pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 20 नवंबर 2011

रहस्य के कोहरे में लिपटे दो जीव

दुनिया के सैकड़ों-हजारों जीव- जंतुओं मे कुछ ऐसे प्राणी हैं जिनके अस्तित्व पर मनुष्य ने रहस्य और ड़र का कोहरा फैला रखा हैइनमे दो प्रमुख हैं पहला है बिल्ली और दूसरा सांप। वैसे इस मामले में बिल्ली सांप से कहीं आगे है। इसी की जाति के शेर, बाघ, तेंदुए आदि जानवर ड़र जरूर पैदा करते हैं पर रहस्यात्मक वातावरण नहीं बनाते। पर अफ्रीकी मूल के इस प्राणी, "बिल्ली" को लेकर विश्व भर के देशों में अनेकों किस्से, कहानियां और अंधविश्वास प्रचलित हैं।
जहां जापान मे इसे सम्मान दिया जाता है, क्योंकि किसी समय इसने वहां चूहों के आतंक को खत्म कर खाद्यान संकट का निवारण किया था। वहीं दूसरी ओर इसाई धर्म में इसे बुरी आत्माओं का साथी समझ नफ़रत की जाती रही है। फ्रांस मे तो इसे कभी जादूगरनी तक मान लिया गया था। हमारे यहां भी इसको लेकर तरह-तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं। एक ओर तो इसके रोने की आवाज को अशुभ माना जाता है। आज के युग मे भी यदि यह रास्ता काट जाए तो अच्छे-अच्छे पढे-लिखे लोगों को ठिठकते देखा जा सकता है। रात के अंधेरे में आग के शोलों कि तरह दिप-दिप करती आंखों के साथ यदि काली बिल्ली मिल जाए तो देवता भी कूच करने मे देर नहीं लगाते। संयोग वश यदि किसी के हाथों इसकी मौत हो जाए तो सोने की बिल्ली बना दान करने से ही पाप मुक्ति मानी जाती है। दूसरी ओर दिवाली के दिन इसका घर में दिखाई देना शुभ माना जाता है। पता नहीं ऐसा विरोधाभास क्यों?
दुनिया भर की ड़रावनी फिल्मों मे रहस्य और ड़र के कोहरे को घना करने मे सदा इसकी सहायता ली जाती रही है। यह हर तरह के खाद्य को खाने वाली है, पर इसका चूहे और दूध के प्रति लगाव अप्रतिम है। इसे पालतू तो बनाया जा सकता है पर वफादारी की गारंटी शायद नहीं ली जा सकती।

सांपों
को लेकर भी तरह-तरह की भ्रान्तियां मौकापरस्तों द्वारा फैलाई जाती रही हैं। जैसे इच्छाधारी नाग-नागिन की विचित्र कथाएं। जिन पर फिल्में बना-बना कर निर्माता अपनी इच्छायें पूरी कर चुके हैं। एक और विश्वास बहुत प्रचलित है, नाग की आंखों मे कैमरा होना, जिससे वह अपना अहित करने वाले को खोज कर बदला लेता है। चाहे वह दुनिया के किसी भी कोने मे हो। सपेरों और तांत्रिकों द्वारा एक और बात फैलाई हुई है कि सांप आवश्यक अनुष्ठान करने पर अपने द्वारा काटे गये इंसान के पास आ अपना विष वापस चूस लेता है। पर सच्चाई तो यह है कि दूध ना पीने वाला यह जीव दुनिया के सबसे खतरनाक प्राणी, इंसान, से ड़रता है। चोट करने या गलती से छेड़-छाड़ हो जाने पर ही यह पलट कर वार करता है। उल्टे यह चूहे जैसे जीव-जंतुओं को खा कर खेती की रक्षा ही करता है। जिससे इसे किसान मित्र भी कहा जाता है।

दुनिया के दूसरे प्राणियों की तरह ये भी प्रकृति की देन हैं। जरूरत है उल्टी सीधी अफवाहों से लोगों को अवगत करा अंधविश्वासों की दुनिया से बाहर लाने की।

शनिवार, 12 नवंबर 2011

क्या कभी कंकडों से भी पानी ऊपर आता है?


