pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 4 अक्टूबर 2011

हादसा, जिसने गाड़ी के लोगों को एक ही परिवार का सदस्य बना दिया

दो-तीन दिन पहले एक विदेशी रेल इंजिन का जिक्र किया था जो कई हादसों से जुड़ कर कुख्यात हो गया था और फिलहाल यार्ड में पडा, खडा है। इसी के चलते बचपन के एक रेल हादसे की याद आ गयी। उस समय गाड़ियों में इतनी भीड़-भाड नहीं होती थी, ना ही इतनी गाड़ियां ही होती थीं। बड़े स्टेशनों के बीच दूरगामी गाड़ियां ज्यादातर दो ही होती थीं। एक मेल दूसरी एक्सप्रेस। जैसे मद्रास मेल, मद्रास एक्सप्रेस। बाम्बे मेल, बाम्बे एक्सप्रेस इत्यादि। लम्बी दूरी की गाड़ियों में ज्यादातर कनाडा के बने 'कनेडियन इंजन' लगा करते थे।

मैं बहुत छोटा था सो सब कुछ विस्तार से तो याद नहीं है पर इतना याद है कि कलकत्ता से पंजाब तीसरे दिन पहुंचना होता था। दो-दो रातें गाड़ी में काट कर जब कोई अपने गन्तव्य पर पहुंचता था तो इंजन के धूएँ, रास्ते की धूल-मिट्टी से संवरे चेहरे को पहचानना मुश्किल हो जाता था। उन दिनों डिब्बों की खिड़कियों में सलाखें भी नही हुआ करती थीं। बच्चे सर निकाल-निकाल कर बाहर के नज़ारे देखने की कोशिश में आँखों में कोयले के कण डलवा कर माँ-बाप की डांट खाया करते थे। आज की तरह की सहूलियतें भी नहीं थीं। लोग-बाग़ जैसे पूरी गृहस्ती ही लेकर चला करते थे। ठंड के दिनों में तो मनों सामान ढोना पड़ता था। बड़े-बड़े 'होल्डाल' जिनमें रजाईयां, कम्बल, चादरें, तकिए, तौलिए इत्यादि भरे रहते थे। लोहे के ट्रंक जिन्हें रखने की जद्दोजहद करनी पड़ती थी। पानी के लिए सुराहियाँ, खाने के सामान के डिब्बे और न जाने क्या-क्या लाद-फाद कर यात्रा में साथ ले जाना पड़ता था।

