pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 5 जून 2013

आज का दिन गहन चिंतन का है

आज विश्व पर्यावरण दिवस है। प्रदूषित होते अपने वातावरण को सुधारने की ओर ध्यान दिलाने का दिन। वैसे अपनी पृथ्वी, अपनी धरा, अपने संसार को बचाने के लिए किसी एक ही दिन सोचना कुछ औपचारिक लगता है क्योंकि यह समस्या धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करते जा रही है। इसी के फलस्वरुप आजकल सूरज का प्रकोप कुछ इस कदर बढ़ गया है कि समूचा देश त्राहि-त्राहि कर रहा है, खासकर मध्य से उत्तर भारत में दिन के शुरू होते ही सूरज सिर के ऊपर चढ़ आता है और देर रात तक उसकी मौजूदगी का तीखा एहसास बना रहता है। लोगों के लिए लू के थपेड़ों के बीच चलना दुस्साहस की मांग करता है। पशु-पक्षियों के लिए पानी की जरूरत पूरा करना जान लेवा होता जा रहा है। पेड-पौधे झुलस के रह गये हैं।

राहत के तमाम कुएं सूख चुके हैं और तालाबों में पानी नहीं के बराबर बचा है। मानसून को पूरे देश में पहुंचने में अभी भी विलंब है। अधिकांश राज्यों में पारा 40 के ऊपर बना हुआ है। वैसे देखा जाए तो सूरज का यह प्रकोप या रूप नया नहीं है। गर्मियां तो सदा से ही प्राकृतिक रूप से अपने नियमानुसार आती ही रहती थीं। पर तब प्रकृति के साथ हमारा रिश्ता मधुर हुआ करता था, हमारे जीवन में तब मशीनों का इतना दखल नहीं हुआ था। भीषण गर्मियों में भी तब कुओं, तालाबों, सरोवरों में इफरात पानी होता था। बाग-बगीचों, पेड-पौधों, जंगलों की भरमार थी जो झुलसा देने वाली गर्म हवा से बचने का वायस होते थे। वर्षों पहले जब पंखे, कूलर, वातानुकूलन यंत्र नहीं होते थे तब भी इंसान सकून से समय बिता लेता था। क्योंकि प्रकृति उसकी सहायक हुआ करती थी। पर हमारी बेवकूफियों का ही यह नतीजा है कि आज अधिकांश आबादी को "टायलेट और दुषित" पानी को ही कुछ हद तक साफ कर फिर काम में लाना पड रहा है.  

इतिहास गवाह है कि दुनिया की महान सभ्यताएं नदी किनारों पर ही बसती पनपी थीं। आज सभ्यता बड़े-बड़े टाउनशिपों में पलती-पनपती है। जहां पानी की अविरल आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं है। पानी के अभाव का आलम यह है कि गर्मी के इस मौसम में राष्ट्रीय राजधानी में जलापूर्ति टैंकरों के भरोसे है, तो सोचा जा सकता है की बाकी राज्यों और शहरों का क्या हाल होगा.  ज्यादातर नदियां सूख कर अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं। विडंबना है कि गर्मियों में अधिक मांग होने के कारण जब बिजली की कमी हो जाती है, तो पानी का भी अभाव हो जाता है।

आज मनुष्य के हित के लिए विकास अवश्यम्भावी है। पर उसी विकास के साधनों का अधिक इस्तेमाल करने के कारण पृथ्वी गर्म हो रही है। ऊपर से सूरज का प्रकोप, इन दो पाटों के बीच अपने जीवन को दुभर बनाने का  दोषी भी इंसान ही है। इसीलिए हर बार गर्मी के हर मौसम में हम सब को ऐसा कष्ट झेलना पडता है। इसके बावजूद हम अपने रहन-सहन का ढर्रा बदलने के बारे में नहीं सोचते। हमें लगता है कि  जब हमारे पास पूरा पानी है तो चिंता काहे की. पर यह समस्या व्यक्तिगत नहीं है। आने वाले दिनों में इसकी गिरफ्त में सारा संसार आने वाला है.  अभी भी कुछ नहीं बिगडा है। अभी भी सही दिशा में उठाया गया हमारा एक कदम आने वाली पीढ़ियों को सुख-चैन से जीने का अवसर दे सकता है. 

