pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 17 अप्रैल 2013

माँ का बुलावा क्या सचमुच आता है? एक अजब-गजब यात्रा वृतांत


ऐसी आम धारणा है कि किसी देव-स्थान या तीर्थ पर जाना तभी संभव हो सकता है जब वहां के अधिष्ठाता देवी या  देवता का बुलावा आता है। खासकर वैष्णव देवी के धाम के साथ यह विश्वास काफी गहराई से जुडा हुआ है। अभी हाल में ही इस विषय पर पक्ष और विपक्ष में कथन पढने को मिले। तभी वर्षों पहले की गयी एक यात्रा का विवरण आंखों के सामने कौंध गया। किसी भी पक्ष की तरफ़दारी ना करते हुए सिर्फ आपबीती बयान कर रहा हूं।   हालांकि उस समय हर कदम पर अडचनें आयीं पर खुद ब खुद दूर भी होती चली गयीं। उस समय घटी एक-एक बात या घटना "पक्ष" की ओर इशारा करती है। पर फिर भी मन किसी ठोस निर्णय पर नहीं पहुंच पाया आज तक। अनेक घटनाओं के कारण यात्रा का वर्णन काफी लंबा हो गया है। इसलिए इसे दो भागों में रख रहा हूं।    

28 तारीख। दिल्ली। 82 या 83 का साल। दिसम्बर का महीना कडाके की ठंड। कार्यस्थल के एक सहयोगी, श्री ओमी ने वैष्णव देवी के दर्शनार्थ चलने का प्रस्ताव रखा। उस समय "जगराते" बहुत होते थे। खासकर टैक्सी, स्कूटर स्टैंड वाले समय-समय पर ऐसा आयोजन करते रहते थे। जिनमें इक्की-दुक्की जगह को छोड कर अधिकांश में फिल्मी गानों पर आधारित भजन गाये जाते थे। मैं कभी भी इन सब जगहों से तारतम्य नहीं बैठा पाया। जिन भजनों को सुन मां की मूरत के बदले फिल्मों के सीन याद आएं वहां श्रद्धा कहां से उपजती। पता नहीं क्यों यह धारणा बन गयी थी कि यह देवी सिर्फ टैक्सी-स्कूटर वालों की अधिष्ठात्री देवी हैं। शायद इसी लिए ओमी के बहुत जोर देने पर भी मन बन नहीं पा रहा था जाने का। पर नहीं जाने का भी कोई कारण नहीं समझ आ रहा था।

माँ का दरबार 
उन दिनों नई दिल्ली और पुरानी दिल्ली स्टेशनों तक जाने के लिए विभिन्न कालोनियों से रल नं। वाली बसें चला करती थीं। राजौरी गार्डेन से रल 6 नं की बस गुजरती थी, जो हम दोनों के घरों को जोडती चलती थी। सो मैंने ऐसे ही कह दिया कि चलना होगा तो अंतिम रल 6 में मिल जाऊंगा। क्योंकि पुरानी दिल्ली से जम्मू एक्स।, ठीक से याद तो नहीं, पर उस समय शायद साढे ग्यारह बजे चला करती थी, से जाने का प्रोग्राम था। घर आ कर बताया तो श्रीमती जी ने भी चले जाने को ही कहा। ऊहापोह में पौने नौ बज गये बस सवा नौ के आस-पास थी। पता नहीं जाने वाले मन का पलडा कैसे भारी पडा कि बैग उठा बस स्टैंड जा पहुंचा। तभी बस भी आ गयी, जिसमें ओमी जी तथा उनका छोटा भाई मौजूद थे। मुझे देख उन्होंने एक सुखद सांस ली। पर यह तो शुरुआत थी। आगे होने वाली बातों का कहां किसी को अंदाज था।

