बुधवार, 10 अक्टूबर 2012

आप भी मेरी तरह, ऐसा ही कुछ तो नहीं दे रहे दूसरों को ?



अब सोचता हूँ, यह कैसा है मेरा देना?  जो चारों ओर तनावयुक्त माहौल बनाता है। सभी को तो कुछ ना कुछ दिया ही पर कोई भी खुश नजर नही आया। यहां तक कि मैं खुद अजीब सा महसूस कर रहा हूं। सिर भारी हो गया है। धड़कनें तेज हो रही हैं। रक्त-चाप बढा हुआ लग रहा है। थकान हावी है......................

पिछला  सप्ताह "देने के सुख का सप्ताह"  यानी  "Joy of giving week"  के नाम से मना या  मनाया गया । मीडिया और बाजार बार-बार याद दिला रहा था,  कि कुछ दान दक्षिणा करो भाई;  देखो देने में  कितना सुख मिलता है  (किसे? खरीदना तो बाजार से ही है ना)  याद करो हमारे  पूर्वज कैसा-कैसा दान करते थे, देते-देते खुद नंगे-भिखमंगे हो जाते थे। बहुतों ने तो इस सुख के लिए अपनी जान तक गंवा दी थी। कई  रसातल में जा पहुंचे थे। बहुतों ने तो अपना परिवार तक गंवा दिया था। तुम भी सोचो मत दूसरों को कुछ तो दो। 

इस समझाइश से थोड़ा जागरुक हो कर मैंने भी  अपने चारों ओर नजर दौड़ाई तो पाया कि प्रकृति और भगवान जैसी दार्शनिकता को छोड़ भी दें तो भी कोई ना कोई, कुछ ना कुछ तो दे ही रहा है और बदले में खुशी हासिल कर रहा  है।  

मतलबी  देने लेने को देखें तो नेता वर्षों से आश्वासन देता आ रहा है और परिवार समेत खुश-समृद्ध रहता है। कारोबारी व्यक्ति  प्रलोभन देता है और अपनी खुशी का इंतजाम करता है। छोटे व्यापारी तीन के बदले चार जैसा कुछ देते हैं, देने वाला जेब कटवा कर और लेने वाला दाम बना कर खुश हो जाते हैं।

पर कहीं-कहीं आपको सचमुच कुछ देकर भी खुश होने वाले लोग हैं। जो बिना किसी अपेक्षा के खुशियाँ बाँटते हैं,  जिनसे आप रोज कुछ पाते हैं पर ध्यान नहीं देते। बुजुर्ग आशीर्वाद देते हैं जिससे आपको संबल मिलता है, मनोबल बना रहता है। पत्नी मुस्कान देती है, आपका हाथ बटाती है, घर-घर लगता है। भाई-बहन स्नेह देते हैं। बच्चे प्यार देते हैं। आपका जीवन सुखमय बना रहता है।

इतना सब मनन-चिंतन कर मैंने सोचा कि देखूं तो मैंने अब तक  क्या दिया है दूसरों को?  कुछ समझ नहीं आया, फिर थोड़ा ध्यान लगाया, याद किया  सुबह से अपनी गतिविधियों को तो पाया कि मैं भी किसी  से पीछे नहीं हूँ,   बहुत कुछ देता आ रहा हूँ सभी को। सबेरे-सबेरे मां पापा को बिना मिले, बताए निकल आया था।  चिंता सौंप आया था।  अब दिन भर फिक्र करेंगे कि गुमसुम सा गया है सब ठीक-ठाक हो। मंहगाई  का अंत नहीं  है,  पर्स कहता है मुझे हाथ मत लगाओ, पत्नी परेशान थी कुछ जरूरी खरीदारी करनी थी,  ड़पट दे कर आया था। बच्चे तना चेहरा देख दुबके रहे। घर के  माहौल का  भारीपन महसूस करते रहे होंगें, उन्हें नजरंदाजी दे  आया था। दफ्तर आ कर दो-चार को हड़कान दी बेवजह तनाव बनाया। आज बहुत जरूरी  काम था, बास सोच रहा था शर्मा आएगा तो हो जाएगा। पर  उसे भी टेंशन थमा दिया कि आज तो कुछ भी पूरा नहीं ही हो पाएगा।

अब सोचता हूँ, यह कैसा है मेरा देना?  जो चारों ओर तनावयुक्त माहौल बनाता है। सभी को तो कुछ ना कुछ दिया ही पर कोई भी खुश नजर नही आया। यहां तक कि मैं खुद अजीब सा महसूस कर रहा हूं। सिर भारी हो गया है। धड़कनें तेज हो रही हैं। रक्त-चाप बढा हुआ लग रहा है। थकान हावी है। यह कैसा सुख है देने का?

