pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 27 जनवरी 2012

परदेश में किसी अपने को फूल भेजने हैं?


  अब इतना तो मालुम ही था कि इंटरनेट से कहीं भी कुछ भी मंगा या या भेजा जा सकता है। पर अभी तक ऐसा मौका या सुयोग नहीं मिल पाया था या यूं कह लें कि हासिल करने की कोशिश ही नहीं की थी। तो जब पिछली शादी की सालगिरह पर दिल्ली से बच्चों द्वारा भेजा या सही अर्थों में, इंतजाम किया हुआ 'बुके' हमें मिला तो आश्चर्य मिश्रित हर्ष होना लाजिमी था।

उसके बाद फूलों की ऐसी सेवाओं के लिए 'जाल' छानने पर जो सार हासिल हुआ वह यह है कि वर्षों से कुछ पुष्प प्रेमी फूलों को उनके चाहने वालों के पास भेजा करते थे। तब यह काम तार या फोन के जरिए किया जाता था। एकाधिक ऐसी संस्थाओं में 'टेलेफ़्लोरिस्ट' का नाम प्रमुख था जिनके करीब 1000 के उपर सदस्य थे। इसकी स्थापना 1947 मे की गयी थी। समय बदला इलेक्ट्रोनिक क्रांति के आने पर इन्होंने अपना नाम बदल कर 'इफ़्लोरिस्ट' कर लिया और अब यह "इंटरफ़्लोरा" के सहयोगी के तौर पर काम कर रहे हैं। 'इंटरफ़्लोरा' नाम की यह संस्था एक विश्वव्यापी संस्थान है जो 65-70 साल से इस व्यवसाय मे सफलता पूर्वक काम कर रही है। इसके दो लाख से भी ज्यादा सदस्य दो सौ देशों में फैले हुए हैं। जो करोडों के आर्डर प्रतिवर्ष पूरा करते हैं। संवाद स्थापित करने के हर माध्यम से इन्हें दुनिया भर से आर्डर मिलते हैं और ये दुनिया के किसी भी हिस्से में फूल पहुंचाने का काम हर बाधा को, चाहे वह भौगोलिक हों, चाहे भाषा सम्बंधी, चाहे समय या मुद्रा की दिक्कत, सब को दूर कर पुष्प-प्रेमियों की इच्छा पूरी करते हैं।
अपने यहां भी बहुतेरी संस्थाएं सफलता पूर्वक पुष्प-प्रेमियों की जरूरतों को पूरा कर रही है।  

तो आप को कभी भी किसी भी आयोजन-प्रयोजन के लिए, संसार के किसी भी कोने में, दुनिया के किसी भी हिस्से मे पाए जाने वाले किसी भी फूल को पहुंचाना होवह भी तीन-चार घंटों में, तो....
"इंटरफ्लोरा" है ना।

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

रायपुर से चला पत्र ग्यारह दिनों में भी दिल्ली नहीं पहुंचा

एक बात जानने की इच्छा है कि इस तरह की लापरवाही की शिकायत किसे और कहाँ की जाए, जिसकी सुनवाई हो सकेप्रतीक्षा रहेगी

एक समय था कि सरकारी सेवा होने के बावजूद डाक विभाग सबसे ज्यादा भरोसेमंद विभाग हुआ करता था। उस समय के समर्पित कर्मचारी आधे-अधूरे पते पर भी चिट्ठी-पत्रियों को येन-केन-प्रकारेण पहुंचाना अपना कर्तव्य समझा करते थे। पर समय बदला वह समर्पण भी ख़त्म हो गया।
१४ जनवरी शनिवार को एक पत्र साधारण डाक से दिल्ली के लिए पोस्ट किया था। आज मंगलवार २४ जनवरी तक वह अपने गन्तव्य तक नहीं पहुँच पाया है। एक तरफ तो रोना रोया जाता है कि लोगों ने पत्र लिखना कम कर दिया है। डाक-खानों को अपना खर्च चलाना भारी पड़ रहा है। कर्मचारियों की छंटाई हो रही है। डाक-खानों की संख्या कम की जा रही है। जगह-जगह से डाक पेटियां हटाई जा रही हैं। खर्च चलाने के लिए तरह-तरह के अन्य स्रोत खोजे जा रहे हैं। तरह-तरह के विकल्प सुझाए तथा अमल में लाए जा रहे हैं। दूसरी ओर जो थोड़ा-बहुत काम है उसे भी ढंग से पूरा नहीं किया जा रहा। यह तो साधारण डाक की बात है, कुछ दिनों पहले तो इस विभाग की बहुचर्चित "स्पीड-पोस्ट सेवा" द्वारा भेजा गया पत्र पांचवें दिन दिल्ली पहुंचा था।

