pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 6 मई 2012

आज के समय में किसी का बीमार पडना एक अपराध है।

कुछ वर्षों पहले बुजुर्गों से आशीर्वाद मिला करता था 'जुग-जुग (युग-युग)जीयो' यानि जीवेम शरद: शतम। उस समय स्वस्थ रहना एक आम बात थी, जो शुद्ध जल, वायु तथा अन्न का प्रदाय थी। हमारे पौराणिक नायक अपने उत्कर्ष के समय में 80-100 साल के होते थे ऐसा वर्णन मिलता है, तो उस समय औसत आयु 150-200 साल की होती होगी। जो आज सिमट कर औसतन 60-65 के आस-पास आ गयी है। वह भी दवा-दारू के भरोसे।

उम्र का सीधा संबंध तन से है और तन को स्वस्थ रखने के लिए शुद्ध आहार की अति आवश्यकता होती है। पर आज जैसा हाल और माहौल है उसमें तो शुद्धता का अर्थ ही बदल गया है। कहावत है कि "जैसा अन्न वैसा मन" पर इसमें आज संशोधन की जरूरत आन पडी है, जिससे अब यह "जैसा अन्न वैसा तन" हो जानी चाहिए। ऐसा दिख भी तो रहा है। आज शायद ही कोई ऐसा घर हो जहां आए दिन कोई मिलावटी खाद्य पदार्थ से अस्वस्थता महसूस ना करता हो। विडंबना तो यह है कि हमारे देश में मिलावटी भोज्य पदार्थ खा कर बीमार हुए इंसान को दवा भी नकली मिलती है, जो करेले की बेल को नीम के पेड पर चढा दोहरी मार दिलवाती है। इस जघन्य अपराध का खात्मा होना तो दूर पहुंच वालों की मिली-भगत से दिन प्रति दिन बढोत्तरी होती ही दिखती है। इसी कारण आम इंसान की बात ही क्या, साधू-संत और नियम-बद्ध जीवन यापन करने वाले स्त्री-पुरुष भी रोगों की चपेट से खुद को नहीं बचा पाते।

आदमी तंदरुस्त रहता है तो स्वयं की देख-रेख में हर पैथी, हर नुस्खा या सुझाव उसे स्वस्थ रहने में सहायक होते हैं। पर इतने बडे शरीर रुपी यंत्र का एक अदना सा पुर्जा भी बेकाबू हो जाए तो फिर उसके तन और धन का भगवान ही मालिक होता है। क्योंकि आज के समय में किसी का बीमार पडना एक अपराध के ताई हो गया है। बीमारी के दौरान दवा-दारू का अतिरिक्त बोझ संभालना अब सब के वश की बात नहीं रह गयी है। सरकारी अस्पतालों की हालत तो जग जाहिर है, जहां अच्छा-भला आदमी बीमार सा लगने लगता है तो दूसरी ओर निजी क्लिनिकों में बीमारी का कम जेब का सफाया ज्यादा होने लगा है। चार-पांच दिन की दवाएं ही आधे महीने के राशन का बजट बिगाड कर रख देती हैं।

इसी सब को ध्यान में रखते हुए अब एहतियात बरतना जरूरी हो गया है कि हम अपनी दिनचर्या और खान-पान का पूरा ख्याल रखें जिससे बीमार पडने के अपराध से बचे रहें।

आगे प्रभू राक्खा।

बुधवार, 25 अप्रैल 2012

कलकत्ते की शान, हावडा पुल



कलकत्ता  के स्मारकों की अंतिम किस्त  - 
आज जब कहीं ना कहीं कुछ साल पुराने पुलों के टूटने, नवनिर्मित या बनने के दौरान ही गिर जाने वाले पुलों की खबर आती है तो इस पुल को इस उम्र में भी सीना ताने, अथक मेहनत करते देख इसके बनाने वालों के प्रति आदर से सर झुक जाता है।

हावडा पुल। वर्षों-वर्ष इस अनूठे अजूबे के ऊपर से दिन में दो बार गुजरना होता रहा। कभी बस से, कभी ट्राम से     और कभी-कभी पैदल भी, पर कभी इसको ध्यान से नहीं देखा था। अलबत्ता नवागंतुकों को हावडा स्टेशन से निकलते ही पूरा सर उठा कर इसे देखना ध्यान में जरूर आ जाता था। पर अब दूर रह कर इसकी अहमियत समझ में आती है।  