बकरी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का चारों ओर जम कर प्रचार किया। सो आज तक कौवे का गुणगान होता रहा है।


पशु-पक्षियों में कौवे की बड़ी धाक थी। उसने कुछ ऐसी भ्रान्ति फैला रखी थी कि उस जैसा समझदार पूरे जंगल में कोई नहीं है। तकदीर तेज थी मौके-बेमौके उसका सिक्का चल ही जाता था। ऐसे ही वक्त बीतता गया। समयानुसार गर्मी का मौसम भी आ खड़ा हुआ अपनी पूरी प्रचंडता के साथ। सारे नदी-नाले, पोखर-तालाब सूख गए। पानी के लिए त्राहि-त्राहि मच गई। ऐसे ही एक दिन हमारा कौवा पानी की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था। उसकी जान निकली जा रही थी, पंख जवाब दे रहे थे, कलेजा मुहँ को आ रहा था। तभी अचानक उसकी नजर एक झोंपडी के बाहर पड़े एक घडे पर पड़ी। उसमे पानी तो था पर एक दम तले में , पहुँच के बाहर। उसने इधर-उधर देखा तो उसे पास ही कुछ कंकड़ों का ढेर नजर आया। कौवे ने अपनी अक्ल दौड़ाई और उन कंकडों को ला-ला कर घडे में डालना शुरू कर दिया। परन्तु एक तो गरमी दुसरे पहले से थक कर बेहाल, ऊपर से प्यास , कौवा जल्द ही पस्त पड़ गया । अचानक उसकी नजर झाडी के पीछे खड़ी एक बकरी पर पड़ी जो न जाने कब से उसका क्रिया-कलाप देख रही थी। यदि बकरी ने उसकी नाकामयाबी का ढोल पीट दिया तो ? कौवा यह सोच कर ही काँप उठा। तभी उसके दिमाग का बल्ब जला और उसने अपनी दरियादिली का परिचय देते हुए बकरी से कहा कि कंकड़ डालने से पानी काफी ऊपर आ गया है तुम ज्यादा प्यासी लग रही हो सो पहले तुम पानी पी लो। बकरी कौवे कि शुक्रगुजार हो आगे बढ़ी पर जैसा जाहिर था वह खड़े घडे से पानी ना पी सकी। कौवे ने फिर राह सुझाई कि तुम अपने सर से टक्कर मार कर घडा उलट दो इससे पानी बाहर आ जायेगा तो फिर तुम पी लेना। बकरी ने कौवे के कहेनुसार घडे को गिरा दिया। घडे का सारा पानी बाहर आ गया, दोनों ने पानी पी कर अपनी प्यास बुझाई।

बकरी का मीडिया में काफी दखल था। उसने कौवे की दरियादिली तथा बुद्धिमत्ता का चारों ओर जम कर प्रचार किया। सो आज तक कौवे का गुणगान होता आ रहा है।

नहीं तो क्या कभी कंकडों से भी पानी ऊपर आया है ?

सोमवार, 7 नवंबर 2011

नाक कटने से बचाने का कोई उपाय है क्या?

करीब डेढ़-दो साल पहले प्राणायाम करते समय नाक के बाएँ नथुने में 'कुछ' होने जैसा महसूस किया था। ऐसे ही होगा ठीक हो जाएगा की सोच के साथ समय और वह दोनों अपनी गति से बढ़ते गए। पतंजलि से संपर्क किया तो जैसी की आशा थी उन्होंने इसे किसी और कारण से होने का बताया, साथ ही कुछ घरेलू उपाय बताए पर उन्हें और अपने तौर पर कुछ न कुछ करते रहने के बाद भी जब 'उसने' अवैध कब्जा न छोड़ा और धीरे-धीरे बायाँ छिद्र पूर्णतया बंद हो गया। फिर एलोपैथी से सहायता की गुजारिश की। पता चला कि यह "पोलिप" कहलाता है, इलाज शुरू हुआ पर कोई फ़ायदा नहीं मिल पाया। हाँ 'प्रकृति-विरुद्ध' दवाओं से कुछ अलग सी समस्याएँ और जरूर हो गयीं। फिर कुछ दिनों बाद होम्योपैथी की शरण ली, बातों-बातों में डाक्टर साहब ने बताया कि वह भी इससे जूझ चुके हैं। उनका मस्सा तो नाक के बाहर आ जाता था। यहाँ कुछ आशा बंधी। दवा-दारू चालू हुई, थोड़ा असर दिखने भी लगा, पर एक जगह आ 'उसकी' हठधर्मिता के सामने कोई बात नही बन पाई। इसी बीच दाएं नथुने पर भी असर शुरू हो गया था। रात सोते समय दोनों छिद्र बंद हो हवा को अन्दर आने से रोकने में पूरी तरह सफल हो गए थे। मजबूरी में सहानुभूतिवश मूंह अपना द्वार खोल सांस लेने की क्रिया को सुचारू रूप देने का प्रयास करता रहता था। पर उससे जीभ, तालू, गला बुरी तरह सूख जाते थे। सर भी भारी रहने लगा था। इन सब को लिए-दिए फिर दिल्ली आना हुआ और फिर एक बार एलोपैथी की सरकार से इस नाजायज कब्जे की शिकायत की। इस बार उन्होंने अपना अंतिम निर्णय लेते हुए शल्य-चिकित्सा करवाने को कह दिया। हालांकि आजकल बिना पूर्ण बेहोश किए लेज़र की सहायता से यह उपचार संभव है, फिर भी यदि कोई इसका भुगत-भोगी हो तो उनके विचारों, ख्यालों और तजुर्बे का सदा स्वागत है।