ऐसा क्यों है कि सरकारी सेवाएं लोगों पर भारी पड़ती रहती हैं. सरकारी डाक सेवाओं, जिन्हें हर तरह की सुविधा उपलब्ध है, के समानांतर चलने वाली "कूरीयर" सेवाएं ज्यादा सफल हैं। कारण वही है उन्हें चिंता है अपने ग्राहकों की। ग्राहक नहीं काम नहीं। पर सरकारी नौकरी में बैठे लोग निश्चिन्त हैं, काम हो न हो, विभाग चले न चले इनकी पगार पर कोई आंच नहीं आने वाली। नहीं तो क्या कारण है कि छोटे-छोटे टी. वी. चैनल रंगे पड़े हैं और दूरदर्शन पर मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं।

एक बात जानने की इच्छा है कि इस तरह की लापरवाही की शिकायत किसे और कहाँ की जाए, जिसकी सुनवाई हो सके। प्रतीक्षा रहेगी।

शनिवार, 21 जनवरी 2012

तिरंगा कहाँ छूट गया

इस आशा में कि फिर हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति का समुद्र हिलोरें लेगा।
आप सब को २६ जनवरी की ढेरों शुभकामनाएं। जय हिंद

चार-पांच दिनों बाद फिर एक बार तिरंगे की पूछ होगी। एक बंधी-बधाई परम्परा की जैसे खाना-पूर्ती की जाएगी। पुराने देश-भक्ति के रेकार्डों की धूल-गर्द साफ होगी। मजबूरी में लोग इकट्ठा होंगें। झंडोतोलन की रस्म पूरी होते ही सब अपना-अपना रास्ता नाप लेंगे।

पहले वाली बात अब नहीं रही कि अलसुबह लोग बच्चों को साथ ले राजपथ पर जा दरियां बिछा परेड का इन्तजार करते थे। समय बदल गया, माहौल बदल गया, लोग बदल गए, सोच बदल गयी और फिर नेता भी तो वैसे नहीं रहे। अब इस दिन ऐसा होता आया है तो करना पडेगा जैसी बात हो गयी है। सब मशीनीकृत होता लगता है। एक-दो दिन बाद खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि कहीं झंडा उलटा टांग दिया गया। कहीं पुराने से ही काम चला लिया गया। कहीं का मानक के अनुरूप नहीं था। कहीं मान्यवर सलामी देना भूल गए इत्यादि-इत्यादि। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि अब देश-प्रेम की भावना का पूर्णतया लोप हो चुका है। ऐसे में बेचारे झंडे की कौन पूछे।

वैसे इसी सन्दर्भ में एक बहुत पुरानी घटना भी याद आ रही है. भारत ने जब 1983 में क्रिकेट वर्ल्ड कप जीता था तो यहाँ तो यहाँ लन्दन तक का आकाश तिरंगे के रंगों से आच्छादित हो गया था। उसी अप्रत्याशित जीत की रजत जयंती पर फिर समारोहों का आयोजन किया गया. लॉर्ड्स में जा कर फिर यादें ताजा की गयीं। सब कुछ था वहां, 83 की विजेता टीम के सारे खिलाड़ी, बड़ी -बड़ी हस्तियाँ , बैनर , प्रायोजक कंपनियों के लोगो। पर नहीं था तो तिरंगा। ये सही है की लॉर्ड्स के मैदान में झंडा ले जाना मना है पर उसे प्रतीक के रूप में तो रखा ही जा सकता था. सचिन ने भी तो लाख विरोधों के बावजूद अपने हेलमेट में लगा रखा है. पर समय बदल गया है, मान्यताएं बदल गयीं हैं, सोच बदल गई है, लगता है, अब खिलाडी भी खिलाड़ी ना रह बी. सी. सी. आई. के कारिंदे भर बन कर रह गए हैं. अब पता नहीं कि वह चूक थी या फिर अंग्रेजों का दवाब, जो इस तरह भारत को सिरमौर बना देख उपजी कुंठा को कम करने की कोशिश कर रहे हों।
इस आशा में कि फिर हर भारतवासी के दिल में देशभक्ति का समुद्र हिलोरें लेगा।
आप सब को २६ जनवरी की ढेरों शुभकामनाएं। जय हिंद।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

हम हार पचा नहीं पाते, पर क्यूँ?