कस्बे हावडा की खुशकिस्मति थी कि दुनिया के व्यस्ततम कैंटीलीवर पुलों में से एक यह पुल यहां बना जिससे वह भी संसार भर में मशहूर हो गया, नहीं तो दुनिया के विशाल और व्यस्ततम रेल स्टेशनों में से एक होते हुए भी शायद उसका इतना नाम नहीं होता।  

हुगली नदी के दोनों किनारों पर पसरा, हावडा और कलकत्ते को जोडता, बाहर से आने वालों के लिए प्रवेश-द्वार सरीखा, विश्व का अनोखा कैंटिलीवर पुल, कब कलकत्ते की एक पहचान बन गया पता ही नहीं चला। यह सिर्फ एक पुल ही नहीं कलकत्ते की जीवन रेखा है। रोज हजारों-हज़ार लोग कलकत्ते के आस-पास के इलाकों से काम करने, अपनी रोजी-रोटी कमाने और शहर की जरूरतों को पूरा करने के लिए इस पर से गुजरते हैं। देश के कोने-कोने के विभिन्न स्थानों से लोग हावडा स्टेशन पर उतर शहर जाने से पहले इसी के दर्शन करते हैं। 

इसके पहले इस जगह पर एक पुराना पुल हुआ करता था, पर नदी में रोज दो बार तेज ज्वार-भाटे के कारण खतरे की आशंका  सदा बनी रहती थी। इसीलिए तत्कालीन सरकार ने एक मजबूत और ऊंचा पुल बनवाने का निर्णय लिया। जिसके फलस्वरूप 1939 में बनना शुरु हो कर 1943 में इस नये पुल का स्वरूप सामने आया। 

करीब सात सालों में पूरे हुए इस 8 लेन के 705 मीटर लम्बे और 71 फुट चौडे पुल के दोनों तरफ 15-15 फुट के दो पैदल पथ पद-यात्रियों के लिए बने हुए हैं। इस पूरी बनावट का भार इसके दोनों सिरों पर 90 मीटर ऊंचे दो विशाल जल-रोधक स्तभों ने उठा रखा है। उनके अलावा बीच में कोई सहारा या खंभा नहीं है। इसे बनाने में करीब 26500 टन लोहे की खपत हुई थी। एक आश्चर्यजनक तथ्य यह भी है कि इसमें कहीं भी "नट-बोल्ट" का इस्तेमाल नहीं किया गया है। सारी की सारी जुडाई "रिवेट" के द्वारा हुई है। उस जमाने में इसके बनने में 2,5000000 रुपये का खर्च आया था। आज तो इतने पैसे पर बिचौलिए भी नहीं मानते।  

आज इसके ऊपर से करीब 60 से 70 हजार विभिन्न तरह की गाडियां और अनगिनत लोग आवाजाही करते हैं। आजादी के बाद इसका नाम "रविंद्र सेतु" कर दिया गया है। पर ज्यादातर लोग अभी भी इसे "हावडा ब्रिज" के नाम से ही जानते हैं। इसकी खूबसूरती को निहारना हो तो नदी में नौका में या स्टीमर में बैठ इसके बीचो-बीच जा कर देखें, एक अद्भुत नजारा पेश आएगा। तभी समझ भी आएगा कि क्यों इसका अनगिनत, विभिन्न भाषाओं की फिल्मों में फिल्माकन किया गया है। 

आज जब कहीं ना कहीं कुछ साल पुराने पुलों के टूटने, नवनिर्मित या बनने के दौरान ही गिर जाने वाले पुलों की खबर आती है तो इस पुल को इस उम्र में भी सीना ताने, अथक मेहनत करते देख इसके बनाने वालों के प्रति आदर से सर झुक जाता है।


# सारे  आंकड़े  और चित्र अंतरजाल से साभार

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

कोलकाता की शहीद मीनार

कलकत्ता/कोलकाता से संबंधित चौरंगी, विक्टोरिया मेमोरियल के बाद यह तीसरी किस्त है.  शहीद मीनार भी कोलकाता में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है तथा अच्छे-बुरे समय की गवाह रही है.  
  
