने ही नहीं बाल कलाकारों ने भी इस तरह के किरदार को बखूबी निभाया है। दो कलियाँ में बाल कलाकार के रूप में दोहरे अभिनय से नीतू सिंह ने सब का मन मोह लिया था। हास्य कलाकारों में एक ही फ़िल्म में महमूद ने तीन-तीन विभिन्न किरदारों को जीवंत कर डाला था।  

अंगूर में संजीव कुमार 
शुरू से अब तक 293 दोहरे किरदार वाली हिन्दी फिल्में बन चुकी हैं। जिनमे सब से ज्यादा नब्बे के दशक में 79 फिल्मों का निर्माण हुआ। एक ही साल में सबसे ज्यादा फिल्में बनाने का रिकार्ड 1974का है जिस साल कुल 12 फिल्में इस विधा की बनीं। जबकि सबसे कम ऐसी फिल्में पचास के दशक में बनीं थीं जिनकी गिनती दस थी।

दोहरे किरदार में सबसे ज्यादा काम करने का श्रेय अमिताभ बच्चन को जाता है जिन्होंने अब तक ऐसे बाईस  किरदार निभाए हैं, जिनमे हिन्दी फिल्मों की संख्या पन्द्रह है। जानकार आश्चर्य होगा की दूसरे नम्बर पर कादर खान हैं, जिन्होंने चौदह ऐसी फिल्में की हैं। अभिनेत्रियों में हेमा मालिनी तथा श्रीदेवी ने दोहरे चरित्र की 6 - 6 फिल्में की हैं। एक ही फ़िल्म
अमिताभ 
में सर्वाधिक किरदार निभाने का कीर्तीमान अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के नाम है, जिन्होंने एक ही फ़िल्म में 12 रोल अदा किए थे। पुरुषों में एक ही फ़िल्म में सर्वाधिक 9 रोल संजीव कुमार ने निभाए हैं।  त्रिकाल एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें 5-5 लोगों ने ऐसे चरित्र निभाए हैं। दूसरे स्थान पर तुम्हारे लिए नाम की फ़िल्म है जिसमें ऐसे किरदारों की संख्या चार है।         

पर हर चीज का समय होता है  अब सितारों के डबल या ज्यादा रोल वाली कई फिल्मों के बॉक्स ऑफिस पर कोई करिश्मा नहीं दिखा पाने के कारण इस फॉर्मूले का चलन भी कम हो गया है। कलाकार की प्रस्तुति और अच्छी कहानी होने पर ही किसी कलाकार का डबल रोल यादगार साबित होता है। डबल रोल का अर्थ है दो बिल्कुल विभिन्न किरदार। अच्छे अभिनेता और बिकाऊ हीरो में फर्क होता है। पर विडंबना है कि ज्यादातर डबल रोल समर्थ अभिनेता की बजाए बिकाऊ हीरो को ही मिलते हैं। बड़े हीरो दर्शकों को पसंद आने वाले अपने खुद के गढ़े  "मैनरिज्म" यानी अदाओं की कैद में ही रहना
हेमा 
चाहते हैं। इसीलिए उनके द्वारा निभाये गए दोहरे किरदार फ़िल्म में कहीं ना कहीं एक दूसरे में गड्ड-मड्ड हो अपना असर खो देते हैं। अक्सर ऐसी फिल्मों की यह चूक खुलकर सामने आ जाती है। 

अभी तक की श्रेष्ठ डबल रोल वाली यादगार कुछ फिल्मों पर नज़र डालें तो ये फिल्में भूले नहीं भूलाई जा सकतीं।
नीतू सिंह दो कलियाँ में 
देव आनंद-हम दोनों, दिलीप कुमार-राम और श्याम, संजीव कुमार-अंगूर और नया दिन नई रात, देवेन वर्मा-अंगूर, किशोर कुमार-असित सेन की दो दूनी चार, राजकुमार-कर्मयोगी, महमूद-हमजोली, धर्मेद्र-गजब, अमिताभ-आखिरी रास्ता, अनिल कपूर-कृष्ण कन्हैया, कमल हासन-अप्पू राजा,  नरगिस-अनहोनी, हेमा मालिनी-सीता और गीता, काजोल-दुश्मन,  शर्मिला टैगोर-मौसम आदि।

दिलीप कुमार  की "राम और श्याम" तथा  संजीव कुमार की "अंगूर"  को दो श्रेष्ठ उदाहरणों में गिना जा सकता है। 

शनिवार, 6 जुलाई 2013

क्या शिव सिर्फ उत्तर के हैं और विष्णू दक्षिण के ?