स्टेशन पहुंच कर पता चला कि गाडी में बिल्कुल भी जगह नहीं है, खडे हो कर जाना भी मुश्किल लग रहा था। मन में पहला विचार यही आया चलो लौट चला जाए। टिकट खिडकी पर विचार विमर्श चल ही रहा था कि एक सज्जन अपने टिकट वापस करवाने आ गये, वह भी पूरे तीन। पर उसमें एक टिकट महिला का था। मेरे आनाकानी करने पर भी ओमी ने यह मौका हाथ से नहीं जाने दिया। मेरे कहने पर भी कि एक तो टिकट बाहर से ले रहे हैं दूसरा उसमें एक महिला का है, गडबड हो गयी तो? ओमी का कहना था कि छोटे भाई को ढक-ढुक कर ऊपर की बर्थ पर सुला देंगे। वैसे भी रात का समय है कौन खोज-खबर लेगा। खैर गाडी पकड ली गयी। कुछ ही देर में कठोर से चेहरे और टेढी भृकुटी वाला चेकर भी आ धमका, वह ओमी का भी गुरु था, बहस बाजी, मोलतोल के बाद किसी तरह 100 रुपये में भाई को बहन मान आगे बढ गया। ऐसे एक बला टली।

29 तारीख। इस तरफ पहली बार जाना हो रहा था सो जम्मू में ठौर के तौर पर ओमी के मामा जी के यहां पडाव डालने की बात थी। अपरान्ह में जम्मू पहुंच उनके घर पहुंचे तो देखा वे घर का ताला खोल रहे हैं। पता चला कि दो सप्ताह बाद अभी पंजाब से लौटे हैं। हम सोच रहे थे कि वे दो-तीन बाद आते तो? खैर जो हुआ अच्छा ही हुआ। तरोताजा हो आगे जाने का पता करने हम बस अड्डे की तरफ चले गये वहां जा पता चला कि दरबार का रास्ता बंद है। ऊपर बर्फ-बारी हुई है। करीब दस हजार लोग फंसे हुए हैं। शासन ने और भीड ना बढे इसलिए यात्रा रोक दी है। अब !!! इतनी दूर आ कर बिना दर्शन के लौटना!!! मन मायूस सा हो गया। पर उपाय भी क्या था?

30 तारीख। आते समय रेल की हालत देख ही चुके थे तो इस बार बस से ही दिल्ली वापसी का तय पाया गया। धूप खिली हुई थी, पर ठंड भी काफी थी। सो कुछ गर्म कपडे पहन ऊपर एक लोई डाल बस के समय का पता करने फिर एक बार बस अड्डे पहुंचे। अभी देख-सुन ही रहे थे कि पता नहीं कहां से एक व्यक्ति आया और पूछने लगा कि क्या कटरे जाना है? ज्ञात हो कि मां के भवन की पैदल यात्रा कटरे से ही प्रारंभ होती है। अब तो खैर बहुत से साधन हो गये हैं पर उस समय घोडे, बंहगी या पैदल ही पहुंचा जाता था। हमें तो मनचाही मुराद मिल गयी। हमारी स्वीकारोक्ति पर उसने अड्डे के बाहर कोने में खडी एक बस की ओर ईशारा कर दिया। पता चला कि नाके पर मेजिस्ट्रेट बैठा हुआ है सो परमिट उसी रास्ते पर पडते किसी गांव का लिया गया है। वहां जा दूसरे रास्ते से कटरा जाया जाएगा। चलना है तो अभी पांच-सात मिनट में चलना होगा। सोचने का समय कहां था, नाहीं घर खबर करने का। उस समय मोबाइल कहां होते थे। हम तीनों वैसे ही बस में सवार हो गये। कंडक्टर ने जयकारा लगाने से मना कर कहा कि नाके पर चेकिंग के बाद जो करना है करें, पर तब तक बिल्कुल चुपचाप रहें। राम-राम कर नाका पार हुआ, हम सब को लगा कि जैसे कोई किला फतह कर लिया हो। फिर तो बिना किसी अडचन के कटरे जा पहुंचे। सबसे पहले मामा जी को फोन पर सारी बात बताई। पर किसे पता था कि अभी तो इंटरवल ही हुआ है।

