दो-तीन दिन पहले एक विदेशी रेल इंजिन का जिक्र किया था जो कई हादसों से जुड़ कर कुख्यात हो गया था और फिलहाल यार्ड में पडा, खडा है। इसी के चलते बचपन के एक रेल हादसे की याद आ ग
यी। उस समय गाड़ियों में इतनी भीड़-भाड नहीं होती थी, ना ही इतनी गाड़ियां ही होती थीं। बड़े स्टेशनों के बीच दूरगामी गाड़ियां ज्यादातर दो ही होती थीं। एक मेल दूसरी एक्सप्रेस। जैसे मद्रास मेल, मद्रास एक्सप्रेस। बाम्बे मेल, बाम्बे एक्सप्रेस इत्यादि। लम्बी दूरी की गाड़ियों में ज्यादातर कनाडा के बने 'कनेडियन इंजन' लगा करते थे।
यी। उस समय गाड़ियों में इतनी भीड़-भाड नहीं होती थी, ना ही इतनी गाड़ियां ही होती थीं। बड़े स्टेशनों के बीच दूरगामी गाड़ियां ज्यादातर दो ही होती थीं। एक मेल दूसरी एक्सप्रेस। जैसे मद्रास मेल, मद्रास एक्सप्रेस। बाम्बे मेल, बाम्बे एक्सप्रेस इत्यादि। लम्बी दूरी की गाड़ियों में ज्यादातर कनाडा के बने 'कनेडियन इंजन' लगा करते थे। मैं बहुत छोटा था सो सब कुछ विस्तार से तो याद नहीं है पर इतना याद है कि कलकत्ता से पंजाब तीसरे दिन पहुंचना होता था। दो-दो रातें गाड़ी में काट कर जब कोई अपने गन्तव्य पर पहुंचता था तो इंजन के धूएँ, रास्ते की धूल-मिट्टी से संवरे चेहरे को पहचानना मुश्किल हो जाता था। उन दिनों डिब्बों की खिड़कियों में सलाखें भी नही हुआ करती थीं। बच्चे सर निकाल-निकाल कर बाहर के नज़ारे देखने की कोशिश में आँखों में कोयले के कण डलवा कर माँ-बाप की डांट खाया करते थे। आज की तरह की सहूलियतें भी नहीं थीं। लोग-बाग़ जैसे पूरी गृहस्ती ही लेकर चला करते थे। ठंड के दिनों में तो मनों सामान ढोना पड़ता था। बड़े-बड़े 'होल्डाल' जिनमें रजाईयां, कम्बल, चादरें, तकिए, तौलिए इत्यादि भरे रहते थे। लोहे के ट्रंक जिन्हें रखने की जद्दोजहद करनी पड़ती थी। पानी के लिए सुराहियाँ, खाने के सामान के डिब्बे और न जाने क्या-क्या लाद-फाद कर यात्रा में साथ ले जाना पड़ता था।
मेरे मामाजी की शादी पंजाब में होनी थी, जिसके लिए मेरी माताजी, मामाजी, मै और दो रिश्तेदार पंजाब मेल से कलकत्ता से फगवाड़ा जा रहे थे। यात्रा का दूसरा दिन था। शायद दोपहर का समय था। गाड़ी में टिकटों की जांच हो रही थी। जैसा कि मैंने जिक्र किया कि मैं काफी छोटा था। रेल द्वारा प्रदत्त मुफ्त यात्रा की सुविधा के हकदार के दायरे में। पर हमउम्र बच्चों से कुछ ज्यादा बड़ा दीखता था। प्रभू प्रदत्त इस नियामत पर जहां घर वाले फूले नहीं समाते थे वही बात ट्रेन के टी टी के गले नहीं उतर रही थी। कुछ झड़प सी हो गयी थी। काफी समझाने पर भी वह भला आदमी जबरदस्ती मुझे बड़ा साबित करने पर तुला था। अपन को इस वाद-विवाद की ना तो समझ थी ना ही कुछ लेना-देना, उलटे बड़ों को उधर उलझा देख अपने को बाहर झांकने का मौका और मिल गया था। गाड़ी अपनी पूरी रफ्तार से भागी जा रही थी। तभी अचानक डिब्बा एक तेज झटके से हिल उठा। मेरा सर जोर से खिड़की के किनारे से टकरा गया दर्द के मारे मैं अपना सर मल रहा था कि सारा वातावरण गहरे धूएँ से भर गया। यात्रियों में हडकंप मच गया। गाड़ी की गति धीरे-धीरे कम हो रही थी, कुछ देर बाद जब वह रुकी तो पुरुष उतर-उतर कर आगे इंजन की ओर भागे, महिलाएं बच्चों को संभाले बैठी थीं पर कुछ अनहोनी की आशंका की छाया सब के चेहरे पर साफ नजर आ रही थी। तभी कोई दौड़ता हुआ आया और उसने बताया कि गाड़ी एक ट्रक से टकरा गयी है। हुआ यह था कि गाड़ी को आते देख कर भी ट्रक चालक ने लाइन पार करनी चाही और हडबडी में ट्रक पटरियों के ऐन बीचो-बीच खडा हो गया। जैसा कि सबने बताया टक्कर के बाद ट्रक एक लम्बे शहतीर के रूप में परिवर्तित हो गया था और इंजन के आगे के हुक में फंस लटक गया था। यदि वह इंजिन के नीचे आ जाता तो डिब्बों को पलटने में देर नहीं लगनी थी और सैंकड़ों जानों के जाने का खतरा था। जो लोग पीछे गए थे घटनास्थल तक, उन्होंने बताया कि ट्रक चालक शायद अपने बच्चों के लिए खिलौने, कपडे ले कर जा रहा था। गाड़ी के चक्के, बाल, खून, कपड़ों इत्यादि से लिथड़े पड़े थे। वहीं टूटे खिलौने, घर की जरूरतों का सामान, महिलाओं के कपडे वगैरह बिखरे पड़े थे। सारा माहौल गमगीन हो गया था। गाड़ी उस सुनसान इलाके में करीब ६-७ घंटे खडी रही। हमारा डिब्बा एक परिवार का रूप ले चुका था। बच्चों के लिए जिससे जो बन पा रहा था वह खाने का इंतजाम कर रहा था पर किसी भी तरह कुछ भी पूरा नहीं पड़ रहा था। इसी बीच आस-पास के गाँव वालों को खबर लग गयी थी। उनसे जो बन पाया था लेकर, दर्जनों लोग आ जुटे थे, गाड़ी के यात्रियों की सहायता के लिए। वही टी टी महोदय जो मेरे को लेकर कुछ घंटों पहले वाद विवाद कर रहे थे, मेरे लिए पता नहीं कहाँ से कुछ चने और मूंगफली ले आए। साथ ही बैठ कर एक दूसरे के बारे में बातें होती रहीं। ट्रेन के चालक और गार्ड घूम-घूम कर लोगों का हौसला बंधाते रहे। उन्हीं ने बताया कि इस इंजन को वह देवता की तरह पूजते हैं। जाने अनजाने कई मुश्किलातें आईं पर इस इंजन के कारण कभी भी किसी यात्री को एक खरोंच तक नहीं आई।
काफी देर बाद गाड़ी आगे बढी पर तब तक जैसे सारे यात्री एक ही परिवार का अंग हो गए थे।