मंगलवार, 4 जून 2013

टूटना छींके का बिल्ली के भागों

अपने यहां चुनावों का मतलब त्यौहार है। आमतौर पर त्यौहारों पर आम-जन खुश, उम्मंगित और उत्साहित रहता है। पर बाकी त्यौहारों और इस त्यौहार में मूल फर्क यह होता है कि और उत्सवों पर नागरिक अपनी जेब से पैसा खर्च कर खुश होता है पर चुनावी उत्सव पर सरकार मौका देती है उसे खुश होने का। चुनाव की घोषणा होते ही जनता चातक की तरह इंतजार करने लगती है सरकारी राहत घोषणाओं का और उसका इंतजार बेकार भी नहीं जाता। सालों विभिन्न तरह से जनता की कमाई बटोरने वाली सरकारों की आंखों में ममता छा जाती है, दिल अचानक दया से द्रवित हो उठते हैं। देने के नाम पर कभी एक हाथ न उठाने वाले दस-दस हाथों से कृपा बरसाने लगते हैं। समझते दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से हैं पर मौके पर बही बयार का फायदा उठाने से नहीं चूकना चाहते।        

अब फिर चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है। दोनो पक्ष भी तैयार हैं। उसी के तहत कैबिनेट में नोट करीब-करीब बन चुका है जिस पर सहमति और घोषणा होते ही देश के लाखों केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की उम्र साठ साल से बढ कर बासठ साल हो जाएगी। इस नई व्यवस्था में उन कर्मचारियों के हाथों भी बटेर लग जाएगी जो रिटायरमेंट की दहलीज पर पहुंच बस टापने ही वाले थे।   

आगामी नवम्बर में दिल्ली में होने वाले चुनावों को देखते हुए सरकार ने कर्मचारियों को खुश कर अपने हक में करने के लिए यह दांव खेला है। क्योंकि केंद्र के 85 फीसदी से ज्यादा कर्मचारी दिल्ली में ही रहते हैं। अगर कैबिनेट में इस फैसले पर मुहर लगती है तो यह तीसरा मौका होगा जब सरकार केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाएगी। 

इससे पहले भाजपा की एनडीए सरकार ने 1998 में केंद्रीय कर्मचारियों की रिटायरमेंट आयु बढ़ाकर 60 वर्ष की थी। वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन युद्ध के बाद 1962 में कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर 58 वर्ष कर दी थी। 

केंद्रीय कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ने के बाद अन्य राज्यों के राज्य कर्मचारियों की भी आशा बढ जाएगी। अभी केवल मध्य प्रदेश में कर्मियों की सेवानिवृत्ति आयु 62 साल है। चाहे जो हो जैसे भी हो आने वाला त्यौहार कुछ चेहरों पर खुशी और रौनक तो ला ही देगा। 

सोमवार, 3 जून 2013

गांव से माँ आई है

गांव से माँ आई है। गर्मी पूरे यौवन पर है। गांव शहर में बहुत फर्क है। पर माँ को यह मालुम नहीं है। माँ तो शहर आई है अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के पास, प्यार, ममता, स्नेह की गठरी बांधे। माँ को सभी बहुत चाहते हैं पर इस चाहत में भी चिंता छिपी है कि कहीं उन्हें किसी चीज से परेशानी ना हो। खाने-पीने-रहने की कोई कमी नहीं है दोनों जगह पर जहां गांव में लाख कमियों के बावजूद पानी की कोई कमी नहीं है वहीं शहर में पानी मिनटों के हिसाब से आता है और बूदों के हिसाब से खर्च होता है। यही बात दोनों जगहों की चिंता का वायस है। भेजते समय वहां गांव के बेटे-बहू को चिंता थी कि कैसे शहर में माँ तारतम्य बैठा पाएगी, शहर में बेटा-बहू इसलिए परेशान कि यहां कैसे माँ बिना पानी-बिजली के रह पाएगी। पर माँ तो आई है प्रेम लुटाने। उसे नहीं मालुम शहर-गांव का भेद।