कटरे में बताया गया कि ऊपर बिल्कुल जगह नहीं है, अपनी जिम्मेदारी पर आगे जा सकते हो। फिर क्या था, बस के सारे यात्रियों ने बिना रुके उसी समय चढाई चढनी शुरु कर दी। अर्ध क्वारी, गर्भ जून कहीं कुछ भी नहीं, सब ठीक-ठाक, कहीं कोई बर्फ नहीं। हम सब को आश्चर्य हो रहा था कि यात्रा क्यूं रोकी गयी थी। पर इस ओर किसी का ध्यान नहीं गया कि यह यात्रा एकतरफा थी। हमें ऊपर से कोई लौटता नहीं मिला था। हंसते-गाते-जयकारा लगाते हम सब करीब-करीब भवन तक पहुंच ही गये थे कोई चार-पांच की।मी। का रास्ता और बचा था कि एक बच्चे की किलकारी सुनाई पडी, मम्मी बर्फ!!! सभी ने मुड कर देखा बायीं तरफ़ एक झाडी पर एक छोटा सुंदर सा बर्फ का फाहा टंगा हुआ था। यह आगत का विजिटिंग कार्ड था।

अगला मोड पार करते ही दुनिया बदल गयी। हम सब जैसे किसी दूसरे लोक में आ गये हों। प्रभू ने जैसे सफेद रंग की कूची फेर दी हो सारी कायनात पर। जहां तक नज़र जाती थी बर्फ ही बर्फ, सिर्फ बर्फ। दूर दिखता भवन,
बर्फ से ढका पूरा परिवेश 
उसके आस-पास की अन्य इमारतें, जंगल, झाडी, पहाड, घाटी सब पर बर्फ का भारी लिहाफ। अब तो हमारे पांवों के नीचे भी बर्फ की चिकनी सतह मोटी
होती जा रही थी। ऊपर से ढलान भी शुरु हो चुकी थी। लोग बार-बार फिसल रहे थे। अब पछतावा हो रहा था कि कटरे में लोगों की सलाह मान कर चलने में सहायक छडियां क्यूं नहीं लीं। फिर दस्ताने वगैरह भी नहीं थे जो आस-पास की झाडियों का ही सहारा लिया जा सकता। किसी तरह सब एक दूसरे का हाथ पकड कछुए की तरह रेंग रहे थे। पीछे एक मां बार-बार अपने बेटे को संभल कर चलने का निर्देश दे रही थी। अचानक हमारे पैरों के पास से वही महिला फिसलती हुई आगे निकलीं, बडी मुश्किल से उन्हें संभाल कर सहारा दे खडा किया जा सका। उन चार कि.मी. को पार करने में तीन-साढे तीन घंटे लग गये।

आगे का हाल कल बयान करूंगा। कैसे लाइन में एक ही जगह खड़े-खड़े नौ घंटे बीत गये. 

शनिवार, 30 मार्च 2013

अब्राहम लिंकन ने गीता शायद ही पढी होगी,


पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है?   शायद हां।   इसी  "हां"  को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस "हां"  से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।


अब्राहम लिंकन ने गीता तो नहीं पढी होगी पर उनका जीवन पूरी तरह एक कर्म-योगी का ही रहा। वर्षों-वर्ष असफलताओं के थपेड़े खाने के बावजूद वह इंसान अपने कर्म-पथ से नहीं हटा।  अंत में तकदीर को ही झुकना पड़ा उसके सामने।

अब्राहम लिंकन 28-30 सालों तक लगातार असफल होते रहे। जिस काम में हाथ ड़ाला वहीं असफलता हाथ आई। पर उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लोगों के लिए मिसाल पेश की और असफलता को कभी भी अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। लगे रहे अपने कर्म को पूरा करने में, जिसका फल भी मिला। दुनिया के सर्वोच्च पद के रूप में। 

उनकी असफलताओं पर नज़र डालें तो हैरानी होती है कि कैसे उन्होंने तनाव को अपने पर हावी नहीं होने दिया होगा। 20-22 साल की आयु में घर की आर्थिक स्थिति संभालने के लिए उन्होंने व्यापार करने की सोची, पर कुछ ही समय में घाटे के कारण सब कुछ बंद करना पड़ा। कुछ दिन इधर-उधर हाथ-पैर मारने के बाद फिर एक बार अपना कारोबार शुरु किया पर फिर असफलता का मुंह देखना पडा।  26 साल की उम्र में जिसे चाहते थे और विवाह करने जा रहे थे, उसी लड़की की मौत हो गयी। इससे उनका मानसिक संतुलन बिगड़ गया। पर फिर उन्होंने अपने आप को संभाला और स्पीकर के पद के लिए चुनाव लड़ा पर वहां भी हार का सामना करना पड़ा। 31 साल की उम्र में फिर चुनाव में हार ने पीछा नहीं छोड़ा। 34 साल में कांग्रेस से चुनाव जीतने पर खुशी की एक झलक मिली पर वह भी अगले चुनाव में हार की गमी में बदल गयी।