मेरे मामाजी की शादी पंजाब में होनी थी, जिसके लिए मेरी माताजी, मामाजी, मै और दो रिश्तेदार पंजाब मेल से कलकत्ता से फगवाड़ा जा रहे थे। यात्रा का दूसरा दिन था। शायद दोपहर का समय था। गाड़ी में टिकटों की जांच हो रही थी। जैसा कि मैंने जिक्र किया कि मैं काफी छोटा था। रेल द्वारा प्रदत्त मुफ्त यात्रा की सुविधा के हकदार के दायरे में। पर हमउम्र बच्चों से कुछ ज्यादा बड़ा दीखता था। प्रभू प्रदत्त इस नियामत पर जहां घर वाले फूले नहीं समाते थे वही बात ट्रेन के टी टी के गले नहीं उतर रही थी। कुछ झड़प सी हो गयी थी। काफी समझाने पर भी वह भला आदमी जबरदस्ती मुझे बड़ा साबित करने पर तुला था। अपन को इस वाद-विवाद की ना तो समझ थी ना ही कुछ लेना-देना, उलटे बड़ों को उधर उलझा देख अपने को बाहर झांकने का मौका और मिल गया था। गाड़ी अपनी पूरी रफ्तार से भागी जा रही थी। तभी अचानक डिब्बा एक तेज झटके से हिल उठा। मेरा सर जोर से खिड़की के किनारे से टकरा गया दर्द के मारे मैं अपना सर मल रहा था कि सारा वातावरण गहरे धूएँ से भर गया। यात्रियों में हडकंप मच गया। गाड़ी की गति धीरे-धीरे कम हो रही थी, कुछ देर बाद जब वह रुकी तो पुरुष उतर-उतर कर आगे इंजन की ओर भागे, महिलाएं बच्चों को संभाले बैठी थीं पर कुछ अनहोनी की आशंका की छाया सब के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। तभी कोई दौड़ता हुआ आया और उसने बताया कि गाड़ी एक ट्रक से टकरा गयी है। हुआ यह था कि गाड़ी को आते देख कर भी ट्रक चालक ने लाइन पार करनी चाही और हडबडी में ट्रक पटरियों के ऐन बीचो-बीच खडा हो गया। जैसा कि सबने बताया टक्कर के बाद ट्रक एक लम्बे शहतीर के रूप में परिवर्तित हो गया था और इंजन के आगे के हुक में फंस लटक गया था। यदि वह इंजिन के नीचे आ जाता तो डिब्बों को पलटने में देर नहीं लगनी थी और सैंकड़ों जानों के जाने का खतरा था। जो लोग पीछे गए थे घटनास्थल तक, उन्होंने बताया कि ट्रक चालक शायद अपने बच्चों के लिए खिलौने, कपडे ले कर जा रहा था। गाड़ी के चक्के, बाल, खून, कपड़ों इत्यादि से लिथड़े पड़े थे। वहीं टूटे खिलौने, घर की जरूरतों का सामान, महिलाओं के कपडे वगैरह बिखरे पड़े थे। सारा माहौल गमगीन हो गया था। गाड़ी उस सुनसान इलाके में करीब ६-७ घंटे खडी रही। हमारा डिब्बा एक परिवार का रूप ले चुका था। बच्चों के लिए जिससे जो बन पा रहा था वह खाने का इंतजाम कर रहा था पर किसी भी तरह कुछ भी पूरा नहीं पड़ रहा था। इसी बीच आस-पास के गाँव वालों को खबर लग गयी थी। उनसे जो बन पाया था लेकर, दर्जनों लोग आ जुटे थे, गाड़ी के यात्रियों की सहायता के लिए। वही टी टी महोदय जो मेरे को लेकर कुछ घंटों पहले वाद विवाद कर रहे थे, मेरे लिए पता नहीं कहाँ से कुछ चने और मूंगफली ले आए। साथ ही बैठ कर एक दूसरे के बारे में बातें होती रहीं। ट्रेन के चालक और गार्ड घूम-घूम कर लोगों का हौसला बंधाते रहे। उन्हीं ने बताया कि इस इंजन को वह देवता की तरह पूजते हैं। जाने अनजाने कई मुश्किलातें आईं पर इस इंजन के कारण कभी भी किसी यात्री को एक खरोंच तक नहीं आई।

काफी देर बाद गाड़ी आगे बढी पर तब तक जैसे सारे यात्री एक ही परिवार का अंग हो गए थे।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

क्या इंजिन पर शैतान का साया था ?

D326 यह नम्बर है एक इंजिन का। जो शायद दुनिया का सबसे 'कुख्यात' रेलवे इंजिन है। आज भी इंग्लैंड के लोगों का मानना है कि इस पर किसी शैतान का साया था। यह धारणा ऐसे ही नहीं बन गयी थी, इसके पीछे बहुत सारे ठोस कारण थे।

इस इंजिन का निर्माण 1962 में हुआ था। उसी साल इसकी टक्कर दूसरी रेल गाडी से हो गयी जिसमें 18 लोगों की मौत हो गयी और करीब 35 लोग घायल हो गये थे। करीब 6-7 महीने की मरम्मत के बाद जब फिर यह पटरी पर आया तो 1963 की 8 अगस्त को इससे जुड़ी गाड़ी में उस समय की सबसे बड़ी डकैती पड़ गयी। जिस पर बाद मे एक सफल फिल्म का निर्माण भी किया गया था। कुछ दिनों बाद 1964 में इस पर काम करते एक कर्मचारी की करंट लगने से मौत हो गयी। इसके साथ घटने वाली छोटी-मोटी दुर्घटनाओं की तो कोई गिनती ही नहीं थी। 1965 में तेज गति से चलते समय इसके सारे 'ब्रेक' फेल हो गये, घबड़ाहट में इसके चालक की ह्रदय गति थमने से मृत्यु हो गयी, रेल्वे कर्मचारियों की सूझ-बूझ से इसकी पटरी बदल इसे एक खड़ी मालगाड़ी से टकरवा कर रोका गया, जिससे एक बड़ी दुर्घटना घटने से बच गयी, सिर्फ कुछ लोगों को मामूली चोटें आयीं थीं।