पहले ही दिन मां नहाने गयीं। उनके खुद के और उनके बांके बिहारी के स्नान में ही सारे पानी का काम तमाम हो गया। सारे परिवार को गीले कपडे से मुंह-हाथ पोंछ कर रह रहना पडा। माँ तो गांव से आई है। जीवन में बहुत से उतार-चढाव देखे हैं पर पानी की तंगी !!! यह कैसा शहर है जहां लोगों को पानी जैसी चीज नहीं मिलती। जब उन्हें बताया कि यहां पानी बिकता है तो उनकी आंखें इतनी बडी-बडी हो गयीं कि उनमें पानी आ गया।

माँ तो गांव से आई हैं उन्हें नहीं मालुम कि अब शहरों में नदी-तालाब नहीं होते जहां इफरात पानी विद्यमान रहता था कभी। अब तो उसे तरह-तरह से इकट्ठा कर, तरह-तरह का रूप दे तरह-तरह से लोगों से पैसे वसूलने का जरिया बना लिया गया है।

माँ तो गांव से आई है उसे कहां मालुम कि कुदरत की इस अनोखी देन का मनुष्यों ने बेरहमी से दोहन कर इसे अब देशों की आपसी रंजिश का वायस बना दिया है। उसे क्या मालुम कि संसार के वैज्ञानिकों को अब नागरिकों की भूख की नहीं प्यास की चिंता बेचैन किए दे रही है। मां तो गांव से आई है उसे नहीं पता कि लोग अब इसे ताले-चाबी में महफूज रखने को विवश हो गये हैं।

 माँ तो गांव से आई है जहां अभी भी कुछ हद तक इंसानियत, भाईचारा, सौहाद्र बचा हुआ है। उसे नहीं मालुम कि शहर में लोगों की आंख तक का पानी खत्म हो चुका है। इस सूखे ने इंसान के दिलो-दिमाग को इंसानियत, मनुषत्व, नैतिकता जैसे सद्गुणों से विहीन कर उसे पशुओं के समकक्ष ला खडा कर दिया है।

माँ तो गांव से आई है जहां अपने पराए का भेद नहीं होता। बडे-बूढों के संरक्षण में लोग अपने बच्चों को महफूज समझते हैं पर शहर के रसविहीन समाज में कोई कब तथाकथित अपनों की ही वहिशियाना हवस का शिकार हो जाए कोई नहीं जानता।        

ऐसा नहीं है कि बेटा-बहू को मां की कमी नहीं खलती, उन्हें उनका आना-रहना अच्छा नहीं लगता। उन्हें भी मां के सानिध्य की सदा जरूरत रहती है पर वे चाहते हैं कि माँ  इस शुष्क, नीरस, प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दि वापस चली जाए  उतना ही अच्छा।