46 वर्षीय लिंकन ने हार नहीं मानी पर हार भी कहां उनका पीछा छोड़ रही थी फिर सिनेट के चुनाव में पराजय ने अपनी माला उनके गले में डाल दी। अगले साल उपराष्ट्रपति के चुनाव के लिए खड़े हुए पर हार का भूत पीछे लगा ही रहा। अगले दो सालों में फिर सिनेट पद की जोर आजमाईश में सफलता दूर खड़ी मुस्काती रही। पर कब तक भगवान परीक्षा लेता रहता, कब तक असफलता मुंह चिढाती रहती, कब तक जीत आंख-मिचौनी खेलती। दृढ प्रतिज्ञ लिंकन के भाग्य ने पलटा खाया और 51 वर्ष की उम्र में उन्हें राष्ट्रपति के पद के लिए चुन लिया गया। ऐसा नहीं था कि वह वहां चैन की सांस ले पाते हों वहां भी लोग उनकी बुराईयां करते थे। वहां भी उनकी आलोचना होती थी। पर लिंकन ने तनाव-मुक्त रहना सीख लिया था। उन्होंने कहा था कि कोई भी व्यक्ति इतना अच्छा नहीं होता कि वह राष्ट्रपति बने, परंतु किसी ना किसी को तो राष्ट्रपति बनना ही होता है।

तो यह तो लिंकन ही थे जो इतनी असफलताओं का भार उठा सके। पर क्या हर इंसान इतना मजबूत बन सकता है?   शायद हां।   इसी  "हां"  को समझाने के लिए भगवान ने इस धरा पर गीता का संदेश दिया था। क्योंकि वे जानते थे कि इस "हां"  से आम-जन को परिचित करवाने के लिए, उसकी क्षमता को सामने लाने के लिए उसे मार्गदर्शन की जरूरत पड़ेगी।


गुरुवार, 28 मार्च 2013

लौटना गब्बर का फिर रामगढ़

वह तो हफ्ते दस दिन में मंदिर, गुरुद्वारे के लंगर से चार-पांच दिन का बटोर लाता हूँ तो ज़िंदा हूं, तुमसे तो वह भी नहीं होगा. हमारे विगत को जानते हुए कोइ हमारा स्मार्ट कार्ड या आधार कार्ड भी नहीं बनाएगा. तुमने जो किया है उससे बुढापे की पेंशन भी मिलने से रही। इसलिए पर्वों-त्योहारों खासकर होली को तो  भूल ही  जाओ जिसने हमारी यह गत बना दी थी

रामगढ़ की एतिहासिक लड़ाई के बाद सब कुछ मटियामेट हो चुका था. ना  डाकुओं का दबदबा रहा, ना वो हुंकार, आदमी ही ना रहे तो गिनती क्या पूछनी. ले दे कर सिर्फ सांभा बचा था, वह भी चट्टान के ऊपर किसी तरह छिपा रह गया था, इसलिए। 

वर्षों बाद जेल काट तथा बुढापा ओढ़ गब्बर वापस आया था रामगढ़। मन में एक आशा थी कि शायद छूटा हुआ  लूट का माल हासिल हो ही जाए. पर वह भौंचक था यहाँ आ कर। बीते सालों में रामगढ़ खुशहाल हो चुका था. अब वहाँ तांगे नहीं तिपहिया और टैंपो चलने लग गए थे. सड़कें भी पक्की हो गयीं थीन. बिजली आ चुकी थी. लालाटेंने इतिहास बन चुकी थीं। बीरू-बसंती के प्यार को विवाह के गठबंधन में बदलने में सहयोगी उस समय की बिना पाइप की पानी की टंकी में अब पाइप और पानी दोनों उपलब्ध हो गए थे. पुलिस का थाना बन गया था. एक डिग्री कालेज भी खुल गया था जिससे किसी अहमद को अपनी जान पर खेल शहर जा पढाई नहीं करनी पड़ती थी. और यह सब ठाकुर के वहाँ से चुनाव जीतने का नतीजा था. 