कलकत्ता/कोलकाता की पहचान बताने वाले स्मारकों में एक मीनार भी शामिल है। जो कोलकता के दिल चौरंगी के पास स्थित है। यह भी दिल्ली की कुतुब मीनार की तर्ज पर जंग में फतह की निशानी के तौर पर बनाई गयी थी। सन 1848 में सर डेविड आक्टरलोनी ने नेपाल की लडाई में अपनी विजय को यादगार बनाने के लिए इसे बनवाया था। इसी लिए पहले इसे "आक्टरलोनी मौन्यमंट" के नाम से जाना जाता  था। पर सन 1969 से इसे एक नया नाम दे दिया गया, "शहीद मीनार"। जो देश की आजादी के लिए शहीद हुए देशभक्तों की याद में रखा गया था। 

आजकल यहां, दिल्ली के 'जंतर-मंतर' की तरह, विभिन्न दलों के जुलुसों की शुरुआत, ऐतिहासिक समारोहों का आयोजन या दलों द्वारा विरोध प्रदर्शन के लिए बैठकें आयोजित की जाती हैं। यहां हुई ऐसी सबसे पहली बैठक का ब्योरा 1931 का मिलता है, जब कवि-गुरु रविंद्रनाथ टैगोर ने एक दिक्षांत समारोह का सभापतित्व करते हुए अंग्रेज सरकार के कार्यों के प्रति विरोध प्रगट किया था।               
     
इस मीनार की ऊंचाई 158 फिट है तथा ऊपर की तरफ दो छज्जे, खडे होने के लिए बने हुए हैं। ऊपर जाने के लिए मीनार की गोलाई के साथ-साथ अंदर की ओर सीढियां बनी हुई हैं जिनकी संख्या 223 है। मीनार के ऊपर से शहर की खूबसूरती को बखूबी निहारा जा सकता है। पर कुछ वर्षों पहले कुछ दुखद हादसों के कारण इस पर निर्बाध चढना बंद करवा दिया गया है। अब इस पर चढने के लिए कोलकाता पुलिस से इजाजत लेनी पडती है।

गुरुवार, 19 अप्रैल 2012

तीन टन की मूर्ति, जो हवा के झोंके से घूमती है


इस  इमारत की  सबसे   अनोखी,   आश्चर्यजनक,   अनूठी  तथा   हैरतंगेज वस्तु है,  मेमोरियल  के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति, जिसके एक हाथ में बिगुल है।  काले  कांसे से  बनी   इस मूर्ति  का वजन तीन टन है। इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की  गति से  हवा के  चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। इंजीनियरिंग का यह बेजोड़ और अनूठा कमाल है

विक्टोरिया मेमोरियल, कोलकाता की शान और पहचान। जिसे अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्ञी रानी विक्टोरिया और अंग्रेजों के स्वर्णिम शासन काल की याद में उस समय की भारत की राजधानी में इस भव्य इमारत को बनवाया था। उनकी इच्छा थी कि यह इमारत आगरे के ताजमहल से भी ज्यादा भव्य हो। संसार के कुशलतम शिल्पी विलियम एमर्सम के अथक प्रयास और देश के सबसे उत्तम मकराना के संगमरमर से सजने के बावजूद, अपने आप में शिल्प और कला का यह नायाब नमूना ताज की बराबरी तो नहीं कर पाया पर संसार की सुंदरतम इमारतों में अपने आप को शुमार जरूर करवा लिया। इसके अंदर एक छोटा सा पर बहुत खूबसूरत सलीके से सजाया गया म्यूजियम भी है जहां विक्टोरिया युग के आयुध, पेंटिंग, मुर्तियां, सिक्के, डाक-टिकट, कपडे, कलाकृतियां आदि बडे आकर्षक तरीके से लोगों के ज्ञानार्जन के लिए रखे गये हैं।       