आखिर नाक की इज्जत का सवाल है भाई।

शनिवार, 5 नवंबर 2011

पांच करोड़ जीतने के साथ मुसीबतें मुफ्त

अभी-अभी संपन्न हुए 'पंचकोटी महा-मनी' के विजेता बने सुशील कुमार की समस्याएँ शुरू होती हैं ........अब

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए। पिछले हफ्ते की ही बात है, बिहार के मोतीहारी जिले के सुशील कुमार ने टी.वी. के 'कौन बनेगा करोड़पति' के माध्यम से शायद देश की सबसे बडी इनामी राशि जीतने का गौरव लाखों लोगों के सामने हासिल किया।दुनिया के सामने रातों-रात मिले धन और प्रसिद्धि ने जहां ढेरों खुशियां झोली में डाल दीं वहीं कुछ अनपेक्षित समस्याएं भी बिन बुलाए आ खड़ी हुईं हैं।


उस समय उनकी माली हालत को देखते हुए बहुत से लोगों की सहानुभूति उनके साथ रही होगी, बहुतों को अच्छा लगा होगा, बहुतेरे मन मसोस कर रह गये होंगे, कुछ निरपेक्ष रहे होंगें और कुछ समय के बाद ऐसे सभी लोग अपने-अपने काम में मशगूल हो गये होंगें। पर असली खेल या कहिए सुशील की मुश्किलात का समय शुरु होता है अब;


सुनने में आ रहा है कि जीतने के बाद खेल में भाग लेने गये लोग वापस अपने घर जाने में हिचकिचा रहे हैं। वे ही नहीं उधर मोतीहारी में बैठे घर के सदस्य भी अपनी और सुशील की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। जिसकी वजह है बिहार के पुराने हालात, जहां छोटी-छोटी रकमों के लिए ही लोगों का अपहरण कर लिया जाता था और यह तो बहुत बड़ी धन-राशि है। हालात पहले से बहुत सुधरे हैं पर फिर भी ड़र बना हुआ है।


यह सारा कुछ उस कहावत की याद दिलाता है कि पैसा ना हो तो मुश्किल और हो तो भी मुश्किल। इतना ही नहीं सुशील कुमार के इतनी बड़ी रकम जितने के बाद उनके नजदीकी भाई-बंधुओं, दोस्त-मित्रों, सगे-सम्बंधियों ने अपने-अपने स्तर पर बहुतेरी आशाएं संजो ली होंगी और यदि किसी कारणवश वे पूरी नहीं हो पातीं तो रिश्तों में भी खटास आने की संभावना बढ जाएगी।


इन सबके अलावा बहुत सारे बीमा एजेंट, बैंकों के प्रतिनिधी, रियल एस्टेट वाले और भी ना जाने कितने ढेरों लोग अपने-अपने धंधों की स्कीमों को लेकर सुशील की राह में पलक-पांवड़े बिछाए इस मोतीहारी के नायक का बेसब्री से इंतजार कर रहे होंगें। भले ही इन सारे लोगों की नियत में खोट ना भी हो तो भी रोज-रोज उनकी जिंदगी में दखलंदाजी कर और कुछ नहीं तो तनाव का तोहफा तो जरूर पूरे परिवार को देंगें ही। खैर जब लक्ष्मीजी आईं हैं तो इतना सब तो सहना ही पड़ेगा।


अब तो यही है कि यदि भगवान ने जिंदगी में सुखद समय लाने का प्रबंध किया है तो वह सही मायनों में सुखद हो।



































