मंगलवार, 14 अगस्त 2012

माँ-बाप के मन में छुपा डर


 बदलते समय, बदलती मान्यताओं, सफलता लिए अंधाधुन्ध दौड़, रिश्तों  में आती ठंडक से  बुढाते, समय के साथ अक्षम होते माँ-बाप के मन के किसी कोने में  कोई डर तो नहीं घर कर रहा ?  

मेरे बच्चे जब तुम हमें एक दिन बूढा और कमज़ोर देखोगे, तब संयम रखना और हमें समझने की कोशिश करना।
अगर हम से खाना खाते वक्त कपड़े गंदे हो जाएं, अगर हम खुद कपड़े न पहन सकें तो जरा याद करना जब बचपन में तुम हमारे हाथ से खाते और कपड़े पहनते थे।
अगर हम तुमसे बात करते वक्त एक ही बात बार बार दोहराएं तो गुस्सा खाकर हमें मत टोकना, धैर्य से हमें सुनना, याद करना, कैसे बचपन में कोई कहानी या लोरी तब तक तुम्हे सुनाते थे जब तक तुम सो नहीं जाते थे।
अगर कभी किसी कारणवश हम न नहाना चाहें तो हमें गंदगी या आलस का हवाला देते हुए मत झिड़कना, क्योंकि यह उम्र का तकाजा होगा। याद करना बचपन में तु्म नहाने से बचने के लिए कितने बहाने बनाते थे और हमें तुम्हारे पीछे भागते रहना पड़ता था।
अगर आज हमें कंप्यूटर या आधुनिक उपकरण चलाने नहीं आते तो हम पर झल्लाना नहीं नाहीं शर्मिंदा होना, समझना कि इन नयी चीजों से हम वाकिफ नहीं हैं और याद करना कि तुम्हे कैसे एक-एक अक्षर हाथ पकड-पकड कर सिखाया था।
अगर हम कोई बात करते करते कुछ भूल जाएं तो हमें याद करने के लिए मौका देना, हम याद न कर पाएं तो खीझना मत। हमारे लिए बात से ज़्यादा अहम है बस तुम्हारे साथ होना और ये अहसास कि तुम हमें सुन रहे हो समझ रहे हो।
अगर हम कभी कुछ न खाना चाहें तो जबरदस्ती मत करना, हम जानते हैं कि हमें कब खाना है और कब नहीं खाना।
अगर चलते हुए हमारी टांगे थक जाएं और लाठी के बिना हम चल न सकें तो अपना हाथ आगे बढ़ाना, ठीक वैसे ही जब तुम पहली बार चलना सीखते वक्त लड़खड़ाए थे और हमने तुम्हे थामा था।

एक दिन तुम महसूस करोगे कि हमने अपनी गलतियों के बावजूद तुम्हारे लिए सदा सर्वेश्रेष्ठ ही सोचा, उसे मुमकिन बनाने की हर संभव कोशिश की। हमारे पास आने पर क्रोध, शर्म या दुख की भावना मन में कभी मत लाना, हमे समझने और वैसे ही मदद करने की कोशिश करना जैसे कि तुम्हारे बचपन में हम किया करते थे।
हमे अपनी बाकी की ज़िंदगी प्यार और गरिमा से जीने के लिए तुम्हारे साथ की जरूरत है। हमारा साथ दो, हम भी तुम्हे मुस्कुराहट और असीम प्यार से जवाब देंगे, जो हमारे दिल में तुम्हारे लिए हमेशा से रहा है।
बच्चे, हम तुमसे प्यार करते हैं।