 ऐसा लगता है जैसे धर्माधिकारियों में आपस में अलिखित समझौता हो गया हो कि अपने-अपने हिस्से में आए प्रभुओं की देख-रेख, रख-रखाव, हानि-लाभ सब अपने-अपने हिसाब से करेंगे। उत्तर के देव के काम में दक्षिण के प्रभू कुछ नहीं बोलेंगे। मध्य के देव, पूर्व की देवियों के मामले में चुप रहेंगे। पश्चिम वाले खुद अपना मामला निपटायेंगे !!! 

उत्तराखंड की आपदा ने अनेक कटु सत्यों को उजागर कर दिया है। जैसे रिसते घाव पर से पट्टी हटा, सेना के जवानों के अथक परिश्रम के बावजूद मवाद बह निकला हो। हमारी बेवकूफियां, मतलबपरस्ती, ह्रदयहीनता, धन-लोलूपता, दो मुंही चरित्रता, लंपटता, मौकापरस्ती यह सब, छोटी-मोटी मानवीय सद्भावनाओं और कोशिशों के बावजूद, दुनिया के सामने उजागर हो गयी हैं।

हमने अभी तक अपने-आप को ही बांट रखा था, दिशा के हिसाब से, भूगोल के हिसाब से, धर्म के हिसाब से, जाति और हैसियत के हिसाब से। पर अब तो इस त्रासदी से लगता है कि हमने अपने-अपने भगवानों को भी बांट लिया है। जैसे छोटे-छोटे क्षेत्रों की हमने अपनी सुविधानुसार पार्टियां बना देश की ऐसी की तैसी कर दी है, वैसे ही अलग-अलग भगवानों को अलग-अलग क्षेत्रों तक सिमित कर छोड़ा है.  अब तो ऐसा एहसास हो रहा है कि आज इंसान भगवान के वश में नहीं, भगवान इंसान के वश में हो गया है। हमने उसके पूजा-पाठ, दर्शन, अर्चना सब का समय निर्धारित कर दिया है। जब चाहे उसे उठाते हैं, जब चाहे सुलाते हैं और जब इच्छा हो ताले में बंद कर रुख्सत हो लेते हैं। उसके नाम का दुर्पयोग कर अथाह धन-राशि एकत्रित करते रहते हैं और उसे अपनी बपौती मान उसका उपयोग सिर्फ अपना भविष्य  संवारने और अपने मन-मुताबिक खर्च करने  में  जुटे रहते हैं।

हमारे धर्म प्रधान देश में धर्म-भीरुता के चलते छोटे-बडे लाखों धर्म स्थल जगह-कुजगह मिल जाएंगे। उनमें से हजारों ऐसे हैं जिनकी साल भर की आमदनी से देश का भविष्य सुधर जाए। और कुछ तो ऐसे हैं जिनकी संपत्ति का कोई पार नहीं है, वे साक्षात कुबेर का निवास स्थान हैं। ठीक है उससे किसी को कोई गुरेज या परेशानी नहीं है, होनी भी नहीं चाहिए, सब आस्था का खेल है। पर विडंबना यह है कि ऐसी भयंकर विपदा के समय, जब देश के हर कोने और हर समुदाय से सहायता की पेशकश की जा रही है तो ये धर्मस्थान चुप्पी साधे बैठे हैं। अपने-अपने स्वार्थों और हितों के चलते हमने सर्वोच्च सत्ता का भी शायद बंटवारा कर दिया है। ऐसा लगता है कि जैसे आपस में अलिखित समझौता हो गया हो कि अपने-अपने हिस्से में आए प्रभुओं की देख-रेख, रख-रखाव, हानि-लाभ सब अपने-अपने हिसाब से करेंगे। उत्तर के देव के काम में दक्षिण के प्रभू कुछ नहीं बोलेंगे। मध्य के देव, पूर्व की देवियों के मामले में चुप रहेंगे। पश्चिम वाले खुद अपना मामला निपटायेंगे।   

भगवान ना करे ऐसा हो, पर क्या कारण है कि दुर्घटना के इतने दिनों बाद भी हर तरह से सक्षम इन देव स्थलों से किसी तरह की भी राहत की पेशकश नहीं की गयी। क्यों कोई सुगबुगाहट अभी तक सुनाई नहीं पड रही?