बुधवार, 22 मई 2013

अच्छाई कभी मिट नहीं सकती

धर्म-जाति-क्षेत्रियता के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगला कर कुछ मुट्ठी भर लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं,पर फिर भी इमान, इंसानियत, सच्चाई अभी बिल्कुल खत्म नहीं हुए हैं संसार में अच्छे, सीधे, परोपकारी, संत स्वभाव के लोगों की संख्या ज्यादा है, पर संख्या और प्रतिशत में कम होने के बावजूद कुटिल लोग उन पर वैसे ही भारी पड जाते हैं जैसे ढेरों दूध पर एक बूंद खटाई की।
#हिन्दी_ब्लागिंग
संसार में अच्छे, सीधे, परोपकारी, संत स्वभाव के लोगों की संख्या ज्यादा है, पर संख्या और प्रतिशत में कम होने के बावजूद कुटिल लोग उन पर वैसे ही भारी पड जाते हैं जैसे ढेरों दूध पर एक बूंद खटाई की। पर लगातार ठगे जाने, धोखा खाने के बावजूद सुदूर गांवों में, पहाडों पर अभी भी निश्छल मानवता जिंदा है। पर इसके साथ ही यह भी सही है कि लगातार बढते शहरीकरण, टी.वी.-सिनेमा में आए घातक बदलाव, बाजार की मॉल संस्कृति का जहरीला धूंआ धीरे-धीरे उस निष्कपटता को आच्छादित करता जा रहा है। धर्म-जाति-क्षेत्रियता के नाम पर भोले-भाले लोगों को बरगला कर कुछ मुट्ठी भर लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं। पर फिर भी ईमान, इंसानियत, सच्चाई अभी बिल्कुल खत्म नहीं हुए हैं इसका उदाहरण या साक्ष्य आए दिन डरावनी खबरों से भरे अखबारों के किसी कोने में, तपते रेगिस्तान के नखलिस्तान के रूप में सद्भावना का संदेश देती कोई खबर मिल ही जाती है। जिसे पढ वर्षों पहले घटी इंसानियत की मिसाल की दो घटनाओं की सहसा याद आ जाती है। 

यह तब की बात है जब पहाडों का मतलब काश्मीर हुआ करता था।  मेरे पिताजी जिन्हें सब बाबूजी कहा करते थे, सदा काम में मशगूल रहने वाले इंसान थे। बहुत कम कहीं आते-जाते थे. हम दो भाई, माँ  तथा बाबूजी, छोटा सा संपन्न  परिवार। एक बार हमारे बहुत इसरार करने पर उन्होंने काश्मीर चलने की हमारी बात मान ली। हमें जैसे कोइ खजाना मिल गया हो.  कलकत्ते से दिल्ली ट्रेन द्वारा तथा वहां से सांयकालीन बस द्वारा श्रीनगर जाना तय हुआ। दिल्ली पहुंच अंतर्राजीय बस अड्डे से बस ली गयी।  सब तयशुदा कार्यक्रम के अनुसार हो रहा था। सुबह बस पहाडों में थी। ऐसे यात्रा का पहला मौका था सो एक-एक दृश्य को आंखों में समो लेने की तदबीर हो रही थी। इसी बीच कुछ जल-कलेवे के लिए ड्रायवर ने बस को एक ढाबे पर रोका। सभी यात्री उतर कर “रिलैक्स” होने लगे। हल्के-फुल्के जलपान के बाद सब बस में सवार हुए और बस फिर अपने गंतव्य की ओर बढ चली। कुछ ही मिनटों के बाद मां को पता चला कि उनका हैंड बैग पीछे ही छूट गया है। बस में गहमागहमी मच गयी, किसी भी शहराती यात्री को बैग मिलने की उम्मीद नहीं थी। पर कंडक्टर और ड्रायवर ने ढाढस बंधाया, बस लौटाई  गयी, ढाबे के मालिक को जैसे ही सब बताया उसने तुरंत अपने कांउंटर से बैग ला मां को थमा दिया, सारा सामान, नगदी यथावत थी। सुखद आश्चर्य ने जान में जान डाली। सभी यात्री हमारी तकदीर का गुणगान कर रहे थे पर कंडक्टर और ड्रायवर जो पहाडों के वासी थे उनके लिए इस में कोई अनहोनी बात नहीं थी। यह हमारी आम शहरी मान्यताओं के लिए एक सुखद झटका था।