सोमवार, 31 अक्टूबर 2011

खुश, सुखी व स्वस्थ रहना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है।

कुछ बातें अति साधारण लगती हैं, पर होती बडे काम की हैं। इनकी जानकारी जो बहुत लाभदायक होती हैं और अधिकांश लोगों को मालुम भी होती हैं, पर सब कुछ याद नहीं रह पाता। इसलिए इन सब बातों को जो जीवन में अहम महत्व रखती हैं, उन्हें दोहराते रहना चाहिए।

ऐसी ही कुछ बातें हैं जो हमारे बडे-बुजुर्गों ने अपने जीवन के अनुभवों से जानी-परखीं और जन हित के लिए सब को बताईं। जिनके प्रयोग से आदमी स्वस्थ और दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता है। इनमें प्रमुख हैं :-

गरिष्ठ भोजन से बचें, कम से कम रोज तो ना ही लें। पेट भर भोजन ग्रहण ना करें। भोजन के साथ पानी ना पीयें, बहुत ही जरूरी हो तो जरा सा लें। भोजन के बाद तुरंत जल ग्रहण ना करें। अधिक मीठे का प्रयोग ना करें। गहरी सांस लेने की आदत डालें। कितनी भी उम्र हो नियमित व्यायाम, आसन या प्राणायाम जरूर करें। कोई रोग हो भी जाए तो उसकी चिंता में ना ड़ूबे रहें उसका उचित इलाज और प्रभू के जप को दवा बनाएं। श्रम या मेहनत से बचने की कोशिश ना करें। अपनी निंदा को सुन धैर्य ना खोएं। अपने दोषों को याद रखें हो सके तो उनकी सूचि बना लें और उन्हें दूर करने की कोशिश करें। ईर्ष्या, द्वेष, परनिंदा से बचें। किसी के साथ भी दुर्व्यवहार ना करें। किसी का दिल ना दुखाएं। झूठ का सहारा ना लें, इससे भी बेवजह तनाव और दिल पर बोझ बढता है। अपने आचार, विचार और व्यवहार को दुषित ना होने दें। बुरे प्रसंगों को याद ना रखें। जो होना है वह हो कर ही रहेगा सो बेकार की चिंता ना पालें,सर्वशक्तिमान की शरण मे अपने आप को पूर्णतया समर्पित कर दें। हो सके तो सोते समय अपनी जानी-अनजानी भूलों की सबसे क्षमा-याचना जरूर करें।

देखिएगा मन हल्का, तन स्वस्थ और दिमाग तनाव मुक्त रहेगा।

मंगलवार, 25 अक्टूबर 2011

"अनदेखे अपनों" को सपरिवार दीपोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएं

इस विधा यानि ब्लागिंग के माध्यम से जितना स्नेह, अपनापन तथा हौसला आप सब की तरफ से मुझे मिला है उससे अभिभूत हूँ। कितनी अजीब सी बात है कि एक-दो दिनों में जब तक सबके नाम दिख न जाएं तो खाली-खाली सा महसूस होता है। यदि खुदा न खास्ता किसी की उपस्थिति चार-पांच दिनों तक न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर खींचा सा रहता है। इस "अनदेखे अपनों" से हुए लगाव को क्या नाम देंगे? जबकि इन तीन सालों में सिर्फ अपनी कूपमंडूकता के कारण बहुत कम लोगों से आमने-सामने मुलाक़ात हो पाई है। चाह कर, मौका रहते हुए भी वैसा नहीं हो पाया। पर ऐसा ही स्नेह सब से बना रहे यही कामना है।

इस दीपोत्सव के पावन पर्व पर मेरी ओर से आप सब को सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाएं।

आने वाले समय में सभी सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें।

प्रभू से यही प्रार्थना है।

रविवार, 23 अक्टूबर 2011

खरीदो-खरीदो, आज पुष्य नक्षत्र का शुभ योग है ! ! ! तो बेचने वाला क्या पागल है?


एक खबर है कि इस साल "बेचने वालों" ने ५५० टन सोना आयात किया है। जो करीब १०० टन ज्यादा है पिछले साल की तुलना में। तो हर साल जो नक्षत्रों की चाल में आ, सौभाग्य की आकांक्षा में किसी तरह बाजार में जा खड़े हो कुछ न कुछ "खरीदते" आए हैं उनका क्या बना ?????