बात हो रही थी गब्बर के लौटने की, समय की मार अपने समय के आतंक गब्बर को आज कोइ पहचानने वाला ही नहीं था. एक्के-दुक्के लोगों ने तो भिखारी समझ उसके हाथ में एक-दो रुपये तक पकड़ा दिए थे। उसने उनको भी अपनी खैनी की पोटली के साथ अपनी कमीज की जेब में ठूंस लिया। उसे तो एक ही चिंता सता रही थी कि पुलिया, जिसे जय ने उड़ा दिया था, के बगैर वह खाई कैसे पार करेगा। पर कमजोर होती आँखों के बावजूद उसे उस सूखे नाले पर एक पक्का मजबूत पुल दिखाई पड़ गया, दिल जल उठा गब्बर का, यह पुल उस समय होता तो..................... खैर धीरे-धीरे चल वह अपने पुराने अड्डे के पास पहुंचा तो वहाँ का नक्शा भी कुछ-कुछ बदला हुआ मिला. लोगों ने प्लाट काट-काट कर घर बनाने की तैयारियां कर रखी थीं। फिलहाल वक्त आशिकों ने उस महफूज जगह को अपना आशियाना बना डाला था। एक्का-दुक्का जोड़े तो इस भरी दुपहरिया में भी चट्टानों के पीछे दुबके नजर आ रहे थे। गब्बर जिसके नाम से पचास-पचास कोस दूर रोते बच्चे दर कर चुप हो जाते थे उसी गब्बर की नाक के नीचे आज के छोकरे प्रेम का राग अलाप रहे थे. 

थका-हारा, लस्त-पस्त गब्बर वहीं एक पत्थर पर बैठ जेब से खैनी निकाल हाथ पर रगड़ रहा था तभी उसे एक चट्टान के पीछे से एक सिर नमूदार होते दिखा। माथे पर हाथ रख आँखे मिचमिचा कर ध्यान से देखा तो खुशी से चीख उठा "अरे सांभा!!!" उधर सांभा जो और भी  सूख कर बेंत की तरह हो चुका था, अपने उस्ताद को सामने पा एक साथ परेशान, चितित और चिढ गया. कारण भी था, वह अपने पेट को भरने का इंतजाम तो ठीक से कर नहीं पाता था, ऊपर से यह आ गया था. पर किया भी क्या जा सकता था। मन मार कर, गुस्सा दबा कुशल-क्षेम पूछी फिर सबेरे मांग कर लाई रोटियों में से चार उसके सामने एक प्याज के साथ रख दीं। भूखे गब्बर ने झट से उनका सफाया कर डाला। किसी तरह शाम ढली, रात बीती, सुबह हुई। आदतानुसार गब्बर ने ऐसे ही पूछ लिया "होली कब है, कब है होली" .इतना सुनते ही सांभा के तनबदन में आग लग गयी ऐसा लगा जैसे नेपोलियन को किसी ने वाटरलू याद दिला दिया हो। वह तो इसके आने से वैसे ही परेशान हो रात भर सो नहीं पाया था, ऊपर से फिर वही सवाल. वह फूट पडा, उस्ताद होली, दिवाली सब भूल जाओ. मंहगाई का कोइ इल्म है तुम्हें? अपनी टेंट में दो दाने दाल और पाँव भर आटा खरीदने को भी कुछ नहीं है। यहाँ ना कुछ खाने को है ना पकाने को।  इधर जो लौंडे-लफाडिए आते हैं एक दो बार उन्हें डरा - धमका कर कुछ एंठने की कोशिश की तो उलटा वे मुझे ही हड़का गये। वह तो हफ्ते दस दिन में मंदिर, गुरुद्वारे के लंगर से चार-पांच दिन का बटोर लाता हूँ तो ज़िंदा हूं, तुमसे तो वह भी नहीं होगा. हमारे विगत को जानते हुए कोइ हमारा स्मार्ट कार्ड या आधार कार्ड भी नहीं बनाएगा. तुमने जो किया है उससे बुढापे की पेंशन भी मिलने से रही। इसलिए पर्वों-त्योहारों खासकर होली को तो  भूल ही  जाओ जिसने हमारी यह गत बना दी थी, और यह सोचो कि  आज खाओगे क्या और कैसे ?

