pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 12 अप्रैल 2012

भाव संप्रेषित करने की क्षमता हर प्राणी में होती है।


यदि ध्यान से पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों के कार्य-कलाप को देखा जाए तो बहुत सारे आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। यदि इनकी आवाजों पर ध्यान दिया जाए तो साफ पता चलता है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न ध्वनियों द्वारा ये आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं। खासकर प्रजनन के समय नर अपनी ओर से तरह-तरह की ध्वनी उत्पन्न कर मादा को पास बुलाने और रिझाने का प्रयास करता है।

संसार मं इंसान को तरह-तरह की भाषाएं, बोलियां और ध्वनियां उत्पन्न करने की क्षमता प्राप्त है। पर इसका यह मतलब नहीं है कि दुनिया के और जीव आपस में अपने भावों का संप्रेषण करने में असमर्थ हैं। पर उनके इस काम के होने नहीं होने का हमें पता ही नहीं चल पाता।  मनुष्य को छोड कर शेष जीव-जंतु भी विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रकार की ध्वनियां उत्पन्न कर अलग-अलग समय में अलग-अलग भाव संप्रेषित करने की क्षमता रखते हैं।  

यदि ध्यान से पशु-पक्षियों, कीट-पतंगों के कार्य-कलाप को देखा जाए तो बहुत सारे आश्चर्यजनक तथ्य सामने आते हैं। यदि इनकी आवाजों पर ध्यान दिया जाए तो साफ पता चलता है कि विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न ध्वनियों द्वारा ये आपस में संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं। खासकर प्रजनन के समय नर अपनी ओर से तरह-तरह की ध्वनी उत्पन्न कर मादा को पास बुलाने और रिझाने का प्रयास करता है। 

कहते हैं कि मोर बादलों को देख अपने पंख फैलाता है पर वहीं वह अपने पंख फैला और नृत्य कर मोरनी को आकर्षित भी करता है। वैसे ही मेढक जो जाडे भर सुप्तावस्था में मिट्टी के नीचे खुद को  दबा रख कर अपने शरीर के तापमान को बनाए रख पडा रहता है वह वर्षा ऋतु के आते ही अपनी टर्राहट से अपनी मादा को संदेश भेजना शुरु कर देता है। मेढक की विभिन्न प्रजातियों में यह ध्वनी अलग-अलग होती है। हमें भले ही यह टर्राहट कर्ण-कटु लगे पर इसे ही सुन कर अंडे देने की स्थति में मादा मेढक अनायास ही नर मेढक की ओर आकर्षित हो जाती है। ज्यादा दूर नहीं अपने घरेलू कुत्ते के व्यवहार पर ही नज़र डालें तो पाएंगे कि सिर्फ भौंकने के लिए बदनाम यह प्राणी भूख लगने, प्यार पाने, प्रेम प्रदर्शन या दुखी होने पर तरह-तरह की ध्वनियां उत्पन्न करता है। यही हाल दूसरे पालतू जानवरों जैसे गाय, बकरी या बिल्ली का भी है। घरों में आने या पाए जाने वाले पक्षियों यथा तोता, कबूतर , गौरैया या कोव्वे के क्रिया-कलाप को ध्यान से देखें तो इनके अलग-अलग भावों में अलग-अलग तरह की आवाजें सुनने को मिलेंगी। पानी के जीवों में छोटी-बडी मछलियों, सील, व्हेल, शार्क या फिर डाल्फिन द्वारा उत्पन्न ध्वनियों या उनके आपस में अपने भावों को पहुंचाने के तरीकों की बात करें तो पन्ने भर जाएंगे। और तो और मच्छर जैसा क्षुद्र कीट भी अपने पंख की फडफडाहट से ध्वनी उत्पन्न कर अपनी बात को अपने साथी तक पहुंचाने की क्षमता रखता है। और यह बहुत ही आश्चर्य की बात है कि हजारों तरह की ध्वनियों के बीच भी मादा मच्छर द्वारा भेजे गये संदेश को नर बखूबी ग्रहण कर उसके पास पहुंच जाता है। टीड्डे और झिंगुर जैसे कीडे भी जबान ना होने पर भी अपने पंखों को अपने पैरों से रगड कर विभिन्न तरह की ध्वनियां उत्पन्न कर अपनी मादा तक अपना संदेश पहुंचा देते हैं। इनके द्वारा उत्पन् ध्वनियां बडी विचित्र होती हैं। हमारे कान सहसा यह अंदाज नहीं लगा पाते कि किस कोने में बैठा टिड्डा अपनी मादा को संदेश भेज रहा है। पता तो हम बहुत कुछ नहीं लगा पाए हैं, पर संसार भर के वैज्ञानिक ध्वनी संप्रेषण के नये-नये पहलुओं को खोजने में लगे हुए हैं इसी उम्मीद से कि भविष्य में इन तथाकथित मूक प्राणियों की 'बात' समझ पाएंगे। 