दूसरा दिन,   होटल से निकल हम चारों जने तफरीह के मूड में घूम रहे थे  कि अचानक पीछे से एक आदमी को जोर-जोर से पुकारते-दौडते अपनी ओर आते देखा। पहले हमने सोचा कि वह किसी ओर को बुला रहा होगा पर वह हमें ही रुकने का इशारा कर रहा था। कुछ ही पलों में वह हमारे पास आ पहुंचा और अपने हाथ का पर्स बाबूजी को थमाने लगा। बाबूजी बिना अपनी जेब देखे मना कर रहे थे कि यह मेरा नहीं है पर वह मान ही नहीं रहा था। नई जगह, अनजाने लोग, मैदानी शहरों की मानसिकता कि कहीं कोई फंसा ही ना रहा हो। तभी वहां एक और व्यक्ति आया जो हिंदी बोल-समझ लेता था। उसने बताया कि आप का पर्स पिछली दूकान में गिर गया था यह उसी को वापस कर रहा है। तभी मां के कहने पर बाबूजी ने अपनी जेब टटोली तो वहां क्या होना था, जैसे ही सारी बात साफ हुई पर्स सही जगह पहुंचा वैसे ही लाने वाले के चेहरे पर पसरा तनाव गायब हो गया जैसे कोई भारी बोझ से मुक्ति मिली हो। बाबूजी ने उसे कुछ देना चाहा तो वहां से ऐसे सिर-हाथ हिलाते भाग लिया जैसे सांप देख लिया हो। 


दो दिनों में ये दो सुखद झटके हम तथाकथित समझदार शहरी लोगों की कई मान्यताओं को बदल कर रख गये। आज भी जब ऐसे लोगों की याद आती है तो वर्तमान के प्रति कडवाहट  कम तो होती ही है भविष्य भी आशा बंधाता नजर आता है। 

रविवार, 12 मई 2013

कर्नाटक ने मुहावरे सार्थक किए



मुहावरे या लोकोक्तियां यूं ही नहीं बन जाते इनमें वर्षों के अनुभवों का निचोड होता है। अब देखिए कर्नाटक में सत्ता पलटते ही और कुछ सिद्ध हो ना हो पर एक साथ कई मुहावरे सार्थक हो गये, जैसे घर का भेदी लंका ढाए, दो की लडाई में तीसरे का भला, बिल्ली के भाग छींका टूटा, हम तो डूबेंगे तुम्हे भी ले डूबेंगे, दो नावों का सवार कहीं नहीं पहुंचता। 

ऐसे ही अर्थों वाले और  मुहावरे भी  अपने औचित्य पर मुस्कुराने लगे हैं।



शनिवार, 4 मई 2013

“अंतिम यात्रा का ब्रांडेड पैकेज”


इंसान के जन्म लेते ही बाजार उसे हाथों-हाथ लेने लगा है और उसकी क्षण-क्षण की प्रगति को पग-पग पर भुनाना शुरु कर दिया है तो  उसकी अंतिम यात्रा, उसके निर्वांण के मौके को वह कैसे छोड सकता है। जबकी यह तो कभी खत्म ना होने वाला व्यापार है। अभी तक शायद कुछ भ्रांतियों, कुछ लोक-लाज, कुछ आलोचनाओं के डर से किसी ने शायद चाहते हुए भी इस तरह का कदम नहीं उठाया है पर लगता है बाजार की गिद्ध दृष्टि से धनागम का यह अजस्र स्रोत ज्यादा दिन तक बचा नहीं रह सकेगा।

बिक्री हो ना हो पर हर छोटे-बडे शहर में नए-नए माल का अवतरित होना निर्बाध रूप से जारी है। ये होते भी करीब-करीब एक जैसे ही हैं। ग्राहकों से ज्यादा सेल्स ब्वाय या गर्ल्स द्वारा जगह घेरे रहने वही जूते-चप्पलों, कपडे-लत्तों की ढेरों दुकानें। इनके बीच-बीच में  खाने-पीने का जुगाड ले बैठे कुछ देसी, विदेशी खान-पान से जुडे लोग। किसी एक "फ्लोर" में एक बडी सी “मनीहारी” की दुकान। किसी एक तल पर जनता के मनोरंजन हेतु एकाधिक स्क्रीन लगाए बैठे फिल्म वाले। एक तल से दूसरे तल तक आने-जाने के लिए चलित नसैनियां। शहर, स्थान को छोड सब एक जैसा, मिलता-जुलता। फिए भी लोग आते हैं भीड लगी रहती है पर वे खरीदते कम वातानुकूलिता का आनंद लेते हुए समय बिताने ज्यादा आते हैं।  इनको रिझाने को तरह-तरह के उचित-अनुचित ढंग माल वालों की ओर से भी अपनाए जाते रहते हैं।