जब किसी भी तरह इसके साथ या इसके द्वारा होने वाली दुर्घटनाओं को नहीं रोका जा सका तो इसे रिटायर कर यार्ड़ में खड़ा कर दिया गया।

रविवार, 25 सितंबर 2011

मैंड्रीन, एक इंद्रधनुषीय बंदर

ज्यादातर यही देखा और जाना गया है कि प्रकृति ने पक्षियों या कीट-पतंगों को ही बहुरंगों से नवाजा है। थलचरों को रंग-बिरंगा होने का सौभाग्य नहीं मिल पाया है। पर पश्चिमी अफ्रिका के घने जंगलों में पाई जाने वाली बंदरों की एक प्रजाति "मैंड्रीन" एक अपवाद है। कुछ-कुछ कुत्ते जैसे मुंह, इंसानों जैसी आखों, पीली दाढी, बीच-बी में धारियों वाली नीली नाक, गुलाबी जबडे, कुछ बड़े चमकीले "पिछले हिस्से" तथा रंग-बिरंगे हाथ पैर वाला बंद बहुत खूबसूरत लगता है। बबून की इस प्रजाति के बाल बहुत घने और मुलायम होते हैं। इसका वजन करीब 50 की.ग्रा. तथा ऊंचाई 150 सें मी इसे दुनिया का सबसे बडा बंदर बनाती है। प्रकृति ने इन्हें आत्म-रक्षा के लिए नुकीले तथा मजबूत दांत प्रदान किए हैं। पर इस जाति की मादा अपने नर से करीब आधी कद-काठी की ही होती है। इसका भोजन फल-फूल, कीड़े-मकोड़े तथा छोटे जीव हैं इसीलिए यह ज्यादातर जमीन पर ही विचरता है। पर आराम या सोना पेड़ों पर पसंद करता है।

मैंड्रीन झुंड में रहना पसंद करते हैं, जिसमे इनकी संख्या 200 तक हो सकती है। परिवार की बात करें तो एक नर के साथ 10 से 15 तक मादा और बच्चे होते हैं। यह स्तनपायी जीव बेहद शर्मीला होता है जिसके रंग उत्तेजित अवस्था में और भी चट और मकदार हो जाते हैं।

अब कटते जंगलों और इनके शिकार के कारण इनके अस्तित्व पर भी खतरे के बादल मंडराने लगे हैं।

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

कई बार ब्लोगर भाईयों से कुछ साझा करने की इच्छा होती है

समय चक्र कब कौन सा रुख करेगा, कौन समझ पाया है। इंसान अच्छे के लिए कुछ करता है पर हो कुछ और जाता है। मन मुताबिक़ न होने से मन इतना खिन्न हो उठता है कि वह प्रभू को भी दोष देने लगता है। उसे लगता है कि जब उसने कभी किसी का दिल नहीं दुखाया, किसी का बुरा नहीं किया, खुद तकलीफ सह दूसरों का ख्याल रखा तो फिर उसके साथ नाइंसाफी क्यों?