इतनी डांट तो गब्बर ने अपनी पूरी जिन्दगी में भी कभी नहीं खाई थी। वह सांभा जो उसके डर के मारे कभी पहाडी से नीचे नहीं उतरता था आज उसे  नसीहत दे रहा था.  सब समय का फेर है। पर यह भी सच है कि तभी से  गब्बर सब भूल-भाल कर अब सिर्फ भोजन जुगाड़  चिंतन  में जुटा हुआ है. 







            

मंगलवार, 26 मार्च 2013

पुल का नाम एक गिलहरी पर

यहाँ गिलहरी की एक छोटी सी समाधी मजदूरों ने पुल की मुंड़ेर पर बना दी थी, इसीलिए इस पुल का नाम गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं।


 हजारोँ-हजार साल पहले, रामायण काल में जब राम जी की सेना लंका पर चढ़ाई के लिए सेतु बना रही थी, तब कहते हैं की एक छोटी सी गिलहरी ने भी अपनी तरफ से जितना बन पडा था योगदान कर प्रभू का स्नेह प्राप्त किया था। शायद उस गिलहरी की  वंश परंपरा अभी तक चली आ रही है। क्योंकि फिर उसी देश में, फिर एक गिलहरी , फिर एक पुल के निर्माण में सक्रीय रही। प्यार भी उसे भरपूर मिला पर अफ़सोस जिन्दगी नहीं मिल पाई।  
     
अंग्रेजों के जमाने की बात है। दिल्ली – कलकत्ता मार्ग पर इटावा शहर के नौरंगाबाद इलाके के एक नाले पर पुल बन रहा था। सैकड़ों मजदूरों के साथ-साथ बहुत सारे सर्वेक्षक, ओवरसियर, इंजिनीयर तथा सुपरवाईजर अपने-अपने काम पर जुटे कड़ी मेहनत कर रहे थे। इसी सब के बीच पता नहीं कहां से एक गिलहरी वहां आ गयी और मजदुरों के कलेवे से गिरे अन्न-कणों को अपना भोजन बनाने लगी। शुरु-शुरु में तो वह काफी ड़री-ड़री और सावधान रहती थी, जरा सा भी किसी के पास आने या आवाज होने पर तुरंत भाग जाती थी, पर धीरे-धीरे वह वहां के वातावरण से हिलमिल गयी। अब वह काम में लगे मजदुरों के पास दौड़ती घूमती रहने लगी। उसकी हरकतों और तरह-तरह की आवाजों से काम करने वालों का तनाव दूर हो मनोरंजन भी होने लगा। वे भी काम की एकरसता से आने वाली सुस्ती से मुक्त हो काम करने लगे। फिर वह दिन भी आ गया जब पुल बन कर तैयार हो गया। उस दिन उससे जुड़े सारे लोग बहुत खुश थे। तभी एक महिला मजदूर सावित्री की नजर पुल की मुंडेर  पर निश्चेष्ट पड़ी उस गिलहरी पर पड़ी, जिसने महिनों उन सब का दिल बहलाया था। उसे हिला-ड़ुला कर देखा गया पर उस नन्हें जीव के प्राण पखेरु उड़ चुके थे। यह विड़ंबना ही थी कि जिस दिन पुल बन कर तैयार हुआ उसी दिन उस गिलहरी ने अपने प्राण त्याग दिये। उपस्थित सारे लोग उदासी से घिर गये। कुछ मजदुरों ने वहीं उस गिलहरी की समाधी बना दी। जो आज भी देखी जा सकती है।

यह छोटी सी समाधी पुल की मुंड़ेर पर बनी हुई है, इसीलिए इस पुल का नाम गिलहरी का पुल पड़ गया। आस-पास के लोग कभी-कभी इस पर दिया-बत्ती कर जाते हैं।

रविवार, 17 मार्च 2013

कुछ बातों की कल्पना भी मुश्किल होती है !!!