इधर खेल की नकेल उसके अफरात आमदनी की गुंजाईश के कारण खेल का '' समझाने वालों के हाथ चली गयी है, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ आमदनी से मतलब है खिलाड़ी बंधुआ मजदूर हो गए हैं और ऐसे मजदूरों से "क्वालिटी" की आशा करना कहाँ की बुद्धिमानी है

भारत की क्रिकेट में हार पर हार। लोग रोजमर्रा की अनगिनत मुसीबतों को भूल इसी का शोक मना रहे हैं।
ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि हम हार नहीं पचा पा रहे हों। पहले भी हारी हुई टीम की लानत-मलानत होती रही है, जीत की खुशी में बनवाए गए स्मारक तोड़े गए हैं, हार कर लौटते खिलाड़ियों का घर पहुँचना दूभर हुआ है। हमारी क्या मानव जाति की फितरत है कि चढ़ते सूरज को सलाम किया जाता है, जो जीतता है उसे ही सिकंदर समझा जाता है।

वैसे भी हम एक दो जीत मिलते ही इतने मुत्तमुईन हो जाते हैं कि किसी को अपने सामने कुछ नहीं समझते, भूल जाते हैं कि चोट खाया सर्प कितना खतरनाक हो जाता है। भूल जाते हैं कि जिसके घर खेलने जा रहे हैं, उसके अपने दर्शक हैं, अपनी जमीन है, खेल में उसने भी झंडे गाड़े हुए थे। वह थाली में जीत ले हमें सौंप देने के लिए नहीं खडा। फिर बाहर बैठे स्वंयभू आलोचक, जिन्हें पिच की लम्बाई या बाल का वजन मालूम न हो या कभी गलती से टीम में जिन्हें स्थान मिल गया हो वे खिलाड़ियों की ऐसी हवा बांधते हैं कि आम-जन को विश्वास हो जाता है कि दुनिया में इस खेल के सिरमौर हैं तो सिर्फ हम। उधर जब खिलाड़ी स्तरहीन प्रदर्शन कर हार जाते हैं तो वही महानुभाव टी.वी. पर आ कर अपना धर्म समझते हैं खिलाड़ियों और उनके खेल की छीछालेदर कर उन्हें खलनायक सिद्ध करने का। कुछ अति उत्साही लोग चुनाव कर्ताओं को ही निशाना बनाना शुरू कर देते हैं। कुछ अपने पसंदीदा खिलाड़ियों से सजी टीम का सुझाव बिन मांगे देना शुरू कर देते हैं। कुछ अपने पूर्वाग्रहों और शायद, कुछ-कुछ, पुराने खिलाड़ियों की सफलता की जलन के कारण उन्हें टीम से बाहर करने की आवाज बुलंद करने लगते हैं। उस समय शायद वे भूल जाते हैं कि टीम में ग्यारह सदस्य होते हैं और व्यस्क खिलाड़ी मात्र दो-तीन ही हैं। हार के बाद ही सब गुनी-जनों के सुझाव बरसते हैं। जीतती टीम के समय उन्हें कुछ याद नहीं रहता। हमारा शगल भी है परनिंदा इसमें अपार सुख छिपा होता है जो मौका मिलते ही उजागर हो अपने स्वामी के दिल को शान्ति प्रदान करता है।

अभी एक सज्जन शिमला, उटकमंड, पचमढी जैसे स्थानों में खेल करवाने का सुझाव देते मिले। उन्हें श्रीलंका और वेस्ट इंडीज की शानदार पारियों की याद नहीं रही। जहां प्रतिकूल स्थितियों में रहते हुए अभावग्रस्त जीवन जीते हुए भी दुनिया के श्रेष्ठ खिलाड़ी अपना और अपने देश का नाम रौशन कर गए। इन महाशय के अनुसार जड़ पर आक्रमण करना चाहिए, तो सारी खुराफातों की जड़ तो पैसा है जिसके लिए कोल्हू के बैल की तरह हमारे खिलाड़ी जुटे रहते हैं, अपनी थकान, चोट और बीमारी छिपाए। क्योंकि एक डर उन्हें और भी खाए जाता है कि कहीं ज्यादा दिन बाहर रह गए तो फिर टीम में स्थान पाना मुश्किल हो जाएगा। यह सब बातें भी उनके प्रदर्शन पर असर डालती हैं। पर पैसा कमाने का जुनून उन्हें चैन से बैठने भी तो नहीं देता, खेल से जरा सी फुर्सत मिलते ही जुट जाते हैं धन कमाने के अन्य स्रोतों में। अब शरीर तो शरीर है कोई मशीन तो नहीं, मौके पर वह भी जवाब दे जाता है।