तो यदि कभी भी किसी पशु या पक्षी की आवाज सुनें तो गौर जरूर करें कि किस तरह की परिस्थिति में वह कैसी आवाज कर रहा है। कुछ ही समय में आप फर्क जरूर महसूस करने लग जाएंगे।

सोमवार, 9 अप्रैल 2012

परिवर्तन की आहट !!!

कहते हैं आग के बिना धुंआं नहीं होता। तो इन दिनों जैसी-जैसी खबरें आ रही हैं वह मात्र संयोग तो नहीं ही हो सकता। सेना प्रमुख का बयान, फौज का दिल्ली की तरफ कूच, सेना में असले की कमी। यह सब ऐसे ही सामने आ गया हो, गले से नहीं उतरता। भले ही इन सब का खंडन होता रहा हो।

देश की जनता का एक बहुत बडा प्रतिशत सत्तारूढ नेताओं से असंतुष्ट है।  सब मानते हैं कि केन्द्र, जहां अधिकांश जन-सेवकों के दामन काले कारनामों से सने हैं, से निजात मिलनी चाहिए। पर विकल्प किसी को नहीं सूझ रहा है। वैसे सत्ता हस्तगत करने के लिए जिनकी जीभें लपलपा रही हैं उनकी असलियत भी जनता जानती है। मीडिया और संचार माध्यमों की बदौलत आज अंतिम सिरे पर खडा इंसान भी कुछ-कुछ जागरुक हो गया है। वह भी जान गया है कि अब वैसे नेता नहीं रहे जिनके लिए देश सर्वोपरी हुआ करता था। आज तो सब कुछ ‘निज व निज परिवार हिताय’ हो गया है। अब तो तथाकथित क्षेत्रीय नेता भी यह कहने का दुस्साहस करने लग गये हैं कि देश के पहले उनकी पार्टी है, पार्टी यानि वे खुद। आम इंसान की किसी को भी फिक्र नहीं है अब सरकार द्वारा हर फैसला खुद को या बडे घरानों या बडी कंपनियों के हित को मद्दे नज़र रख कर किया जाता है। करोंडों-अरबों डकारने वाले खुले सांड की तरह घूम रहे हैं क्योंकि कमजोर नेतृत्व की हिम्मत नहीं है उन पर नकेल कसने की और उस नुक्सान की भरपाई का खामियाजा देश के मध्यम वर्ग को चुकाना पडता है।

चारों तरफ फैले इस असंतोष को सभी बखूबी महसूस कर रहे है। आजादी के बाद के कुछ साल छोड दें तो भी दबी जुबान से तीस पैंतीस सालों में सैन्य शासन की बात उठ चुकी है। जिसे बडी चतुराई से दबा दिया जाता रहा है। बहुत संभव है कि देशवासियों के आक्रोश और नेतृत्व की अक्षमता को देखते हुए देश का एक धडा इस बात का आकलन कर भविष्य की संभावना को टटोल रहा हो। वैसे भी आज सेनाध्यक्ष से लेकर आम आदमी भी जानता है कि कहीं भी कुछ भी कह देना पत्थरकी लकीर नहीं हो जाता। बहुसंख्यक यदि पक्ष में हों तो ठीक नहीं तो दूसरे दिन अपनी ही बात का खंडन करना आम बात हो गयी है। वैसे भी किसी की कही बात को आधे लोग तो पढते-सुनते नहीं, जो सुनते हैं उनमें से आधे गौर नहीं करते, बचे हुए आधों को ऐसी बातों पर विश्वास नहीं होता। फिर दूसरे-तीसरे दिन खंडन आ जाता है और हल्के-फुल्के अंदाज में बात आई-गयी हो जाती है। 