ऐसे ही दौर से करीब एक-डेढ़ साल से गुजर रहा हूँ। अन्दर ही अन्दर असंतोष, क्रोध, बेचैनी जैसे भाव सदा दिलो-दिमाग को मथते रहते हैं, जिनको कभी किसी पर जाहिर नहीं किया। लोगों को यही लगता रहा कि यह इंसान सर्वसुख से संपन्न, चिंता रहित, हर तरह के तनाव से मुक्त, खुशहाल जिन्दगी का स्वामी है। पर किसी को पता नहीं है कि अन्दर ही अन्दर किसी बहुत करीबी द्वारा पीठ पर किए गए वार से क्षुभित है। इसलिए नहीं कि अगले ने धोखा दिया, इसलिए कि दिलो-दिमाग के न चाहने के बावजूद उस शख्स को अपना बनाया। क्षोभ अपने पर है अपने गलत निर्णय पर है।
उसके बारे में उसी के हितैषियों ने भी आगाह किया था. कई लोगों के समझाने के बावजूद मन में कहीं विश्वास था कि अपने गलत कार्यों पर उसे कभी न कभी पछतावा जरूर होगा, क्योंकि वह जानता है कि वह जो भी कर रहा है वह गलत है, जो भी कह रहा है वह झूठ है, बेजा फ़ायदा उठाने की एक घृणित चाल है। पर मेरी इस चुप्पी या उसे सुधरने के लिए समय देने के मेरे फैसले को उसने मेरी कमजोरी समझा और इसीसे शायद उत्साहित हो वह और ओछी हरकतों पर उतर आया है।

इन सब से न मैं घबडाया हूँ न ही चिंतित हूँ। पर पानी सर से ऊपर जा रहा है।






रविवार, 18 सितंबर 2011

घुटने में अभी भी हेड़ेक है

बात पिछले से भी पिछले मंगलवार की है,यानि 6/9/11 की। दोपहर करीब दो बजे का समय था। रिमझिम फुहारें पड़ रही थीं सो उनका आनंद लेने के लिए पैदल ही घर की ओर निकल पड़ा। यही बात इंद्रदेव को पसंद नहीं आई कि एक अदना सा इंसान उनसे डरने के बजाय खुश हो रहा है बस उन्होंने उसी समय अपने सारे 'शावरों' का मुंह एक साथ पूरी तरह खोल दिया। अचानक आए बदलाव ने अपनी औकात भुलवा दी और बिना कुछ सोचे समझे मुझसे सौ मीटर की दौड लग गयी। उस समय तो कुछ महसूस नहीं हुआ पर रात गहराते ही घुटने में दर्द ने अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी। जिसने नजरंदाज रवैये के कारण दो दिनों की अनचाहा अवकाश लेने पर मजबूर कर दिया। इलाज करने और मर्ज बढने के मुहावरे के सच होने के बावजूद अपनी अच्छी या बुरी जिद के चलते मैने किसी "डागदर बाबू" को अपनी जेब की तलाशी नहीं लेने दी। जुम्मा-जुम्मा करते 12-13 दिन हो गये पर दर्द महाशय घुटने के पेचो-खम मे ऐसे उलझे थे कि निकलने का नाम ही नहीं ले रहे।

अब जैसा रिवाज है, तरह-तरह की नसीहतें, हिदायतें तथा उपचार मुफ्त में मिलने शुरु हो गये। अधिकांश तो दोनों कानों से आवागमन की सहूलियत देख हवा में जा मिले पर कुछ अपने-आप को सिद्ध करने के लिए डटे रह गये। सर्व-सुलभ उपायों को खूब आजमाया गया। 'फिलिप्स' कंपनी की लाल बत्ती का सेक दिया गया, अपने नामों को ले कर मशहूर मलहमें पोती गयीं, सेंधा नमक की सूखी-गीली गरमाहट को आजमाया गया पर हासिल शून्य बटे सन्नाटा ही रहा। फिर बाबा रामदेव की "पीड़ांतक" का नाम सामने आया, उससे कुछ राहत भी मिलती लगी, हो सकता है कि अब तक दर्द भी एक जगह बैठे-बैठे शायद ऊब गया हो, सही भी है उसे और भी घुटने-कोहनियां देखनी होती हैं खाली मेरे यहां जमे रहने से उसकी दाल-रोटी तो नहीं चलनी थी तो अब पूर्णतया तो नहीं पर आराम है।