पापा-मम्मी

सोमवार, 6 अगस्त 2012

प्रकृति को नमस्कार है

कभी किसी पहाड, समुद्र, रेगिस्तान या बीहड वनों में सूर्योदय  या सूर्यास्त  देखें। उन्मुक्त विचरते जीव-जंतुओं को निहारें, कल-कल करती नदियों, ऊंचाई से गिरते झरनों का संगीत सुनें। हजारों तरह के फल-फूल, लता-कंद प्रदान करने वाली धरती, जीवन दाई शीतल-मंद-सुगंध वाले समीर को महसूस करें. घुलमिल जाने दें अपने आप को उसमें.  अपने  अस्तित्व को भूला  उसके आँचल में समा जाने दें अपने-आप को, तब उसकी विशालता और अपनी   छुद्रता का एहसास हो पाएगा । प्रकृति एक अजूबा है। इसमें इतने गूढ रहस्य समाए हैं कि उनको खोजने में सदियों का समय भी कम पड सकता है।  

दुनिया के हर देश, हर कोने में कहीं ना कहीं इसने अपनी धरोहर सजा के रखी हुई हैं। ऐसी ही एक अनोखी झील है बर्मा में। जहां साल के एक दिन सूर्य के विशिष्ट कोण से निकली रश्मियों, झील के जल,  साथ की चट्टानों और उस पर की लता-गुल्म-झाड़ियों से एक अद्भुत, आश्चर्यचकित कर देने वाला दृष्य आकार लेता है। जिसे देख कर सहसा उस महाशक्ति को नमन करने को मजबूर होना पडता है। बहुत बार यह नज़ारा प्रदर्शित हो चुका है पर बहुतों ने अभी इसे देखा नहीं है, इसलिए एक बार फिर - 

सर घुमा कर देखने पर यह  अद्भुत करिश्मा सामने आता है.  प्रकृति को नमस्कार है . इसे बचाने में सदा 
सहयोग करते रहें. यह बची रहेगी तभी हमारा जीवन भी सुरक्षित रह पाएगा. इसके सहारे हम हैं,  हमारे सहारे यह नहीं.    
   

गुरुवार, 2 अगस्त 2012

भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक. रक्षा-बंधन



 इस पर्व ने जात-पात, धर्म-अधर्म, ऊंच-नीच से सदा अपने को अलग रखा। इसीलिए आज भी यह उतने ही उत्साह, प्रेम, स्नेह से याद रखा जाता है और  अनेकानेक झंझावतों के बावजूद मनता चला आ रहा है। 

रक्षा-बंधन यानि राखी का त्योहार। भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक। एक दूसरे की सुरक्षा तथा मंगलकामना की अदीन इच्छा का गवाह। हमारे ग्रंथों में भी इससे संबंधित ढेरों कथाएं मिलती हैं।

देवासुर संग्राम वर्षों से चल रहा था। कोई भी पक्ष हार मानने को तैयार नहीं था। पर धीरे-धीरे देवताओं की  शक्ति क्षीण होती चली जा रही थी। देवराज इंद्र चिंतातुर रहने लगे थे। ऐसा देख इंद्राणी ने यज्ञ-पूजन कर मंत्र-पूरित रक्षा-सूत्र  उनकी कलाई में बांधा था। देवताओं की विजय हुई थी। वही शायद पहला रक्षा-बंधन  था।

कहते हैं मृत्यु के देवता यम और उनकी बहन यमुना में अगाध स्नेह था। पर कार्य की अधिकता के कारण यम को बहन से मिलने का समय नहीं मिल पाता था। तब यमुना ने उनसे वचन लिया था कि साल में एक बार चाहे वे कहीं भी हों उससे मिलने जरूर आएंगे। यम उस वचन को निभाते चले आ रहे हैं। और वह दिन है सावन की पूर्णिमा  का यानि आज का।

महाभारत के दौरान श्री कृष्ण जी की ऊंगली में चोट लगने से द्रौपदी ने अपने वसन से कपडा फाड उनकी चोट पर बांधा था। तभी श्री कृष्ण ने उन्हें अभय का वरदान दिया था। 

यह सिर्फ भाई का बहन को रक्षा का आश्वासन देने का प्रतीक ही नहीं है। इसका अर्थ और भी व्यापक रूप में है। समय गवाह रहा है कि पेडों को बचाने के लिए लोगों ने उन्हें भी रक्षा-सूत्र  बांधा है। पुरोहित अपने यजमान को राखी बांध उसकी कुशलता की कामना करता है। सभासद और मंत्री दल अपने राजा को राखी बांधते रहे हैं।  