गुरुवार, 5 अप्रैल 2012

सीख ऐसी भी तो हो सकती थी।


पुरानी कहानी है कि एक गुरु अपने शिष्यों को लेकर एक जंगल से कहीं जा रहे थे। एक दिन पहले ही भयानक तूफान वहां से तबाही मचाते हुए गुजरा था। जिसके फलस्वरूप बडे-बडे पेड धराशाई हो गये थे पर लता, गुल्म, ऊंची घास, खर-पतवार वैसे के वैसे अपने स्थान पर झूम रहे थे। गुरु ने इन सब की ओर इंगित कर अपने शिष्यों से कहा कि देखो जो गरूर में अकडा रहा उसका नाश हो गया और जो परिस्थिति के अनुसार अपने को ढाल गये वे जीवित बच गये। तुम भी इनसे सीख ले अपने को ऐसा ही बना डालो।

सोचता हूं कि गुरु यह भी तो कह सकते थे कि इन रीढ विहीन, मतलब परस्त, अन्याय का सामना ना कर सकने वाले खर-पतवार की बजाए इन  पेडों से सीख लो कि भले ही हमारा नामोनिशान मिट जाए हम कभी भी  आतंक, अत्याचार, अन्याय या आक्रमणकारी के आगे सर नहीं झुकाएंगे।

सोमवार, 2 अप्रैल 2012

बंगाल का दिल कलकत्ता और कलकत्ते का दिल धर्मतल्ला यानि चौरंगी यानि एसप्लेनेड


तब कलकत्ता, कलकत्ता ही हुआ करता था. कोलकाता नहीं.  



बंगाल का दिल कलकत्ता और कलकत्ते का दिल धर्मतल्ला यानि चौरंगी यानि एसप्लेनेड। धर्मतल्ला नाम कुछ अजीब सा है खासकर इस बात को मद्देनज़र रखते हुए कि दिल्ली से पहले अंग्रेजों ने कलकत्ता को ही देश की राजधानी बनाया था। खैर बात तब की है जब अभी कलकत्ते में मेट्रो रेल चलने की बात अभी बात ही थी। तब यह इलाका बहुत सुंदर हुआ करता था। हालांकी बंगाल हरियाली से भरपूर है पर शहर कलकत्ता इससे महफूज ही है। जो थोडी-बहुत हरियाली इस शहर के पास थी वह सिर्फ धर्मतल्ला के इलाके के पास से "विक्टोरिया मेमोरियल" तक सीमित थी। वह भी पेड-पौधों के रूप में ज्यादा ना हो कर मैदान के रूप में उपलब्ध थी। वहीं दसियों फुटबाल के क्लब थे। जिनकी जरुरतों के कारण मैदानी हरियाली बची हुई थी। शहर के सघन इलाकों में रहने वाले लोग रविवार और छुट्टी के दिनों ताजी हवा के लिए इधर का रुख जरूर करते थे। रविवार के दिन तो मेला लगा रहता था हर जगह। इस जगह थोडी-थोडी दूर पर करीब 14-15 सिनेमा घर थे, मजाल है कि किसी में भी किसी भी तरह की फिल्म की किसी भी क्लास की टिकट मिल जाए। खूब ब्लैक हुआ करती थी टिकटें। नयी और अच्छी फिल्म की 8-10 रुपये की टिकट 100 रुपये में भी मुश्किल से मिलती थी। इधर से निराश लोग मैदान का रुख कर लिया करते थे। जहां तरह-तरह के जायकों वाली चाट-पकौडी, कचौडी, पुचके और झाल-मुडी वाले जीभ के जरिए लोगों को तरो-ताज़ा बना देते थे। या फिर ऐसे ही मेट्रो सिनेमा से लेकर ग्रैंड होटल के नीचे से होते हुए लोग पार्क स्ट्रीट के मंहगे इलाके तक पहुंच जाते थे "विंडो शापिंग" करते हुए।     

कलकत्ता को महलों का शहर कहा जाता है। ज्यादातर अट्टालिकाएं इसी इलाके में हैं, जो वास्तु और शिल्प का बेजोड नमूना हैं। धर्मतल्ला के 8-10 की.मी. के दायरे मे अंग्रेजी कलाकारी का बेहतरीन कार्य दिखाई पडता है। चाहे वह ताजमहल की तर्ज पर बना विक्टोरिया मेमोरियल हो, चाहे देश के सुंदरतम भवनों में से एक गवर्नर हाउस हो, या फिर फोर्ट विलियम, एक ऐसा किला जो जमीन की सतह से नीचे बनाया गया है, दूर से पता ही नहीं चलता कि वहां कुछ है भी कि नहीं। इनके अलावा ग्रैंड होटल की विशाल इमारत, राइटर्स बिल्डिंग, विक्टोरिया हाउस, अजायब घर, मुख्य पोस्ट आफिस का भव्य भवन, मेट्रोपोलेटिन बिल्डिंग, सेना का मुख्यालय, शहीद मिनार, मेट्रो सिनेमा, टीपू की मस्जिद, स्टेटस मैन का भवन या फिर देश का पहला प्लैनेटेरियम जो बिडलाजी की सौगात है इस शहर को, क्या-क्या गिनाया जाए। 
   