शुक्रवार, 28 जून 2013

कायनात को दोस्त बनाना ही पडेगा

सही मानिए, जिस दिन इस "कब" का उत्तर मिल जाएगा, उस दिन से कोई आपदा, विपदा, त्रासदी प्रलयंकारी हो कर हमें इतना नहीं सताएगी. क्योंकि तब प्रकृति का दोस्ताना हाथ हमारे साथ होगा.   

उत्तराखंड हादसे के भी कई रूप हैं। वहाँ  रहने वालों के लिए यह महाविनाश का रूप था, जिसमे उनका घर-द्वार, रोजी-रोटी सब छीन गये.  वहाँ गए तीर्थ यात्रियों के लिए भयंकर प्रकोप था, जिसके कारण उन्हें शारीरिक, आर्थिक कष्टों के साथ-साथ अपने प्रिय जनों से बिछुड़ने का गम जीवन भर सालता रहेगा.  प्रकृति की यह विनाश लीला थी, जिसने जीव-जड़ सबका संतुलन बिगाड़ कर रख दिया।

पैसों के साथ पकडे गए कथित साधू 
बहुतेरे लोगों के लिए यह विपदा पैसा बनाने का जरिया भी बन गयी, जिसमे कुछ लोग अमानुषिकता की हदें भी पार कर गये. कुछ मतलब परस्त नेताओं की मौकापरस्ती भी इससे उजागर हो उनकी हकीकत बयान कर गयी.  पर इसके साथ ही लोगों को मिसाल भी देखने को मिली जब कुछ "बाहर वालों" ने बिना किसी हिचक, या लालच के अपने आस-पास के क्षेत्र को साफ करने की ठान ली. पर दुःख यही है की उनके इस काम से भी किसी ने सबक लेने की जहमत नहीं उठाई।    

इस हादसे का कारण देखा जाए तो प्रकृति जनक कम, इंसान द्वारा निर्मित ज्यादा था. मानव के पैर जहां भी पड़े वहीं उसने उस जगह को मलबा घर बना डाला. फिर वह चाहे हिमालय हो या फिर सुदूर स्थित च्न्द्र्मा. चाहे सागर की गहराईयाँ हों या फिर रेगिस्तान. ऐसे ही जानते-बुझते, पैसों के लालच में पहाड़ों में जगह-जगह वैध-अवैध निर्माण, खनन, वृक्षों की कटाई ने प्रकृति को दोस्त की जगह दुश्मन बना दिया। इसी लिए वर्षों से छिट-पुट हादसों द्वारा अपनी नाराजगी को नजरंदाज करने वालों को आखिर कायनात ने एक करारा झटका  में और  नहीं की.  पर लगता नहीं कि हमने अभी  भी कोई सबक सीखने की कोशीश की है.
चहुं ओर बर्बादी  