इधर खेल की नकेल उसके अफरात आमदनी की गुंजाईश के कारण खेल का 'ख' न समझाने वालों के हाथ चली गयी है, जिन्हें सिर्फ और सिर्फ आमदनी से मतलब है। खिलाड़ी बंधुआ मजदूर हो गए हैं और ऐसे मजदूरों से "क्वालिटी" की आशा करना कहाँ की बुद्धिमानी है।

बुधवार, 18 जनवरी 2012

'रियेल्टी शोज' जो सबसे ज्यादा अनरियल होते हैं।

आज जिन्हें रियेल्टी शोज कहकर परोसा जा रहा है वास्तव में वही सब से ज्यादा अनरियल होते हैं। हालांकि शुरुआत कुछ अच्छे, सार्थक, मनोरंजक और ज्ञानवर्धक सीरियलों से हुई थी, जैसे बोर्नविटा क्विज या अंताक्षरी जैसे शोज। पर फिर टी.वी. पट गया निर्रथक नकली घरेलू कलह-क्लेश वाले सीरियलों से और वैसे सार्थक प्रयास नेपथ्य में ढकेल दिए गये।

कालीदासजी ने कहा है "उत्सव प्रिय: मानवा:" जो आज के सन्दर्भ कुछ बदल कर "सदा नवीन प्रिय: मानवा:" हो गया है। कुछ साल पीछे चलें तो साठ के दशक में जब टी.वी. का दखल भारत में नहीं हुआ था, तब मेले-ठेलों में तरह-तरह के अजूबे प्रदर्शित किए जाते थे, जो अवास्तविक होने के बावजूद वास्तविक लगते थे। उन्हीं दिनों 'फ़्री-स्टाइल' नाम से होने वाली कुश्तियों में, जिनमें अपने दारा सिंह मुख्य नायक हुआ करते थे, बडी भीड उमडा करती थी। वह सब भी एक तरह से रियेल्टी शो ही हुआ करता था, मंच पर तरह-तरह की घोषणाएं कर दर्शकों में उत्सुकता बढाई जाती थी, कुश्ती के दौरान भी दर्शकों को रोमांचित करने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाए जाते थे। पर होता था सब सोचे-समझे मुताबिक। अभी कुछ समय पहले भी W.W.F. की नकली मुठभेडों का बच्चों और युवाओं पर जुनून सवार रहता था। जिन्होंने अपने हंगामेदार आयोजन, आक्रामक प्रचार, अजीबोगरीब भेषभूषा तथा भाषा से लोगों को अपना दिवाना बना लिया था। धीरे-धीरे उसका ‘क्रेज’ भी उतार पर है।