आदमी घूमता-घूमता थक जाए तो पास ही बहती गंगा के किनारे बना बाबूघाट जैसे बाहें पसारे लोगों की थकान मिटाने को आतुर हुआ करता था। शाम ढले किताबों के शौकीनों के लिए हर तरह की किताबों का एक विशाल "जखीरा" पसरा रहता था मेट्रो सिनेमा और शहीद मिनार के बीचो-बीच।      

पर अब सब कुछ बदल सा गया है, ना वह शांति है ना पहले जैसा सकून नाही फुरसत का वैसा माहौल। पैदल पथों पर फेरी वालों ने अतिक्रमण कर चलना दूभर कर दिया है। मेट्रो के बनने से अब वह खुलापन भी दिखाई नहीं देता। शाम ढलते-धलते असामाजिक तत्वों के डर से लोगों ने मैदान की तरफ हवाखोरी के लिए जाना बंद सा कर दिया है। चारों ओर अफरा-तफरी और भागम-भाग ही दिखाई पडती है। कभी जाओ तो हूक सी उठती है दिल में, बरबस याद आ जाता है वह गुजरा जमाना।

शनिवार, 31 मार्च 2012

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमि की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है।


हे श्री राम,
प्रणाम।
फिर तुम्हारा जन्म दिवस आया है। चारों ओर उल्लास छाया हुआ है। भक्तिमय वातावरण है। पूजा अर्चना जोरों पर है। पर यह सब भी आज के भौतिक युग की बाजारू संस्कृति का ही एक अंग है। एक बहुत छोटा सा प्रतिशत ही होगा जो सच्चे मन से तुम्हें याद कर रहा होगा। आधे से ज्यादा लोग तो सिर्फ तुम्हारे नाम से मिलने वाले आज के अवकाश से खुश हैं। कुछ लोगों की दुकानदारी है और कुछ लोगों की तुम्हारे नाम की आड़ में अपनी रोटी सेकने का बहाना।
तुम्हारे जन्म दिवस का तो सब को याद है, पर तुम्हारे आदर्शों, तुम्हारी मर्यादा, तुम्हारे चरित्र, तुम्हारी बातों का इस देश से तिरोधान होता जा रहा है।

तुमने माँ-बाप की आज्ञा शिरोधार्य की, आज के माँ-बाप ड़रे रहते हैं कि ऐसा कुछ ना हो जाए जिससे उनके कुलदीपक को कुछ नागवार गुजरे। आज माँ-बाप की बात मानना तो दूर उनकी बात सुननी भी बच्चे गवारा नहीं करते। तुमने नारी का सम्मान करने की बात कही तो आज यहां हालात ऐसे हैं कि जन्म से पहले ही कन्या को परलोकगमन की राह दिखा दी जाती है। नारी उद्धार के पीछे अपना उद्धार करने पर कटिबद्ध हैं आज के समाज के कर्णधार। तुमने भाईयों के लिए सर्वत्याग किया आज अपने लिए लोग भाईयों को त्यागने में नहीं हिचकते। तुमने अपनी शरण में आनेवाले का सदा साथ दिया चाहे उसके लिए कोई भी कीमत चुकानी पड़ी हो पर आज मुसीबत में पड़े लोगों से भी कीमत वसूली जाती है। तुमने दीन-हीन-दुखियारे-पिछड़ों को सदा गले लगाया, उन्हें सम्मान का हकदार बनाया। आज ऐसे ही लोगों के कंधों का सहारा लेकर मतलबपरस्त अपनी पीढीयों का भविष्य सवारने में लगे हैं। तुमने धन-दौलत-एश्वर्य को सदा हेय समझा आज यही प्रतिष्ठा का माध्यम हैं। तुम्हारे समय में तो एक ही रावण था जिसे मार कर तुमने इस धरा को भयमुक्त किया था। पर आज तो घट-घट में रावण विराजमान हैं जो अपनी अभेद्य लंकाओं में बैठे-बैठे जाने कितनी सीताओं को अपमानित, लांछित तथा प्रताड़ित करने के बावजूद समाज में प्रतिष्ठित एवं सम्मानित हैं। तुम्हारे समय में शिक्षा, आध्यात्म, मोक्ष आदि पाने का जरिया होता था ऋषि, मुनियों का सान्निध्य, जिसमें वे आदरणीय पुरुष अपना जीवन लगा देते थे, आज के बाबा अपने एश्वर्य, भोग, लिप्सा के लिए दूसरों का जीवन ले रहे हैं। तुमने तो अपने शत्रु की अच्छाईयों को अपनाने में भी कभी देर नहीं की आज ऐसा करने की कोई सोचता भी नहीं है उल्टा उसके लिए कोई भी बुराई अपनाने में लोग नहीं हिचकते। तुमने अपने धुर-विरोधियों को भी सम्मान दिया आज लोग अपने विरोधियों को मिटा देने में विश्वास करते हैं।