सालों-साल से हमारी आदत रही है योरोप या पश्चिम को बुरा कहने की और नीचा साबित करने की। उनकी बुराईयाँ सदा हमें आकृष्ट करती रहीं, पर हमने उनकी अच्छाईयों को सदा नकारा और नजरंदाज किया है. इस   हादसे से बचे लोगों के किसी भी कैंप-शिविर-पनाहगाह को लें, जगह-जगह खाली प्लास्टिक के ग्लास, कागज़ की प्लेटें, खाली रैपर, कार्टंस बिखरे दिख जाएंगे, एक जगह इकट्ठा कर डालने की व्यवस्था होने के बावजूद. हमें इसकी आदत पड़ी हुई है. पर कुछ लोग हैं जिन्हे ऐसी बेतरतीबी रास नहीं आती. ऐसे ही एक जर्मन माँ-बेटे को
Jodie Underhill
ऋषिकेश के बस अड्डे पर लोगों ने वहाँ बिखरी पड़ी, गंदगी फैला रही चीजों को हटा कर कूड़ेदान में डालते देखा। रैमो नाम के बालक की उम्र मात्र नौ साल की है और सफाई की पहल भी उसी ने अपनी माँ से पूछ कर की. दिन-रात काम में लगे सफाई कर्मियों ने उसे हाथ के ग्लव्स जरूर दिए पर वहाँ बैठे लोगों ने न कोई सहायता ही की नहीं गंदगी कम करने की कोशिश. ऐसा ही एक उदाहरण है ब्रिटेन की Jodie Underhill जो देहरादून में Garbage Girl के नाम से जानी जाने लगी है, बिना किसी लालच के, वर्षों से  जुटी हुई है सफाई अभियान मे. उसे तो अब स्थानीय लोगों की सहायता भी मिलने लग गयी है. एक तरफ हम हैं जो आज कुछ न कर सिर्फ दुहाई देते हैं अपने अतीत की। गर्व करते हैं किसी जमाने के अपने जगद गुरु होने का। गर्व करते हैं अपनी पुरानी गौरव-संपदा का.  दूसरी तरफ हैं ऐसे कुछ लोग जो बातों में नहीं कर्म में विश्वास करते है. 

पर हम कब लाएंगे अपनी आदतों में सुधार. कब मूंगफली खा रेल के डिब्बे में छिलके ड़ालना बंद करेंगे? कब बसों-कारों से खाली पानी की बोतलें या रद्दी कागज़ बाहर उछालना छोड़ेंगे? कब अपना घर साफ कर अपने घर का कूडा दूसरे के दरवाजे के सामने सरकाना बंद करेंगे? कब अपने टामी-टमियाइन की गंदगी से सडकों-गलियों को निजात दिलवाएंगे ?  कब? कब?

सही मानिए, जिस दिन इस कब का उत्तर मिल जाएगा, उस दिन से कोई आपदा, विपदा, त्रासदी प्रलयंकारी हो कर हमें इतना नहीं सताएगी. फिर यदि हमने अपना वजूद बचाना है तो कायनात का हाथ थामना ही पडेगा.

मंगलवार, 25 जून 2013

यह बांए हाथ का खेल नहीं है

बाएं हाथ के लिए कैंची 
हमने अपने सगे-संबंधियों, जाने-पहचाने, अड़ोस-पड़ोस में या मशहूर बहुत सारे लोगों के बारे में पढा, सुना या देखा होगा कि वे लोग अपना ज्यादातर काम अपने बायें हाथ से निपटाते हैं। इसे हमने प्राकृतिक तौर पर ही लिया भी होगा। पर कभी भी इनकी मुश्किलों पर ना तो ध्यान ही दिया  होगा और न ही कभी सोचा होगा। यदि आप दाहिने हाथ से काम करने वाले हैं तो एक बहुत छोटा सा काम कर देखिये। एक कैंची लीजिए और अपने बायें हाथ से उससे कुछ भी, कागज, कपड़ा या अपनी मूछें, कतरने की कोशिश कर देखिये क्या होता है। फिर सोचिए बाएं हाथ से काम करने वालों की परेशानी को। हर चीज चाहे वह कैंची हो या स्क्रू कसना हो, कैमरे के बटन हों या कमीज के सब दाहिने हात को ध्यान में रख कर ही तो बनते हैं। कभी-कभी तो भारी मशीनें बांए हाथ वालों के लिए जान जोखिम की वस्तु बन जाती है जब उसे "हैंडल" करने में कठिनाई होती है। यह तो वाम-हस्त वालों की कुशलता होती है जो ऐसी परिस्थितियों को जल्द अपने अनुसार ढाल लेते हैं। अपनी इसी काबलियत से कभी-कभी तो खेलों में बांए हाथ वाले खिलाडी दाएं हाथ वालों पर भारी पड जाते हैं। क्रिकेट इसका बढिया उदाहरण है। अब तो बांए हाथ से काम करने वालों के क्लब, जो 1990 में स्थापित हुआ था, ने  1992 से 13 अगस्त को  "International Left-Handers Day  के रूप में मनाना शुरू कर दिया है.      