जो होना था वह हुआ और अच्छा ही हुआ क्योंकि इससे एक सच्चाई सामने गयी। बहुत दिनों से बहुत बार बहुतों से बहुतों के बारे में सुनते रहे हैं कि फलाने का दिमाग घुटने में है। आज तक इस बात को हल्के-फुल्के अंदाज में ही लिया जाता रहा है। पर अब मुझे पूरा विश्वास हो गया है कि यह मुहावरा यूंही नहीं बना था इसमें पूरी सच्चाई निहित थी। आप बोलेंगे कि वह कैसे? तो जनाब इन 12-13 दिनों में बहुत कोशिश की, बहुतेरा ध्यान लगाया, हर संभव-असंभव उपाय कर देख लिया पर एक अक्षर भी लिखा ना जा सका। जिसका साफ मतलब था कि यह सब करने का जिसका जिम्मा है वह तो हालाते-नासाज लिए घुटने में बैठा था। इस हालात में वह अपनी चोट संभालता कि मेरे अक्षरों पर ध्यान देता ?

रविवार, 11 सितंबर 2011

गणपति बप्पा का जाना

अब उस स्थान का खालीपन, जहां गजानन विराजमान थे, काटने को दौड़ता है। आते-जाते बरबस निगाहें उस ओर उठ कुछ तलाशने लगती हैं। फिर मन अपने आप को तैयार करने लगता है अगले वर्ष उनके आने तक के इंतजार के लिए।

वैसे तो प्रभू अंतर्यामी हैं, सर्वव्यापी हैं। पर इन बीते दस दिनों में ऐसा लगता है कि वे साक्षात हमारे साथ हैं। मान्यता भी है कि इन दस दिनों में प्रभू धरा पर विचरण करते हैं। शांत, सच्चे, सरल ह्रदय से ध्यान लगाएं तो इसका आभास भी निश्चित होता है।

साल भर के लम्बे इंतजार के बाद कहीं जा कर वह दिन आता है जब श्री गणेश की चरणरज से घर-आंगन पवित्र हो पाता है। ऐसा लगने लगता है कि दूर रह रहे किसी आत्मीय, स्वजन का आगमन हुआ हो। जो अपनी गोद में हमारा सिर रख प्यार से सहलाते हुए हमारे सारे दुख-र्द, परेशानियां, विघ्न, संकट दूर कर अपनी छत्र-छाया में हमें ले लेता है। होता भी ऐसा ही है इन दिनों तन-मन-माहौल, सारा परिवेश मानो मंगलमय हो उठता है, अबाल-वृद्ध, नर-नारी सब पुल्कित हो आनंदसागर में गोते लगाने लगते हैं। एक सुरक्षा की भावना सदा बनी रहने लगती है। लगता है कि कोई है, आस-पास, जो सदा हमारी फिक्र करता है, हमारे विघ्नों का नाश करता है, जो सदा हमारे भले की ही सोचता है।

रोज घर से, उसे प्रणाम कर, निकलते समय ऐसा आभास होता है कि कोई बुजुर्ग अपनी स्नेहिल दृष्टि से हमें आप्लावित कर अपने वरद हस्त से रक्षा और सफलता की आशीष दे रहा हो। दिन भर काम के दौरान भी एक दैवीय सकून सा बना रहता है। संध्या समय लगता है कि परिवार के अलावा भी कोई हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। लौट कर उनके दर्शन कर यह महसूस होता है जैसे कि वे हमारा ही इंतजार कर रहे हों। इतना ही नहीं उनके आने से आस-पड़ोस के परिवार भी एक आत्मीयता के सुत्र में बंध जाते हैं। अपने-अपने काम में मशगूल हरेक इंसान जो चाह कर भी अपने आत्मीय जनों से हफ्तों मिल नहीं पाता उसकी यह कसक भी इन दिनों दूर हो जाती है जब संध्या समय सब जन पूजा-अर्चना, आरती के समय एकत्र होते हैं।