बचपन मे एक कहानी पढी थी। एक किसान के घर एक नेवला था जो बिल्कुल घर के सदस्य की तरह था। किसान दम्पति भी उसे अपने बेटे की तरह रखते थे। एक बार किसान की पत्नी अपने नवजात शिशु को नेवले की निगरानी  में छोड पानी लेने बाहर चली जाती है। इसी बीच घर में एक विषैला सांप आ जाता है पर इसके पहले कि वह बच्चे को कोई हानि पहुंचा पाता नेवले ने अपनी जान पर खेल उसे मार डाला। फिर अपनी मालकिन को आता देख वह दौडता हुआ उसके पैरों में लोटने लगता है पर महिला उसके मुंह में लगे सांप के खून को अपने बच्चे का रक्त समझ पानी का घडा उस पर पटक उसे मार डालती है।

कहानी पढ नेवले के प्रति सहानुभुति तो जागती ही है पर उस महिला की बाकि जिंदगी कैसे पश्चाताप की अग्नि में जल कर बीती होगी, कैसे चुपचाप तडपती होगी अपराध बोध से, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। 

वैसी ही एक कहानी फिर नजरों के सामने से गुजरी। गुजरात के महान लेखक श्री केशुभाई देसाई की कहानी “धारिया”। पति की मृत्यु के पश्चात भीषण गरीबी की हालत में मेहनत-मजदूरी कर मां अपने एकलौते बेटे को पढाती है। उच्च शिक्षा के लिए शहर भेजती है। लडका वहीं रह कर अपनी मां के सपनों को पूरा करने की कोशिश करता है। समय बीतता है। एक बार वह छुट्टियों में घर आता है। संयोगवश उसकी नजर मां के उभरते पेडू पर पड जाती है। दिमाग में शक का राक्षस घर बनाता है और वह गडांसे से मां का सर धड से अलग कर पुलिस में आत्मसमर्पण कर देता है। पोस्ट-मार्टम की रिपोर्ट से पता चलता है कि मां को गर्भ नहीं, पेट का कैंसर था। बेटे को बडा आदमी बनने में कोई बाधा ना आये, उसकी पढाई ना छूटे इसलिए वह पैसे बचाने के लिए अपनी जान को दांव पर लगा, बिमारी का ईलाज नहीं करवाती,  पर !!!!! 

बेटा क्या जी पाएगा? क्या होगा इस घोर अपराध का प्रायश्चित? क्या होगा उस जिंदा लाश का?

शनिवार, 16 मार्च 2013

साईयाँ भी जाको रख लेता है, उसका .........


भारत दास वैष्णव।
हमारे संस्थान में कार्यरत एक सज्जन। प्रभू की गाय। ज्यादातर "फिजिकली प्रेजेंट, माइंडली एबसेंट" अपने में मग्न। संस्थान में तो सभी के कृपापात्र हैं। पर अभी दो-तीन दिन पहले ही पता चला कि उपरवाला भी उन पर खास मेहरबान है (तभी तो पहलवान हैं) इसके साथ ही यह भी सत्य सामने आया कि कहावतें यूँही नहीं बनी उनके पीछे भी ठोस कारण हुआ करते थे। जैसे बंगाली भाषा में एक कहावत है कि  "जिस दिन तकदीर खराब हो उस दिन यदि ऊंट पर भी बैठे हों तो कुत्ता काट लेगा।"  
  
हुआ यह कि अपने भारत दास जी (भरत नहीं) अपने में खोये, मग्न चले जाते हुए सडक विभाजक पर बिना देखे-सुने सायकल समेत दूसरी तरफ अवतरित हो गये। उधर से एक युवक जो बैठा तो अपनी बाइक पर था पर सवार हवा पर था, आंधी की तरह उड़ा आ रहा था।  इन्हें अचानक सामने पा ब्रेक लगाने की गलती कर बैठा, फलस्वरुप वह कहीं गया उसकी गाडी कहीं गयी। गनीमत रही कि उसका रंग ही रतनारा हुआ, कोई अंग भंग नहीं हुआ अलबत्ता उसके कपडे जरूर "डिजायनर और हवादार" हो गये। पर बात यहीं ख़त्म नहीं हुई, उस दिन तो उसका राहू, शनि पर सवार था। वह अभागा  पीछे एक पुलिस की गाडी को "ओवरटेक" कर भागा आ रहा था। उसके गिरने पर पीछे आती पुलिस कर्मियों को मौका मिला, उसे धर दबोचा और दो-चार  हाथ लगा दिए।