अब दुनिया में बाजार कहीं का भी हो, उसकी राक्षसी भूख मिटती नहीं है, उसके नियामकों को उसके पेट को भरने के लिए सतत प्रयास करते रहना पडता है। इन्हीं प्रयासों का फल हैं ये आधुनिक रियेल्टी शोज। योरोप में ये काफी पहले आ गये थे हमारे यहां बिना ज्यादा मेहनत किए उन्हीं को जरा सा रद्दोबदल कर परोस दिया गया। तरह-तरह की अवास्तविकताएं वास्तविकता के नाम से परोसी जाने लगीं। एक दो टेढे-बांके सीरियल सफल क्या हुए, भेडिया धसान शुरु हो गया। पर मानव तो सदा बदलाव चाहता है। कुछ दिन तो चटोरे दिमागों को उनका स्वाद भाया पर फिर उनका असर कम होना शुरु हो गया। तथाकथित टी.आर.पी. गिरते देख दर्शकों को रोके रखने के लिए नयी-नयी तिकडमें आजमाई जाने लगीं। भावनाओं को उभाडने के लिए इनमें नौटंकी का समावेश कर दिया गया। हारते, बाहर होते प्रतियोगी के मां-बाप की आंखों से आंसू निकलवा कर उनका क्लोज-अप लिया जाने लगा, प्रतियोगी से उल्टे-सीधे प्रवचन बुलवाए जाने लगे, तालियां प्रायोजित की जाने लगीं, दर्शक दीर्घा से कुछ एक भाडे के ट्टूओं का नाचना-झूमना दिखाया जाने लगा, अपनी-अपनी पसंद के प्रतिभागी के लिए ‘जजों’ में रंजिश, मनमुटाव, बहस दिखा दर्शक को भरमाने की कोशिशें होने लगीं। कुछ दिनों बाद जब दर्शक असलियत समझयहां से मुंह फेरने लगे तो उन्हें फिर बांधे रखने के लिए निर्माता भदेशपन पर उतर आए। सबसे पूरानी ‘मानवीय कमजोरी’ का फायदा उठाने के लिए बी, सी ग्रेड की “कलाकारों की कलाकारी" को हथियार बना लिया गया। नग्नता, द्विअर्थी संवादों का खुल कर प्रयोग शुरु हो गया। ऐसे ही किसी एक 'कुप्रयास' के सफल होते ही वैसे ही चार और बाजार में उतार दिए गये। फिर तो किसी की सगाई होने लगी, किसी का स्वयंबर तो कोई तो शादी तक करवाने को उतारू हो गया। जीवन की सच्चाईयों से दूर, नैतिकता को ताक पर रख, बच्चों, परिवारों की फिक्र के बगैर विज्ञापनों से मोटी कमाई करते ये बिना सिर-पैर के, मीठा जहर परोसते जलवे जारी हैं और रहेंगे जब तक दर्शक जागरूक हो इन्हें सिरे से नकार ना दें।

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

हमारी "विश्व धरोहरें"

इंसान को अपने प्रादुर्भाव के साथ ही जब भी अपनी जीवन रक्षा और भोजन की समस्याओं से निजात मिली होगी, तभी से उसने सृजन का कार्य भी शुरु कर दिया होगा। समय के साथ-साथ जैसे-जैसे उसमे गुण विकसित होते गये उसके सृजन में भी परिपक्वता आती चली गयी। धीरे-धीरे इंसान की कलाकृतियां से यह धरा सुशोभित होती चली गयी। प्रकृति और उसी की कृति इंसान में जैसे एक स्वस्थ होड सी लगी हो एक से एक नायाब कलाकृतियों के सृजन की।

पर काल बडा निष्ठुर होता है। उसके सामने सुंदर, असुंदर, अच्छे-बुरे किसी का कोई मोल नहीं होता। समय आने पर हर चीज को काल-कल्वित होना पडता है। फिर चाहे वह नायाब कलाकृतियां हों, भवन हों या स्मारक हों। रही प्रकृति के सृजनों की बात तो वह भी समय की मार के साथ-साथ इंसान की महत्वाकांक्षाओं, आवश्यकताओं की शिकार होती चली जाती हैं। इन्हीं सब बातों को मद्दे-नजर रख 1972 में 'युनेस्को' की पहल और सहयोग से "विश्व धरोहर संरक्षण का गठन हुआ जिससे इस धरा की सुंदरतम, अनोखी, अनूठी सम्पदाओं का रख-रखाव कर उनके जीवन को कुछ और बढाया जा सके।

हमारी "वसुधैव कुटुम्बकम" की तर्ज पर सारे संसार को एक मान यहां की अद्भुत कलाकृतियों की खोज की गयी। जिसमें मानव निर्मित और प्रकृति प्रदत्त दोनों की कृतियां शामिल थीं। जैसे जंगल, पहाड़, रेगिस्तान, झील, स्मारक, भवन, शहर इत्यादि।

अभी तक इस सूचि में 936 अनमोल कृतियां स्थान पाकर विश्व धरोहर होने का गौरव पा चुकी हैं। भारत की भी 28 कृतियां इसमें शामिल हैं। जिनमें 23 मानव निर्मित हैं और पांच प्रकृति प्रदत्त। ऐसी ही 32 और नाम विचाराधीन हैं जो इस गौरव को पाने का इंतजार कर रहे हैं।

भारत से विश्व धरोहर परिवार में शामिल होने वाले स्मारक और जगहें निम्नलिखित हैं :-

1, ताजमहल, आगरा।

2, आगरे का किला, आगरा।

3, लाल किला, दिल्ली।

4, कुतुब मिनार, दिल्ली।

5, हुमाँयूं का मकबरा, दिल्ली।

6, महाबोधी मंदिर, गया।

7, गोआ के चर्च, गोआ।

8, सांची का बौद्ध स्तूप, म.प्र.