सोचिए,  ध्यान से, कहीं आप भी मेरी तरह, ऐसा ही कुछ तो नहीं दे रहे दूसरों को ?

मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

जनता को ही आगे आ कर अंकुश लगाना होगा



एक हैं कलमाडी। जनता की यादाश्त चाहे कितनी भी अल्पजीवी हो पर इतनी भी कमजोर नहीं है कि वह इन महानुभाव को भूला बैठी हो। वैसे इनके द्वारा संपादित कार्य ही इतना महान था कि इतनी ज़ल्दी भूलना मुश्किल  था। सभी जानते हैं कि  राष्ट्रमंडल खेल घोटाले में लिप्तता के कारण कलमाडी को गिरफ्तार किया गया था, और अब वह जमानत पर हैं। हालांकि जिस सीबीआई ने उन्हें गिरफ्तार किया था, उसी ने बाद में उन्हें क्लीन चिट भी दे दी थी, यह कैसे हुआ वह अलग मुद्दा है।  पर सरकार रूपी गठबंधन में उनके मौसेरे भाईयों ने पता नहीं अब  क्या समा बांधा, किसे क्या समझाया कि सरकार ने फिर उन्हें संसदीय समिति में मनोनीत कर दिया। पर शायद कुछ लोगों की  आंखों  की शर्म बची हुई है इसीलिए जब कलमाडी महाशय को भारतीय ओलंपिक संघ में फिर स्थान देने की अनुशंसा की गयी तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने ऐसा ना करने का साफ एलान कर एक अनुकरणीय उदाहरण पेश कर दिया है।

सरकार ने जनता और  अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को कलमाडी के बारे में जिस तरह अलग-थलग रखा  उससे भी  यह शक जोर पकड़ता था कि सरकार मामले की लीपापोती कर दोषियों को बचाने की कोशिश में है। पर इससे भी कलमाडी पर लगा दाग धुल नहीं सका । पर इतना जरूर हो गया कि इस  सरकारी प्रोत्साहन के कारण  कलमाडी लंदन ओलंपिक जाने की बात करने की धृष्टता करने लगे थे। पर उस वक्त खेल मंत्री ने उनकी नहीं चलने दी और अब भारतीय ओलंपिक संघ से उन्हें बाहर करने में जगदीश टाइटलर ने अहम्  भूमिका निभाई है,. यह अलग बात है कि वे  खुद संघ का मुखिया बनना चाहते हैं। 

संघ का चुनाव अगले महीने है, और कलमाडी अपना अध्यक्ष पद बरकरार रखने के लिए चुनाव लड़ने की हर तिकडम आजमाने को आतुर हैं। जबकि उनकी इस महत्वाकांक्षा पर लगाम लगाते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने कहा है कि यह चुनाव पूरी तरह आचार संहिता के आधार पर होना चाहिए। अब अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति के एथिक्स कमीशन ने भी टिप्पणी की है कि जब तक कलमाडी निर्दोष साबित नहीं होते, तब तक संघ में उनके लिए कोई जगह नहीं है।

पर सवाल यह उठता है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ ऐसा नैतिक साहस राजनीतिक व्यवस्था में क्यों नहीं दिखता? क्यों देश की राजनीतिक पार्टियां भ्रष्टाचार की अनदेखी कर खुद सत्ता में आने के लिए अयोग्य, भ्रष्ट, धन-लोलूप पात्रों को बार-बार सामने ला उन्हें देश और प्रजा का शोषण करने का मौका देती रहती हैं? इस मामले में सत्तारूढ ही नहीं दूसरी पार्टियों का  भी एक जैसा ही रुख होता है।  इस बार भी वोटों की मजबूरी के चलते अकेले कलमाडी पर ही नज़रें इनायत नहीं की गयीं बल्कि  उसी थैली के कुछ और बट्टे, कनिमोझी और राजा को भी संसदीय समितियों में लाकर केंद्र ने कोई अच्छा संदेश जनता तक नहीं पहुंचाया है। वस्तुत: ऐसा कर कोयले की दलाली में काले हुए हाथों को अपने ही  चेहरे पर भी मल लिया है। 

मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

यह गांधी का देश है


"ग्लोबल फाइनैंशल इंटीग्रिटी" की सूचना के अनुसार हमारे देश का करीब 210 अरब रुपया स्विस बैंकों में जमा है। यह रिपोर्ट 2008 की है। यह बेकार पड़ा जमा धन हमारी जीड़ीपी के पचास प्रतिशत के बराबर है। ये बैंक ही वहां की अर्थ व्यवस्था को संभालते हैं हमारे पेट को काट कर। चूंकी वहां के लोगों की रोजी-रोटी ऐसा ही धन जुगाड़ करवाता है सो वहां खाता खोलने में भी आपको ढेरों सहूलियतें मुहय्या करवाई जाती हैं। बस आपके पास "माया" होनी चाहिए। बिना ज्यादा झंझटों और दस्तावेजों के सिर्फ पासपोर्ट से ही 15-20 मिनट में आपका खाता खोल आपके हाथ में डेबिट कार्ड़ थमा दिया जाता है। भविष्य में भी एक ई-मेल से आप अपना धन उनके सदा खुले मुख में उडेल सकते हैं।

हम-आप अंदाज भी नहीं लगा सकते कि यदि स्विस बैंकों में पड़ी सडती रकम किसी तरह वापस अपने देश आ जाए तो क्या कुछ हो सकता है। इससे पैंतालिस करोड़ गरीब करोड़पति बन सकते हैं। हमारे सर पर लदा अरबों का विदेशी कर्ज चुकता कर देने के बावजूद बहुतेरे आधे-अधूरे प्रोजेक्ट पूरे किए जा सकते हैं। इतनी रकम को किसी ढंग की जगह लगा दिया जाए तो उसके ब्याज से ही सालाना बजट पूरा हो सकता है।

ऐसे धन का ढेर बनाने में वे लेन-देन सहायक होते हैं जो हवाला के जरिए किए जाते हैं। बड़े रक्षा और बहुतेरे सौदों का कमीशन ले बाहर ही छुपा दिया जाता है। आयात-निर्यात के उल्टे-सीधे बिल बना, उससे प्राप्त पैसे को बाहर बैंकों के अंधेरे लाकरों में गर्त कर दिया जाता है। बिना किसी रिकार्ड़ के देश से पैसा बाहर भेज दिया जाता है। ये सारा काम क्या आम इंसान के वश का है? सब जानते हैं कि कैसे लोग ऐसे तरीके से वैसा धन इकट्ठा कर सकते हैं।

ऐसा भी नहीं है कि सिर्फ हमारे यहां से ही वहां धन पहुंच रहा हो। दुनिया के दूसरे देशों में भी नमकहराम बैठे हुए हैं। कम्यूनिज्म के पैरोकार रूस का इस मामले में दूसरा स्थान है, पर वह क्या खा कर हमारे चंटों का मुकाबला करेगा, दूसरा स्थान होने के बावजूद उसके धन की मात्रा हमारे से एक चौथाई भी नहीं है। जबकि हर जगह अपने को सर्वोच्च मानने वाला, धन कुबेर अमेरिका पहले के पांच स्थानों में भी जगह नहीं बना पाया है। हम उसकी ऐसी नकल क्यों नहीं करते?
स्विस बैंक के एक प्रबन्धक ने भारत की अर्थ व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत की जनता गरीब हो सकती है पर देश गरीब नहीं है। उसने आगे कहा कि वहां का इतना पैसा स्विस बैंकों में जमा है जिससे :-

# भारत सरकार 30 सालों तक बिना टैक्स का बजट पेश कर सकती है।

# 60 करोड़ नौकरियां वहां उपलब्ध करवा सकती है।

# दिल्ली से देश के हर गांव तक 4 लेन सड़क बनवा सकती है।

# बिजली की अनवरत सप्लाई की जा सकती है

# वहां के हर नागरिक को साठ साल तक 2000 रुपये दे सकती है।

# ऐसे देश को किसी भी वर्ल्ड बैंक या कर्ज की कोई जरूरत नहीं पड़ सकती।

यह कहना था वर्ल्ड बैंक के एक जिम्मेदार अधिकारी का। जरा गंभीरता से सोचिये कि भ्रष्टता की यह कौन सी सीमा है। ऐसी कौन सी मजबूरी है सरकार की या वह कौन सी ताकते हैं जिनके सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही कुछ करने की और उस धन को वापस लाने की।  