ऐसा हो ही नहीं सकता कि कोलकाता आने वाला कोई भी पर्यटक इस 338x228 और 184 फिट की कलाकृति को देखे बिना वापस चला जाए। बाहर से आने वालों को छोडिए बंगवासी यहां के रहवासी भी यहां बार-बार आने का मोह छोड नहीं पाते हैं। 

पर इस इमारत की सबसे अनोखी, आश्चर्यजनक, अनूठी तथा हैरतंगेज वस्तु है, मेमोरियल के सिरे पर स्थापित एक परी की मूर्ति जिसके एक हाथ में बिगुल है। इसे "एंजल आफ़ विक्टरी" के नाम से जाना जाता है। काले कांसे से बनी 16 फिट की इस मूर्ति का वजन तीन टन है। 23 बाल-बेयरिंगों की सहायता से इसे ऐसे स्थापित किया गया है कि 15 की.मी. की गति से हवा के चलते ही यह उसकी दिशा में घूम जाती है। यानि यह हवा की दिशा बतलाने वाला यंत्र यानि  "Weather-Cock"  है। इतने ज्यादा वजन के बावजूद हवा के झोंके से घूम जाने वाला इंजिनियरिंग का कमाल। जो पूरे ३६० डिग्री तक घूमने की क्षमता रखता है.   

1921 में बनाया गया यह अजूबा वर्षों-वर्ष बिना किसी खराबी के अपनी कसौटी पर खरा उतरता रहा। पहली बार 1985 में इसके घूमने में रुकावट आयी थी, वह भी इमारत का रख-रखाव करते हुए धूल-मिट्टी के कारण इसके बेयरिंग के जाम होने से। उसे तुरंत ठीक भी कर लिया गया था। पर 1999 में आकाशीय बिजली के गिरने से इसका घूमना बिल्कुल बंद हो गया था। पर 6 सालों की अथक मेहनत से इसे फिर अपनी पूर्वावस्था में लाने में कामयाबी हासिल कर ली गयी।  पूरा काम बहुत जोखिम भरा था जरा सी चूक इस ऐतिहासिक  इमारत को मंहगी पड सकती थी। इसी लिए बहुत सावधानी पूर्वक हर कदम को फूंक-फूंक कर रखते हुए सारे काम को अंजाम दिया गया था। 

बंगवासी बेहद संवेदनशील होते हैं। मूर्ति  भले ही अंग्रेजों की देन हो पर उससे सारे बंगाल के रहवासियों को हार्दिक लगाव था तभी तो उसके खराब होने पर पूरे बंगाल में जैसे शोक की लहर दौड गयी थी। पर उसका ठीक होना भी किसी उत्सव से कम नहीं रहा।




सोमवार, 16 अप्रैल 2012

कभी न कभी आप के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा :-D


बहुतेरी बार कुछ ऐसा घटता है जो कभी-कभी सोच में डाल देता है, कुछ सोचने-समझने लायक ना होने पर भी दिमाग में कुछ सवाल पैदा कर देता है, क्यूं एक-दो बार नहीं, ऐसा कई-कई   बार होता है। आपने भी जरूर यह "महसूसा" होगा कि बाथ-रूम में जाने पर ही द्वार-घंटी बजती है,  या फिर :-  

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने के
   पहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती है
   वही जल्दी बढ़ने लगती है।

क्यों -----हुआ  है क्या  :-D

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

कब तक हम बाबाओं की जमात में वृद्धि करवाते रहेंगे?



जब पढे-लिखे लोग ही ऐसे बाबाओं के मकडजाल में उलझ जाते हैं तो सोचिए निरक्षर, अनपढ सीधे-सरल लोगों पर इनकी धार्मिक अफीम का कितना और कैसा घातक असर होता होगा।  पर साथ ही साथ यह भी सच है कि जब तक हम किसी चमत्कार के तहत अपने भविष्य को सवारने, खुशहाल होने के सपने देखते रहेंगे तब तक ऐसे बाबाओं की जमात मे वृद्धि होती रहेगी। 

हमारे पवित्र ग्रन्थ गीता में खुद भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ज्ञान देते हुए कहा था कि "कर्म किए जा, फल की इच्छा मत कर"। यानि हम यथाशक्ति अपनी सामर्थानुसार कर्म करें, बाकी उसके अच्छे या बुरे परिमाण की चिंता प्रभू पर छोड दें। 