9, भीम बेटका की गुफाएं, म.प्.

10, खजुराहो, म.प्.

11, पावागढ उद्यान, गुजरात।

१२, कोणार्क का सूर्य मंदिर, ओडिसा।

13, पहाड़ी रेल, शिमला, नीलगिरी।

14, अजंता की गुफाएं, महाराष्ट्र।

15, एलोरा की गुफाएं, महाराष्ट्र।

16, एलेफेंटा की गुफाएं, महाराष्ट्र।

17, छत्रपति शिवाजी टर्मिनल, महाराष्ट्र।

18, केवलादेव उद्यान, राजस्थान।

19, जंतर-मंतर, राजस्थान।

20, चोला मंदिर, तमिलनाडू।

21, महाबलीपुरम, तमिलनाडू

22, पट्टदकल स्मारक, कर्नाटक।

23, हम्पी के स्मारक, कर्नाटक।

24, फतेहपुर सीकरी, यू.पी.

25, फूलों की घाटी, उत्तरांचल।

26, काजीरंगा नेशनल पार्क, आसाम।

27, मनास सैंक्चुरी, आसाम।

28, सुंदरवन, प.बं.

इनका परिचय अगली बार।

गुरुवार, 12 जनवरी 2012

बारूद को निष्क्रिय कर देने वाला एक अद्भुत पौधा 'सदाबहार'

जिसमे सबसे चमत्कृत करने वाली बात है कि यह बारूद जैसे पदार्थ को भी निष्क्रिय करने की क्षमता रखता हैइसी के चलते आज विस्फोटक क्षेत्रों और भंडारण वाली हजारों एकड़ भूमि को उपयोग के लायक बनाया जा सक रहा है.

दुनिया में तरह-तरह के पेड़, पौधे, वनस्पतियाँ, लताएं, गुल्म पाए जाते हैं. सबके अपने-अपने गुण-विशेषताएं होती हैं. कईयों के बारे में तो अभी भी पूरी जानकारी नहीं पा सका है इंसान. ऐसी ही प्रकृति की एक अनोखी देन है, सदाबहार नाम का यह पौधा। जिसका वैज्ञानिक नाम "विंका रोजेआ" है।

अपने नाम के अनुसार यह भारत के करीब सभी हिस्सों में सालों-साल पाया जाता है। प्रकृति ने इसे इतनी क्षमता दी है कि यह बिना किसी विशेष सार-संभाल के भी फलता-फूलता रहता है। अपने सफेद-जामुनी रंग के फूलों से लड़ा-फदा यह पौधा बरबस किसी को भी अपनी ओर आकृष्ट कर लेता है। इस पौधे की खासियत है कि इसके फूल तो खाद्य के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं पर इस के बाकी अंग कड़वे और विषाक्त होते हैं।

शोधों से इसके एकाधिक गुणों का पता चला है। जिसमे सबसे चमत्कृत करने वाली बात है कि यह बारूद जैसे पदार्थ को भी निष्क्रिय करने की क्षमता रखता है। इसी के चलते आज विस्फोटक क्षेत्रों और भंडारण वाली हजारों एकड़ भूमि को यह निरापद बना रहा है। अपने "केंद्रीय औषधीय एवं सुगंध पौधा संस्थान" द्वारा की गयी खोजों से पता चला है कि इसमें पाया जाने वाला क्षार रक्त कैंसर के उपचार में बहुत उपयोगी होता है। इसके साथ ही यह रक्तचाप को कम करने और मधुमेह जैसी बीमारी को काबू में करने में बहुत सहायक होता है। शोधों के कारण जैसे-जैसे इसकी खूबियों का पता चलता जाता है वैसे-वैसे इसकी मांग भी देश-विदेश में बढती जा रही है. इसीलिए अब इसकी खेती भी की जाने लगी है। यह अनोखा पौधा अब संजीवनी बूटी बन गया है।
इसे लगाना या उगाना बहुत आसान है, इसके डंठल को कहीं भी रोप दिया जाए यह अपनी जिन्दगी शुरू कर देता है। जानकारों का कहना है कि सदाबहार और नीम के ७-७ पत्तों का खाली पेट सेवन करना मधुमेह में काफी उपयोगी होता है।





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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...