ऐसे ही एक दिन आफिस से एक नवनिर्मित, विशाल व भव्य,  बाजार द्वारा फेंके गये फंदे को देखने चला गया, लौटा तो बेहद थका हुआ था घर आते ही नींद पूरी तरह हावी हो गयी। पर माल की भव्यता सपने में भी तारी रही। खुद को वहीं घूमता पा रहा था। ऐसे में ही अचानक एक शो-रूम के सामने पैर ठिठक गये। कुछ नया और हट कर लग रहा था उसके प्रवेश द्वार पर बडे-बडे अक्षरों में लिखा हुआ था “अंतिम यात्रा का सुगम ब्रांडेड पैकेज”। नयी चीज देख जिज्ञासा जगी। इस बला को जानने अंदर बैठी बाला के पास गया। उसने मुस्कुराहट के साथ स्वागत किया। फिर मेरे पूछने पर उसने जो बताया वह हैरतंगेज तो था ही बाजार की अनंत भूख के लिए आम जन की मेहनत की कमाई रूपी खून का निर्बाध प्रवाह जारी रखने के षडयंत्र का भयावह रूप भी सामने ला रहा था।   

बाला के अनुसार आज के भागा-दौडी के जमाने में जो चीज सबसे कम उपलब्ध है वह है समय। इसी कारण चाहते ना चाहते हुए हम अपने कई अनुष्ठानों को पूरा नहीं कर पाते। इसके अलावा बहुतेरे सम्पन्न घरों के माता-पिता वृद्धाश्रम में दिन गुजारते इहलोक से परलोक को रवाना हो जाते हैं। इसी सब को मद्दे नज़र रख हमने यह नया “कांसेप्ट शुरु किया है। जिस तरह आप शादी-ब्याह, जन्म दिन, मुंडन, जनेऊ आदि के मौकों पर पैकजों की सुविधा लेते हैं उसी तरह हम इंसान की अंतिम यात्रा को बिना किसी अडचन और असुविधा के पूरी करने की जिम्मेदारी लेते हैं। बस आपको शव का एड्रेस और अपनी जरूरतों का पूरा ब्योरा हमें देना होता है। बाकी माचिस से लेकर पंडित और अस्थी विसर्जन से लेकर पगडी तक का सारा जिम्मा हम ले लेते हैं।  हमारे पंडित भी अपने विषय में मास्टर या पी.एच.डी. डिग्री धारी होते हैं जो अपने काम को बखूबी समझ कर संबंधित परिवार की भावनाओं का ख्याल रखते हुए पूरी निष्ठा और विधी पूर्वक सम्पन्न करवाते हैं। इन दिनों परिवार में बाहर से आए लोगों के खाने-पीने-रहने की भी हम समुचित व्यवस्था करते हैं। इस कर्म-कांड में प्रयुक्त तमाम वस्तुएं “ब्रांडेड कम्पनियों” की ही प्रयोग में लाई जातीं हैं। जैसे बांस वगैरह हम सुदूर आसाम से मंगाते हैं। चिता की लकडियां भी करीने से तराशी हुई एक सार होती हैं जिनसे हमारे विशेषज्ञ अंतिम शय्या तैयार करते हैं जो देखने में बिल्कुल आरामदायक बिस्तर का एहसास करवाती है। दहन स्थल पर प्रयुक्त होने वाली सारी सामग्री शुद्ध और ब्रांडेड हो इसका पूरा ख्याल रखा जाता है। शव को श्मशान तक लाने हेतु वातानुकूलित वैन प्रयुक्त की जाती है। इतना ही नहीं घर से लोगों को लाने और छोडने के लिए वातानुकूलित बस भी मुहैय्या करवाई जाती है। बात हो ही रही थी कि तभी वहां कुछ "अप-टु-डेट सज्जन" बुकिंग के लिए आ गये और मेरी फिर ना आने वाली नींद खुल गयी। 