रविवार, 30 सितंबर 2012

अविश्वसनीय भारत


दोस्तो, कई  मायनों में हमारा देश महान था और है पर उसका एक पहलू और भी है उस पर भी नज़र डाल लेते हैं :

हम एक ऐसे देश में रहते हैं जहां गेहूं 25 रुपये कीलो मिलता है पर सिम कार्ड मुफ्त में उपलब्ध है। 

घायलों या बीमारों के लिए अम्बुलेंस या तो मिलती नहीं या आने में इतनी देर कर देती है कि..... पर विदेशी पिज्जा खिलाने वाले उसको ग्राहक तक आधे घंटे से भी पहले पहुंचाने की कुव्वत रखते हैं। 

आपने कार लेनी है तो सिर्फ 5% के ब्याज पर तुरंत मिल जाएगी पर यदि आप अपने बच्चे की पढाई के लिए लोन लेना चाहते हैं तो वह 12% पर किसी तरह जूते घिसवाने के बाद ही मिल पाएगा या नहीं निश्चित नहीं होता। 

विडबंना है कि जिसे जरूरत होती है उसे बैंक लोन देने में ढेर सारी अडचने खडी कर देते हैं पर उस रसूखदार या सक्षम को यह आसानी से उपलब्ध करवा दिया जाता है, जहां से पैसा वापस आने की संभावना क्षीण होती है।   

यहां फल तथा सब्जियों को तो अस्वास्थ्यकर माहौल में ज्यादातर सडक किनारे बेचा और खरीदा जाता है वहीं जूते और कपडे आलीशान वातानुकूलित माल में बिकते हैं। 

शायद यहीं पेय पदार्थों में नकली सुगंध मिला कर उसे आम, संतरे, मौसम्बी का स्वाद दिया जाता है और असली नींबू से जूठे बर्तनों को साफ करने की सलाह दी जाती है।  

यहां जन्म के सर्टिफिकेट पर अच्छे संस्थान में 40% पर भी दाखिला मिल जाता है पर मेहनत कर मेरिट में 90% आने पर भी धक्के खाने पडते हैं। 

इस देश में जहां लाखों लोगों को एक समय भी भर पेट भोजन नसीब नहीं होता वहां क्रिकेट के विवादास्पद तमाशे पर लोग अरबों रुपये किसी टीम को बनाने और नचाने पर बर्बाद कर देते हैं।  

यहां हर आदमी तुरंत अमीर और मशहूर होने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है पर सही रास्ता अख्तियार करने से दूर भागता है।

सरकारी नुमायंदों के आवास, निवास, दफ्तर तो तुरंत बन जाते है, उनकी सजावट और रख-रखाव पर हर साल करोडों रुपये भी खपाए जाते हैं पर उसी जनता, जिसके रहमो-करम पर वे यह मुकाम हासिल करते हैं उसकी सहूलियतों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता और कभी ऐसा हो भी जाता है तो उसको पूरा करने में दशक लग जाते हैं।                         

गुरुवार, 27 सितंबर 2012

एक अच्छे उद्देश्य के आंदोलन का बुरा अंत

करीब दो साल पहले अन्ना हजारे के दिशा-निर्देश में शुरू हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का जो हश्र हुआ है,वह दुखदाई तो है ही साथ ही करोड़ों देश वासियों की उम्मीदों पर भी पानी फेरने वाला साबित हुआ। आम-लोगों को एक आस बंधी थी कि उनकी मेहनत की कमाई का वह हिस्सा जो टैक्स के रूप में सरकार लेती है और जिसका अच्छा-खासा प्रतिशत बेईमानों की जेब में चला जाता है, उसका जनता की भलाई में उपयोग हो सकेगा। उनको अपना हक पाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पडेगा। भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और भ्रष्टाचारियों की नकेल कसी जा सके। 