खब्बू की-बोर्ड 
पहले बांए हाथ के लेखकों को लिखने में जो  कुछ दिक्कतें आती थीं वह भी अब  आधुनिक तकनीकी की इजाद QWERTY कम्प्यूटर की-बोर्ड से दूर हो गयीं हैं। जिसमे करीब 56 प्रतिशत टाइपिंग बांए हाथ से की जाती है. अंग्रेजी के 3000 शब्दों की तुलना में सिर्फ 300 शब्द ही दाएं हाथ से टाइप किए जाते हैं. दुनिया में ज्यादातर लोग अपने दायें हाथ से काम करते हैं। इसीलिये उन्हीं को मद्देनजर रख औजार या मशीनेबनाने वाली कंपनियां अपने उत्पाद बनाती हैं। पर इनकी मुसीबतों और तादाद को देखते हुए आस्ट्रेलिया के एक व्यवसायी ने बायें हाथ से काम करने वालों की मुश्किलों को दूर करने के लिये अपने उत्पाद 'लेफ्ट हैंडेड प्रोडक्टस' के नाम से बनाने शुरु कर दिये हैं। एक पन्थ दो काज, अपना और दूसरों का भला एक साथ।
यह तो विज्ञान ने साबित कर दिया कि दोनों तरह के लोगों में कोई फर्क नहीं होता नहीं तो सदियों से बायें हाथ से काम करने वालों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था। एक समय था जब इंग्लैण्ड में बाएं हाथ से काम करने वालों को "नाइट" की उपाधी नहीं  दी जाती थी। क्योंकि ऐसा समझा जाता था कि  उनमे शैतान  का अंश है। यहां तक कि इन्हें भूत-प्रेत की संज्ञा देकर मार डालने तक की कोशिशें भी होती रहती थीं। इसी डर से बहुत से मां-बाप अपने बायें हाथ का उपयोग करने वाले बच्चों को जबरन राइट हैंडेड बनाने की कोशिश किया करते थे। पति अपनी बायें हाथ से काम करने वाली पत्नि को त्यागने में गुरेज नहीं करते थे। मार-पीट, प्रताड़ना तो आम बात थी। आज भी रूस, जापान, जरमनी और यहां तक की अपने देश भारत में भी कहीं-कहीं बायें हाथ का इस्तेमाल अशुभ माना जाता है। 

वाम-हस्त के लिए घड़ी 
पर अब बाएं हाथ से काम करने वालों के लिए खुशखबरी है की कुछ सालों पहले तक दुनिया की आबादी में  उनका 11 प्रतिशत अब बढ़ कर 13 प्रतिशत हो गया है। और फिर पहले की एक मिथ्या धारणा का भी अंत हो गया है कि दाहिने हाथ से काम करने वालों की जिन्दगी लम्बी होती है। अब तो खोजों से यह भी पता चला है की जानवर भी दाएं या बाएं  हाथ वाले होते हैं, जिसमे वाम-हस्तीय  ध्रुवीय भालू सबसे अच्छा उदाहरण है।  सुन कर बहुत अजीब लगता है कि कभी योरोप में लोग सिर्फ बांयी ओर  ही चलना पसंद करते थे जिससे किसी झगड़े के दौरान दायीं ओर तुरंत वार किया जा
सके तथा महलों में घुमावदार सीढ़ियां  भी दाहिने हाथ से काम करने वालों को ध्यान में रख कर बनाई जाती थीं।

वह तो फ्रांस का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि उसने ऐसी प्रथा को तोडा। आज संसार में ज्यादातर गाड़ियां दाहिने हाथ वाली होती हैं फिर भी करीब 65 देशों में अभी भी "लेफ्ट हैण्ड ड्राइव" लागू है। फ्रांस शायद अकेला देश है जहां रेल गाड़ियां तो बायीं तरफ चलती  हैं पर हवाई जहाज और नौकाओं को दाहिने हाथ की ओर से चलाया जाता है।

यह आम धारणा है कि दिमाग का दाहिने तरफ का हिस्सा शरीर के बांए हिस्से को जो संगीत, भावनाओं और अनुसंधान इत्यादि के लिए जिम्मेदार होता है, और बांयीं तरफ़ का हिस्सा शरीर के दाहिने हिस्से को कंट्रोल करता है जो गणित, विज्ञान, भाषा इत्यादि के लिए जिम्मेदार होता है। पर ऐसा क्यूं है इसका उत्तर मिलना अभी बाकी है।  


   

शनिवार, 22 जून 2013

हम और हमारा इतिहास ऐसा तो न था !!!