पता ही नहीं चला कैसे दस दिन बीत गये। कल वह दिन भी आ गया जब हमारे गणपति बप्पा को वापस शिव-लोक जाना था। मन एक-दो दिन पहले से ही उदास था। पर जाना तो था ही।
जब बप्पा का आगमन हुआ था तब भी सब की आंखों में आंसू थे जो खुशी के अतिरेक में लछला आए थे। आज भी रुंधे गले के साथ सब की आंखें अश्रुपूरित थीं जो उनकी विदाई के कारण सूखने का नाम ही नहीं ले रहे थे। हालांकि स्पष्ट लग रहा था कि प्रभू कह रहे हैं, दुखी मत हो, मैं सदा तुम्हारे साथ हूं और अगले साल फिर आऊंगा ही। पर मन कहां मानता है।

अब उस स्थान का खालीपन, जहां गजानन विराजमान थे, काटने को दौड़ता है। आते-जाते बरबस निगाहें उस ओर उठ कुछ तलाशने लगती हैं। फिर मन अपने आप को तैयार करने लगता है अगले वर्ष उनके आने तक के इंतजार के लिए।

शुक्रवार, 9 सितंबर 2011

शिवजी और माता पार्वती को ही अपने पुत्र से मिलने दक्षिण जाना पड़ता है।

यह कहानी बच्चों को सिखाती है अपने माता-पिता का अज्ञाकारी होना, उनका आदर करना, उनको सदा खुश रखना पर कहीं ना कहीं एक कसक भी छोड़ जाती है।

बचपन में चंचल तथा छोटे होने के कारण भगवान शिव तथा माता पार्वती, श्री गणेशजी का ध्यान तथा ख्याल रखते थे। कुछ दिनों तक तो ठीक रहा पर धीरे-धीरे कार्तिकेयजी को लगने लगा कि उनकी उपेक्षा हो रही है और पिता-माता उन्हें कम चाहते हैं। यह बात उन्होंने शिवजी से कही। प्रभू ने उन्हें समझाया कि ऐसी बात नहीं है तुम दोनों समान रूप से हमें प्यारे हो। पर कार्तिकेयजी को तसल्ली नहीं हुई। वे अनमने से, उदास से रहने लगे। बात बनती ना देख शिवजी ने माता पार्वती से सलाह कर इस गुत्थी का एक हल निकाला। उन्होंने सब को बुला कर कहा कि जो भी पृथ्वी के तीन चक्कर लगा उस पर स्थित सारे तीर्थों की परिक्रमा कर सबसे पहले हमारे पास आएगा उसे ही गणनायक की उपाधि दी जाएगी और वह सबसे सम्मान पाने का हकदार होगा।

निश्चित दिन और समय पर सारे देवी-देवताओं, ऋषि-मुनियों की उपस्थिति में, प्रभू का इशारा पाते ही कार्तिकेयजी अपने वाहन मोर पर सवार हो धरा की परिक्रमा करने निकल पड़े। इधर गणेशजी पेशोपेश में थे। एक तो उनका भीमकाय शरीर दूसरा अदना सा चूहा, जिस पर सवार हो यदि वे निकलते तो एक ही चक्कर लगाने में उन्हें हफ्तों लग जाते। पर वे विवेकशील, विद्यावान तथा ग्रन्थों के ज्ञाता थे। जिनमें बताया गया है कि माता-पिता के दर्शन सारे तीर्थों के दर्शन से मिलने वाले पुण्य से भी ज्यादा फल देते हैं। ऐसा याद आते ही उन्होंने शिवजी और माता पार्वती की तीन बार परिक्रमा की और उन्हें प्रणाम कर उनके चरणों में बैठ गये। सबने एक स्वर से उन्हें विजेता घोषित कर दिया।

कुछ समय पश्चात जब कार्तिकेयजी धरती की परिक्रमा कर वापस आए और उन्हें इस बात का पता चला तो वे बहुत खिन्न हो गये। उन्होंने उसी समय घर त्यागने की घोषणा कर दी। सब के बहुत समझाने पर भी वे नहीं माने और कैलाश छोड़ दक्षिण दिशा में रहने चले गये और फिर कभी लौट कर घर नहीं आए। शिवजी और माता पार्वती को ही अपने पुत्र से मिलने दक्षिण जाना पड़ता है।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...