रोज-रोज की घोटाले की खबरों और उसमें लिप्त सफेद पोशों के काले चेहरों को देख आम आदमी पूरी तरह हताश-निराश हो चुका था। ऐसे में अन्ना के अवतरण, उनके व्यक्तित्व, उनके चरित्र, उनकी निस्पृहता से उसे अंधेरे में एक आशा की किरण दिखाई दी जिसे वह सुहानी सुबह की रोशनी समझ, उत्साह से भर आंदोलन का हिस्सा बन कभी राम-लीला मैदान तो कभी जंतर-मंतर पर जा खडा हुआ। उअसने आंधी-पानी की परवाह नहीं की। उसे पुलिस की लाठियां ना डरा सकीं, उसे जेल जाने का कौफ नहीं रहा। क्योंकि उसमें एक आशा जगी थी कि सामने वाला अपने जैसा आदमी जिसे सत्ता या धन का लोभ नहीं है वह व्यवस्था में जरूर कुछ ना कुछ फेर-बदल कर सुराज लाने में सफल होगा। कभी-कभी अन्ना के मंच पर विवादास्पद लोगों को जुटते देख एक शंका भी होती थी पर फिर अन्ना की ओजस्वी वाणी उसे आश्वस्त कर देती थी। यहां तक कि सत्तारूढ लोगों की चालों का जवाब देते हुए जब अन्ना ने चुनाव लडने की घोषणा की तब भी उस आम आदमी ने उन्हें जिताने का मन ही मन संकल्प ले लिया था। मगर जिस तरह से अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग हुईं हैं, जैसे इस आंदोलन के अंतर्विरोध और आपसी मतभेद उभर कर सामने आए हैं उससे भिर जन-मानस में हताशा-निराशा घर कर गयी है। क्योंकि इस आंदोलन ने सीधे सत्ता को चुन्नौती दी थी, राजनीति के सामने हुंकार भरी थी, आम इंसान जिनके सामने पडने में घबराता है उन हस्तियों को शीशा दिखलाया था। 

अब केजरीवाल जो करने जा रहे हैं यदि उसमें अन्ना का साथ ना रहा तो वह कहां तक सफल होंगे, क्या वह जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतर पाएंगे, क्या वे अपनी प्रतिबद्धताओं से जुड़े रह पाएंगे? क्या वे चुने जाने के बाद ईमानदार बने रह सकेंगे या फिर खिचडी सरकार बनने, जिसकी आशंका बहुत ज्यादा है, वे भी गठबंधन का फायदा उठा कर आज की नौटंकी की तरह नीतियों का विरोध करने के नाटक और साथ-साथ सत्ता में हिस्सा पाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर हो मौकापरस्त बन जाएंगे यह तो समय ही बताएगा। पर अभी तो एक अच्छे उद्देश्य को लेकर शुरु हुए आंदोलन का हश्र बुरा ही रहा है।   

सोमवार, 24 सितंबर 2012

श्री गणपतिजी की अष्टोत्तरशत नामावली यानी श्री गणेशजी के १०८ नाम,


ये श्री गणेशजी के १०८ नाम हैं। रोज इनका जाप करें और सुखीस्वस्थ एवं प्रसन्न रहें

1, ॐ श्री विघ्नेशाय नम:
2, ॐ श्री विश्व्वरदाय नम:
3, ॐ श्री विश्वचक्षुषे नम:        
4, ॐ श्री जगत्प्रभवे नम:
5, ॐ श्री हिरण्यरुपाय नम:
6, ॐ श्री सर्वात्मने नम:
7, ॐ श्री ज्ञानरूपाय नम:
8, ॐ श्री जगन्मयाय नम:
9, ॐ श्री ऊर्ध्वरेतसे नम:
10, ॐ श्री महाबाहवे नम:
11, ॐ श्री अमेयाय नम:
12, ॐ श्री अमितविक्रमाय नम:
13, ॐ श्री वेदवेद्याय नम
14, ॐ श्री महाकालाय नम:
15, ॐ श्री विद्यानिद्यये नम:
16, ॐ श्री अनामयाय नम:
17, ॐ श्री सर्वज्ञाय नम:
18, ॐ श्री सर्वगाय नम:
19, ॐ श्री गजास्याय नम:
20, ॐ श्री चित्तेश्वराय नम:
21, ॐ श्री विश्वमूर्तये नम:
22, ॐ श्री विगतज्वराय नाम:
23, ॐ श्री अमेयात्मने नम:
24, ॐ श्री विश्वाधाराय नम:
25, ॐ श्री सनातनाय नम:
26, ॐ श्री सामगाय नम:
27, ॐ श्री प्रियाय नम:
28, ॐ श्री मंत्रिणे नम:
29, ॐ श्री सत्वाधाराय नम:
30, ॐ श्री सुराधीशाय नम:
31, ॐ श्री समस्तसाक्षिणे नम:
32, ॐ श्री निर्द्वेद्वाय नम:
33, ॐ श्री निर्लोकाय नम:
34, ॐ श्री अमोघविक्रमाय नम:
35, ॐ श्री निर्मलाय नम:
36, ॐ श्री पुण्याय नम:
37, ॐ श्री कामदाय नम:
38, ॐ श्री कांतिदाय नम:
39, ॐ श्री कामरूपिणे नम:
40, ॐ श्री कामपोषिणे नम:
41, ॐ श्री कमलाक्षाय नम:
42, ॐ श्री गजाननाय नम:
43, ॐ श्री सुमुखाय नम:
44, ॐ श्री शर्मदाय नम:
45, ॐ श्री मुषकाधिपवाहनाय नम:
46, ॐ श्री शुद्धाय नम:
47, ॐ श्री दीर्घतुंडाय नम:
48, ॐ श्री श्रीपतये नम:
49, ॐ श्री अनंताय नम:
50, ॐ श्री मोहवर्जिताय नम:
51, ॐ श्री वक्रतुंडाय नम:
52, ॐ श्री शूर्पकर्णाय नम:
53, ॐ श्री परमाय नम:

54, ॐ श्री योगीशाय नम:
55, ॐ श्री योगधाम्रे नम:
56, ॐ श्री उमासुताय नम:
57, ॐ श्री आपद्धंत्रे नम:
58, ॐ श्री एकदंताय नम:
59, ॐ श्री महाग्रीवाय नम:
60, ॐ श्री शरण्याय नम:
61, ॐ श्री सिद्धसेनाय नम:
62, ॐ श्री सिद्धवेदाय नम:
63, ॐ श्री करुणाय नम:
64, ॐ श्री सिद्धाय नम:
65, ॐ श्री भगवते नम:
66, ॐ श्री अव्यग्राय नम:
67, ॐ श्री विकटाय नम:
68, ॐ श्री कपिलाय नम:
69, ॐ श्री ढुंढिराजाय नम:
70, ॐ श्री उग्राय नम:
71, ॐ श्री भीमोदराय नम:
72, ॐ श्री शुभाय नम:
73, ॐ श्री गणाध्यक्षाय नम:
74, ॐ श्री गणेशाय नम:
75, ॐ श्री गणाराध्याय नम:
76, ॐ श्री गणनायकाय नम:
77, ॐ श्री ज्योति:स्वरूपाय नम:
78, ॐ श्री भूतात्मने नम:
79, ॐ श्री धूम्रकेतवे नम:
80, ॐ श्री अनुकूलाय नम:
81, ॐ श्री कुमारगुरवे नम:
82, ॐ श्री आनंदाय नम:
83, ॐ श्री हेरंबाय नम:
84, ॐ श्री वेदस्तुताय नम:
85, ॐ श्री नागयज्ञोपवीतिने नम:
86, ॐ श्री दुर्धषाय नम:
87, ॐ श्री बालदुर्वांकुरप्रियाय नम:
88, ॐ श्री भालचंद्राय नम:
89, ॐ श्री विश्वधात्रे नम:
90, ॐ श्री शिवपुत्राय नम:
91, ॐ श्री विनायकाय नम:
92, ॐ श्री लीलासेविताय नम:
93, ॐ श्री पूर्णाय नम:
94, ॐ श्री परमसुंदराय नम:
95, ॐ श्री विघ्नांधकाराय नम:
96, ॐ श्री सिंधुरवरदाय नम:
97, ॐ श्री नित्याय नम:
98, ॐ श्री विभवे नम:
99, ॐ श्री प्रथमपूजिताय नम:
100, ॐ श्री दिव्यपादाब्जाय नम:
101, ॐ श्री भक्तमंदाराय नम:
102, ॐ श्री शूरमहाय नम:
103, ॐ श्री रत्नसिंहासनाय नम:
104, ॐ श्री मणिकुंड़लमंड़िताय नम:
105, ॐ श्री भक्तकल्याणाय नम:
106, ॐ श्री कल्याणगुरवे नम:
107, ॐ श्री सहस्त्रशीर्ष्णे नम:
108, ॐ श्री महागणपतये नम:

गुरुवार, 20 सितंबर 2012

ममता, स्नेह, वात्सल्य को पैसे से नहीं तौला जा सकता



यदि ऐसा कोई  कानून बनता है तो क्या यह देश के सभी समुदायों, सभी धर्मावलंबियों पर लागू होगा या अपनी कुर्सियों पर पकड मजबूत करने के लिए सिर्फ "हिंदू मैरेज एक्ट" पर लागू कर हिंदुओं को ही फिर बली का बकरा बनाया जाएगा ?   एक और बात  इन सबसे घबडा कर कुछ पुरुष विवाह के नाम से ही बिदकने लगें तो? क्योंकि पैसा देकर जब बाजार से हर सेवा उपलब्ध होगी तो कोई क्यूं मुफ्त की सरदर्दी पालेगा? वैसे भी विदेशी प्रभाव में आ कर "एक अलग तरह का" जीवन-यापन बडे शहरों में शुरु हो ही चुका है। तब समाज का क्या रूप बनेगा इसका जवाब किस के पास है ?


विज्ञापन के क्षेत्र और बाजार में एक जुमला काफी प्रसिद्ध है, "जो दिखता है वही बिकता है।" चाहे गुणवत्ता से उसका दूर-दूर तक कोई सबंध ना हो। अब यही बात समाज के हर क्षेत्र पर लागू होने लगी है। अपने को खबरों में और मीडिया में बनाए रखने के लिए कोई भी कुछ भी कहने-करने को तैयार रहता है, खासकर 'शो बिज' और राजनीति के खिलाडी। अब कुछ दिन पहले तक महिला व बाल कल्याण मंत्रालय को कौन संभालता है यह "कौन बनेगा करोडपति" में पच्चीस लाख वाला सवाल हो सकता था। पर जबसे पुरुष की कमाई का एक हिस्सा घर की स्वामिनी को देने का शगूफा चला है तबसे अनजानी सी मंत्री महोदया श्रीमती कृष्णा तीरथ को देशवासी ही नहीं बाहर के मुल्कों में रहने वाले भी जानने लगे हैं। इस कानून का क्या हश्र होगा यह तो समय ही बतला पाएगा पर मंत्री महोदया ने खुद को प्रसिद्ध करवा ही लिया। 

कुछ तथाकथित समाज सुधारकों का मानना है कि मर्द सदियों से औरत को भावनात्मक रूप से बेवकूफ बना घर के काम करवाता रहा है तो यह उनकी घटिया सोच है। उन्हें नहीं मालुम कि ममता क्या होती है, स्नेह कैसे सदस्यों को एकजुट रखता है, उत्सर्ग की भावना क्या होती है। पुरुष के दूर-दराज के क्षेत्र में काम पर रहने पर महिला कैसे घर को घर बनाए रखती है। कुछ अपवादों को छोड दें तो क्या पुरुष बाहर जी-तोड मेहनत नहीं करता जिससे उसके परिवार का भविष्य सुखमय हो। क्या वह अपनी पत्नी का दुख-सुख में ख्याल नहीं रखता या फिर वह पूरे परिवार को पालने की चिंता नहीं करता? यदि वह भी मुआवजा मांगने लगे तो? ऐसा भी नहीं है कि सारे पुरुष कर्तव्यपरायण ही होते हैं फिर भी अधिकांश घरों में पति अपनी कमाई का एक बडा हिस्सा पत्नी को सौंप इसलिए निश्चिंत हो जाता है क्योंकि उसे पत्नी की कार्क्षमता पर भरोसा होता है, उसे वह अपने से अलग नहीं मानता। पर इस नासमझदारी वाले कदम से नारी का भला हो या नहो पर इस बात की आशंका जरूर है कि परिवारों में विघटन  शुरु हो रिश्तों में दरारें पडनी शुरु हो जाएंगी। अपरोक्ष रूप से नारी को फिर दोयम दर्जे में ढकेलने की बात हो जाएगी।  हमारे देश की मजबूती में हमारे परिवारों की एकजुटता का बहुत बडा हाथ है ऐसा तो नहीं कि यह भी देश को विखंडित करने की कोई साजिश हो। 

भले ही उनका प्रतिशत नगण्य ही हो पर बहुतेरी महिलाएं ऐसी हैं जो सर उठा कर गर्व से अपना जीवन-यापन कर रही हैं। ऐसा ही एक अच्छा खासा प्रतिशत उन महिलाओं का भी है जो अपने पति से ज्यादा कमा कर परिवार को सुखमय बना रहा है। देश में कुछ इलाके ऐसे भी हैं जहां आज भी मातृ-सत्ता का चलन है, वहां महिलाओं का ही बर्चस्व है। इन सब को भी आप नकार नहीं सकते। सिर्फ वातानुकूल कक्ष में बैठ घडियाली आंसूं बहा किसी का भला नहीं हो सकता। कानून ऐसा हो जो सर्व मान्य हो, बिना किसी को ठेस पहुंचाए उसे सम्मान पूर्वक जीने का हक दिला सके चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, बाल हो या वृद्ध।           