हे प्रभू आज हमें तुम्हारी ज्यादा जरूरत है। एक बार सिर्फ एक बार अपने सुंदर, सजीले, उतंग शिखरों वाले मंदिरों से बाहर आकर आप अपनी मातृभूमि की हालत देखो। तुम तो अंतर्यामी हो, दीनदयाल हो, सर्वशक्तिमान हो, तुम्हारे लिए तो कुछ भी अगम नहीं है।

एक बार सिर्फ एक बार फिर अवतार लो मेरे देवा !!!!!!

गुरुवार, 29 मार्च 2012

अंकल, कन्या खिलाओगे ?

नवरात्रों में,  खास कर अष्टमी के दिन, आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता है । सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती है। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते हैं। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी 

सुबह-सुबह दरवाजे की घंटी बजी। द्वार खोल कर देखा तो पांच से दस साल की चार-पांच बच्चियां लाल रंग के कपड़े पहने खड़ी थीं। छूटते ही उनमें सबसे बड़ी लड़की ने सपाट आवाज में सवाल दागा, 'अंकल, कन्या खिलाओगे'?
मुझे कुछ सूझा नहीं, अप्रत्याशित सा था यह सब। अष्टमी के दिन कन्या पूजन होता है। पर वह सब परिचित चेहरे होते हैं, और आज वैसे भी षष्ठी है। फिर सोचा शायद गृह मंत्रालय ने कोई अपना विधेयक पास कर दिया हो इसलिये इन्हें बुलाया हो। अंदर पूछा, तो पता चला कि ऐसी कोई बात नहीं है। 
मैं फिर कन्याओं की ओर मुखातिब हुआ और बोला, बेटा आज नहीं, हमारे यहां अष्टमी को पूजा की जाती है .
"अच्छा कितने बजे"? फिर सवाल उछला, जो सुनिश्चित भी कर लेना चाहता था, उस दिन के निमंत्रण को। 
मुझसे कुछ कहते नहीं बना, कह दिया, बाद में बताऐंगे।
तब तक बगल वाले घर की घंटी बज चुकी थी।

मैं सोच रहा था कि बड़े-बड़े व्यवसायिक घराने या नेता आदि ही नहीं आम जनता भी चतुर होने लग गयी है। सिर्फ दिमाग होना चाहिये। दुह लो, मौका देखते ही, जहां भी जरा सी गुंजाईश हो। बच ना पाए कोई।
जाहिर है कि ये छोटी-छोटी बच्चियां इतनी चतुर सुजान नहीं हो सकतीं। यह सारा खेल इनके माँ, बाप, परिजनों द्वारा रचा गया है। जोकि दिन भर टी.वी. पर जमाने भर के बच्चों को उल्टी-सीधी हरकतें करते और पैसा कमाते देख, हीन भावना से ग्रसित होते रहते हैं। अपने नौनिहालों को देख कुढते रहते हैं कि लोगों के कुत्ते-बिल्लियाँ भी छोटे पर्दे पर पहुँच कमाई करने लग गए हैं, दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी और हमारे बच्चे घर बैठे सिर्फ रोटियां तोड़े जा रहे हैं। 