ऐसी ही अनेक घटनाएं एवं कथाएं इस पवित्र और स्नेहिल त्योहार से जुडी हुई हैं, चाहे वह सिकंदर की बात हो या फिर हुमायूं की। इस पर्व ने जात-पात, धर्म-अधर्म, ऊंच-नीच से सदा अपने को अलग रखा है । इसीलिए आज भी यह उतने ही उत्साह, प्रेम, स्नेह से याद रखा जाता है और ऐसी ही अनेकों कहानियों, विश्वासों, श्रद्धाओं के साथ, अनेकानेक झंझावतों के बावजूद मनता चला आ रहा है। 

सभी भाई-बहनों को रक्षा-बंधन की ढेरों शुभकामनाएं।

शनिवार, 28 जुलाई 2012

गंगा घर से बह रही हो तो कोई कैसे ना नहाए ?



पर कोई करे भी तो क्या, इन इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से बचा भी तो नहीं जा सकता। अब हर कोई महात्मा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री तो  हो नहीं  सकता  !!!


महत्वाकांक्षा हर इंसान में होती है। होनी भी चाहिए। इसी से जीवन में आगे बढने का, सफल होने का जज्बा बना रहता है। यह प्रकृति प्रदत्त इच्छा कुछ लोगों में जीवन भर बनी रहती है। वैसे भी हर इंसान की चाहत होती है कि समाज उसे भी कुछ महत्व दें, लोग उसे जानें, आदर-सम्मान का हकदार समझें। 
पहले इस महता को अपनी योग्यता, विद्वता, लियाकत और कठोर परिश्रम से अर्जित किया जाता था। समय बदला, हर चीज की मान्यताएं बदल गयीं। अब अपने को खास बनाने के लिए पारिवारिक संबंधों, आर्थिक हैसियत और "डानियत" का सहारा लिया जाने लगा है क्योंकि इससे बेकार की मेहनत नहीं करनी पडती। खासकर राजनैतिक मैदान में कूदने में यह बैसाखियां काफी सहायक होती हैं खासकर पारिवारिक।

कांग्रेस का गांधी परिवार तो मुफ्त में बदनाम है। यदि चारों ओर नज़र दौडाई जाए तो पाएंगे की  हर प्रदेश, हर पार्टी, हर मुकाम पर जरा सा रसूख पाते ही लोग अपनों को आम से खास बनाने में जुट जाते  हैं। इसमें देश के कुछ हिस्से तो आदर्श हैं बाकियों के लिए। वहां तो खून के रिश्तों के अलावा अडोसी-पडोसी, गांव-शहर के लोगों को भी लाभान्वित करने में कोई कसर नहीं छोडी जाती। आज किसी भी रसूखदार को देख लें, भाई-भतीजा वाद से अछूता नहीं मिलेगा। हर वह शख्स जिसका माँ-बाप, भाई-बहन, चाचा-ताऊ खासम-खास हो, वह बचपन से ही सत्ता के झूले में झूलने के सपने देखने लगता है। जिसको हवा मिलती रहती है अपने अग्रजों की शह से। अभी कुछ दिनों पहले "बच्चों" के लिए केंद्र और प्रदेशों के बीच की तनातनी का तमाशा देखा ही जा चुका है।  