यदि सरकार सही मायनों में महिलाओं का उत्थान चाहती है तो भी यह रास्ता उचित नहीं लगता। इससे बेहतर होता कि पुरुष की सारी संपत्ति का आधा भाग महिला के नाम कर दिया जाता। इस तरह काम के बदले पैसा देना ओछी मानसिकता का प्रतीक है। कोई भी स्वाभिमानी, प्रेमल, ममतामयी नारी इस तरह अपना मेहनताना लेना स्वीकार नहीं करेगी। जो स्त्री अपने स्नेहिल, वात्सल्यता भरे व्यवहार से दुख-तकलीफ, खुशी-गम, ऊंच-नीच में परिवार को एकजुट रखती रही हो, जिसका अधिकार सारे घर पर माना जाता रहा हो उसे इस तरह कैसे उसी की नजरों में कमतर साबित किया जाना चाहिए। यह तो उसका व्यवसायिककरण हो जाएगा।  पति-पत्नी का पवित्र बंधन  मालिक और नौकर का रिश्ता बन कर रह जाएगा। फिर यदि ऐसा होता है तो पैसे के बदले करवाए गये काम में मीन-मेख निकालना शुरु हो जाएगा। काम पूरा ना होने की स्थिति में आक्रोश और क्रोध की संभावना से भी इंकार नहीं किया जा सकता। दूसरी बात दुनिया में सिरफिरों की कोई कमी नहीं है ऐसा ही कोई पति काम के बदले पैसा दे अपनी और जिम्मेदारियों से मुंह मोड ले तो महिला की अन्य जरूरतों यथा कपडे-लत्ते, दवा-दारू, मनोरंजन, निजी वस्तुओं की जरूरत तथा अन्य ढेरों खर्चों के लिए आवश्यक रकम क्या सरकार अपने कोष से देगी? एक बात और भी गौर-तलब है बहुतेरे घरों में पति-पत्नी में नोक-झोंक, अनबन, तनाव या कलह-क्लेश की स्थिति बनी रहती है। उस पर यदि इस प्रकार के उट-पटांग कानून लाद दिए जाएंगे तो इन सबसे घबडा कर कुछ पुरुष विवाह के नाम से ही बिदकने लगें तो? क्योंकि पैसा देकर जब बाजार से हर सेवा उपलब्ध होगी तो कोई क्यूं मुफ्त की सरदर्दी पालेगा? वैसे भी विदेशी प्रभाव में आ कर "एक अलग तरह का" जीवन-यापन बडे शहरों में शुरु हो ही चुका है। तब समाज का क्या रूप बनेगा इसका जवाब किस के पास है? 

सबसे बडी बात यदि यह कानून बनता है तो क्या यह देश के सभी समुदायों, सभी धर्मावलंबियों पर लागू होगा या अपनी कुर्सियों पर पकड मजबूत करने के लिए सिर्फ "हिंदू मैरेज एक्ट" पर लागू कर हिंदुओं को ही फिर बली का बकरा बनाया जाएगा?  

देश के "सेव फ़ैमिली फाउंडेशन", जिसकी देश भर में करीब चालीस शाखाएं हैं, का कहना है कि कोई भी कानून लिंग भेद नहीं करता पर इस बार यह एक तरफा बात लगती है जिसमें दूसरे पक्ष को पूरी तरह नजरंदाज किया गया है। जिसका सबसे खतरनाक पहलू पारिवारिक विखंडता होगी। 

इसलिए यदि सरकार अपनी राजनीति से उपर उठ कर सचमुच महिलाओं का भला और उनका सर्वांगीण उत्थान चाहती है तो कोई तर्कसम्मत कदम उठाए। नहीं तो जैसी हमारी व्यवस्था है उसमें किसी की भलाई के लिए दिल से उठाये गये कदम को भी गलत रास्ते में डलवाने में देर नहीं लगती। बाल-विवाह, विधवा-उद्धार, बाल-श्रम, बालिका-पुनुरुत्थान, रेवडी की तरह बंटती छात्र-वृत्तियों का हश्र सभी देख ही चुके हैं। 


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