मैं बाकी रात भर सोचता रहा कि जब इंसान के जन्म लेते ही बाजार उसे हाथों-हाथ लेने लगा है और उसकी क्षण-क्षण की प्रगति को पग-पग पर भुनाना शुरु कर दिया है तो उसके निर्वांण के मौके उसकी अंतिम यात्रा  को वह कैसे छोड सकता है। जबकी यह तो कभी खत्म ना होने वाला व्यापार है। अभी तक शायद कुछ भ्रांतियों, कुछ लोक-लाज, कुछ आलोचनाओं के डर से किसी ने शायद चाहते हुए भी इस तरह का कदम नहीं उठाया है पर लगता है बाजार की गिद्ध दृष्टि से धनागम का यह अजस्र स्रोत ज्यादा दिन तक बचा नहीं रह सकेगा।

बुधवार, 24 अप्रैल 2013

मोटापे पर वजन की मार

भट्ट साहब का ध्यान इस ओर शायद नहीं गया कि अपनी इस सलाह से वे जिमों, व्यायामशालाओं, स्लिम करने का दावा करने वाले पेय और खाद्य बनाने वाली कंपनियों का परोक्ष-अपरोक्ष रूप से कितना भला कर रहे हैं। ऐसा त्तो नहीं कहीं उनकी भी ऐसी कोई संस्था हो।

मोटापा इंसान के लिए खतरे की जड है, यह सभी जानते हैं। यह भी सही है कि यह अपने आप में खुद ही एक बिमारी है जिसके दसियों नुक्सान हैं। इन सब के अलावा मोटे लोगों के लिए एक और बुरी खबर है, यदि नार्वे के एक अर्थ शास्त्री का सुझाव मान लिया गया तो हवाई यात्रा करने वाले स्थूलकाय लोगों को अपने वजन के हिसाब से पैसा चुकाना पडेगा। उनके अनुसार ऐसा करना स्वास्थ्य, वित्त और पर्यावरण के लिए लाभदायक होगा। 

नार्वे यूनिवर्सिटी कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर भरत भट्ट ने सलाह दी है कि एयरलाइन्स को हवाई यात्रियों से उनके वजन के मुताबिक पैसा लेना चाहिए। भट्ट ने ‘जर्नल ऑफ रेवेन्यू एंड प्राइसिंग मैनेजमेंट’ में लिखा है कि इससे लोग अपना वजन घटाने को प्रेरित होंगे जिससे उन्हें दोहरा लाभ होगा, एक तो वे स्वस्थ रहेंगे दूसरा उनका किराया घटने से उनकी बचत भी होगी। उनके मुताबिक इस तरह की योजना को अपनाने वाले जहाज में हल्के वजन वाले ज्यादा यात्रियों को लिया जा सकेगा। इससे एयरलाइन्स को भी फायदा होगा। साथ ही यह पर्यावरण के लिए नुकसानदेह ईंधन के उपयोग में भी कमी लाएगा।

भट्ट ने तीन आप्शन पेश किए है, जिन्हें वह ‘अपने वजन के हिसाब से हवाई किराया देना’ कहते हैं। पहले के अनुसार यात्री और उसके सामान के वजन के हिसाब से किराया तय होगा। दूसरे के मुताबिक एक आधार किराया होगा जो सबके लिए होगा। इसके बाद ज्यादा वजन वाले यात्रियों से अतिरिक्त पैसा वसूला जाएगा। 

पर भट्ट साहब का ध्यान इस ओर शायद नहीं गया कि अपनी इस सलाह से वे जिमों, व्यायामशालाओं, स्लिम करने का दावा करने वाले पेय और खाद्य बनाने वाली कंपनियों का परोक्ष-अपरोक्ष रूप से कितना भला कर रहे हैं। ऐसा त्तो नहीं कहीं उनकी भी ऐसी कोई संस्था हो।

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