शुरू-शुरू में जब पहाड़ों पर पानी बरसने की खबरें आईं तो किसी ने उसकी भयावहता का अंदाज न लगाते हुए उसे हल्के से लेते हुए, मौसम की बारीश के रूप में ही लिया था। फिर जब उसकी तस्वीरें सामने आईं तो लोगों के रौंगटे खड़े हो गए, दिल हिल गये। पर अब जो खबरें आ रही हैं या भुग्तभोगी बता रहे हैं उससे तो सबके सिर शर्म के मारे नीचे हुए जा रहे हैं। चार-चार , पांच-पांच दिनों से भूखे प्यासे लोगों की सहायता तो दूर, उन्हें दुत्कारा जा रहा है।  चार-पांच रुपये के बिस्कुट के पैकेट के 200 रुपये, पानी की एक बोतल के 100 रुपये, एक रोटी के 180 रुपये, थोड़े से चावलों के लिए 500 रुपये, आधे पेट भोजन के लिए 1000 रुपये तक वसूले जा रहे हैं। ना दे पाने की स्थिति में दुत्कारा जा रहा है।  यहां तक कि छोटे बच्चों का रोना-कल्पना भी पत्थर  दिलों को पिघला नहीं पा रहा। सुनने में तो यहां तक भी आया है कि लोग अपने बच्चों के लिए पैसा न होने की स्थिति में हजारों रुपयों की सोने की वस्तुएं 200-300 रुपये में दे खाना खरीदने पर मजबूर हो रहे हैं।

जान बचाने की कीमत वसूलने में गाड़ी-घोड़े वाले भी पीछे नहीं हैं, जोशीमठ से ऋषिकेश तक के लिए टैक्सीवाले 15000-15000 रुपयों की मांग कर रहे हैं। हेलीकाप्टर सेवा देने वाली कंपनियां जो दिन भर के हिसाब से पैसा लेती थीं अब घंटों के हिसाब से पैसा वसूलने लग गयी हैं। यात्रियों को यह समझ नहीं आ रहा की वे कुछ खा कर शरीर को बचाएं या भूखे-प्यासे रह, पैसे बचा, घर पहुँचने का इंतजाम करें।

प्रकृति के प्रकोप से किसी तरह जिनकी जान बच भी गयी है वे अब इंसान की लंपटता-लालसा के शिकार बन रहे हैं।  मानवीय संवेदना, इंसानियत, भलमानसता इन सब शब्दों के चिथड़े-चिथड़े हो चुके हैं। आदमी, आदमी की मजबूरी का फ़ायदा उठाने से बाज नहीं आ रहा। वह भी भगवान के निवास में, उसकी नाक के नीचे। अभी भी वह पकृति के कोप, प्रभू की टेढ़ी चितवन को पहचान नहीं पा रहा है। और इसमें कोई आश्चर्य की या बड़ी बात भी  नहीं है कि यदि कहीं किसी के द्वारा भ्रष्टाचार निवारण की बात उठाई जाती है तो ऐसे लोग वहाँ भी हाथ उठा चिल्ला-चिल्ला कर दूसरों पर दोष मढ़ते दिखाई देते हों। अपना दुष्कर्म न तो किसी को दिखाई पड़ता है नाही कोई उसे याद रखता है।    

समझ में नहीं आता कि ऐसा करने वाले क्या उसी देश के वाशिंदे हैं जिस देश के किस्से-कहानियों में सदा मुसीबतजदा की सहायता की बातें की गयी हों।  जिनमे अपनी जान पर खेल कर दूसरों की जान बचाने की शिक्षा दी गयी हो। जिनमे पशु-पक्षी, पेड़-पौधे सभी वस्तुओं में अपने जैसा जीवन मान उन्हें यथासंभव संरक्षित करने पर जोर दिया गया हो। वहीं चंद सिक्कों के लाभ के लिए बच्चों तक को दरकिनार किया जा रहा है। उनका भूख के मारे रोना, चीखना-चिल्लाना भी किसी के मन में दया का संचार नहीं कर पा रहा।