फिर ऐसे ही किसी कुटिल दिमाग में इन दिनों  बच्चों को घर-घर जीमते देख यह योजना आयी होगी और उसने इसका कापी-राइट कोई और करवाए, इसके पहले ही, दिन देखा ना कुछ और बच्चियों को नहलाया, धुलाया, साफ सुथरे कपड़े पहनवाए, एक वाक्य रटवाया, "अंकल/आंटी, कन्या खिलवाओगे? और इसे अमल में ला दिया।

ऐसे लोगों को पता है कि इन दिनों लोगों की धार्मिक भावनाएं अपने चरम पर होती हैं। फिर बच्ची स्वरुपा देवी को अपने दरवाजे पर देख भला  कौन मना करेगा। सब ठीक रहा तो सप्तमी, अष्टमी और नवमीं तीन दिनों तक बच्चों और हो सकता है कि पूरे घर के खाने का इंतजाम हो जाए। ऊपर से बर्तन, कपड़ा और नगदी अलग से। वैसे भी इन तीन दिनों तक आस्तिक गृहणियां चिंतित रहती हैं, कन्याओं की आपूर्ती को लेकर। जरा सी देर हुई या अघाई कन्या ने खाने से इंकार किया और हो गया अपशकुन। इसलिए होड़ रहती है पहले अपने घर कन्या बुलाने की। 

नवरात्रों में,  खास कर अष्टमी के दिन, आस-पडोस की अभिन्न सहेलियों में भी अघोषित युद्ध छिड़ जाता है । सप्तमी की रात से ही कन्याओं की बुकिंग शुरु हो जाती है। फिर भी सबेरे-सबेरे हरकारे दौड़ना शुरु कर देते हैं। गृहणियां परेशान, हलुवा कडाही में लग रहा है पर चिंता इस बात की है कि "पन्नी" अभी तक आई क्यूं नहीं? "खुशी" सामने से आते-आते कहां गायब हो गयी  कोरम पूरा नहीं हो पा रहा है।

इधर काम पर जाने वाले हाथ में लोटा, जग लिए खड़े हैं कि देवियां आएं तो उनके चरण पखार कर काम पर जाएं। देर हो रही है, पर आफिस के बास से तो निपटा जा सकता है {वैसे आज के दिन तो वह भी लोटा लिए खड़ा होगा :)} घर के इस बास से कौन पंगा ले, वह भी तब जब बात धर्म की हो।

आज इन "चतुर-सुजान" लोगों ने कितना आसान कर दिया है  सब कुछ।  पूरे देश को राह दिखाई है, घर पहुंच सेवा प्रदान कर।

"जय माता दी"

बुधवार, 28 मार्च 2012

कुत्ता बच्चों को "ईडेन का सेव" खिलाने पर उतारू


बहुतेरी बार विदेशी "कुत्तों" ने हमारे देश पर हमले किए, हमें लूटा-खसोटा, हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारी धरोहरों को नष्ट करने की पुरजोर कोशिश की। वह तो कहते हैं ना कि दुश्मनों ने तो पूरा जोर लगाया एकाधिक बार सफल भी रहे पर कोई बात थी जो हस्ति नहीं मिटी हमारी। इतिहास से सभी वाकिफ हैं। पर उनकी कोशिशें शायद थमी नहीं हैं।

इधर फिर एक विदेशी कुत्ता अपने मालिकों के नापाक इरादों को पूरा करने में लगा हुआ है। यह वही 'वोडाफोन' का कुत्ता है जो पिछले सालों अपनी मासूमियत के कारण हम सब के दिलों का चहेता बन गया था। पर इस बार के विज्ञापनों पर ध्यान दें उसकी मासूमियत में एक षडयंत्र का आभास हो रहा है। लगता है वह बच्चों की कमसिन उम्र का भोलापन छीन लेना चाहता हो। इस छोटी सी उम्र में जैसे वह उन्हें "ईडेन का सेव" खिलाने पर उतारू हो। जिस तरह वह विज्ञापन के बालक-बालिका के एकांत की रक्षा करता है, जिस तरह उन्हें खींच-तान कर एक-दूसरे के सामने ला खडा करता है, जिस तरह बच्चों को आमने-सामने लाने का कोई मौका नहीं चूकता, उससे इस धारणा को बल मिलता है कि कहीं ना कहीं कुछ तो गडबड है। ये विदेशी कंपनियां अपने यहां के जहर को यहां भी फैलाने से बाज नहीं आ रही हैं।  

विशिष्ट पोस्ट

गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...