इधर मीडिया के रवैये के कारण भी कभी-कभी अजीबोगरीब परिस्थितियां सामने आ जाती हैं। कुछ सीरियलों के दिशानिर्देशों से अब एक चलन सा बन चुका है कि समाज के किसी भी वर्ग से आया इंसान यदि कोई उपलब्धि हासिल करता है तो दृष्य मीडिया कैमरा उठाए उसके घर के अंदर तक पहुंच उनकी प्रतिक्रियाओं को कैद करने की आपसी होड में जुट जाता है, बिना यह जाने-सोचे कि क्या सामने वाला इस लायक है भी कि नहीं। उधर घर वाले अचानक अपनी इस बढी हुई हैसियत को संभाल नहीं पाते और कुछ भी ऊल-जलूल बोल एक विवादास्पद स्थिति पैदा कर रख देते हैं। इसका ताज़ा उदाहरण है हमारे महामहिम के सुपुत्र जिन्होंने अपने पिता के राष्ट्पति बनते ही दौडे चले आए खबरचियों के सामने पहले तो कसाब और सरबजीत के बारे में एक अजीब सी टिप्पणी कर दी फिर पिता की खाली हुई 'सीट' को ले कर अपनी दबी-ढकी हार्दिक इच्छा के तहत अपना दावा पेश कर दिया। बाद में जिसका जवाब देना दादा को भारी पड गया था। 

पर कोई करे भी तो क्या इन इच्छाओं, कामनाओं, लालसाओं से बचा भी तो नहीं जा सकता। अब हर कोई महात्मा गांधी या लाल बहादुर शास्त्री तो हो  नहीं सकता !!!       


गुरुवार, 26 जुलाई 2012

मुंह बाए खडी है कांग्रेस की जटिल परीक्षा


प्रणव मुखर्जी के राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार घोषित होते ही राहुल गांधी को सरकार में बडी जिम्मेदारी मिलने की संभावना पर बहस का तेज होना पार्टी के अंदर की कशमकश को उजागर करता है। अब शिद्दत से यह महसूस किया जा रहा है कि युवा पीढ़ी को, जिसका सीधा अर्थ राहुल गांधी ही है, आगे बढ़कर जिम्मेदारी संभालनी चाहिए। राहुल गांधी ने भी इस बार कुछ दिनों पहले इस बात पर सकारात्मक रुख दिखाया था। यदि पार्टी 2014 में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाना चाहती है, तो यही उपयुक्त समय है कि उन्हें मंत्रिमंडल में लाया जाए। फिर प्रणब मुखर्जी के जाने के बाद केंद्रीय मंत्रिमंडल में वरिष्ठता क्रम का जो विवाद चल रहा है, वह भी खासकर कांग्रेस के लिए अच्छा संकेत नहीं दे रहा। उनके आने से यह विवाद भी स्वत: समाप्त हो जाएगा। 

पर इस राह में जो सबसे बडी अडचन है वह है कि अब तक राहुल अपनी नेतृत्व क्षमता का कोई उचित उदाहरण पेश नहीं कर पाए हैं। पिछले चुनावों में भी उनका प्रदर्शन नकारात्मक ही रहा था। ऐसे में अगले लोकसभा चुनाव में वह कोई चमत्कार कर पाएंगे, इसकी गारंटी भी नहीं दी जा सकती। लेकिन इससे राहुल गांधी की राजनीतिक संभावनाओं पर कोई फर्क नहीं पड़ता। पर सोचने की बात यह भी है कि देश की सबसे पुरानी, रसूखदार और बडी पार्टी अभी भी अपने अस्तित्व के लिए पारिवारिक करिश्मे पर ही भरोसा किए हुए है।

पर सच यह भी है कि कोई बड़ी जिम्मेदारी न संभालते हुए भी राहुल पार्टी और सरकार में बड़ी हैसियत रखते हैं। जहां एक तरफ सोनिया गांधी संगठन की सर्वेसर्वा हैं तो दूसरी ओर सरकार के मुखिया पहले ही कह चुके हैं कि उन्हें जब भी कहा जाएगा, तभी वह राहुल गांधी के लिए प्रधानमंत्री की कुरसी खाली कर देंगे। इसलिए राहुल को सत्ता में आने और उसे संभालने में कोई दिक्कत या अडचन नहीं आने वाली। पर पद संभालने के बाद आने वाली जिम्मेदारी को संभालना, पार्टी एकता को बनाए रखना दूसरी तमाम मुश्किलातों का हल निकालने के साथ सहायक दलों के घाघ नेताओं को मिलाए रखना एक बडी चुन्नौती होगी। इसके साथ ही अपने ही दल के मतलब और मौकापरस्तों, चापलूसों, चाटुकारों और अति महत्वाकांक्षी लोगों की पहचान कर उन्हें भी काबू में रखना पडेगा।   