वैसे इस कठोरता का एक पहलू और भी है। अधिकाँश स्थानीय लोग भविष्य की आशंका से सहमे हुए हैं। उन्हें डर  है की अभी तो मानसून पूरी तरह शुरू भी नहीं हुआ है, आने वाले दिनों में न जाने क्या हाल हो, इस लिए भी वे अपनी जरूरत की वस्तुओं को बचा कर रखना चाहते हों।  वैसे इसी बीच इक्का-दुक्का ऐसी भी खबरें आयीं हैं जिनमें कहीं-कहीं कुछ गांव वालों या लोगों ने बिना किसी लालच के जहां तक हो सका है बेबसों की सहायता की है। पर ऐसा बहुत कम ही हो पा रहा है। 

एक कहावत है "यथा राजा तथा प्रजा।"  तो क्या यह सब आजकल की संस्कृति, माहौल या चलन का फल है ?  क्योंकि  हम और हमारा इतिहास ऐसा तो न था !!!

शुक्रवार, 21 जून 2013

नमक के कुछ नमकीन उपयोग

दुनिया में हर चीज की अच्छाई और बुराई होती है। अब जैसे नमक को ही ले लें, हजारों-हजार साल से मनुष्य इस सस्ती प्रकृति-प्रदत्त नियामत का उपयोग करता आया है। पर आजकल अपनी अनियमित दिनचर्या के कारण खराब होती सेहत का दोष इसे भी मान मानव शरीर पर इसके दुष्प्रभाव का इतना प्रचार किया गया है की इसे लोग विष की तरह मानने लग गए हैं। पर ऐसा है नहीं।  अति तो हर चीज की खराब होती है और नमक भी इसका अपवाद नहीं है। सच्चाई यह है की इसकी एक संतुलित मात्रा हमारे शरीर के लिए अति आवश्यक है। यह तो रही शरीर की बात,  इसके अलावा भी रोजमर्रा के कामों में भी यह काफी काम की चीज है। आजमाएं इसके कुछ उपयोग -            

#  खाना बनाते समय या चिकनाई से कहीं आग लग जाए तो तुरंत उस पर नमक छिड़क दें। आग बुझ जाएगी। 

# मधुमक्खी या बर्र ने डंक मारा हो तो उस जगह को नाम कर नमक से धक् दें, आराम मिलेगा।

# अखरोट या बादाम जैसे सूखे मेवों का छिलका आराम से उतारने के लिए उन्हें घंटे भर के लिए नमक के पानी में डुबो दें, छिलका निकालने में आसानी होगी। 

# दरवाजों-खिड़कियों और चींटीयों के आने जाने के रास्तों पर नमक का छिड़काव कर दें, उनसे निजात मिल जाएगी।  

# अनचाही घास या पौधों से छुटकारा पाना हो तो उन पर नमक डाल कर  गरम पानी डाल दें, आपकी परेशानी तो दूर हो ही जाएगी वह भी बिना पर्यावरण को नुक्सान पहुंचाए।  

# यदि आपका  पालतू जूओं इत्यादि कीड़ों  से परेशान हो तो उसके बसेरे और उसकी उपयोग वाली चीजों को नमक मिले पानी से धो डालें। यदि घर में कारपेट वगैरह में कीड़ों का प्रकोप हो तो उस पर नमक छिड़क कर ब्रश कर दें।   

# गलती या जल्दबाजी में अंडा फर्श पर गिर जाए तो उस पर नमक डाल दें। 15-20 मिनट बाद आसानी से जगह साफ हो जाएगी। 

# कभी-कभी प्रेस करने वाली आयरन पर दाग पड जाते हैं, इनको दूर करने के लिए वैक्स-पेपर पर नमक डाल इस पर प्रेस घुमाएं, दाग मिट जाएंगे। 

# ओवन में कुछ गिर गया ह तो उस पर नमक डाल कुछ गरम कर दें। जगह साफ हो जाएगी।  

# चाय, कॉफी के प्यालों में दाग पड  गए हों तो उनमें नमक और बर्फ के टुकडें डाल आधा घंटा छोड़ दें, फिर धो डालें, कप नए जैसे हो जाएंगे।    

# मोमबत्ती को गाढे नमकीन पानी में कुछ घंटे तक भिगो कर सुखा कर रख लें। वह बिना ज्यादा पिघले देर तक जलेगी।  



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