किसके जीवन में सुख-दुःख नहीं आते।  यह तो जीवन चक्र है। स्थाई कुछ भी नहीं है। पर सुख में हम सारी बातें तिरोहित कर जश्न मनाने में जुटे रहते हैं और विपरीत परिस्थितियों में दुख से जल्द से जल्द छुटकारा पाने के लिए इसका-उसका दरवाजा खटखटाने लगते हैं। भूल जाते हैं कि जिसने कष्ट दिया है वही दूर करेगा, छोड देते हैं अपनी आस्था को पीछे, डगमगा जाने देते हैं अपने विश्वास को उस सर्वोच्च सत्ता के प्रति और बन जाते हैं ठगों के हाथ की कठपुतली। 

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दुःख हमारे जीवन में आते हैं तो क्या इन तथाकथित बाबाओं को इनसे मुक्ति मिल पाती होगी? कदापि नहीं। ये भी हमारी तरह पांच तत्वों के जीव हैं, इन्हें भी आदि-व्याधी सताती है। इन्हें भी देह धारण करने का दंड भोगना पडता है। ऐसा शायद ही कोई संत-महात्मा-बाबा या चमत्कारी पुरुष हुआ होगा जिसने अपने जीवन में रोग या हारी-बिमारी का सामना ना किया हो, जिसके जीवन में कभी विपरीत परिस्थितियां ना आईं हों, जिसने कभी कोई कष्ट ना भुगता हो।  किन्तु ये आजकल के मजमेबाज येन-केन-प्रकारेण अपने चारों ओर ऐसा आभा-मंडल रच लेते हैं जिससे आम इंसान की आंखें चौंधिया कर सच देखना बंद कर देती हैं और हम एक अलौकिक पद प्रदान कर इन्हें पूजकर भगवान का दर्ज़ा दे देते हैं। बिना यह सोचे-समझे कि एक आम मनुष्य भगवान कभी नहीं बन सकता है। इन तथाकथित बाबाओं को लेकर पूर्व के अनुभव तो यही कहते हैं कि हमारी अंध श्रद्धा का फायदा उठाकर इनका कद इतना बड़ा हो जाता है जिसकी आड़ में ये गलत काम करने से भी गुरेज नहीं करते। तब शासन से लेकर प्रशासन तक इनके समक्ष निरीह नज़र आता है। 

जब पढे-लिखे लोग ही ऐसे बाबाओं के मकडजाल में उलझ जाते हैं तो सोचिए निरक्षर, अनपढ सीधे-सरल लोगों पर इनकी धार्मिक अफीम का कितना और कैसा घातक असर होता होगा।  पता नहीं देश की जनता कब समझ पाएगी भगवान और आदमी का फर्क, कब समझेगी कि बाबाओं से उसका भला नहीं होने वाला नहीं है? पर साथ ही साथ यह भी सच है कि जब तक हम किसी चमत्कार के तहत अपने भविष्य को सवारने, खुशहाल होने के सपने देखते रहेंगे तब तक ऐसे बाबाओं की जमात मे वृद्धि होती रहेगी। 

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

चाह होनी चाहिए राह तो खुद-बखुद सामने आ जाती है

बहुत पहले सुना था कि जी. टी. रोड पर पंजाब के ढाबों में भीड़ अधिक होने और ग्राहकों के पास समय कम होने की वजह से लस्सी या शेक जैसे पेय पदार्थों को "वाशिंग मशीन" में बनाया जाने लगा था. एक साथ ढेर सारा पेय पदार्थ और समय भी कम. अब यह जिसके दिमाग की भी उपज हो उसकी बुद्धि की बलिहारी. 
पर इस चित्र को देख क्या ऐसा  लगता है कि किसी आविष्कार के लिए बड़ी-बड़ी डिग्रियों की आवश्यकता जरूरी है, नहीं न :-) 
  
 तो दाद दीजिए अपने इस  देसी वैज्ञानिक को. जिसने सिद्ध कर दिया है कि चाह होनी चाहिए, राह अपने आप सूझ जाएगी.  

विशिष्ट पोस्ट

गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...