इधर इतना सब होने के बावजूद जिसके कारण यह सब हुआ वह भारत दास जी "ओह, ओह, बेचारा" कहते हुए निरपेक्ष भाव से अपने रास्ते चल दिए। उन्हें पता ही नहीं चला कि वह आज प्रभू कृपा से चोट-ग्रस्त होने से बाल-बाल तो बचे ही, पिटने से भी बच गये हैं। 



शुक्रवार, 8 मार्च 2013

पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता?

कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व  हो तुम !!!  

क्या सचमुच पुरुष केंद्रित समाज महिलाओं को दिल से बराबरी का हकदार मानता है? वैसे ऐसे समाज, जो खुद आबादी का आधा ही हिस्सा है उसे किसने हक दिया महिलाओं के लिए साल में एक दिन निश्चित करने का? आज जरूरत है सोच बदलने की। इस तरह की मानसिकता की जड पर प्रहार करने की। सबसे बडी बात महिलाओं को खुद अपना हक हासिल करने की चाह पैदा करने की। यह इतना आसान नहीं है, हजारों सालों की मानसिक गुलामी की जंजीरों को तोडने के लिए अद्मय, दुर्धष संकल्प और जीवट की जरूरत है। उन प्रलोभनों को ठुकराने के हौसले की जरूरत है जो आए दिन पुरुष उन्हें परोस कर अपना मतलब साधते रहते हैं।

 यह क्या पुरुषों की ही सोच नहीं है कि महिलाओं को लुभाने के लिए साल में एक दिन, आठ मार्च, महिला दिवस जैसा नामकरण कर उनको समर्पित कर दिया है। कोई पूछने वाला नहीं है कि क्यों भाई संसार की आधी आबादी के लिए ऐसा क्यों? क्या वे कोई विलुप्तप्राय प्रजाति है? यदि ऐसा नहीं है तो पुरुषों के नाम क्यों नहीं कोई दिन निश्चित किया जाता? पर सभी खुश हैं। विडंबना है कि वे तो और भी आह्लादित हैं जिनके नाम पर ऐसा दिन मनाया जा रहा होता है और इसे मनाने में तथाकथित सभ्रांत घरानों की महिलाएं बढ-चढ कर हिस्सा लेती हैं।

आश्चर्य होता है, दुनिया के आधे हिस्से के हिस्सेदारों के लिए, उन्हें बचाने के लिए, उन्हें पहचान देने के लिए, उनके हक की याद दिलाने के लिए, उन्हें जागरूक बनाने के लिए, उन्हें उन्हींका अस्तित्व बोध कराने के लिए एक दिन, 365 दिनों में सिर्फ एक दिन निश्चित किया गया है। इस दिन वे तथाकथित समाज सेविकाएं भी कुछ ज्यादा मुखर हो जाती हैं, मीडिया में कवरेज इत्यादि पाने के लिए, जो खुद किसी महिला का सरेआम हक मार कर बैठी होती हैं। पर समाज ने, समाज में  उन्हें इतना चौंधिया दिया होता है कि वे अपने कर्मों के अंधेरे को न कभी देख पाती हैं और न कभी महसूस ही कर पाती हैं। दोष उनका भी नहीं होता, आबादी का दूसरा हिस्सा इतना कुटिल है कि वह सब अपनी इच्छानुसार करता और करवाता है। फिर उपर से विडंबना यह कि वह एहसास भी नहीं होने देता कि तुम चाहे कितना भी चीख-चिल्ला लो, हम तुम्हें उतना ही देगें जितना हम चाहेंगे। जरूरत है महिलाओं को अपनी शक्ति को आंकने की. अपने बल को पहचानने की, अपनी क्षमता को पूरी तौर से उपयोग में लाने की। अपने सोए हुए जमीर को जगाने की।
कब तक मुगालते में रहोगी? अरे, अब तो जागो, आधा विश्व  हो तुम !!!  

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