इन्हीं सब पर पार पाते हुए उन्हें अपनी पिछली विफलताओं को भी  भुलाते हुए अपने-आप को सिद्ध करना होगा। तभी उनका और देश का मार्ग प्रशस्त हो पाएगा। 


मंगलवार, 24 जुलाई 2012

रायसीना के नये महामहिम


'रायसीना पहाडी' पर बने महल की दरो-दिवारों को भी पता था कि इस बार प्रणव मुखर्जी का आना तय है। राजनीति की काजल की कोठरी से कोई बिरला ही अपना दामन पाक-साफ रख सकता है क्योंकि विपक्ष की तो छोडें अपने ही कोई कसर नहीं छोडते दाग लगाने में, फिर वह चाहे टीके के रूप में ही क्यों ना हो।

अभी बहुत अरसा नहीं हुआ और नाहीं प. बंगाल इसे कभी भुला पाएगा जब ज्योति बसु के प्रधान मंत्री बनने के रास्ते में उन्हीं की पार्टी ने रोडे अटका दिए थे। प्रणव मुखर्जी की इस उपलब्धी से बंगवासियों के दर्दे दिल को जरूर राहत मिलेगी। हालांकि यहां भी पहले राह उतनी आसान नहीं थी पर कहीं ना कहीं दिलों में फांस होने के बावजूद पार्टी ने अपना पूरा जोर लगा दिया था। साथ ही इक्के-दुक्के आरोपों के बावजूद प्रणव जी की छवि, राजनीतिक कद तथा मौके-बेमौके सामने आता रहा तारनहार का रूप भी इस राह में काफी सहायक रहा।  

देश के इस सर्वोच्च पद के लिए ऐसा व्यक्तित्व चाहिए होता है, जिसकी छवि बेदाग हो, सभी दलों में जिसकी समान स्वीकार्यता हो जो सबको साथ लेकर चल सके। जिसे अच्छा-खासा राजनीतिक अनुभव हो, जिसमें मुश्किलात के समय सबसे आगे खड़े होने का साहस हो, जो कठिन परिस्थियों में भी त्वरित निर्णय ले सके, जिसे संसदीय प्रक्रियाओं की गहरी जानकारी हो, जिसकी विलक्षण स्मृति और शालीन व्यक्तित्व हो। ये सारे गुण कलाम साहब और कुछ कमोबेश दादा में उपलब्ध हैं जो उन्हें समकालीन राजनीति में औरों से अलग करते हैं।

इतना तो निर्विवाद सत्य है कि प्रणब मुखर्जी की राजनीतिक और आर्थिक समझ पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।  क्लर्क से प्रोफेसर, पत्रकार, और फिर बांग्ला कांग्रेस से राजनीति की यात्रा शुरू करने वाले मुखर्जी इंदिरा गांधी की गैरमौजूदगी में भी कैबिनेट की बैठकों को बखूबी संभालते रहे थे।

हालांकि इंदिरा गांधी की मृत्यु के बाद कुछ कारणों से उन्होंने कांग्रेस पार्टी से खुद को अलग कर लिया था पर उनकी प्रतिभा, क्षमता और लियाकत के कारण पार्टी उन्हें ज्यादा दिन अपने से अलग ना रख सकी। इस वापसी के बाद तो उन्होंने तमाम महत्वपूर्ण मंत्रालयों की जिम्मेदारी सफलतापुर्वक संभाली। पिछले करीब आठ वर्षों से वह यूपीए सरकार के संकटमोचक की भूमिका बार-बार निभाते  रहे हैं।

अब देश को उनकी इस नई भूमिका में उनसे सार्थक दिशा-निर्देश की उम्मीद रहेगी।

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...