पहले जैसा दस्तूर या रिवाज नहीं रहा कि साल में होली-दिवाली पर बाजार सजते थेअब तो खोज-खोज कर कोई कोई देसी-विदेशी मौका ला खडा कर दिया जाता है, जनता को लुभा-भरमा कर उसकी जेब ढीली करवाने के लिएइन सब में सबसे बड़ा मौका या त्यौहार होता है दीपावली काजिसका इंतजार बाज की तरह बाजार करता हैलोगों को भरमाने के जितने तरीके साल के इस मौके पर काम में लाए जाते हैं, उतने पूरे साल में भी कभी इस्तेमाल नहीं होतेदीपावली के काफी पहले से ग्राहकों को घेरने की चालें रची जाने लगती हैंमुख्य त्यौहार के पहले पड़ने वाले 'धन तेरस' से ही साम, दाम, भेद, हर विधा को आजमाया जाने लगता हैयहाँ तक कि वास्तु, ज्योतिष, भविष्य इत्यादि का जोड़-घटाव का रूपक रच ऐसा माहौल बना दिया जाता है कि लोगों को लगने लगता है कि इस मुहूर्त पर यदि कुछ खरीद नही पाए तो जीवन में सौभाग्य पाने का एकमात्र अवसर चूक जाएंगेबस बेचारा कैसे भी जोड़-तोड़ कर कुछ कुछ इंतजाम कर बाजार में जा खडा होता है

इस साल भी वैसे ही नाटक रचा गयापर इस बार ग्राहकों के रुझान और उनकी भारी जेब का आकलन कर पंडितों की सहायता ले खरीदारी की अवधि को पहले की तरह कुछ घंटों का रख दो दिनों का कर दिया गया कि आओ-आओ, कुछ तो लेकर ही जाओमजे की बात यह कि बकरे को ही उसकी भलाई की मरीचिका दिखा हलाल करने की पूरी तैयारी हैक्योंकि जाहिराना बात है कि बाजार की बढ़ती भीड़ से किसे फ़ायदा होने वाला है, जो खरीदने पर उतारू है उसे या जो अपना सारा "स्टाक" बेचने पर तुला है उसेअरे भाई ! जब सिर्फ खरीदना इतना सौभाग्यशाली है तो हजारों-हजार लोग बेचने पर क्यों उतारू हैं? क्या उन्हें सौभाग्य की आकांक्षा नहीं है? या फिर वह सिर्फ परमार्थ के लिए बाजार में खड़े हुए हैं ? यदि इस पुष्य नक्षत्र के शुभ मुहूर्त में सिर्फ खरीदने से ही भाग्य फलता है तो क्या हजारों - लाखों दुकानों के मालिक पागल हैं। आज अखबारें खबरों का जरिया न रह कर "पैम्फलेट" मात्र रह गयी हैं। कोई भी अखबार उठा कर देख लिजीए विज्ञापनों से पटी पड़ी हैं। इन्हें ही जरिया बना हर खासो-आम को आगाह किया जाता है कि देखो मौका मत चूको। कुछ तो खरीदो। देखो कितने लुभावने आफर तुम्हारे फायदे के लिए आँखें बिछाए पड़े हैं। ७०-७० प्रतिशत पर छूट दी जा रही है। सोचने की बात है कि यह छूट देने वाला क्यों घाटा सहेगा? पर सोचने की फुरसत किसे और कहाँ है सबको लगता है कि कहीं ऐसा हो कि पड़ोसी के यहाँ लक्ष्मीजी आकर बैठ जाएं और हम बाजार की पोल ही खोजते रह जाएं यही वह कारण भी है जिससे हफ्ते में गोरा बनाने वाली क्रीम की फैक्ट्री अफ्रिका में लग यहीं वारे-न्यारे कर रही है यहाँ रह कर भी लोगों का ध्यान देश के दक्षिणी भाग में रहने वाले लोगों की तरफ नहीं जाने देती नहीं तो लोगों को पता होता कि इसी नक्षत्रों के खेल के लिए "बेचने वालों" ने इस बार करीब ५५० टन सोना देश में आयात किया है जो कि पिछले साल के मुकाबले पूरा "१०० टन" ज्यादा है

तो क्या सोच रहे हैं? आखिर पुष्य नक्षत्र है भाई !!! वह भी ऐसा योग जो कई सालों बाद आया है। चलिए कुछ खरीदारी हो ही जाए, कहीं सचमुच ही ऐसा कुछ हुआ तो सालों ताने सुनने मिलेंगे :-)

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नकारों को नकारते नवयुवा

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...